रमेश कुमार‘रिपु’ की वह इश्क़ 1982 वाला था सिर्फ प्रेम कहानी नहीं, बल्कि 1982 के उस हिंदुस्तान की याद है, जहाँ प्रेम का इजहार आँखें करती थीं, दिल खत लिखता था और शादी के बाद वही प्रेम जीवन भर का रिश्ता बन जाता था। उस समय न मोबाइल था, न व्हाट्सऐप, न मिलने के लिए सौ बहाने। बस एक झलक के लिए घंटों इंतजार और एक मुस्कान के सहारे पूरी शाम गुजर जाती थी।
वह इश्क़ 1982 वाला था\ कहानी
सन् 1982 की बात है।
शहर छोटा था, लेकिन लोगों के दिल बड़े हुआ करते थे। मोहल्लों में घरों के दरवाजे अक्सर खुले रहते थे। शाम को छतों पर औरतें बैठकर सब्जियाँ काटती थीं। बच्चे गलियों में क्रिकेट खेलते थे और नुक्कड़ की चाय की दुकान पर बैठे बुजुर्ग देश-दुनिया की खबरों पर बहस करते थे।उन्हीं गलियों में रहता था पच्चीस घर छोड़कर एक लड़का अमित।
बी.ए. अंतिम वर्ष का विद्यार्थी। उम्र बाईस साल। पिता डाक विभाग में क्लर्क थे और माँ चाहती थीं कि बेटा पढ़-लिखकर सरकारी नौकरी करे।लेकिन अमित की जिंदगी में इन दिनों एक और जरूरी विषय जुड़ गया था।
उसका नाम था प्रेम।
और उस विषय की एक ही अध्यापिका थी मीरा।
मीरा उसी कॉलेज में बी.ए. द्वितीय वर्ष में पढ़ती थी। सुबह कॉलेज जाते समय सफेद सलवार-कमीज, कंधे पर नीला दुपट्टा, पैरों में साधारण सैंडल और बालों में दो लंबी चोटियाँ।उसके पास एक नीली डायरी थी, जिसमें वह कविताएँ लिखती थी।

अमित ने उसे पहली बार कॉलेज की लाइब्रेरी में देखा था।वह प्रेमचंद की किताब लौटाने आई थी और अमित सामने वाली मेज पर बैठा अखबार पढ़ने का नाटक कर रहा था।मीरा ने किताब लाइब्रेरियन को दी, फिर एक पल के लिए उसकी तरफ देखा।
बस, उतना ही।
अमित को लगा, जैसे किसी ने उसके भीतर कोई घंटी बजा दी हो।उस दिन घर लौटते समय वह साइकिल इतनी धीरे चला रहा था कि एक रिक्शेवाले ने पीछे से आवाज लगाई।
“भैया, साइकिल चला रहे हो या किसी का इंतजार कर रहे हो?”
अमित ने पलटकर देखा।रिक्शेवाला हँस रहा था।अमित भी मुस्करा दिया।
उसे क्या मालूम था कि उस दिन से उसकी जिंदगी की रफ्तार साइकिल से नहीं, मीरा की आँखों से तय होने वाली थी।
अमित के घर में एक पुराना आईना था। लकड़ी के फ्रेम वाला। उसके किनारे पर कहीं-कहीं पॉलिश उखड़ गई थी।पहले अमित उस आईने के सामने मुश्किल से दो मिनट खड़ा होता था। बाल सँवारे, कमीज के बटन लगाए और निकल गया।लेकिन मीरा को देखने के बाद आईने का महत्व अचानक बढ़ गया।अब वह रोज शाम को आईने के सामने खड़ा होकर बाल सँवारता।कभी बाल दाईं तरफ करता, कभी बाईं तरफ।कभी पानी लगाकर पीछे करता, फिर खुद ही नापसंद करके दोबारा सँवारता।
उसकी माँ रसोई से आवाज लगातीं,”अमित! क्या आज आईने से शादी करने का इरादा है?”
“आ रहा हूँ, माँ!”
“सुबह कॉलेज जाते समय भी यही हाल था। शाम को बाजार जाना है या प्रधानमंत्री से मिलने?”
अमित हँसकर बाहर निकल जाता।
उसकी पसंद थी हल्के रंग की पैंट, धारीदार शर्ट और बेल्ट में फँसी हुई कमीज।शर्ट नई नहीं होती थी, लेकिन इस्त्री की हुई जरूर होती थी।बालों में थोड़ा-सा तेल, कलाई पर पुरानी घड़ी और पैरों में पॉलिश किए हुए जूते।बस, इतना ही काफी था।
उधर मीरा की शाम भी कुछ अलग नहीं थी।कॉलेज से लौटने के बाद वह घर के काम में माँ का हाथ बँटाती। फिर पढ़ने बैठती। और शाम ढलने से पहले आईने के सामने खड़ी होकर अपनी दो चोटियाँ बनाती।
कभी माँ कहतीं,”मीरा, जरा जल्दी कर। बाजार से धनिया भी लाना है।”
मीरा तुरंत जवाब देती,”हाँ माँ, बस पाँच मिनट!”
उन पाँच मिनटों में बालों की माँग सीधी होती, दोनों चोटियों में रिबन बँधता, दुपट्टा ठीक होता और आईने में एक नजर खुद पर पड़ती।वह खुद से पूछती,”आज वह आएगा क्या?”
फिर अपने ही सवाल पर मुस्करा देती।
उसकी माँ को लगता, बेटी बड़ी होकर कुछ ज्यादा ही खुश रहने लगी है।उन्हें क्या पता था कि उस खुशी का नाम अमित था।
उन दिनों मोहल्ले का बाजार केवल खरीदारी की जगह नहीं होता था।वह शहर का छोटा-सा रंगमंच था।एक तरफ कपड़े की दुकान, दूसरी तरफ किराने वाला, आगे रेडियो ठीक करने की दुकान और नुक्कड़ पर चाय-समोसे का ठेला।शाम को दुकानों के बाहर पीली रोशनी वाले बल्ब जल उठते थे। साइकिलों की घंटियाँ बजतीं। रिक्शों के पहिए चरमराते। दुकानदार ग्राहकों को आवाज देते।किसी दुकान पर बिनाका गीतमाला के गाने बज रहे होते तो कहीं रेडियो पर क्रिकेट की कमेंट्री।और उसी बाजार में दो लोग रोज किसी न किसी बहाने पहुँच जाते थे।
मीरा के घर में कभी चीनी खत्म हो जाती, कभी सिलाई का धागा चाहिए होता, कभी माँ कहतीं,
“जरा आलू ले आ।”
मीरा को लगता, जैसे उसके घर में अचानक जरूरत की चीजों की संख्या बढ़ गई है।
उधर अमित को भी घर में हर शाम कुछ न कुछ याद आने लगा था।कभी पिता की चिट्ठी पोस्ट करनी है, कभी साबुन लाना है, कभी कॉपी खरीदनी है।
उसकी माँ एक दिन झुँझलाकर बोलीं,”अमित, तुम्हें घर की सारी जरूरतें शाम को ही क्यों याद आती हैं?”
अमित ने गंभीर चेहरा बनाकर कहा,”माँ, देश की अर्थव्यवस्था में बाजार का बहुत महत्व है।”
माँ ने हाथ में पकड़ा चम्मच दिखाते हुए कहा,”अर्थव्यवस्था को कह देना, अगली बार सब्जी भी लेते आना!”
अमित हँसता हुआ निकल गया।उसे बाजार में मीरा के आने की उम्मीद थी।और उस दिन किस्मत ने उसका साथ दिया।मीरा अपनी सहेली के साथ चूड़ियों की दुकान के सामने खड़ी थी।
अमित साइकिल लेकर सामने से गुजरा।
मीरा ने उसे देखा।
अमित ने भी देखा।
दोनों की आँखें मिलीं।
मीरा ने तुरंत नजरें फेर लीं।
फिर कुछ कदम आगे जाकर पलटकर देखा।
अमित अब भी उसी तरफ देख रहा था।
मीरा मुस्करा दी।
एक छोटी-सी मुस्कान।लेकिन अमित के लिए वह शाम की सबसे बड़ी घटना थी।वह साइकिल लेकर आगे निकल गया। लगभग बीस कदम बाद उसे याद आया कि वह साबुन खरीदने आया था।वह वापस लौटा।
दुकानदार ने पूछा,
“क्या चाहिए, बाबू?”
अमित ने कहा,”साबुन।”
“कौन-सा?”
अमित ने मीरा की तरफ देखते हुए कहा,”जो अच्छा हो।”
दुकानदार ने साबुन का डिब्बा सामने रख दिया।
“यह ले जाओ।”

अमित ने पैसे दिए और घर लौट गया।रास्ते भर उसे यही लगता रहा कि आज बाजार में कुछ खास हुआ है।जबकि सच यह था कि कुछ कहा ही नहीं गया था।यही तो उस जमाने के इश्क की सबसे खूबसूरत बात थी।बातें कम होती थीं, मगर एक नजर में पूरी कहानी लिख दी जाती थी।
अमित के तीन खास दोस्त थे राकेश,बबलू और सलीम।तीनों को अमित के प्रेम का पता चल चुका था।दोस्ती में राज बहुत दिन छिपे नहीं रहते, खासकर तब जब दोस्त का चेहरा बिना किसी वजह के चमकने लगे।
एक दिन चारों कॉलेज से निकलकर सिनेमा देखने गए।शहर के पुराने टॉकीज में उस सप्ताह एक रोमांटिक फिल्म लगी थी।पोस्टर पर हीरो-हीरोइन एक-दूसरे की आँखों में देख रहे थे।
बबलू ने पोस्टर देखकर कहा,”अमित, टिकट चार हैं। लेकिन लगता है फिल्म देखने सिर्फ हम तीन आए हैं। चौथा तो पहले से ही किसी और की आँखों में फिल्म देख रहा है।”
सलीम जोर से हँस पड़ा।
अमित ने उसकी पीठ पर धौल जमाई।
“चुप कर, साले!”
फिल्म शुरू हुई।पर्दे पर हीरो प्रेमिका के लिए गीत गा रहा था।
अमित को मीरा याद आने लगी।
राकेश ने उसके कान में कहा,”भाई, पर्दे पर ध्यान दे। हीरो गा रहा है, तू मन ही मन शादी के फेरे ले रहा है!”
फिल्म खत्म हुई तो चारों बाहर निकले।टॉकीज के सामने समोसे का ठेला लगा था।चारों ने समोसे खाए और कुल्हड़ में चाय पी।चायवाले के रेडियो पर पुराना फिल्मी गीत बज रहा था।तभी सामने वाली गली से मीरा अपनी सहेली के साथ आती दिखाई दी।उसने हल्के गुलाबी रंग का सलवार-कमीज पहना हुआ था।बालों में वही दो चोटियाँ।हाथ में बाजार का छोटा-सा थैला।
अमित की नजर उस पर पड़ी तो वह अचानक चुप हो गया।
उसके दोस्तों ने भी उधर देखा।
मीरा पास से गुजरी।एक पल के लिए उसकी नजर अमित पर ठहरी।फिर उसने हल्का-सा सिर झुकाया और आगे बढ़ गई।अमित के चेहरे पर ऐसी मुस्कान आई, जैसे किसी ने उसे बिना टिकट के पूरी दुनिया दिखा दी हो।मीरा कुछ दूर निकल गई तो बबलू ने अमित के कंधे पर हाथ रखा।
“यार, तूने गजब की भाभी चुनी है!”
राकेश बोला,”भाभी ने तो देखकर मुस्करा दिया। अब तू बता, शादी में बारात पैदल जाएगी या साइकिल पर?”
सलीम ने चाय का आखिरी घूँट लेते हुए कहा,”मैं तो अभी से कह रहा हूँ, दूल्हे की तरफ से समोसे का इंतजाम मेरा रहेगा।”
तीनों ठहाका लगाकर हँस पड़े।
अमित ने हँसते हुए कहा,”अभी कुछ तय नहीं है, बेवकूफों!”
बबलू ने तुरंत जवाब दिया,”हाँ, हाँ! हम भी जानते हैं। तुम्हारे जमाने में पहले आँखें मिलती हैं, फिर घरवाले मिलते हैं, उसके बाद ही शादी की फाइल आगे बढ़ती है!”
चारों हँसते हुए घर की तरफ चल पड़े।
उस दिन अमित ने पहली बार मन ही मन मीरा को अपनी पत्नी के रूप में सोचा था।और अजीब बात यह थी कि इस खयाल से उसे डर नहीं लगा।उसे अच्छा लगा।बहुत अच्छा।
मीरा के पास एक नीली डायरी थी।वह उसमें कभी कविता लिखती, कभी कोई अधूरी पंक्ति।
उस दिन उसने लिखा,”तुम सामने से गुजरते हो तो लगता है, जैसे बाजार की सारी आवाजें अचानक धीमी हो गई हों। तुम कुछ कहते नहीं, मगर तुम्हारी आँखें मुझसे जाने क्या-क्या पूछती हैं। और मैं… मैं हर बार बिना जवाब दिए मुस्करा देती हूँ।”
लिखने के बाद उसने डायरी बंद कर दी।कुछ देर तक उसे सीने से लगाए बैठी रही।फिर उसे अपनी ही हरकत पर हँसी आ गई।
“पागल कहीं की!”
लेकिन वह जानती थी कि अब उसका मन पहले जैसा नहीं रहा।अमित भी कम परेशान नहीं था।
उसने अपने कमरे में बैठकर मीरा के नाम एक चिट्ठी लिखी।कई बार काटा, कई बार लिखा।
पहली पंक्ति लिखी,”प्रिय मीरा!”
फिर काट दिया।लिखा,”मीरा जी!”
यह भी अच्छा नहीं लगा।
आखिरकार उसने लिखा,”तुमसे कुछ कहना है।”
फिर उसे लगा कि यह भी बहुत सीधा है।वह चिट्ठी मोड़कर किताब के भीतर रख दी।
अगले दिन कॉलेज में मीरा लाइब्रेरी में मिली।अमित उसके पास गया।उसकी धड़कन इतनी तेज थी कि उसे लगा, मीरा सुन लेगी।

“मीरा…”
“जी?”
“तुम्हारी किताब… यानी… वह जो तुमने पिछले हफ्ते ली थी…”
मीरा ने उसे देखा।
“कौन-सी किताब?”
अमित को समझ नहीं आया कि वह क्या बोले।
“वही… हिंदी वाली।”
मीरा की आँखों में शरारत उतर आई।
“अच्छा! हिंदी वाली किताब?”
“हाँ।”
“तो?”
“कुछ नहीं।”
मीरा मुस्कराई।
“अमित जी, आप कुछ कहना चाहते हैं तो कह दीजिए। किताबों के बहाने कब तक बात करेंगे?”
अमित का चेहरा लाल हो गया।
मीरा हँसी नहीं। उसने उसे शर्मिंदा भी नहीं किया।
बस धीरे से बोली,”मुझे भी आपसे कुछ कहना है।”
अमित ने पहली बार उसकी आँखों में बिना नजरें चुराए देखा।
मीरा ने धीमे स्वर में कहा,”लेकिन अभी नहीं।”
और वह चली गई।
अमित वहीं खड़ा रह गया।उस दिन उसे समझ आया कि इंतजार भी कभी-कभी प्रेम का हिस्सा होता है।
नवंबर की एक शाम थी।हल्की ठंड शुरू हो गई थी।मोहल्ले के पेड़ों से सूखे पत्ते गिर रहे थे। बाजार में मूँगफली बिकने लगी थी। चाय की दुकानों पर भीड़ बढ़ गई थी।मीरा अपनी माँ के कहने पर दवा लेने निकली थी।अमित भी घर से दूध लेने के बहाने निकला था।दोनों पुराने डाकघर के पास आमने-सामने पड़ गए।
इस बार मीरा के साथ उसकी सहेली नहीं थी।अमित ने हिम्मत जुटाई।
“मीरा, दो मिनट बात कर सकता हूँ?”
मीरा ने चारों तरफ देखा।सड़क पर लोग आ-जा रहे थे।
वह बोली,”यहाँ?”
“नहीं… मेरा मतलब… अगर तुम्हें ठीक लगे तो…”
मीरा मुस्करा दी।
“आप हर बात इतनी घुमा-फिराकर क्यों कहते हैं?”
अमित ने हिम्मत करके कहा,”क्योंकि तुम सामने होती हो तो सीधी बात याद ही नहीं रहती।”
मीरा ने अपना चेहरा थोड़ा झुका लिया।उसके गालों पर हल्की लाली आ गई।कुछ क्षण दोनों चुप रहे।फिर मीरा ने पूछा,”आप रोज शाम को बाजार क्यों आते हैं?”
अमित ने कहा,”सामान लेने।”
“रोज?”
“हाँ।”
“घर में इतना सामान खत्म होता है?”
अमित हँस पड़ा।”नहीं। अब तो माँ भी पूछने लगी हैं कि घर में कौन-सी दुकान खोलनी है।”
मीरा अपनी हँसी नहीं रोक पाई।दोनों पहली बार एक साथ हँसे थे।वह हँसी किसी फिल्मी दृश्य जैसी नहीं थी।उसमें कोई संगीत नहीं था, कोई कैमरा नहीं था।बस दो लोग थे, जो महीनों से एक-दूसरे को देख रहे थे और पहली बार अपने मन की बात के करीब पहुँचे थे।
मीरा ने कुछ देर बाद पूछा,”आपको मुझसे कुछ कहना था?”
अमित ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा,”हाँ। मैं तुम्हें पसंद करता हूँ। बहुत पसंद करता हूँ।”
मीरा चुप रही।अमित को लगा, शायद उसने गलती कर दी।
वह जल्दी से बोला,”अगर तुम्हें बुरा लगा हो तो…”
मीरा ने बात काट दी।
“मुझे बुरा नहीं लगा।”
“तो?”
मीरा ने धीरे से कहा,”मैं भी आपको पसंद करती हूँ।”
बस।इतनी-सी बात।न कोई वादा, न कोई कसम, न साथ जीने-मरने की बातें।लेकिन अमित को लगा, जैसे उसके भीतर वर्षों से बंद कोई खिड़की खुल गई हो।
मीरा ने दवा की पुड़िया संभाली और बोली,”अब मुझे घर जाना चाहिए। माँ इंतजार कर रही होंगी।”
अमित ने सिर हिलाया।
“हाँ।”
वह कुछ कदम चली, फिर पलटी।
“और सुनिए…”
“हाँ?”
“कल कॉलेज में लाइब्रेरी के पास मिलिएगा।”
अमित ने पूछा,”क्यों?”
मीरा मुस्कराई।”कुछ कहना है।”

वह चली गई।अमित देर तक वहीं खड़ा रहा।उस शाम घर पहुँचकर उसने दूध का बर्तन माँ को दिया।माँ ने पूछा,”आज दूध लेने में इतनी देर क्यों हो गई?”
अमित ने कहा,”रास्ते में एक जरूरी काम था।”
माँ ने मुस्कराकर कहा,”अच्छा! अब तुम्हारे जरूरी काम भी होने लगे?”
अमित चुपचाप अपने कमरे में चला गया।उस रात उसे नींद देर से आई।क्योंकि अगले दिन उसे अपनी जिंदगी का सबसे खूबसूरत इंतजार करना था।
समय गुजरता रहा।अब अमित और मीरा कॉलेज में कभी लाइब्रेरी के पास, कभी बरामदे में, कभी किताबों की दुकान पर मिल लेते।उनकी बातचीत में बड़ी-बड़ी बातें नहीं होती थीं।
मीरा पूछती,”आज पढ़ाई की?”
अमित कहता,”की थी।”
“झूठ!”
“तुम्हें कैसे पता?”
“क्योंकि तुम्हारी किताब में आज भी वही पन्ना खुला है।”
अमित हँस देता।कभी अमित पूछता,”तुम्हें कौन-सा गाना पसंद है?”
मीरा कहती,”जो सुनकर मन अच्छा हो जाए।”
“यह भी कोई जवाब हुआ?”
“तो फिर तुम ही बता दो।”
और अमित कोई फिल्मी गीत गुनगुनाने लगता।मीरा हँसकर उसे रोक देती।धीरे-धीरे कॉलेज के कुछ दोस्तों को पता चल गया।फिर एक दिन मीरा की सहेली ने उसकी माँ से कह दिया कि मीरा आजकल बहुत खुश रहती है।माँ ने बेटी को अपने पास बुलाया।
“मीरा, एक बात पूछूँ?”
“पूछिए।”
“कोई लड़का पसंद है?”
मीरा का चेहरा उतर गया।माँ ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“डर मत। मैं तुम्हारी माँ हूँ। दुश्मन नहीं।”
मीरा की आँखों में आँसू आ गए।उसने धीरे से अमित का नाम बता दिया।
माँ कुछ देर चुप रहीं।फिर पूछा,”क्या वह तुम्हारे साथ जिंदगी बिताना चाहता है?”
मीरा ने सिर झुका लिया।
“मुझे लगता है, हाँ।”
माँ ने उसके सिर पर हाथ रखा।
“तो उसे अपने घरवालों से बात करने को कहो। प्यार करना गलत नहीं है, लेकिन जिंदगी सिर्फ मिलने और मुस्कराने का नाम नहीं होती। जिम्मेदारियाँ भी होती हैं।”
उधर अमित के घर में भी पिता ने उसकी शादी की चर्चा छेड़ दी थी।
एक शाम उन्होंने पूछा,”अमित, तुम्हारी पढ़ाई पूरी होने वाली है। कोई लड़की पसंद हो तो बता देना। हम तुम्हारे लिए रिश्ता देख रहे हैं।”
अमित ने पहली बार अपने पिता के सामने सिर उठाकर कहा,”पिताजी, मुझे एक लड़की पसंद है।”
पिता ने अखबार मोड़ा।
“कौन?”
“मीरा। मेरे कॉलेज में पढ़ती है।”
“उसके पिता क्या करते हैं?”
“बैंक में नौकरी करते हैं।”
पिता कुछ देर सोचते रहे।
फिर बोले,”लड़की अच्छी होनी चाहिए। परिवार अच्छा होना चाहिए। और सबसे जरूरी बात, तुम दोनों को समझना चाहिए कि शादी कोई फिल्म नहीं है।”
अमित ने कहा,”जी, पिताजी।”
पिता ने अखबार फिर खोल लिया।”ठीक है। पहले तुम्हारी पढ़ाई पूरी हो जाए। फिर बात करेंगे।”
अमित के लिए यह आधी मंजूरी थी।और आधी मंजूरी भी उस जमाने में किसी प्रेमी के लिए पूरी दुनिया जीत लेने जैसी होती थी।
कॉलेज से निकलने के बाद कुछ माह बाद सन् 1984 में अमित को एक सरकारी कार्यालय में नौकरी मिल गई थी। वेतन बहुत ज्यादा नहीं था, लेकिन इतना था कि वह अपने पैरों पर खड़ा हो सके।
दोनों परिवारों की मुलाकात हुई।कुछ सवाल हुए। कुछ संकोच हुआ। रिश्तेदारों ने पूछताछ की। जन्मपत्री भी मिलाई गई।और आखिरकार शादी तय हो गई।मीरा ने जब पहली बार सुना कि अमित के घरवालों ने रिश्ता स्वीकार कर लिया है, तो वह कुछ देर तक चुप बैठी रही।
उसकी माँ ने पूछा,”खुश नहीं हो?”
मीरा की आँखों से आँसू बह निकले।
“बहुत खुश हूँ, माँ।”

माँ ने उसे गले लगा लिया।शादी के दिन मोहल्ले में खूब रौनक थी।घर के बाहर रंगीन झालरें लगी थीं। औरतें मंगलगीत गा रही थीं। बच्चे मिठाई के डिब्बों के आसपास मंडरा रहे थे।अमित सेहरा बाँधे बैठा था।उसके दोस्त अब भी बाज नहीं आ रहे थे।
बबलू ने कहा,”भाई, आज तो आईने में देखने की जरूरत नहीं है। दुल्हन खुद देखने आ रही है!”
सलीम बोला,”लेकिन एक बात है। इतने साल बाजार में साबुन, दूध और कॉपियाँ खरीदने का फायदा आज समझ में आया।”
राकेश ने अमित के कान में कहा,”यार, तूने गजब की भाभी चुनी थी। अब संभालकर रखना!”
अमित हँस पड़ा।
जब मीरा लाल जोड़े में उसके सामने आई, तो कुछ क्षण के लिए वह उसे देखता ही रह गया।दो चोटियों वाली वही लड़की अब दुल्हन बनी बैठी थी।आँखों में वही चमक।चेहरे पर वही मुस्कान।फर्क बस इतना था कि अब उसे देखने के लिए बाजार में सामान खरीदने का बहाना नहीं बनाना पड़ेगा।अब वह उसकी जिंदगी का हिस्सा बनने जा रही थी।
फेरे शुरू हुए।मंत्रों की आवाज के बीच अमित ने धीरे से पूछा,”मीरा, खुश हो?”
मीरा ने आँखें उठाकर उसे देखा।
“बहुत।”
अमित ने मुस्कराकर कहा,”एक बात बताऊँ?”
“क्या?”
“मैंने तुम्हें पहली बार लाइब्रेरी में देखा था। उसी दिन तय कर लिया था कि तुमसे शादी करूँगा।”
मीरा हँस दी।
“झूठे! उस दिन तुम अखबार पढ़ रहे थे।”
“अखबार तो बस बहाना था।”
मीरा ने धीमे से कहा,”मुझे पता था।”
“कैसे?”
“क्योंकि तुम एक ही पन्ना आधे घंटे से पढ़ रहे थे।”
दोनों हँस पड़े।
पंडित जी ने कहा,”अब आगे बढ़िए।”
और दोनों ने एक साथ अगला कदम बढ़ा दिया।शायद शादी का असली अर्थ भी यही था।
एक-दूसरे को पूरी तरह जान लेने का दावा किए बिना, साथ चलने का फैसला कर लेना।
समय किसी के लिए नहीं रुकता।1982 का बाजार धीरे-धीरे बदल गया।पुरानी दुकानों की जगह नई दुकानें खुल गईं। साइकिलों की जगह मोटरसाइकिलें आ गईं। चाय के ठेले के पास मोबाइल फोन की दुकान बन गई। पुराने टॉकीज की जगह एक बड़ा शॉपिंग कॉम्प्लेक्स खड़ा हो गया।
अमित और मीरा के बालों में सफेदी उतर आई।
उनके बच्चे बड़े हो गए। घर में बहू आई। फिर पोता हुआ।लेकिन उनकी जिंदगी में कुछ चीजें नहीं बदलीं।हर शाम अमित अब भी आईने के सामने खड़ा होकर अपने बाल सँवारता था।अब बाल कम हो गए थे, मगर आदत वही थी।
मीरा कभी-कभी पीछे से आकर कहती,”अब किसे दिखाने के लिए तैयार हो रहे हो?”
अमित मुस्कराकर जवाब देता,”एक पुरानी प्रेमिका है मेरी। उसे आज भी अच्छा लगना चाहिए।”
मीरा हँस देती।
“बुढ़ापे में भी बातें बनाना नहीं छोड़ा!”
एक दिन दोनों उसी पुराने बाजार से गुजर रहे थे।सड़क चौड़ी हो गई थी। दुकानों के नाम बदल गए थे। चाय का पुराना ठेला अब एक छोटी-सी दुकान बन चुका था।
अमित ने मीरा से कहा,”याद है, मैं रोज यहाँ सामान लेने आता था?”
मीरा मुस्कराई।
“हाँ। और तुम्हारे घर में कभी साबुन खत्म होता था, कभी चीनी।”
अमित चौंका।
“तुम्हें सब पता था?”
मीरा ने उसकी तरफ देखा।
“अमित, उस समय मैं भी तो रोज शाम को बाजार आती थी। मुझे भी तो तुमसे मिलना होता था।”
अमित हँसने लगा।”मतलब हम दोनों एक-दूसरे को बेवकूफ बना रहे थे?”
मीरा ने कहा,”नहीं। हम दोनों एक-दूसरे के लिए बहाने बना रहे थे।”
वे कुछ देर चुपचाप चलते रहे।फिर उसी चाय की दुकान पर बैठ गए।अमित ने दो चाय मँगाई।
मीरा ने चाय का कप उठाते हुए पूछा,”एक बात बताओ। अगर तुम्हें फिर से 1982 में जाने का मौका मिले, तो क्या करोगे?”

अमित ने बिना सोचे जवाब दिया,”वही सब।”
“क्या मतलब?”
“वही कॉलेज, वही साइकिल, वही दोस्तों की बेवकूफियाँ, वही शाम का बाजार। और वही तुम।”
मीरा ने मुस्कराकर पूछा,”और अगर मैं तुम्हें उस समय पसंद नहीं करती तो?”
अमित कुछ देर सोचता रहा।
फिर बोला,”तो शायद मैं तुम्हें पसंद करने की कोशिश करता रहता।”
मीरा ने उसका हाथ पकड़ लिया।”और मैं तुम्हें बाजार में ढूँढ़ती रहती।”
दोनों हँस पड़े।चाय ठंडी हो रही थी।बाजार में लोग आ-जा रहे थे।एक युवा लड़का अपनी मोटरसाइकिल के शीशे में बाल सँवार रहा था। थोड़ी दूर एक लड़की मोबाइल पर किसी से हँसते हुए बात कर रही थी।
अमित ने उनकी तरफ देखा और मुस्कराया।”हमारे समय में प्रेम करना कितना मुश्किल था।”
मीरा ने कहा,”और कितना आसान भी।”
“वह कैसे?”
“तब हमें एक-दूसरे से बात करने के लिए मोबाइल नहीं चाहिए था। बस एक नजर काफी थी।”
अमित ने उसकी तरफ देखा।
वही आँखें।वही मुस्कान।बस समय की कुछ लकीरें उनके आसपास उतर आई थीं।
उसने धीरे से कहा,”मीरा, एक बात कहूँ?”
“अब क्या?”
“तुम आज भी उतनी ही अच्छी लगती हो।”
मीरा ने चाय का कप नीचे रखा।”और तुम आज भी उतने ही झूठे हो।”
दोनों फिर हँस पड़े।उस शाम घर लौटते समय अमित ने मीरा का हाथ थाम लिया।
रास्ता वही पुराना था।साथ चलने वाले लोग बदल गए थे।दुकानें बदल गई थीं।जमाना बदल गया था।लेकिन उनके बीच चल रहा प्रेम अब भी वहीं था, जहाँ 1982 में पहली बार शुरू हुआ था।एक नजर में।एक मुस्कान में।एक अनकहे वादे में।क्योंकि कुछ प्रेम कहानियाँ उम्र के साथ खत्म नहीं होतीं। वे उम्र के साथ घर बन जाती हैं।
और फिर एक दिन, जब पोती ने दादी से पूछा,”दादी, दादाजी से आपका प्यार कैसे हुआ था?”
मीरा ने अमित की तरफ देखा।
अमित ने मुस्कराकर कहा,”बेटा, तुम्हारी दादी को पाने के लिए मुझे रोज बाजार जाना पड़ता था।”
पोती ने आश्चर्य से पूछा,”क्यों? दादाजी, आपके पास फोन नहीं था क्या?”
अमित और मीरा एक-दूसरे को देखकर हँस पड़े।
मीरा ने पोती को अपने पास बैठाया और कहा,”फोन नहीं था, बेटा। लेकिन इंतजार था।”
“इंतजार?”
“हाँ। किसी के आने का इंतजार। किसी की एक झलक का इंतजार। किसी की मुस्कान का इंतजार।”
पोती कुछ देर सोचती रही।फिर बोली,”दादी, यह तो बहुत मुश्किल था!”
मीरा ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा,”मुश्किल था, लेकिन बहुत खूबसूरत था।”
पोती ने पूछा,”अगर आप दोनों आज के जमाने में मिले होते तो?”
मीरा ने अमित की तरफ देखा।अमित ने उसका हाथ पकड़ लिया।दोनों ने एक साथ कहा,”तो शायद हम एक-दूसरे को इतनी अच्छी तरह जान ही नहीं पाते।”
और उस शाम पोती ने पहली बार महसूस किया कि प्रेम केवल किसी से बात करते रहने का नाम नहीं है।कभी-कभी प्रेम उस बात का नाम भी है, जो दो लोग पूरी जिंदगी एक-दूसरे से कह नहीं पाते, फिर भी समझ जाते हैं।1982 का इश्क़ ऐसा ही था।वहाँ प्रेमिका को ऑनलाइन देखने की सुविधा नहीं थी, इसलिए उसे देखने के लिए बाजार जाना पड़ता था।वहाँ दिल टूटने पर किसी को ब्लॉक नहीं किया जाता था, बल्कि उसकी एक झलक पाने के लिए उसी रास्ते से बार-बार गुजरना पड़ता था।वहाँ प्रेम जताने के लिए महँगे उपहार नहीं होते थे, बल्कि किताब के बीच रखा एक सूखा फूल होता था।वहाँ शादी के बाद प्रेम खत्म नहीं होता था, बल्कि पहली बार पूरी तरह शुरू होता था।और सबसे खूबसूरत बात यह थी कि जिस लड़की को पाने के लिए कभी लड़का रोज आईने के सामने खड़ा होकर बाल सँवारता था, वही लड़की चालीस साल बाद उसके बिखरे बाल देखकर भी मुस्करा देती थी।
शायद इसीलिए आज भी 1982 का इश्क़ याद आता है तो लगता है,काश, जिंदगी में एक बार ऐसा प्यार हमें भी मिला होता।जिसमें मिलने की खुशी थी, बिछड़ने का डर था, इंतजार का रोमांच था और साथ निभाने का ऐसा वादा था, जिसे किसी कागज पर लिखने की जरूरत नहीं पड़ती थी।

रमेश कुमार‘रिपु’
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