रमेश कुमार ‘रिपु’ की कहानी इक्कीस दिन का सच केवल एक चरवाहे की कहानी नहीं है, बल्कि सत्ता, न्याय, जनविश्वास और नैतिक साहस की कथा है। इसमें कई स्तरों पर संदेश छिपे हैं।सबसे पहला संदेश यह है कि ताकत का मूल्य उसके आकार में नहीं, उसके चरित्र में होता है।दूसरा संदेश यह है कि सत्ता जब अन्याय करती है,तो सच को कुछ समय के लिए दबा सकती है, मिटा नहीं सकती।
इक्कीस दिन का सच\ कहानी
गाँव की सुबह हमेशा धुएँ और ओस की मिली-जुली गंध से खुलती थी।लेकिन उस दिन जमींदार के आँगन में हुक्के की आग कुछ ज्यादा सुलग रही थी।
“उसे निकाल दो,” जमींदार ने कहा,“यह चरवाहा अब नरम पड़ गया है। गाँव को अब लठ चाहिए।”
पुराना चरवाहा सिर झुकाकर चला गया।गाँव में खबर फैली इलाहाबाद से लठबाज आ रहा है। पहलवान है। अकेले दस पर भारी।तीसरे दिन धूल उड़ाती बैलगाड़ी से वह उतरा। गठीला शरीर, चौड़े कंधे,आँखों में सीधी रेखा-सी सख्ती। कंधे पर चिकनी चमकदार लाठी।
उसका नाम रईस था।गाँव के चरवाहों ने दूरी बनाकर देखा।रामू ने फुसफुसाकर कहा, “यह हमें सीधा करने आया है।”
पहला सामना गांव के चरवाहों का रईस के साथ ऐसा हुआ की सब उसके दोस्त बन गए। वह जिससे भी मिला सभी के मन में तरह-तरह के सवाल उठ रहे थे। उसका दिल डॉल और शक्ल सूरत पहलवान जैसा तो था ही लेकिन उसके चेहरे की भंगिमा बता रही थी कि वह गुंडा भी है।
शाम ढल रही थी। सभी चरवाहे गाय भैंसों को हांक रहे थे गांव की ओर ले जाने के लिए। तभी खेतों के उस पार दलदल के पास अचानक हलचल हुई।रामू की एक भेड़ कीचड़ में धँस गई थी।
“अरे बचाओ!” रामू चिल्लाया। सभी चरवाहे एक दूसरे का मुंह देखने लगे। किसी की इतनी हिम्मत नहीं पड़ रही थी कि वह कीचड़ में कूदें।सब घबराए खड़े थे। तभी रईस आया। उसने बिना कुछ कहे लाठी दलदल में अड़ा दी।
“इसे पकड़। साथ खींचेंगे।”
रामू हिचकिचाया,फिर पकड़ लिया। नथुनी और गिरधारी भी जुट गए।काफी मशक्कत के बाद भेड़ बाहर आई।रामू की आँखें भर आईं।“क्यों किया?”
रईस ने शांत स्वर में कहा,“जान तेरी थी, पर दर्द सबका होता है।”
उस दिन पहली बार सभी चरवाहों को लगा कि हम जैसा सोच रहे हैं वैसा रईस नहीं है। इसके मन में हम लोगों के प्रति स्नेह और प्यार है। कहीं से भी आया हो लेकिन है तो यह इंसान ही। रईस भी अपनी पोटली खोला और सबके साथ मिलकर रोटी अचार खाने लगा। अब तो गांव के सभी चरवाहों का रईस दोस्त हो गया था।सब एक साथ गांव की गाय, भैंस और मवेशियों को लेकर जंगल की ओर जाते, और शाम को जब लौटते तो साथ ही लौटा करते थे।
दिन बीतते गए। रईस के प्रति अन्य चरवाहों के मन में जो गिले शिकवे थे वह काम होते गए।एक रात तालाब किनारे चरवाहों की टोली बैठी थी। चाँद पानी में टूट रहा था।
नथुनी ने पूछा,“सच बताओ, तुम्हें क्यों बुलाया गया है?”
रईस ने लाठी घुटनों पर टिकाई फिर कहा,“डर पैदा करने। ताकि कोई सिर न उठाए।”
रामू ने धीमे स्वर में कहा, हां बताओ तुम इलाहाबाद से यहाँ क्या करने आए हो ? तुम वहाँ भी किसी के यहाँ काम ही करते रहे होगे। उसे छोड़कर यहाँ किस मकसद से आए हो या फिर तुम्हें बुलाया गया है।”
रईस बोला, “ मैं पांडे जी के यहाँ काम करता था उन्होंने एक दिन कहा कि तुझे मेरे समधी के यहाँ जाना है। आज से तू वही काम करेगा। किसी तरह की शिकायत नहीं आनी चहिए।”
मैं कोई सवाल भी नहीं किया ,चला आया इसलिए कि मुझे तो काम करना ही है, चाहे यहाँ करूं या फिर दूसरे गाँव में जाकर। मैं पहलवानी वहाँ करता था इसके अलावा मुझ में खूबी है कि मैं लाठी बहुत तेज चला लेता हूँ। लेकिन तुम लोग डरो नहीं मैं बेवजह किसी को लाठी नहीं मारता।”
कुछ देर खामोशी रही। फिर रईस खुद बोल पड़ा।“इलाहाबाद में मेरे अब्बा पर भी झूठा इल्ज़ाम लगा था। भीड़ ने सच नहीं देखा,शक देखा। उस दिन सीखा,झूठ सबसे तेज लाठी है।”
उसकी आवाज में गुस्सा नहीं,थकान थी। गाँव के सभी चरवाहे रईस की बातें बड़े ध्यान से सुना फिर तय किया कि हम लोग जैसा सोच रहे हैं या फिर गाँव में जो बातें सुनी गई है, वैसा रईस नहीं है। यह वक्त का मारा हुआ है। उस रात से वे सिर्फ साथी नहीं रहे,एक टोली बन गए।
रामू की माँ बीमार पड़ी। दवा के पैसे नहीं थे।गिरधारी ने कहा, “मेरी बकरी बेच दूँ?”
नथुनी बोला, “मेरे पास थोड़े बचत हैं।”
रईस ने अपनी मज़दूरी का आधा हिस्सा आगे बढ़ाया।
रामू रो पड़ा,“तुम तो पराए थे।”
रईस मुस्कुराया,“पराया तब तक होता है,जब तक रोटी अलग पकती है।”
गाँव की बुज़ुर्ग चाची ने रईस को रोटी देते हुए कहा,“बेटा, बाहर से आया था, पर आज अपना लगता है।”
धीरे-धीरे चरवाहों की एकता गाँव में दिखने लगी।वे साथ चलते, साथ बैठते, साथ बोलते।
गाँव के मुखिया सुरेश दुबे तक यह बात पहुंची कि उसके समधी ने जो आदमी भेजे हैं काम करने के लिए वह तो दूसरे गोल में जाकर मिल गया। कामचोर रामू को मैंने जिस लिए निकाला, वह तो मिर्च नमक लगाकर रईस को मेरे खिलाफ भड़काने लगा होगा। न जाने वह उसके कान में क्या- क्या भरा होगा। यह सोचकर गांव के प्रधान सुरेश दुबे परेशान हो गए। उन्हें यह लगने लगा कि गाँव के सारे चरवाहे एक हो जाएंगे तो फिर मेरी मवेशी को कोई भी चराने नहीं ले जाएगा। इतना ही नहीं जिस दिन ये सब एक हो गए,उसी दिन उसकी कुर्सी की चारों टाँगें डगमगा जाएँगी।
उसने रईस को बुलाया।
“तुम्हें यहाँ इसलिए बुलाया था कि सब अलग रहें,और तुमने इन्हें एक कर दिया!”
रईस शांत रहा। कुछ देर बाद कहा,“एक साथ खड़े लोग डरते नहीं, मुखिया जी।”
यही वाक्य काँटे की तरह चुभ गया।
गाँव के मुखिया सुरेश दुबे तुरंत समझ गए आगे चलकर रईस उनके लिए कंटक बन सकता है। इसलिए भी की यह तो पहलवान है और लाठी चलाने में माहिर है। और ताकतवर आदमी के आगे सभी झुकते हैं। मुझे कुछ करना होगा। ताकि रईस मेरे दरवाजे से बाहर ना जा सके। यह बेवजह चला गया तो मेरे समधी मुझे ही चार बातें सुनाएंगे।
एक सुबह गाँव गाँव के लोग उठकर अपने मवेशियों को चारा दे रहे थे। कोई बाल्टी लेकर कुआं जा रहा पानी लेने तो कोई घांस काटने जा रहा था, तभी कुछ l लोगों ने शोर मचाया।मुखिया की गौशाला में गाय मर गई।गाय के शरीर पर दस गहरे निशान हैं।
गांव के प्रधान सुरेश दुबे ने पंचायत बुलाई। सभी पांच हैरान होकर मुखिया से पूछ रहे थे ऐसी क्या बात हो गई कि अपने पंचायत बुला ली।
गाँव के प्रधान सुरेश दुबे ने कहा कि बात ही ऐसी हो गई कि मुझे आप लोगों को बुलाना पड़ा। और मैं जो कहने जा रहा हूं उसे ध्यान से सुनें और अपने विवेक से उस पर फैसला सुनाए।
पंचायत बैठी।
मुखिया गरजा, मेरे गौशाला में एक गाय मर गई है। गाय के शरीर पर निशान है और यह निशान लाठी का है। बड़ी बेरहमी से मूक जानवर को लाठी से मारा गया है। आप सभी पंच चलाकर गौशाला में देख ले की गाय के शरीर पर लाठी के कितने निशान हैं।और सभी जानते हैं कि उसके शरीर पर जो लाठी के निशान पड़े हैं ऐसी लाठी इस गांव में सिर्फ एक आदमी के पास है। मैं जानता हूं कि मेरी बात पर आप लोग विश्वास नहीं करेंगे ,मैं यदि किसी का नाम लूंगा तो कई तरह के सवाल उठेंगे। इसलिए अच्छा होगा कि आप सभी पंच गौशाला में चलकर गाय को देख लें और खुद बताएं कि उसके शरीर पर लाठी के जो निशान है ,वह किसकी लाठी का है।
भीड़ की आँखें रईस पर।
रईस ने लाठी जमीन पर रख दी। वह गिड़गिड़ाते हुए कहा, माना कि मैं मुसलमान हूं लेकिन मैं गाय को अपनी रोजी-रोटी मानता हूं। उस पर लाठी मारना दूर की बात है,मैंने हाथ तक नहीं लगाया।”
लेकिन पंचायत ने उसकी कोई बात नहीं सुनी ना उसकी कोई दलील मुखिया के सामने चली। पंचोली उसे सजा सुना दी।इक्कीस दिन मुँह ढककर आज से गांव में भीख मांगोगे ।
रईस ने गमछा बाँध लिया।इक्कीस दिन वह दरवाजे-दरवाजे गया।पहले दिन रामू ने चुपचाप कटोरे में रोटी रखी।“हम जानते हैं,तुमने नहीं किया।”
दूसरे दिन नथुनी ने पानी दिया।तीसरे दिन गिरधारी ने कहा,“इक्कीस दिन गुजरेंगे, पर हम साथ हैं।”
रईस हर शाम तालाब किनारे बैठता।सोचता ,”क्या सच इतना हल्का है कि दस झूठे निशानों से दब जाए?”
पर इस बार वह अकेला नहीं था।चरवाहों की चुप्पी अब डर नहीं,रही थी।इक्कीसवें दिन चौपाल पर भीड़ जमा थी।रईस आया। चेहरा खुला। आँखें स्थिर।उसके पीछे रामू, नथुनी, गिरधारी और बाकी चरवाहे खड़े थे।
रईस ने लाठी उठाई,फिर चौपाल के बीच गाड़ दी।
“यह लाठी अब किसी एक की नहीं,” उसने कहा।
“यह हमारी एकता की निशानी है।”
रामू आगे आया,“गाय के शरीर पर मिट्टी से निशान बनाए गए थे। बीमारी से मरी थी। डॉक्टर की रिपोर्ट भी यही कहती है।
नथुनी बोला,“उस रात गौशाला की चाबी किसके पास थी, सब जानते हैं।”
भीड़ में स्वर उठने लगे।रईस ने पोटली से कागज़ निकाला।“रिपोर्ट लिखवा आया हूँ। जाँच होगी।”
दो सिपाही चौपाल पहुँचे।मुखिया का चेहरा फीका पड़ गया।इस बार पंचायत गाँव के मुखिया सुरेश के कहने पर नहीं बल्कि गांव के चरवाहों के कहने पर बैठी। गाँव के चरवाहे बारी-बारी से रईस के पक्ष में बोलने लगे ,और डॉक्टर की रिपोर्ट भी दिखाए। रामू ने कहा जिस रात को प्रधान के गौशाला में गाय के मरने की बात कही जा रही है उस रात रईस मेरे घर पर था। मैं डर के मारे उस दिन नहीं बोला और वैसे भी प्रधान मुझे अपने घर में काम करने से मना कर दिए थे और निकाल दिए थे। मैं कुछ बोलना तो प्रधान कहते कि यह जानबूझकर बोल रहा है, इसलिए मेरी खिलाफत कर रहा है। लेकिन डॉक्टरी रिपोर्ट से सच सामने आ गया है इसलिए हम सब ने पंचायत बुलाये हैं। पंच परमेश्वर होते हैं। इसलिए हम नहीं चाहते कि हमारे गाँव से यह संदेश जाए की पंचों ने गलत फैसला सुनाया है।
जाँच में साबित हुआ,गाय बीमारी से मरी थी।निशान बाद में बनाए गए।मुखिया पर मामला दर्ज हुआ।उसे पद से हटाया गया।रईस ने जाने का फैसला किया।
रामू ने पूछा,“रह जाओ।”
रईस ने कहा,“मैं लड़ने नहीं आया था। बस इतना चाहता था कि तुम लोग साथ खड़े होना सीखो।”
वह चला गया।कुछ दिन बाद नई पंचायत बैठी।
रामू बोला,“गाँव में रहने वाले ही एक-दूसरे के सुख-दुख के साथी होते हैं। बाहर से डर बुलाना पंच परमेश्वर की मर्यादा के खिलाफ है।”
नथुनी ने जोड़ा,“पंचायत आग बुझाने के लिए होती है, भड़काने के लिए नहीं।”
सबने तय किया,अब कोई फैसला अकेले नहीं होगा।हर निर्णय सामूहिक होगा।
चौपाल की लाठी को बरगद के नीचे गाड़ दिया गया।
बरसात आई।तालाब भर गया।बच्चे खेलते हुए पूछते,“वह बड़े भैया फिर कब आएँगे?”
बुज़ुर्ग चाची मुस्कुरातीं,“जब भी गाँव डरने लगेगा उसकी याद आ जाएगी।”
गाँव ने सीखा,लाठी जब तक हाथ में रहती है,ताकत लगती है।
जब जमीन में गड़ जाती है, तब सिद्धांत बन जाती है।और पंच परमेश्वर कहीं चौकी पर नहीं बैठता,वह लोगों के जागे हुए दिलों में बसता है।
रमेश कुमार ‘रिपु’
राममंदिर के पास,अवधपुरी कालोनी
भाटागांव,रायपुर छत्तीसगढ़
मो. 7974304532



