गोवर्धन यादव की लघुकथा हमारे समय का बयान है।इनकी कथाओं में समाज की वो तस्वीर है जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। गिरते सामजिक मूल्यों की ओर केवल इशारा नहीं करती है बल्कि कहती हैं कि यदि चाहते हो कि समाज में सामाजिक संस्कार जिंदा रहें तो एक कदम बढ़ायें बचाने के लिए।
गोवर्धन यादव \ लघुकथाएं

चिंता की मकड़ी
आदमी जिन्दगी में तीन काम बमुश्किल कर पाता है. बच्चों की पढाई-लिखाई, उनकी शादियाँ और एकाध छोटा सा मकान. यह सब करते-करते वह या तो दुनिया से कूच कर जाता है या फ़िर उसकी जेब पूरी तरह से खाली हो जाती है. यदि वह जीवित रहा तो केवल उसके पासशेष रह जाती है भूली-बिसरी बातें जिनके सहारे वह अपना एकाकी जीवन काटता है.
रामलालजी के परिवार में दो बेटे त्तथा एक बेटी है. उन्होंने नौकरी में रहते हुए अपना एक आशियाना बनवा लिया था. सभी की उचित परवरिश करते हुए उन्हें उच्च शिक्षा दिलवाई थी. दोनो बेटों की शादी वे कर चुके थे., आज दोनो बेटे तथा बहूएं सरकारी मुलाजिम है. अच्छा खासा कमाते भी हैं. सेवानिवृति से पूर्व वे अपनी बेटी की शादी नहीं करवा पाए थे,बस इसी बात का दुख उन्हें सालता है.
काफ़ी प्रयास के बाद एक रिश्ता आया. लडका देखने में स्मार्ट था और वह एक इंजीनियर के पद पर कार्यरत थी. लडका दहेज लेने के पक्ष में नहीं था लेकिन पिता को मोटी रकम दहेज में चाहिए था. उनका अपना कहना था कि लाखॊं खर्च करके लडके को पढाया-लिखाया है ,सो अपना घाटा इस तरह पूरा करना चाहते हैं. खैर बात आगे बढी. रामलालजी को उम्मीद थी कि वे रकम का इंतजाम कर लेगें.
घर के पूरे सदस्य बैठकर इस पर विचार-विमर्श कर रहा थे. उन्होंने अपनी व्यथा उजागर करते हुए कहा कि अब उनके पास पेन्शन के अलवा कुछ भी देने को बचा नहीं है. और शादी में लगभग दस लाख खर्च होने है. यदि आप सभी इसमें सहभागी बनते हैं तो बात बन सकती है.
सहमति अथवा असहमति देने की बारी दोनो बेटॊं और बहूऒं की थी. सभी ने मौन ओढ रखा था. सब एक दूसरे का चेहरा देख रहे थे कि पहल कौन करता है.
आखिर बडॆ बेटे ने मुँह खोला. पिताजी.,पिछली साल अम्माजी के बिमारी के चलते मेरे लगभग एक लाख रुपया खर्च हो गया. फ़िर मुझे अपने बेटा-बेटियों को भी तो आगे पढाना-लिखाना है. मैं बडी रकम तो नहीं दे पाऊँगा, हाँ एकाध लाख फ़िर भी जुटा लूंगा. दूसरे ने कहा- अभी हम लोगों की इतनी सेलेरी नहीं है, फ़िर भी पच्चीस-पचास का इन्तजाम तो मैं कर ही दूँगा. बहूऒं ने अपनी ओर से मुँह नही खोला. खैर.उनसे उम्मीद भी नहीं की जा सकती थी.
अपनी-अपनी बात कहकर सब, एक के बाद एक उठकर चले गए थे. हाल में बचे रह गए थे केवल रामलालजी ,जो विचारों के भंवर में डूब-चूभ रहे थे और चिंता की मकडी उनके चेहरे पर घना जाला बुनने लगी थी.
३६-तकाजा

“तुम कुछ करते क्यों नहीं? कब से कह रही हूँ कि एकाध बार गाँव हो आओ. पर तुम हो कि जगह से हिलने का नाम ही नहीं लेते.”
“ क्यों पीछे पडी रहती हो हर हमेशा. कह तो दिया न, कभी चला जाऊँगा.”
“ ऐसा कहते-कहते तो बरसों हो गए,पता नहीं कब जाओगे? गाँव में अपना एक खानदानी मकान है. थोडी बहुत जमीन भी है. क्या कुछ नहीं होता होगा उसमें?. बरसों हो गए, एक दाना भी तुम्हारे भाई ने नहीं भेजा. मैं तो कहती हूँ कि जाकर हिस्सा बंटवारा करवा लो. अगर इसी तरह देर की तो तुम्हारा भाई उस जायजाद पर कुण्डली मार कर बैठ जाएगा और तुम्हारे हाथ कुछ नहीं लगेगा. हिस्सा- बंटवारा हो जाएगा तो हम अपनी जमीन बेच कर एक अच्छा सा मकान तो बना सकेगें. कब तक किराए के मकान में सडते रहेगें.”
रोज-रोज की टिकटिक से बचने के लिए वह एक दिन गाँव जा पहुँचा. जाने से पहले उसने भतीजे-भतीजियों के लिए एक किलो मिठाई का डिब्बा अपने सूटकेस में भर लिया था.
मुख्य सडक से चार-पांच किलोमीटर दूर है उसका गाँव. बस से उतरकर वह एक पेड के नीचे यह सोचकर खडा हो गया था कि कोई न कोई आटॊ-रिक्शा मिल जाएगा. उसने एक व्यक्ति से जानकारी लेनी चाही तो उसने पलटकर जवाब दिया कि इस गाँव के लिए कोई आटॊ-वाटॊ नहीं चलते. बात करते समय उसे ऐसा लगा कि यह आदमी तो अपनी जान पहचान का सा लगता है. उसने अपना परिचय देते हुए कहा कि वह भी इसी गाँव का रहने वाला है. बरसों से शहर में रह रहा हूँ, काम की अधिकता की वजह से गाँव कुछ आना-जाना कम ही हो पाता है. वह जिससे बात कर रहा था, वह संयोग से उसका सहपाठी निकला. वह भी गाँव ही जा रहा था. रास्ता चलते हुए उसने उसके घर के बारे में विस्तार से जानकारी देते हुए बतलाया कि उसकी माँ कई दिनों से बिमार पडी है. वह जब-तब तुम्हारा तब तुम्हारा नाम लेकर कहती है,कि कई बरस हो गए अपने राम को देख हुए. पता नहीं कब आएगा?. बस तेरा ही नाम रटते रहती है. तुम्हें कभी अपनी माँ की याद तक नहीं आयी? पता नहीं कब बेचारी की आँख मूंद जाए. पिछले साल तुम्हारे दो बैल मर गए. रामू काम भी काफ़ी पिछड गया है. बडी मुश्किल से तुम्हारा भाई अपनी घर-गिरस्ती चला पा रहा है
उसकी दो बेटियां भी जवान हो चुकी है. बेटियों के हाथ किसी तरह पीले हो जाए, इसी सोच में तुम्हारा भाई सूख कर कांटा हो गया है. पहले कितना हट्टा-कट्टा था वह.
.यह सब सुनकर उसे ऐसा लगने लगा था कि वह अभी गश्त खा कर गिर पडॆगा. उसकी आँखॊं के सामने अंधेरा सा छाने लगा था. हलक सूख आया था. किसी तरह वह गाँव जा पहुँचा लेकिन उसकी हिम्मत घर के अंदर घुसने की नहीं हो रही थी.
संयोग से उसी समय एक लडकी बाहर निकली. देखने में लगता है जैसे बरसों से उसने कंघी-चोटी नहीं की हो. कपडॆ भी उसमे तार-तार हो आए थे. एक नजर में तो वह उसे पहचान नहीं पाया था.लेकिन उसे देखते ही लडकी ने अपनी माँ को आवाज लगाते हुए” माँ, देखो-देखो तो, चाचा आए हैं, कहते हुए वह भाव-विभोर हो गई थी. बस एक आवाज में पूरा घर बाहर निकल आया था.सभी के चेहरे पर छाई उदासी देखकर उसकी आँखे भर आयी थीं. बडी मुश्किल से उसने अपने आपको संभाला और उस ओर बढ चला था जिस कमरे में उसकी माँ के कराहने की आवाज आ रही थी.
भगवान के नाम

एक सरकारी कार्यालय में काम कर रहे बडे बाबू ने अपनी नौकरी के दस साल में लाखों का बैंक बैलैंस,शहर में तीन आलीशान बंगले,मोटर गाडियां आदि का जखीरा इकठ्ठा लर लिया था. किसी दिलजले ने उसकी शिकायत विजिलेंस में कर दी.इन्क्वारी हुई. जांचकर्ता अधिकारी ने उससे इतनी बेशुमार दौलत कैसे इकठ्ठा की,यह जानना चाहा तो उसने बडे इतमिनान से जबाब देते हुए कहा- सर…मैंने अपने जीवन में कभी किसी भी मुवक्किल से एक नया पैसा भी नहीं मांगा. एक बडी सी पेटी जिसमे ताला जड़ा हुआ है जिस पर देवी-देवता का चित्र चस्पा किया गया था दिखाते हुए कहा-मैं हर मुवक्किल से कहता कि ,जो भी आपकी श्रद्धा हो इस पेटी में डाल दो. इससे जो भी रकम इकठ्ठा होगी,उससे एक विशाल मंदिर का निर्माण होगा. लोग दस-बीस-पच्चीस-पचास के नोट डाल जाते. इस तरह मैंने जमीनें खरीदी और आलिशान भवन का निर्माण करवाया. जो कुछ भी (सम्पत्ति) आप देख रहे हैं,वह सब भगवान के नाम हैं. मेरा इसमें कुछ भी नहीं है. मैं तो केवल भगवान का भक्त हूँ, बस उन्हीं की सेवा करता हूँ और उन्हीं के आश्रय में रहता हूँ”.बडॆ बाबू की बात सुनकर जांच अधिकारी ने अपनी फ़ाईल बांधी और उलटे पैर लौट गए थे.
शर्म नहीं आती ?

.””क्यों भाई…अच्छॆ खासे हट्ट- कट्टे नौजवान हो, कोई काम- धंधा क्यों नही करते.,भीख माँगते हुये तुम्हें शर्म आनी चाहिये”
“शर्म तो बहुत आती है साहब ,मगर कोई काम देता ही नहीं. चलिये आप ही मुझे कोई छोटा-मोटा काम दिला दीजिये. मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि मैं उसे पूरी इमानदारी और पूरी निष्ठा के साथ पूरा करुँगा.”
:” अच्छा ये तो बतलाओ कि घर और कौन कौन हैं ?”
“” एक बूढी अपाहिज मां है,जो काफ़ी लंबे समय से बिमार पडी है. अभी वह तवे सी तप रही है,”
“तो उसका इलाज क्यों नहीं कराते. उसे अस्पताल- वस्पताल ले जाओ ,मुफ़्त में इलाज हो जायेगा.और उसे दवा भी मिल जायेगी.”
” साहबजी, ठीक कहा आपने कि उसे अस्पताल ले जाऊँ तो वह ठीक हो जायेगी,लेकिन उसका इलाज कराने से भी कोई फ़ायदा नहीं है. अगर वह ठीक हो भी गई तो भूख में नाहक ही तडपेगी. जब मैं स्वयं का पेट नहीं भर पाता तो उसे क्या खिलाउँगा. उसका मर जाना ही ठीक रहेगा.
बडी ही बेबाकी एवं निष्ठुरता के साथ उसने अपने मन की बात कह दी थी ,ऎसा कहते हुए न तो उसे कोई ग्लानि हो रही थी और न ही कोई शिकन उसके चेहरे पर दिख रही थी.

गोवर्धन यादव.
103, कावेरी नगर छिन्दवाड़ा(म.प्र.) 480001 MO-9424356400