प्रगति गुप्ता की कविता - rashtrmat.com

प्रगति गुप्ता की कविता

प्रगति गुप्ता की पहली कविता सिखाती है कि प्रेम का सबसे बड़ा रूप त्याग और विदा को स्वीकार करना है; दूसरी कविता कहती है कि सच्चा प्रेम या आत्मीयता दूरी और समय से समाप्त नहीं होती, वह स्मृतियों और भावों में जीवित रहती है। इनकी कविता पढ़ें और आनंद लीजिये।

प्रगति गुप्ता \ कविता

माँ-बेटी 

आज जब करने लगी हूँ विदा

संस्कारों से पूर्ण कर तुम्हें,

चलचित्र-सा चलने लगा है

अपने घर द्वार लाने

और भेजने के बीच

मन मस्तिष्क में कहीं….

तुम्हें जन्म देकर

जिस चौखट से गोद में लेकर घर लाई,

उसी चौखट से विदा कर रही हूँ

नव सृजन हेतु कहीं….

तुम्हारा आना,

घर आँगन का जैसे

किलकारियों और

नन्हीं शरारतों से भर जाना था…

अब विदा करना

मेरे ही आँगन के

रीते होने से जुङा था…

इस आने और

विदा करने के बीच

असंख्य भावों से जुड़े पल

हमारे साथी रहे,

जिन्हें संजोकर हम

पल-पल रखते रहे …

तुम्हारे न होने पर भी

मेरा घर आँगन

तुम्हारी गूँजती आवाजों से

हरदम भरा रहना है,

तुमसे जुड़ी स्मृतियों के

एहसासों का सफ़र

हमारे होने तक

यूँ ही चलते रहना है…

पर हमारे रिश्ते से जुड़ा

सत्य यह भी है

बँधे हैं जिन कर्मों के चक्रों से

उनके सूत्रधार हम ही होते हैं

कभी बहुत कुछ देकर

तो कभी सामन्जस्य बिठाने को

समय के संग संग हम

बस खुद को

तैयार किया करते हैं….

  अपने आस-पास  

अपने आस-पास –

भीड़ भरे शब्दों के बीच

मैं खोजती रही

सिर्फ़ एक शब्द जो तुम्हारी

कमी से जुड़ा था,

उसी एक शब्द से

तुम्हारा अस्तित्व जुड़कर

मेरे अस्तित्व के

संग-संग चलने लगा था…

तुम्हारे महसूस करवाये

अहसासों ने

मेरे उन सोए हुए

भावों को उठा दिया,

जिनका वज़ूद वक़्त के

थपेड़ों में कहीं

गुम होने लगा था…

नहीं जानती इस यात्रा में

कौन कब तक

किसके साथ चलेगा,

पर मनों के मिलने से

तेरा मेरा प्रारब्ध

फिर कभी

एक साथ चलने को

एक दूजे के लिए जुटेगा….

– प्रगति गुप्ता

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