राष्ट्रमत न्यूज,रीवा(ब्यूरो)।रीवा की राजनीति में परिसीमन के बाद बड़ा बदलाव होना तय है। विधानसभा क्षेत्रों का भूगोल बदलेगा तो नेताओं की चुनावी जमीन भी बदलेगी। राजेंद्र शुक्ला की लोकसभा पर नजर, तो अभय मिश्रा के सामने भी अपना सियासी किला बचाने की चुनौती। जनार्दन मिश्रा सेमरिया से विधानसभा चुनाव लड़ेंगे । आने वाले चुनावों में रीवा की सियासत इसी नए समीकरण के इर्द-गिर्द घूमती दिखाई देगी।

भय में अभय, रीवा पर नजर
सेमरिया विधायक अभय मिश्रा के लिए आने वाला विधानसभा चुनाव आसान नहीं होगा। भाजपा सरकार के कारण क्षेत्र में किए गए वादों को पूरा कराने की उनकी सीमाएं सामने आई हैं। यही वजह है कि अभय मिश्रा अब रीवा विधानसभा के मुद्दों पर भी सक्रिय हो रहे हैं। धरना-प्रदर्शन से लेकर गिरफ्तारी देने तक और उपमुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ला पर लगातार हमले करने तक, उनकी राजनीति का दायरा सेमरिया से बाहर निकलता दिखाई दे रहा है।अभय मिश्रा समझ रहे हैं कि आने वाले समय में सेमरिया की राजनीति उनके लिए चुनौतीपूर्ण होगी। इसलिए रीवा विधानसभा में अपनी राजनीतिक जमीन तैयार करना उनकी रणनीति का हिस्सा है। परिसीमन के बाद जब विधानसभा क्षेत्रों की संरचना बदलेगी, तब अभय मिश्रा की राजनीति का नया केंद्र रीवा बन सकता है।

जनार्दन ही सेमरिया क्यों?
भाजपा सांसद जनार्दन मिश्रा को अब विधानसभा की राजनीति में उतारने का रास्ता तैयार किया जाएगा। पिछली बार भी उन्हें सेमरिया से विधानसभा चुनाव लड़ाने की बात चली थी, लेकिन उन्होंने इसे अपनी लोकसभा टिकट कटवाने की कोशिश बताया था। उनका तर्क था कि विरोधी चाहते हैं कि वह अभय मिश्रा के सामने चुनाव लड़ें और हार जाएं।लेकिन अब राजनीतिक परिस्थितियां बदल रही हैं। भाजपा को रीवा लोकसभा सीट पर नया चेहरा उतारना होगा तो जनार्दन मिश्रा के लिए सेमरिया का रास्ता खुलेगा। सतना में गणेश सिंह को विधानसभा चुनाव लड़ाने का उदाहरण भी भाजपा की रणनीति को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।जनार्दन मिश्रा के सामने अब विधानसभा की राजनीति में लौटने की चुनौती होगी। रीवा की लोकसभा सीट पर राजेंद्र शुक्ला की दावेदारी मजबूत होती है तो जनार्दन मिश्रा को सेमरिया की ओर जाना पड़ सकता है।

राजेंद्र शुक्ला क्यों लड़ेंगे लोकसभा चुनाव?
उपमुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ला जानते हैं कि प्रदेश की राजनीति में आगे बढ़ने के लिए केवल पद पर बने रहना पर्याप्त नहीं है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के रहते मुख्यमंत्री पद की राह आसान नहीं है। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष का पद भी उनके लिए स्वतः उपलब्ध विकल्प नहीं है। भाजपा की राजनीति में ओबीसी, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के समीकरणों के साथ ब्राह्मण प्रतिनिधित्व का संतुलन भी महत्वपूर्ण है।राजेंद्र शुक्ला को उपमुख्यमंत्री बनाए जाने के पीछे प्रदेश का सामाजिक और राजनीतिक संतुलन भी एक कारण माना गया। लेकिन अगली बार यही समीकरण उनके पक्ष में बने रहेंगे, इसकी गारंटी नहीं है।

सीएम और राजेन्द्र के बीच खटपट
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और उपमुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ला के बीच प्रशासनिक फैसलों को लेकर समय-समय पर चर्चा होती रही है। बालाघाट में सीएचएमओ की नियुक्ति को लेकर डॉ. मनोज पांडेय और डॉ. दहिया के नामों से जुड़ा घटनाक्रम भी इसी संदर्भ में देखा गया। डॉ मनोज पांडेय रीवा के हैं इसलिए राजेन्द्र शुक्ला उन्हें सीएचएमओ बना दिये लेकिन मुख्यमंत्री ने उनकी जगह जबलपुर के शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ शत्रुध्न दाहिया को बना दिया। गत दिनों पार्टी की बैठके में भी मोहन यादव ने जहरीली सिरप से हुई मौत पर राजेन्द्र शुक्ला की खूब खिंचाई की थी।राजेंद्र शुक्ला के सामने अपनी राजनीतिक हैसियत बनाए रखने की चुनौती है। स्वास्थ्य व्यवस्था से जुड़े विवादों और संजय गांधी अस्पताल की घटनाओं ने भी उनकी राजनीतिक छवि को लेकर सवाल खड़े किए हैं। ऐसे में लोकसभा चुनाव उनके लिए प्रदेश की राजनीति से आगे राष्ट्रीय राजनीति में अपनी भूमिका बनाने का रास्ता हो सकता है।

वीरेंद्र गुप्ता को मिलेगी रीवा विधानसभा?
राजेंद्र शुक्ला यदि लोकसभा चुनाव लड़ते हैं तो रीवा विधानसभा सीट पर भाजपा को नया चेहरा उतारना होगा। ऐसे में पूर्व महापौर और भाजपा नेता वीरेंद्र गुप्ता का नाम सामने आएगा। व्यापारी वर्ग में उनकी पकड़ और संगठन में उनकी भूमिका उन्हें इस दौड़ में महत्वपूर्ण बना सकती है।वीरेंद्र गुप्ता को संगठन में जिम्मेदारी दिए जाने के राजनीतिक मायने भी इसी संदर्भ में देखे जा सकते हैं। राजेंद्र शुक्ला के साथ उनकी बढ़ती नजदीकी भविष्य के चुनावी समीकरणों का हिस्सा बन सकती है।वहीं, नगर निगम अध्यक्ष वेंकटेश पांडेय की भूमिका स्थानीय राजनीति तक सीमित रह सकती है। दूसरी ओर, पूर्व विधायक केपी त्रिपाठी के लिए अगला विधानसभा चुनाव कठिन चुनौती लेकर आएगा। महिला सीएसपी से कथित अभद्रता के विवाद ने उनकी राजनीतिक छवि को नुकसान पहुंचाया था। भाजपा में उनकी अगली भूमिका संगठन के फैसले पर निर्भर करेगी।

कांग्रेस में राजेंद्र या कविता?
रीवा विधानसभा की राजनीति में कांग्रेस के सामने भी उम्मीदवार चयन का सवाल होगा। प्रदेश कांग्रेस महासचिव कविता पांडेय और जिला ग्रामीण कांग्रेस अध्यक्ष इंजीनियर राजेंद्र शर्मा की दावेदारी महत्वपूर्ण होगी।यदि अभय मिश्रा सेमरिया से चुनाव लड़ते हैं तो रीवा की शहरी और ग्रामीण विधानसभा सीटों पर कांग्रेस को नए सिरे से समीकरण बनाना होगा। राजेंद्र शर्मा और कविता पांडेय के बीच टिकट की प्रतिस्पर्धा तेज होगी।महापौर अजय मिश्रा बाबा भी विधानसभा की टिकट के दावेदार हो सकते हैं। ऐसे में कविता पांडेय के लिए रास्ता आसान नहीं होगा। हालांकि, पिछली बार टिकट नहीं मिलने के बाद इस बार उनकी दावेदारी को नजरअंदाज करना भी कांग्रेस के लिए आसान नहीं होगा।कविता पांडेय के सामने सबसे बड़ी चुनौती पार्टी के भीतर अपने समर्थन को मजबूत करने की होगी। श्रीनिवास तिवारी जैसे प्रभावशाली नेता का राजनीतिक संरक्षण अब उनके पास नहीं है। दूसरी ओर, राजेंद्र शर्मा की संगठनात्मक भूमिका और अजय मिश्रा बाबा की राजनीतिक महत्वाकांक्षा टिकट का समीकरण उलझा सकती है।

परिसीमन बदलेगा रीवा की सियासत
परिसीमन के बाद रीवा की राजनीति में केवल विधानसभा क्षेत्रों का भूगोल नहीं बदलेगा, बल्कि कई नेताओं की राजनीतिक दिशा भी बदल जाएगी। राजेंद्र शुक्ला की नजर लोकसभा पर होगी, जनार्दन मिश्रा को विधानसभा की राजनीति में लौटना पड़ सकता है और अभय मिश्रा रीवा में अपनी जमीन मजबूत करने की कोशिश करेंगे।भाजपा में वीरेंद्र गुप्ता जैसे नेताओं के लिए नए अवसर खुल सकते हैं, जबकि कांग्रेस को कविता पांडेय, राजेंद्र शर्मा और अजय मिश्रा बाबा के बीच संतुलन बनाना होगा।रीवा की सियासत में अगला बदलाव केवल टिकटों का फेरबदल नहीं होगा। यह उन नेताओं की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं का परिणाम होगा, जो बदलते परिसीमन के साथ अपनी नई जमीन तलाशेंगे। चुनाव आने तक तस्वीर साफ हो जाएगी, लेकिन उसके संकेत अभी से दिखाई देने लगे हैं।