डॉ. रंजना जायसवाल की कहानी राम नाम सत्य है समाज में जातिगत भेदभाव और छुआछूत की उस कड़वी सच्चाई को उजागर करती है, जहाँ मृत्यु के बाद हर इंसान राख बनकर समान हो जाता है, लेकिन जीते-जी इंसानों के बीच जाति की दीवारें खत्म नहीं होतीं।इंसान की पहचान उसकी जाति या पेशे से नहीं, बल्कि उसके कर्म और इंसानियत से होनी चाहिए। मृत्यु सबको समान करती है, तो जीवन में भेदभाव क्यों?
राम नाम सत्य है \ कहानी
पूस की इस हाड़ कपा देने वाली ठंड में हर दूसरे दिन किसी न किसी बुजुर्ग की मिट्टी आ ही जाती थी। इस साल ठंड कुछ जरूरत से ज्यादा ही थी।जवान भी हाथ सिकोड़े दांत किटकिटाते दिख जाते।कितने भी स्वेटर,जैकेट और टोपी मफलर पहन लो राहत का नामो-निशान नहीं था फिर बुजुर्गों का तो क्या ही कहना…कुल मिलाकर मगध आजकल खुश और व्यस्त रहता।उसका धंधा जोरों पर था।धंधा जोरों पर…!

यह एक शब्द कान को कितना चुभता था।कोई भला मानुष होता तो मन वितृष्णा से भर जाता पर वह कर ही क्या सकता था।उसने तो जन्म ही ऐसे जाति और समुदाय में लिया था जहाँ मिट्टी की अंतिम यात्रा उसे उसके गंतव्य तक पहुँचाने में सहयोग देना ही उसका काम था।
मगर अब पहले जैसी बात नहीं रही थी।जब से घाट के बगल में बिजली वाली “संस्कार” मशीन लग गई थी,घाट की आग कुछ ठंडी पड़ गई थी।मगध की नजरों में वो तथाकथित शिक्षित लोग जलवायु और पर्यावरण की सुरक्षा की बात करने वाले अब मगध के घाट पर नहीं सीधे मशीन वाले घाट पर जाते।जहाँ लकड़ी की जगह बटन दबाते ही लाल-लाल दहकती राडों से तेज़ ताप निकलती और मिनटों में “मुक्ति” मिल जाती है।मगध कभी-कभी सोचता था।
“ऐसी भी क्या जल्दी,जिस व्यक्ति के साथ एक उम्र बिताई हो उसकी अंतिम यात्रा के समय उनके पास उसके लिए वक्त भी नहीं!क्या इतने जल्दी किए गए क्रिया कर्म से आत्मा मुक्त होती है?क्या पंच तत्त्वों से बना शरीर पंच तत्व में मिल पाता है?”
मशीन के धुएँ में कोई गंध नहीं होती,शायद इसीलिए कोई अपने की पहचान भी सूंघ नहीं पाता और न राख में कोई कहानी।सिर्फ़ एक रशीद भर ही होती है जिसमें आपके किसी अपने के दाह संस्कार का नम्बर का क्रम लिखा होता है।जो मिट्टी के जलने से पहले और जलने के बाद राख में तब्दील हो चुके अपने को देने के काम आती है।वह जानता था, इस मशीन की वजह से धीरे-धीरे उसकी दुनिया भी राख में बदल रही थी पर ग़नीमत की बात यह थी कि आज भी कुछ लोग हैं जो अपने और अपनों को विधि विधान से इस दुनिया से विदा करते हैं।उनकी अंतिम यात्रा सुगम बनाते हैं और प्रकृति से लिए को वापस करने में विश्वास रखते हैं।वह कभी-कभी जलती हुई लाशों को देखकर सोचता यह जलती हुई लाशें राख हो जाएगी तब वह न किसी ब्राह्मण की होगी ना ठाकुर की न वैश्य की…वह सिर्फ़ राख होंगी।
कल तीन चिता जली थी,जिसमें से एक के घरवालें फूल चुनकर जा चुके थे।दूसरी अभी पूरी तरह से ठंडी नहीं हुई थी और तीसरी, तीसरी लावारिस थी।
“राम नाम सत्य है, सत्य बोलो सत्य है।”
जीवन के सबसे बड़े सत्य से वातावरण गूंज उठा।अचानक से घाट पर चहल-पहल हो गई।धीरे-धीरे घाट पर काफ़ी भीड़ जमा हो गई थी।लगता था कोई समृद्ध या सम्मानित व्यक्ति गया था।परिवार के साथ समाज के लोग भी शामिल थे।चेहरे पर कोई भाव नहीं थे पर वे दुखी थे समाज की इस अपूर्ण क्षति से…
मिट्टी को कंधा दिए हुए लोगों के पैर अचानक लड़खाएँ…भीड़ में से किसी ने कहा
“जरा संभाल के…! इस बार की भारी बारिश की वजह से सड़क जगह-जगह से उखड़ गई है।”
तभी दूसरे ने कहा-
“पूरे शहर का यही हाल है।”
तब तक तीसरा बोल पड़ा
“जब से यह सरकार आई है,तब से पूरे देश का यही हाल है।बस बड़े-बड़े वायदे करा लो इनसे, विकास के नाम पर अपने बैंक अकाउंट भर रहें हैं जनता जाए भाड़ में…”
भीड़ खिलखिला कर हंस पड़ी।अचानक उन्हें याद आया वह इस वक्त किसी की मरनी किसी के दाह संस्कार में एकत्र हुए हैं उन्होंने झट से गंभीरता का आवरण ओढ़ लिया। नदी ने कोहरे की चादर ओढ़ रखी थी।लोग ठंड से कपकपा रहे थे।कोई और दिन होता तो कब के निकल गए होते पर ऐसे समय में निकलना आसान नहीं था।किसी का दुकान खोलने का समय था तो किसी का ऑफिस जाने का…
“जिंदगी भर हाय-हाय करो,एक दिन सबको यहीं पहुँचना है।”
किसी ने बड़े दार्शनिक स्वर में कहा-“सब मोह माया है।“पर छूटती कहाँ है।”
किसी ने तपाक से बोला।बीच-बीच में भीड़ में से किसी न किसी का फोन घन-घना जाता।सफेद शर्ट वाले व्यक्ति ने फोन उठाया।उधर से आवाज़ आई।
“कहाँ रह गए,बच्चों के पी टी एम में भी जाना है।”
सफेद शर्ट वाला व्यक्ति आवाज़ को सुन लज्जित हो गया।
“यहाँ अभी आग भी नहीं लगी है, ऐसे कैसे चला आऊॅं! जैसे ही आग लगेगी आ जाऊँगा, तुम तैयार रहना।”
तभी दूसरे व्यक्ति का फोन बजा
“भैया माल कहाँ गिराना है?”
उस व्यक्ति ने मोबाइल पर अपना हाथ रखते हुए धीरे से कहा,“गली की तरफ वाले दरवाजे पर गिरा देना।”
सबकी अपनी-अपनी व्यस्तताए थी पर इस अंतिम यात्रा में शामिल होने के लिए उन व्यस्तताओं पर अचानक से ब्रेक लग गया था।जब तक जीवन है तब तक इस उलझन में हर एक व्यक्ति को उलझना ही है।तभी भीड़ में से किसी सज्जन व्यक्ति ने कहा,“जीवन की उठा-पटक क्या कम है कि जीवन की अंतिम यात्रा भी सुगम ढंग से नहीं हो सकती!”

कुछ ने उनके इस वक्तव्य पर संवेदना प्रकट की तो कुछ ने “हम्म” करके हुंकारी भरी।
तभी दूसरे ने कहा,“हमें मिल-जुल कर कोई कदम उठाना चाहिए।आखिर हम सबको एक दिन यहीं आना है।”
भीड़ पीछे की तरफ़ हटने लगी,उन्हें डर था कि कहीं ये जिम्मेदारी उन पर न लाद दी जाए।उस व्यक्ति ने भीड़ पर नज़र डाली पर क्या और कौन कदम आगे बढ़ाएगा ये तय नहीं हो पा रहा था।तभी बगुले से सफेद झक्क कुर्ता पहने एक समृद्ध व्यक्ति जिनके मुख मंडल से संपन्नता टपक रही थी ने आगे बढ़कर कहा,“मैं इस पुनीत कार्य के लिए पाँच लाख रुपए का योगदान देता हूँ।आप सभी भी आगे बढ़िए और स्वेच्छा से इस कार्य में सहयोग कीजिए।”
नदी शांत कल-कल ध्वनि के साथ बह रही थी।पिछले साल भी किसी सम्भ्रांत व्यक्ति के जाने पर इसी तरह की भीड़ जुटी थी और लोगों ने इसी तरह का आवाहन और वायदे किए थे पर वक्त के साथ कुछ ना बदला… लोग इसी तरह मरते रहे घाट पर आते रहे।न जाने कितनी ही योजनाएं इस घाट पर बनती और यहाँ से जाने के बाद सब भूल जाते।
तभी भीड़ में से किसी ने चिल्ला कर कहा
“कोई है?”
उस कोई का कोई नाम नहीं जानता था। तभी पास के टाल से कोई बाहर निकाला।
“मगध,तुम्हें कोई पुकार रहा है?”
चेक शर्ट, काली पैंट के ऊपर ऊनी सफेद शॉल ओढ़े मगध अपनी झोपड़ी से बाहर निकला।
“तुम ही डोsss…”
शब्द उस व्यक्ति के गले मे अटक गए।एक पल को लगा मानो उसका नाम भर लेने से ही वह अपवित्र हो जाएगा।
“साहब इधर बस अभी धुला है।”
मगध ने उसकी बात को अनसुना कर मुस्कुराते हुए कहा, भीड़ को उसकी मुस्कुराहट अच्छी नहीं लगी।आधा घँटे पहले ही एक बुजुर्ग की मिट्टी से उसके घर वाले फूल चुनकर ले गए थे।बाकी बचे अवशेष को मगध ने नदी से पानी भर-भर कर बहा दिया था।अब उस जगह कुछ घँटे पहले जलाए गए मिट्टी के अवशेष भी नहीं रह गए थे।रह गए थे तो सिर्फ़ राख और मिट्टी पर चढ़ाए गए फूल जो नदी की धारा के साथ कहीं दूर अनंत यात्रा पर निकल गए थे।इस धरती पर अब उस मिट्टी की यादें भर ही रह गई थी।जिसे परिजन पोटली बनाकर अपने साथ ले गए थे।
“ओ मग्धवा कोई मिट्टी जल रही है क्या?जरा लकड़ी तो भेज,चूल्हा जलाना है,आज खाना बनाने में देर हो गई।”
मगध की अम्मा ने जोर से आवाज़ लगाई।भीड़ का ध्यान उस आवाज़ की ओर चला गया।चिता की आग जल रही थी पर अम्मा के जीवन की लौ धीरे-धीरे कम होती जा रही थी।मगध ने बायीं तरफ नज़र डाली,चिता अभी पूरी तरह से ठंडी नहीं हुई थी।मृतक के तन और लकड़ी के अवशेष के ढेर के बीच लाल-लाल लकड़ी दहक रही थी।उसने हाथ बढ़ाकर चिता से लकड़ी निकाली और अपने बेटे की तरफ देखकर कहा,“सोनुवा, जरा अम्मा को पहुँचा दो।”
मगध का बड़ा बेटा आजकल अपने बाप के साथ पुस्तैनी काम सीख रहा था।यहाँ भी नेपोटिज्म था पर इस नेपोटिज्म में उनकी खुशी शामिल नहीं थी थी तो सिर्फ़ उनकी मजबूरी…मगध कितना चाहता था कि उसका बेटा पढ़-लिख कर कुछ बन जाए पर चाहा हुआ पूरा कब हुआ है? इस तथाकथित सभ्य समाज ने उन्हें अपने साथ अपने बीच रहने के लिए अनुमति तक नहीं दी थी,वह भला उनके सपनों को जगह कैसे दे देते।गंगा के तट पर बने इनके घर दुनिया में रहकर भी दुनिया से अलग थे।न जाने इन्होंने ऐसे कौन से पाप किए थे,बड़े से बड़े पाप को धोने वाली पवित्र गंगा भी पीढ़ियों से उन पापों को धुल नहीं पाई थी।
सोनुवा ने जलती लकड़ी को अम्मा को पकड़ा दिया। अम्मा खाट पर सिकुड़ी बैठी हुई थी।ठंड से उनका पूरा शरीर ऐंठा जा रहा था।होंठ नीले पड़ चुके थे।सोनुवा ने उनकी चादर ठीक की और चूल्हे की बुझी राख में लकड़ी का टुकड़ा खोज धीरे से फूंक मारी। राख उड़ी पर आग नहीं जगी ठीक समाज के मरे हुए जमीर की तरह…
अम्मा ने खटिया पर बैठे-बैठे खिड़की से झांका और गंगा जी की तरफ देख मन ही मन बुदबुदाया
“माई आखिर कब तक!तू तो सबका पाप धोती है, हमारा कब धोएगी।”
अम्मा ने एक नजर अपने घर पर डाली।घर!जिस घर को घर कहना भी गलत था।मगध का घर शहर के अंतिम छोर पर नदी के किनारे बना मानो मगध और मगध जैसे लोगों की तरह ख़ुद भी धीमे-धीमे सांसें ले रहा था।उस घर की मिट्टी की दीवारों पर समय और गरीबी दोनों ने अपनी परतें जमा दी थी।बरसों पहले यह घर लीपा-पुता था जिसका आंगन चम-चम चमकता था। अब वहाँ दरारों में जंगली घास उग आई थी।दरवाजे की कुंडी लोहे की थी लेकिन वक्त के निर्मम हाथों ने उसे भी ढीला कर दिया था।वह भी ढीली होकर लटक गई थी।
छप्पर जगह-जगह से झुक गया था और बरसात में हर ओर से टपकता था।मगध ने टपकते छप्पर पर काली-पीली पन्नी बिछा रखी थी पर वह भी वक्त की मार से भला कहाँ बच पाई थी।झोपड़ी के कोने में छोटी-सी रसोई थी। कालिक से पुती काली दीवारों पर कुछ कीलें ठुकी थी।जिन पर थके-हारे बर्तन लटके हुए थे।बर्तन,जो वक्त के साथ अपनी आवाज़ और चमक दोनों खो चुके थे।वहीं पास में दो कीलों के बलबूते पर एक रस्सी बंधी हुई थी जिस पर घर भर के कपड़े एक के ऊपर एक लदे हुए थे।
कहते हैं जीवन का अंतिम सत्य मृत्यु है।मगध और उसके परिवार का इस सच से रोज सामना होता था पर उसके घर में भी उम्मीद की एक लौ जगाने के लिए भूतों के नाथ भोलेनाथ की एक तस्वीर टंगी थी।मगध बिना नागा रोज वहाँ अपने विश्वास का दीपक जलाता था वही तो उसके तारणहार थे।
न जाने क्यों अम्मा की आँखों से दो आँसू ढुलक आए अम्मा ने उन आँसुओं को आंचल में समेट लिया।
“चल हठ मैं जलाती हूँ।”

अम्मा ने बड़े ठसक के साथ कहा और उस जलती हुई लकड़ी को अपने लीपे-पुते चूल्हे में खोस दिया था।चूल्हा भभक कर जल पड़ा।सुना था आग से शुद्ध कुछ भी नहीं होता,सोना भी आग में तप कर शुद्ध हो जाता है फिर मगध जैसे लोग दुनिया और समाज की दृष्टि में क्यों अछूत अस्पृश रह जातें हैं?
भीड़ पीछे की तरफ़ हट गई, लोगों का मन न जाने कैसा-कैसा हो गया। उन्होंने मगध को हिकारत भरी नजरों से देखा
“छी: कैसा इंसान है,आँख का पानी मर गया है।”
मगध एक अलग ही दुनिया में था।वह सोच रहा था…
“अगर हमारे हाथ इतने ही अपवित्र है तो ईश्वर हमें मुर्दों की मुक्ति का दायित्व क्यों सौंपता है?”
तभी किसी ने कहा
“इन्हें डर नहीं लगता है।हमें तो रात में इस ओर गुजरने से भी डर लगता है।”
तभी किसी दूसरे ने कहा
“मुर्दे की जलने की ऐसी बदबू आती है कि खड़ा होना मुश्किल है और ये मज़े से यहाँ रहतें हैं।”
मगध चुपचाप भीड़ की आवाज़ सुन रहा था वह कहना चाहता था,“मजे! वह और उसका परिवार ही जानता है कि वह कितने मजे में हैं। वह कहना चाहता था,साहब डर तो उसे भी लगता है पर क्या आप और आप जैसे लोग अपनी बस्ती में उनके जैसे लोगों को साथ रहने देंगे! सच पूछिए तो डर मुर्दों से कम इंसानों से ज़्यादा लगता है। मुर्दों से क्या ही डरना उनकी वजह से तो उनके घरों के चूल्हे जलते हैं।”
लोगों की आँखों में हजारों सवाल उग आए थे पर वह भूल गए थे डोम की जिंदगी की यही सच्चाई है। उस भीड़ में ठाकुर थे ब्राह्मण थे वैश्य थे जो मृतक आत्मा की अंतिम दर्शन करने के लिए पहुँची थी पर कोई भी ऐसा इंसान नहीं था जो मगध और मगध जैसे लोगों के जीवन के संघर्ष को समझ सके।कोई आग कोई जल उन्हें आज तक पवित्र नहीं कर पाई थी।
मिट्टी जलने में अभी वक्त था,लोग बोर हो रहे थे।लोगों ने वीडियो बनाने शुरू कर दिया तो कुछ ने सेल्फी…
तभी किसी ने पूछा
“लगभग कितनी लकड़ी लगती होगी?”
बगल वाला जानकार था।उसने ठंडे स्वर में बोला
“नौ मन…”
“नौ मन?नौ मन लकड़ी के लिए कितने पेड़ काटने होते होंगे! पर्यावरण का कितना नुकसान होता होगा,हमारा वायुमंडल इसीलिए गर्म होता जा रहा।किसी को एक पेड़ तो लगाना नहीं हैं बस…”
भीड़ ने उस व्यक्ति को घूर कर देखा,इस वक्त कोई भी उसके ज्ञान को सुनना नहीं चाहता था।मृत देह को टीट्ठी से उतार कर नौ मन लकड़ी से बनी चिता के ऊपर रख दिया गया। परिवार के लोगों द्वारा मिट्टी पर सम्मान स्वरूप चढ़ाई गई शाल को मगध एक-एक कर उतार रहा था।
“क्या करेगा इन सब का…”
किसी ने कहा
“करेगा क्या पहनेगा या बेच देगा।अभी देखिएगा कितना बड़ा मुँह खोलता है।”
दूसरे ने जवाब दिया।
“मतलब!”
“लगता है पहली बार घाट पर आए हो?”
“मुर्दे को जलाने का भी टैक्स लगाते हैं ये लोग…”
“छी: मुर्दे का भी नहीं छोड़ते।अंधेर मचा रखी है।नींद कैसे आती होगी।”
नींद सही कहा था उस युवक ने… मगध को वह दिन याद आ गया जब उसके बापू ने पहली बार उसके छोटे-छोटे हाथों को पकड़ कर चिता सजाना सिखाया था उस रात वह नींद में बड़बड़ाता रहा था।अम्मा ने कहा भी था
“काहे इस काम में डाल रहे हो!”बापू ने हताश होकर कहा था
“हमारे पास कोई रास्ता भी नहीं है यह काम नहीं करेगा तो फिर करेगा क्या…? वह दिन था और आज का दिन मगध ने अपने इस पूरे जीवन में न जाने कितनी मिट्टियों के लिए चिताएं सजाईं होंगी और इस तरह की बातों का सामना भी किया होगा।अब तो उसे और उसके कानों को इस तरह की बातें सुनने की आदत पड़ चुकी थी।भीड़ एक बार फिर मगध और मगध जैसे लोगों के लिए जजमेंटेल हो गई थी।
मगध ने कहा,“सही कह रहे हैं बाबू साहब पर कर क्या सकते हैं।कोई तो खास बात रही होगी न इस काम में… राजा हरिश्चंद्र ने भी काम किया था उन्होंने भी अपनी पत्नी से अपने बेटे को जलाने के लिए पैसा मांगा था फिर हम क्यों नहीं! साहब आप लोग भी अपने काम को पसंद करते होंगे, इज्जत देते होंगे।अगर हमारा काम यही है तो हम उसे इज्जत की नजर से क्यों ना देखें! ”
भीड़ चुप थी, क्या जवाब देती… जीवन का सच यही तो था।मृतक के बेटे ने कंधे पर पानी से भरा मिट्टी का घड़ा रखा, चिता की परिक्रमा की और घड़े को पीछे की तरफ पलट दिया।मिट्टी का घड़ा मिट्टी में मिल चुका था और मानव तन भी मिट्टी में मिलने के लिए तैयार था।
चिता के ऊपर चंदन की लकड़ी,उपले अगरबत्ती,धूपबत्ती और देशी घी डाल चिता में आग लगा दी गई। मृतक को मुखाग्नि उसके बड़े बेटे ने दी।मगध ने पन्नी में रखे दशागन को मुट्ठी में भरा और चिता पर डाला चिता भक-भक कर जल उठी।भीड़ छटने लगी वे अभी तक जिस माया मोह की बात कर रहे थे वे स्वयं उस माया मोह में फंसने को जा रहे थे शायद यही जीवन चक्र है।
चिता की सूखी लकड़ियों ने तेज़ी से आग पकड़ ली थी और वह चट-चट की आवाज़ के साथ जल उठी।तभी पुल के ऊपर से सन्नाटे को चीरती हुई एक ट्रेन सीटी बजाते हुए गुजरी।कोहरे ने ट्रेन की रफ़्तार पर लगाम लगा रखी थी।ठंड और कोहरे से लड़ती और हाँफती हुई वह धीरे-धीरे पुल पर चढ़ रही थी।
ट्रेन की बोगियों की खिड़कियों से अपने-अपने हिस्से का पुण्य कमाने के लिए कुछ हाथ सिक्कों को पकड़े बाहर निकले। उनके होंठ लगातार तेज़ी से हिल रहे थे जैसे खुद और वक्त के साथ उनकी कोई रेस लगी हो।पुल पर अचानक से भार बढ़ गया था।अब तक पुल पर ट्रेन और ट्रेन में बैठे यात्रियों का वज़न था पर अब, अब उस पुल पर ट्रेन, यात्रियों और यात्रियों की दुआओं,ख्वाहिशों और मन्नतों का भी वजन था।ट्रेन में बैठे हुए यात्री एक अलग ही यात्रा में थे।पुल पार करने से पहले वह सिक्के को फेंक देना चाहते थे।उनके मन-मस्तिष्क में एक अजीब सी होड़ मची हुई थी।वह सारी दुआएं और मन्नतें मुट्ठियों में बंद सिक्कों के माध्यम से गंगा के पवित्र जल में फेंक देना चाहते थे।।आस्था की कोई जाति,रूप या रंग नहीं होता।आँखों पर उम्मीद का चश्मा लगाए न जाने कितने हाथ खिड़कियों से बाहर निकले और उन्होंने पूरी ताकत और आस्था के साथ उस सिक्के को नदी में फेंका…
“टन्न-टन्न…”
सिक्के लोहे के पुल से टकराकर कोहरे को काटते हुए हवा में गुलाटी मारते एक मज़े हुए गोताखोर की तरह गंगा के जल में डुबकी लगा चुके थे।सिक्कों के डूबते ही सोनुवा भी उस ठंडे जल में डुबकी मार चुका था।गंगा में डूबा वह सिक्का धर्म,जाति, रंग-रूप,अमीरी और गरीबी से ऊपर उठ चुका था,अब वह सिर्फ धन था।

चिता अभी भी शांति से जल रही थी।वह दुनिया के मोह माया से ऊपर उठ चुकी थी।मगध का लड़का तेज़ी से नदी में उतरा और नदी के गहराई से सिक्के बटोर लाया।
बगल में जल रही लावारिस लाश ठंडी पड़ चुकी थी। ईश्वर जाने न जाने किस की थी! पुलिस वाले घाट पर पटक गए थे।इस तरह की लाशों के लिए कुछ समाज सेवी संस्थाओं ने क्रिया कर्म का बीड़ा उठाया था तो कुछ सज्जन और सम्भ्रांत लोग भी अंश दान कर पुण्य के भागीदार बनते थे।मगध जानता था कि इस लावारिस लाश का कोई परिजन फूल चुनने नहीं आएगा। उसने लावारिश लाश की राख से फूल को चुन प्लास्टिक की पन्नियों में भरा और नए मुर्दे के स्वागत में उस जगह को धो कर चमका दिया।बगल में जलती लाश का धुआं और राख आसमान छूता धीरे-धीरे आकाश में खो गया।आकाश नहीं जानता था यह किस मिट्टी का धुंवा था पर उसने हाथ फैलाकर उसका स्वागत किया और अपने में समाहित कर लिया।
वह मृतक की देह को राख होता देख रहा था और मन ही मन सोच रहा था कि लोग मरने के बाद जलकर राख होते हैं पर वह और उसके समुदाय के लोग तो जीते जी लोगों की उपेक्षा से राख हो रहें हैं।
स्थान अब चमक रहा था पर समाज के मन-मष्तिष्क में मगध और मगध जैसे लोगों के ऊपर लगा जाति का दाग गंगा का पवित्र जल भी धुल नहीं पाया था।शायद गंगा भी अब थक चुकी थी।नदी की धारा में बहते फूल और सिक्कों की झिलमिल के बीच मगध का अस्तित्व गुम हो चुका था।शायद इस गुमनामी में ही उसकी पहचान थी, वह नदी, लहर,राख और आकाश के बीच कहीं मिल गया थाजहाॅं कोई भेद नहीं था,कोई जाति नहीं थी केवल मिट्टी थी जो हर बार जलती और फिर इसी तरह बहा दी जाती थी।
“राम नाम सत्य है,सत्य बोलो सत्य है।”
घाट एक बार फिर जीवन के उस वास्तविक सत्य से गूंज उठा था शायद कोई एक और मिट्टी आ रही थी।मगध पूरी ईमानदारी के साथ घाट की सफाई में लग गया क्योंकि यही उसके जीवन की सच्चाई थी और शायद सभी के जीवन की भी…

डॉ. रंजना जायसवाल
लाल बाग कॉलोनी,छोटी बसही मिर्जापुर, उत्तर प्रदेश
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