महेन्द्र तिवारी की कहानी ‘पिता की डायरी’ का संदेश है कि आधुनिकता और बदलते समय के बीच हमें अपनी जड़ों, रिश्तों और पुरानी पीढ़ी की विरासत को नहीं भूलना चाहिए।पिता की असली विरासत केवल धन-संपत्ति नहीं, बल्कि उनके अनुभव, संस्कार, यादें और जीवन के मूल्य होते हैं। नई पीढ़ी को पुरानी पीढ़ी की भावनाओं और विरासत का सम्मान करना चाहिए।
पिता की डायरी\ कहानी
दिसंबर की सर्द धूप जब बनारस के अस्सी घाट की सीढ़ियों पर उतरती है, तो पत्थर की ठंडक धीरे-धीरे पिघलने लगती है। इस धूप में एक अजीब सा ठहराव होता है, जैसे सदियों पुराना इतिहास किसी थके हुए मुसाफिर की तरह सुस्ता रहा हो। इसी धूप के बीच पिछले पैंतीस सालों से एक मुमकिन सी दुनिया बसाए बैठे थे-पंडित रामस्वरूप शास्त्री।
सत्तर पार कर चुके रामस्वरूप जी की आँखें अब थोड़ी कमज़ोर हो चुकी थीं, लेकिन उनकी मेज पर रखे चश्मे के नंबर और उनके उसूलों की धार आज भी उतनी ही तेज थी। अस्सी घाट के नुक्कड़ पर उनकी एक छोटी सी दुकान थी,‘शास्त्री जी की पुरानी किताब की दुनिया’। दुकान क्या थी, महज़ एक चौकोर कमरा था, जिसकी दीवारों से पुरानी किताबों, दीमक लगे कागजों और चमेली के तेल की मिली-जुली महक आती थी। यहाँ विक्रम संवत की पंचांगों से लेकर, प्रेमचंद की फटी जिल्द वाली ‘गोदान’, रवींद्रनाथ टैगोर के बांग्ला गीतों के हिंदी अनुवाद और न जाने कितनी ऐसी नायाब पांडुलिपियाँ मिलती थीं, जो अब बाज़ार से गायब हो चुकी थीं।

रामस्वरूप जी के लिए किताबें केवल कागज के पन्ने नहीं थे, बल्कि जीते-जागते रिश्ते थे। जब कोई ग्राहक आता और पूछता, “शास्त्री जी, हरिवंश राय बच्चन की ‘मधुशाला’ का कोई पुराना संस्करण मिलेगा?” तो रामस्वरूप जी बिना किसी फेहरिस्त के सीधे उस कोने की अलमारी तक जाते, जहाँ धूल की हल्की परत जमी होती, और बिल्कुल सही किताब निकालकर उसके पन्नों को इस तरह सहलाते जैसे कोई माँ अपने बच्चे के गाल पर हाथ फेरती हो।
लेकिन पिछले कुछ महीनों से रामस्वरूप जी की इस दुनिया में एक खलल सा पड़ गया था। वह खलल था-समय की रफ्तार। कस्बे और घाट का यह इलाका भी अब बदल रहा था। जिन गलियों में कभी बैलों की घंटियों और साइकिलों की घंटियों की आवाज़ गूँजती थी, वहाँ अब ई-रिक्शा और सुपरफास्ट स्मार्टफोन्स की दुनिया ने कब्जा कर लिया था। हर हाथ में स्क्रीन थी और हर आँख में भविष्य की अनिश्चित दौड़। लोग अब पुरानी किताबों के पीले पन्नों पलटने की बजाय, अपनी उंगलियों से स्क्रीन पर पन्ने खिसकाते थे। किंडल और पीडीएफ के इस दौर में रामस्वरूप जी की दुकान पर आने वाले खरीदारों की संख्या कम होने लगी थी।
उनकी इकलौती चिंता उनका बेटा, मयंक था। मयंक कंप्यूटर इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद बेंगलुरु की एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में काम करता था। बेटे के लिए रामस्वरूप जी ने अपनी पूरी ज़िंदगी खपा दी थी। हर एक पुरानी किताब को बेचकर जो थोड़े-बहुत पैसे बचते, वे मयंक की ट्यूशन और फीस में लग जाते। मयंक जब छोटा था, तो इन्हीं किताबों के बीच बैठकर कहानियाँ सुना करता था। लेकिन जैसे-जैसे वह बड़ा हुआ, उसकी दुनिया और सपने दोनों बदल गए।
बेंगलुरु जाने के बाद मयंक की दुनिया कोडिंग, प्रोजेक्ट डेडलाइन और शेयर बाजार के ग्राफ तक सिमट कर रह गई थी। शुरुआत में हर रविवार को उसका फोन आता था,”बाबूजी, सेहत का ख्याल रखना।” फिर वह फोन महीने में एक बार होने लगा और अब तो त्योहारों या पैसों के लेन-देन के वक्त ही उसका संदेश स्क्रीन पर चमकता था।
रामस्वरूप जी को व्हाट्सएप चलाना नहीं आता था। उनके पास एक पुराना नोकिया का बटन वाला फोन था, जिसमें सिर्फ घंटी बजती थी और आवाज सुनाई देती थी। जब कभी वे मयंक से बात करने की कोशिश करते, तो मयंक की व्यस्त आवाज सुनाई देती,”बाबूजी, मीटिंग में हूँ, बाद में बात करता हूँ।” और वह ‘बाद का समय’ कभी नहीं आता था।
दुकान के ठीक सामने एक छोटी सी चाय की टपरी थी, जिसे भोला चलाता था। भोला रामस्वरूप जी का हमदर्द था। वह रोज़ सुबह उनके लिए अदरक वाली कड़क चाय लाता और पास की बेंच पर बैठकर गंगा की लहरों को देखता।

एक दिन सुबह-सुबह भोला ने चाय का कुल्हड़ बढ़ाते हुए कहा, “शास्त्री जी, आजकल दुकान पर रौनक कम दिखती है। शहर के लोग अब मॉल जाने लगे हैं। ऑनलाइन सब कुछ घर बैठे मिल जाता है।”
रामस्वरूप जी ने चाय की चुस्की ली, अपनी धुंधली आँखों से गंगा की बहती धारा को देखा और मंदार मुस्कान के साथ बोले, “भोला भाई, नदियाँ और किताबें कभी पुरानी नहीं होतीं। इनका पानी और पन्ने भले ही बदल जाएं, लेकिन प्यास वही रहती है। आज लोग भाग रहे हैं, कल थककर यहीं बैठेंगे।”
लेकिन भीतर ही भीतर रामस्वरूप जी जानते थे कि समय बदल रहा है। मयंक के जन्मदिन पर उन्होंने एक पुरानी, चमड़े की जिल्द वाली डायरी खरीदी थी। उस डायरी में उन्होंने अपने जीवन के संस्मरण, बनारस के घाटों की कहानियाँ और अपने उन अनकहे अहसासों को लिखा था, जो वे कभी मयंक से कह नहीं पाए थे। वे चाहते थे कि मयंक जब कभी बनारस लौटे, तो वह डायरी उसे दें।
दिसंबर का महीना बीतता गया और ठंड बढ़ती गई। एक शाम, जब रामस्वरूप जी दुकान बंद करने की तैयारी कर रहे थे, तो एक युवक उनकी दुकान के भीतर आया। उसने खाकी जैकेट पहन रखी थी और उसके कंधे पर एक बड़ा सा बैग टंगा था। उसकी आँखें उत्सुकता से भरी थीं।
“नमस्ते शास्त्री जी,” युवक ने कहा। उसकी आवाज़ में एक अजीब सा अपनापन था। “मैंने सुना है कि आपके पास फणीश्वरनाथ रेणु की ‘मैला आंचल’ का पहला संस्करण मिल सकता है?”
रामस्वरूप जी ने उसे गौर से देखा। चेहरे पर उम्र की थकान के बावजूद उनकी आँखों में चमक आ गई। उन्होंने कहा, “बैठिए बेटा। पहला संस्करण तो नहीं, लेकिन दूसरा संस्करण सुरक्षित रखा है, जिस पर लेखक के हस्ताक्षर तो नहीं, पर उस दौर की महक जरूर है।”
रामस्वरूप जी ने अलमारी टटोली और वह किताब निकाल कर लड़के के हाथ में रख दी। लड़के ने किताब को ऐसे थामा जैसे कोई बहुत कीमती खजाना मिल गया हो। उसने पूछा, “शास्त्री जी, आजकल लोग डिजिटल पढ़ रहे हैं, आप अभी भी इन पुरानी किताबों से क्यों जुड़े हैं? इसमें मुनाफा कितना होता है?”
रामस्वरूप जी मुस्कुराए। उन्होंने कहा, “बेटा, पीडीएफ फाइलें दिमाग को जानकारी दे सकती हैं, लेकिन दिल को सुकून नहीं। स्क्रीन की रोशनी आँखों को चौंधिया सकती है, लेकिन पन्नों की खुश्बू रूह को ठंडक देती है। मुनाफे की बात जहाँ तक है, तो मैं इन किताबों को बेचता नहीं हूँ, बस इनके असली वारिस तक पहुँचाता हूँ।”
लुक ने किताब के पैसे चुकाए और कृतज्ञता से सिर झुकाकर चला गया। उस रात रामस्वरूप जी काफी देर तक दुकान में बैठे रहे। बाहर कोहरा गहराता जा रहा था। गंगा के उस पार हल्की सी रोशनी टिमटिमा रही थी। उन्हें अचानक मयंक की बहुत याद आई। उन्होंने अपनी जेब से वह पुराना फोन निकाला और मयंक का नंबर डायल किया।
घंटी लगातार बजती रही। रामस्वरूप जी की साँसें अटकी हुई थीं। उन्हें लगा कि शायद इस बार बेटा उठा ले। लेकिन फिर से वही यांत्रिक आवाज़ गूँजी,”आप जिस व्यक्ति से संपर्क करना चाहते हैं, वह व्यस्त हैं…”
रामस्वरूप जी ने फोन धीरे से मेज पर रख दिया। उन्होंने अपनी डायरी उठाई और उसके पन्ने पलटने लगे। तभी अचानक दुकान के बाहर एक कार के रुकने की आवाज़ आई। दरवाज़ा खुला और एक लंबा-चौड़ा युवक कोट पहने हुए तेज़ी से दुकान के भीतर आया।
कोहरे और धुंधले प्रकाश में रामस्वरूप जी ने अपनी आँखें सिकोड़कर देखा।
“बाबूजी!”
वह आवाज़… वह आवाज़ पिछले पाँच सालों से रामस्वरूप जी के कानों में गूँज रही थी। वह मयंक था। मयंक बिना किसी पूर्व सूचना के अचानक आ गया था। उसके चेहरे पर थकान थी, लेकिन आँखों में वह पुरानी चमक और थोड़ी सी गिल्ट (अपराधबोध) भी साफ़ झलक रही थी। उसने सीधे आगे बढ़कर रामस्वरूप जी के पैर छू लिए।
रामस्वरूप जी अवाक रह गए। उनके हाथ काँपने लगे। उन्होंने अपने दोनों हाथों से मयंक का चेहरा उठाया और उसकी आँखों में देखने लगे। “मयंक… तू… तू अचानक? कोई बात तो नहीं?”

मयंक ने अपनी आँखें पोंछते हुए कहा, “कोई बुरी बात नहीं है बाबूजी। बस… बहुत दिनों से आपकी वो चाय और आपकी ये दुकान याद आ रही थी। बेंगलुरु में बड़ी-बड़ी इमारतों के बीच जब रात को अकेला बैठता था, तो लगता था कि मैं सब कुछ पाकर भी बहुत कुछ खो चुका हूँ। पिछले हफ्ते मैंने एक मीटिंग के बीच अचानक लैपटॉप बंद कर दिया और फ्लाइट पकड़ ली।”
मयंक ने दुकान के चारों तरफ नजर दौड़ाई। वही पुरानी किताबें, वही दीमक की महक और कोने में रखी उनकी वह पुरानी कुर्सी। उसे महसूस हुआ कि दुनिया चाहे जितनी बदल जाए, उसकी जड़ें यहीं इसी मिट्टी से जुड़ी हुई थीं।
रामस्वरूप जी की आँखें नम हो गईं। उन्होंने मयंक को अपने सीने से लगा लिया। उस ठंड भरी रात में, अस्सी घाट की उस छोटी सी दुकान के भीतर एक अजीब सी गर्माहट फैल गई थी।
अगली सुबह, जब सूरज की पहली किरण ने गंगा के घाटों को छुआ, तो रामस्वरूप जी और मयंक दोनों घाट की सीढ़ियों पर बैठे थे। भोला ने दो कुल्हड़ चाय लाकर उनके सामने रखी।
मयंक ने चाय का कुल्हड़ उठाया और रामस्वरूप जी की तरफ देखकर मुस्कुराया। रामस्वरूप जी ने अपनी जेब से वह चमड़े की जिल्द वाली डायरी निकाली और मयंक के हाथ में रख दी।
मयंक ने पूछा, “यह क्या है, बाबूजी?”
रामस्वरूप जी ने गंगा की बहती धारा की ओर देखते हुए कहा, “यह समय के वे पन्ने हैं, बेटा, जो मैंने तुम्हारे लिए सहेज कर रखे थे। अब इन पन्नों को पलटने की ज़िम्मेदारी तुम्हारी है।”
समय अपनी रफ्तार से बह रहा था, लेकिन इस बार वह किसी से दूर नहीं जा रहा था, बल्कि दो पीढ़ियों के बीच की दूरियों को पाट रहा था। अस्सी घाट की धूप अब और भी सुनहरी लग रही थी।

महेन्द्र तिवारी
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