काली टाई वाली औरत \ कहानी - rashtrmat.com

काली टाई वाली औरत \ कहानी

जयंती रंगनाथन की ‘काली टाई वाली औरत’ कहानी का मुख्य संदेश है कि अंधविश्वास और चमत्कारी  इलाज के दावों पर आंख मूंदकर भरोसा करना खतरनाक हो सकता है। मोबाइल की लत जैसी समस्या का समाधान झूठे दावों और जादू-टोने में नहीं, बल्कि सही समझ, जागरूकता और वैज्ञानिक उपचार में है।कहानी एक मां के त्याग और बच्चों के प्रति उसके प्रेम को भी उजागर करती है। वह अपने नाती को मोबाइल की लत से बचाने के लिए खुद को प्रयोग का माध्यम बना देती है।

काली टाई वाली औरत \ कहानी

ठीक घर के नीचे, तमाम तारों और केबल से घिरे बिजली के खंबे पर, बीचोबीच लकड़ी का एक बोर्ड लगा हुआ था, एकदम नया।

क्या आपका बच्चा पढ़ाई छोड़ कर हर समय मोबाइल में लगा रहता है? सोशल मीडिया में फेसबुक, इंस्टा और रील में गुम रहता है?

अगर हां तो चेत जाइए, यह एक बीमारी है

इससे पहले के कोई बड़ा कांड हो जाए, उसे मोबाइल एडिक्ट बनने से रोकिए।

इस बीमारी का शर्तिया इलाज

बस दो दिनों में

संपर्क कीजिए

डॉक्टर अंजुमन से

नीचे दो मोबाइल नंबर दिए गए थे।

घर की सीढ़ियां चढ़ते समय रूना ने रुक कर पोस्टर पढ़ा। चेहरे पर अजीब सी मुस्कराहट आई। लो, अब ये भी धंधा बन गया। रूना घर पहुंची तो मां बालकनी में आरामकुर्सी पर आंख बंद किए सो रही थीं। उनको इस तरह शांति से सोते देखना अच्छा लग रहा था। मां की बाईं आंख का पांच दिन पहले मोतियाबिंद ऑपरेशन हुआ था। इस समय आंख में पट्टी बंधी थी। टीवी नहीं देख पाती थी, मोबाइल नहीं देख पाती थी, एक तरह से फ्रस्ट्रेटेड हो रही थीं। रूना ने गैस जला कर भगौने में पानी डाला। शाम की चाय का वक्त है। मां और वो एकदम कड़क और सख्त सी चाय पीते हैं। दो खारी बिस्किट के साथ। मां का बस चले तो चाय के साथ भी अपनी बतकही जारी रखे। रूना ने ही नियम बनाया है, हाल-फिलहाल। खाते-पीते समय कोई बात नहीं करेगा। और तो घर में कोई रहता नहीं, मां के लिए ही हैं ये और ऐसे वाले सारे नियम। मां भुनभुन भी करती हैं। नियम तोड़ती भी हैं। गुस्सा भी होती हैं। पर रूना की मर्जी। जो वो तय करे। ऐसे ही थोड़े खूसट मास्टरनी के नाम से मशहूर है।

तो रूना पढ़ाती है एक मिडल स्कूल में। स्कूल बेशक प्राइवेट है, पर सारी खामियां सरकारी वाली हैं। बच्चों को पढ़ने में कोई दिलचस्पी नहीं और मास्टरों को पढ़ाने में। मास्टर गति को पहुंचे लोग बस हर समय इस फेर में रहते हैं कि उनके पैसे कैसे बढ़ जाएं। हर मास्टर के पास तयशुदा बच्चे ट्यूशन पढ़ने आते हैं, स्कूल में ही या उनके घर में। शायद ही कोई बच्चा स्कूल में ऐसा हो जो ट्यूशन पढ़ने ना जाता हो। रूना ने भी किया यह काम कुछ साल। दो साल पहले जब पापा के गुजरने के बाद मां साथ रहने आई, तो उसने ट्यूशन लेना छोड़ दिया।

ऐसा नहीं था कि उसे अतिरिक्त पैसे खलते थे, चाहिए थे, जरूर चाहिए थे, पर मां ज्यादा देर तक घर में अकेली नहीं रह पाती थीं। जब शाम को स्कूल में ट्यूशन पढ़ा कर रूना थक-हार कर घर आतीं, तो मां कभी बीच बाजार में तफरी कर रही होतीं तो कभी बाइयों के मोहल्ले में कोई सिरफरी सी बात ले कर कभी जमादार से तो कभी कचड़ा उठाने वाले किसी बच्चे से झगड़ रही होतीं। वहां से मां को वापस घर लाना टेढ़ी खीर होता। रोज-रोज के झंझट से तंग आ कर रूना ने ट्यूशन लेना छोड़ दिया।

अब दोनों साथ रहते थे, पर ऐसे जैसे दो तलवारें आपस में भिड़ने को तैयार हों। मां कुछ कहती, रूना दो-दो जवाब देती। रूना के कुछ का मां कुछ और बनाती और देर रात तक मां-बेटी में दुस्साहसी लड़ाइयां होती रहतीं। चीखम चिल्ली और कभी-कभी तो तोड़-फोड़ भी।

रूना ने कभी किसी से इस बात की शिकायत नहीं की कि मां उसके साथ क्यों रहती हैं। एक भाई था बड़ा और बहन थी छोटी। दोनों शादीशुदा थे। दोनों ने मां को साथ रख कर देख लिया, दोनों की शादियां टूटने के कगार पर आ गईं। तय हुआ मां रूना के साथ रहेंगी। वो भी अकेली, मां भी अकेली। रूना की खब्त पूरे परिवार में नामचीन थी। मां तो पहले से थीं। दोनों का साथ रहना और एक-दूसरे की खब्त बांटना लाजिम था।

रूना चाय बना कर कमरे में ले आई। मां के कान के पास जा कर जोर से चिल्लाई, ‘चाय तैयार है।’

मां घबरा कर उठीं। हिलती हुई। पांच मिनट तक हिलती रहीं। पहले खुद को संभाला फिर अपने हिलते हाथ को। चाय का कप हाथ में लेने के बाद कुछ बोलने के लिए मां ने मुंह खोला, रूना ने यह कह कर चुप करवा दिया, ‘पी लो, फिर बोलना। मैं भी तुम्हें एक मजेदार बात बताऊंगी।’

चाय पीने तक मां किसी तरह दांत भींचे और पेट दबाए बैठी रही। कप नीचे रखते ही मां की आवाज आने लगी, ‘तू हमेशा मुझे चुप रहने को क्यों कहती है? तू तो ना होती चुप। मुझे बता आज खाने में दाल इतनी फीकी क्यों थी, तड़का भी नहीं था। मैं ऐसा खाना खाऊंगी अब? मुर्दों वाला खाना?’

रूना चिढ़ कर बोली, ‘लगाया तो था तड़का। पर तुम्हें ना मां, मिर्च मसाला खाने की बुरी आदत पड़ गई है। फिर सुबह उठ कर रोती रहती हो कि जल रहा है पिछवाड़ा। जलेगा खूब जलेगा। और खाओ मिर्ची। मैं कल से लाल मिर्च कूट कर रख जाऊंगी एक कटोरी में। मिला लेना दाल में।’

‘तू राक्षसनी है। वो ही बोलती हैं ऐसी बातें। मैं क्यों खाऊंगी कुटी मिर्च? खाना ठीक से बनाना आता नहीं, दोष मिर्च को दे रही है।’

ऐसी बातें अनंत काल तक चलती रहती थीं। सुनने वाले को अखर सकता था, बोलने वाले को नहीं। पर अंतत: रूना ही बीच में रुकी और उसने मां को घर के नीचे लगे पोस्टर के बारे में बताया। मां चमत्कृत हुई, फिर बोलीं, ‘मैं भी जा कर देखूंगी। बरनी का बेटा मोंटू तो मोबाइल के पीछे पगलाया रहता है। दिनभर बस रील-रील। बरनी को बोलूंगी अपने बेटे का इलाज करवा ले।’

बरनी यानी रूना की छोटी बहन।

मां को शाम को सीढ़ी से उतार कर रूना नीचे का एक चक्कर लगवा लाई। मां की आंखें अभी कमजोर थीं, सो रूना से एक पर्चे पर अंजुमन का नंबर लिखने को कहा। रूना को लगा, मां नंबर बरनी को भेजेंगी। पर मां के दिमाग में तो कुछ और ही था।

रूना को दुनिया के तमाम बच्चों की तरह स्कूल जाना सख्त नापसंद था। लेकिन मजबूरी। बच्चों की भी, अध्यापकों की भी। सुबह जल्दी उठना, तैयार हो कर और अपना होमवर्क करके जाना, ये ऐसे काम थे, जिनसे रूना स्कूली टाइम से ही बच कर चलती। पर क्या करें, अध्यापिका की नौकरी टाइम से और आसानी से मिल गई। परमानेंट होने के लिए बीएड भी कर लिया। फिर आदत भी तो होती है। बन गई आदत। अपनी इस बेजार आदत से खदबदाई रूना को स्कूल से घर लौटना अच्छा लगता था। रास्ते में यूं ही लपड़-लपड़ पैर चलाते हुए घूमना, कुछ पसंद की चीज खरीद कर खा लेना, ये सब अध्यापकी के पर्क्स थे। तो अच्छे मूड में चल रही थी रूना। दोपहर ढले घर के अंदर घुसी तो एकदम कमरे के बीचोबीच एक अजीब सी शक्ल वाली औरत को बैठा पाया। शक्ल-वक्ल तो बाद की बात, सबसे पहले निगाह गई उसके ढीलमढील शर्ट पर पहनी गई काली टाई पर। रूना बेतहाशा चौंक गई। फिर उसने गौर से देखा, पैरों में एकदम ढीला सा पैंट, कंधे तक के बदरंग बालों की अस्त-व्यस्त पोनी। है कौन? उसके घर में क्या कर रही है?

उसके ठीक सामने मां बैठी थी। मां का चेहरा बता रहा था, उनका मूड और दिमाग सही है।

रूना के चेहरे पर असमंजस देख मां ने जल्दी से कहा, ‘तूने पहचाना? कल तूने जिक्र किया था इनका।’

रूना ने चेहरा घुमाया। और नहीं में सिर हिलाया।

‘अरे, अंजुमन हैं। बिल्डिंग के नीचे पोस्टर लगवाया है। मोबाइल की बीमारी से छुटकारा दिलवाने वाली डॉक्टर।’

रूना की आंखें चौड़ी हो गईं। अंजुमन की कमर जितनी। हार कर उसने अपनी निगाह उनके चेहरे पर जड़ दी।

अंजुमन एक पांव पर दूसरे पांव रख कर बैठी थी। घड़ी-घड़ी ऊपर रखा पांव हिलाने लगती। मां के चेहरे पर लंबी वाली हंसी फैली थी। यानी उन्हें अच्छी लग रही थी काली टाई पहनी यह औरत।

रूना अपना स्कूल का बैग रख कर कुर्सी खींच कर बैठ गई। मां को देख कर पूछ लिया, ‘इनसे कब बात की तुमने? कल रात ही तो नंबर लिया था?’

‘सुबह। जैसे तू स्कूल गई, मैंने फोन लगा दिया। हमने खूब बातें की। कह रही हैं बरनी के बेटे की लत तो एक ही दिन में ठीक कर देंगी। मैंने कहा, घर आ जाओ। यहीं से फोन कर लेंगे बरनी को।’

‘तो कर लिया?’

‘अरे अभी कहां, अभी तो हमारी बातें ही खत्म नहीं हुईं। अंजुमन मैडम तो गजब की हैं। अमरीका में काम कर चुकी हैं…’

‘हम्मम… क्या काम? मोबाइल वाली बीमारी को ठीक करने का?’ रूना की आवाज तीख्री सी थी।

अंजुमन के चेहरे की मुस्कान पहले थोड़ी उतरी, फिर बहुत। गला खंखार कर बोलीं, ‘बीमारी तो बीमारी है। ऐसी कई बीमारियां से दो-दो हाथ कर चुकी हूं। बट फॉर युअर काइंड इंफार्मेशन, मैं प्रोफेशनल डॉक्टर हूं। मैंने न्यूयॉर्क में चौदह लोगों के परिवार में ये बीमारी ठीक है। दादा से पोता तक, हर कोई दिन में बाइस घंटे फोन पर अटका रहता था। मैंने ऐसा शर्तिया इलाज किया कि उस घर में अब एक भी मोबाइल फोन नहीं है।’

‘अच्छा क्या किया? चोरी करवा दिया क्या?’

‘लगता है आपकी बेटी को मुझ पर यकीन नहीं है अम्मा।’ अंजुमन ने मां की तरफ देख कर कहा, ‘तब से मजाक उड़ाए जा रही है। इतना बड़ा पोस्टर पूरे शहर में हर कहीं लगाया है, तो कोई तो बात होगी ना मुझमें?’ अंजुमन के मुंह से गुस्सा नुमा झाग निकलने लगा।

मां ने बात संभाली, ‘मास्टरनी है ना। बच्चों को जल्दी से नंबर नहीं देती। बुरा ना मानो इसकी बातों का। आपके टाइम पर भी स्कूल में सनकी मास्टरनियां होती थीं ना। वैसा ही समझ लो।’

रूना का मन हुआ, मां को वहीं सुना दें। पर इस समय नहीं। काली टाई वाली औरत के सामने नहीं।

वो उठी और थोड़ा आवाज ठीक करके बोली, ‘चाय पिएंगी आप? इस समय मैं और मां रोज पीते हैं।’

‘हां, पी लूंगी। चीनी तेज रखना। कोई बीमारी नहीं है मुझे।’

वैसे शक्ल और शरीर से तो लग रहा था, तमाम होंगी, तभी दूसरों के मोबाइल की बीमारी को ठीक करने का ठेका ले रखा है।

काली टाई वाली डॉक्टर अंजुमन दिलचस्प किरदार थीं। चाय के साथ-साथ किस्से पर किस्से चटकाती गईं। अंतिम किस्सा था कि उसे काला जादू आता था और अकसर वो अपने क्लायंट को ठीक करने के लिए दवाओं के साथ काला जादू का इस्तेमाल करती थी।

मां यह सुनकर बेहद उत्तेजित हो गईं। लेकिन रूना हाथ बांधें बैठी रही। यह थोड़ा ज्यादा हो गया। काला जादू? कोरी गप्प।

अंजुमन गंभीर आवाज में बोली, ‘यकीन करना है तो करो, वरना मेरा क्या? पर मैं जो काला जादू को भी एक दवा मानती हूं। हड्रैंड पर्सेंट शर्तिया इलाज।’

‘मोबाइल के लत जैसी टुच्ची चीज छुड़ाने के लिए काला जादू? ऐसा कौन करवाता होगा?’

‘उनसे पूछिए जिनके घर में बच्चों से ले कर बड़े तक कामधाम छोड़ कर हर समय मोबाइल में डूबे रहते हैं। हर समय बस रील-रील। यह इस सदी की सबसे बड़ी लत है। शराब और गांजे से भी ज्यादा। वो लत तो आप छुड़ा भी लो, मोबाइल की लत छोड़े ना छूटती है। मेरे पास एक मां आई थी अपने तेईस साल के बेटे के साथ। उसका एक कंधा कान के साथ जुड़ गया था। लड़का मोटरसाइकिल चला रहा हो या पैदल चल रहा हो, एक कान पर हमेशा फोन टंगा रहता। वो भी कंधे के सहारे। लोग कुबड़े होते हैं, वो लड़का कंधड़ा हो गया था। एक सेकंड मोबाइल फोन के बिना ना कटे। कभी देखे रील, तो कभी गेम खेले तो कभी कुछ सुन ले। अजब था हाल। ठीक से खड़ा नहीं हो पा रहा था। मरीजों का मरीज था। दवा और दुआ से ठीक होने वाला प्राणी नहीं। फिर मैंने किया इलाज। एकदम ठीक हो गया। अब मोबाइल फोन देखते ही उसे उबकाई आ जाती है। दूर उठा कर फेंकता है जैसे रेंगता हुआ सांप देख लिया हो।’

रानू हंसने लगी, ‘और ये सब काला जादू से हुआ?’

‘बिलकुल। मैं पहले मरीज को देखती हूं। दवा से ठीक होने वाला हो, तो सही। नहीं तो यही इलाज करती हूं। यह शर्तिया इलाज है। सौ परसेंट।’

मां बुदबुदाने लगी, ‘मोंटू के लिए यही इलाज सही रहेगा।’

‘चुप रहो मां,’ रूना गरज कर बोली, ‘बेकार में बरनी और मोंटू का समय खराब ना करो। मैं बात करूंगी, मोंटू से। ये जादू-वादू कुछ नहीं होता। और मैडम अंजुमन। आपने चाय पी ली है तो अपने तशरीफ का टोकरा उठा कर जाएं यहां से। हमारी मां के सामने ये उल्टी-सुल्टी बातें मत कीजिए। ये खुद भी काली-पीली जादूगरनी से कम नहीं। कहीं आप पर जादू ना कर दे।’

अंजुमन तमतमा कर उठ खड़ी हुई। अब जा कर उसका असली कद सामने आया। वो पांच फुट से कुछ कम की खाती-पीती महिला थी। रूना थी पांच फुट छह इंच की लहीम-शहीम कद-काठी की औरत। वो एकदम से काला जादू की डबल लग रही थी। अंजुमन ने अपने कद को नापते हुए सिर झुकाया और दरवाजा खोल कर दन-दन करती बाहर निकल गई।

मां अब तक अपने को जब्त किए थी, फट पड़ी, ‘तूने घर आए मेहमान का अपमान कैसे किया? वो भी मेरे मेहमान का? मैंने बुलाया था उसे।’

रूना अपनी आवाज काबू में रखती हुई बोली, ‘मां तुम इन चक्करों में मत पड़ो। घर पर मत बुलाया करो। सच में जादू जानती होगी तो अनर्थ कर देगी।’

‘जरूर जानती होगी। मैं कहूंगी उससे, तेरे पागलपन का इलाज करे सबसे पहले। हां, पागल है तू पागल। मैं कहे देती हूं, मुझे अच्छा नहीं लगा तेरा बोलना। पाप लगेगा तुझे।’

रूना ने सिर पकड़ लिया, ‘पहले से कम लगा है क्या मां? और श्रॉप क्यों दे रही हो? शांत हो जाओ। मैं बरनी से बात करूंगी।’

‘बरनी से नहीं, अंजुमन से बात करेगी। मैं कहे देती हूं, जब तक तू उससे माफी नहीं मांगेगी, मैं खाना नहीं खाऊंगी। पानी भी नहीं पियूंगी। आज से अभी से भूख हड़ताल…’

रूना कंधे उचका कर वहां से चली गई। मां को पीछे छोड़ कर। पता है, उसकी मां भूखी नहीं रह सकती। शाम होते-होते खुद आ जाएंगी किचन में। कुछ बनवाने। खाने।

पर शाम हो गई, रात भी होने को आई। मां अपनी जगह से टस से मस ना हुईं। बरनी का फोन आया, ‘दीदी, मां को क्या हो गया? तुमने कुछ कह दिया क्या? कह रही है खाना-पीना छोड़ दिया है।’

‘सब तेरे लिए है बरनी। तेरे और मोंटू के लिए। किसी फॉक्स डॉक्टर को पकड़ कर लाई थी मोंटू की मोबाइल की बीमारी का इलाज करवाने। मैंने डॉक्टर को चैलेंज कर दिया तो मां नाराज हो गईं।’

‘ऐसा क्यों कर रही हो दीदी? पता है ना मां लो बीपी की मरीज हैं। नहीं खाएंगी तो शुगर और भी नीचे चला जाएगा। मां को नाराज मत किया करो दी…’

रूना का मन हुआ, अपनी छोटी बहन का गला पकड़ ले, कमबख्तों, तुम लोग नहीं रख पाए मां को, यहां भेज दिया और मुझसे कह रहे हो मां को नाराज मत कर। रूना की आवाज सख्त हो गई, ‘बहन, तुझे इतनी चिंता है तो आ कर उन्हें मना ले। देख, मैं तो ऐसी ही हूं। देखती हूं कब तक नहीं खाती?’

‘मोंटू के एग्जाम ना होते तो आ जाती दीदी। प्लीज संभाल लो। मैं दस-पंद्रह दिन में आ जाऊंगी। तुम कहोगी तो कुछ दिन के लिए मां को अपने साथ ले जाऊंगी। मेरी सास चार धाम के लिए बाहर जा रही हैं।’

रूना ने कुछ कहा नहीं। बहन मां को तभी अपने पास रख सकती हैं जब सास साथ ना हो। भाई तभी रख सकता है, जब बीवी मायके गई हो। वो कब रख सकती है, इस बारे में किसी को परवाह नहीं है।

बरनी की बातों को सिर से झटक रूना ने मां के कमरे में झांका। वो दुपट्टे से मुंह ढांके औंधी पीठ पड़ी हुई थी। रूना ने उनके कान के पास जा कर कहा, ‘मां, कुछ खा लो। तबीयत खराब हो जाएगी। बच्चों जैसा क्यों कर रही हो?’

मां पलटी। उनकी आंखें लाल हो रखी थीं, ‘मैं करूंगी। बच्चों जैसा करूंगी। पागल हूं ना, ना हूं तो हो कर दिखाऊंगी। पर खाना नहीं खाऊंगी। जा तू खा ले। सब खा ले। मेरी आंखों से दूर हो जा।’

‘मां…’ रूना जोर से बोली, ‘एक पागल औरत आ कर कुछ बक गई और तुमने गंभीरता से ले लिया। उठो मां। बरनी भी आएगी यहां जल्दी। तुम थोड़े दिनों के लिए चली जाना उसके साथ। देखो, जिंदा रहोगी तभी तो जाओगी अपनी प्यारी छोटी बेटी के पास। गर्म दूध ला दूं?’

‘नहीं,’ मां एकदम जोर से चिल्लाई, ‘मैं मर जाऊं तो ही अच्छा है।’

रूना कमरे से बाहर आ गई। पर चिंता बढ़ गई। मां इस तरह खाना छोड़ देंगी सोचा नहीं था। किसी तरह दोनों मां-बेटियों की भूखी-सूखी रात बीती। रूना की नींद जल्दी उचट गई। मां कमरे में सो रही थी। माथे पर हाथ रखा, गर्म था। रूना चाय बना लाई। मां के कानों के पास जा कर धीरे से बोली, ‘चाय बिस्कट लाई हूं। उठो …’

मां गला खंखार कर उठी। चाय का कप हाथों में पकड़ा, बिस्किट मुंह तक ले जाने को हुई फिर एकदम से दूर फेंक दिया। कप तिपाई पर रख फिर से लेट गई। रूना का चेहरा लटक गया। मां का चेहरा अपनी तरफ करके बोली, ‘ऐसा क्यों कर रही हो मां? अच्छा, प्रॉमिस, मैं तुम्हारी काली टाई वाली औरत को शाम को घर ले कर आऊंगी। माफी भी मांग लूंगी। पर तुम मेरी बात मान लो। कुछ खा लो।’

मां की आंखों में हल्की सी चमक आई। चाय का कप हाथ में उठा लिया। धीरे से घूंट भर कर बोली, ‘सच्ची कह रही है ना तू? देख, झूठ बोलेगी तो मैं तुझ पर कभी यकीन नहीं करूंगी।’

रूना ने उनका सिर हलके से थपथपाया। पूरा शरीर गर्म हो रखा था। कुछ खिलाने के बाद दवा देनी होगी। शरीर कमजोर हो रहा है, बस अकल की धार नहीं घिस रही।

रूना तैयार हो कर मां को नाश्ता खिला कर स्कूल के लिए निकली। उसने अंजुमन के नंबर पर फोन किया। नंबर पर लंबी-लंबी घंटी जाती रही। किसी ने नहीं उठाया। उसने मैसेज छोड़ा, किसी भी तरह शाम को घर आ कर मां से मिल ले। मैसेज का भी कोई जवाब नहीं आया।

स्कूल में पढ़ा रही थी, पर ध्यान में मां थी, अंजुमन थी। पता नहीं, मां ने लंच किया होगा या नहीं। घर जा कर मां सवाल पूछेगी तो क्या जवाब देगी?

स्कूल छूटने के बाद घर जाने में कोई उत्साह नहीं था। रास्ते में रह-रह कर आंखें चौकन्नी हो रही थीं। शायद कहीं दिख जाए वो पांच फुट की पगलिया। काला सा कुछ आंखों के सामने से गुजरता तो लपक कर वो पीछे पड़ जाती। क्या पता, काली टाई हो मोहतरमा की।

रास्ता खत्म हो गया, घर आ गया। पर जादूगरनी का कोई लच्छन नजर नहीं आया।

मां खिड़की का सींकचा पकड़े खड़ी थी। आंखें दुबला गईं, चेहरा ढला सा। रूना का चेहरा देखा, फिर धीरे से कहा, ‘झूठ कहा तूने। साथ ले कर आएगी।’

‘मैंने कई बार फोन किया मां। वो उठा नहीं रहीं।’

मां सिर हिलाने लगी, गुड़िया की तरह, फिर तड़प कर बोली, ‘मैंने भी लगाया। वो उठा नहीं रहीं। नाराज है मुझसे। अब तो जरूर जादू कर देगी।’

‘कुछ नहीं करेगी। वो रोज ना जाने कितनों से मिलती होगी। सब पर जादू करने लगेगी तो खेल खत्म हो जाएगा। मैं ढूंढ रही हूं। मिल जाएगी।’

मां ने कुछ कहा नहीं। बस चेहरा सुझाए बिस्तर पर जा कर लेट गईं। रूना घर से बाहर निकल आई। उसके स्कूल के कुछ छात्र ट्यूशन के बाद घर जा रहे थे। रूना ने इशारे से उन्हें बुलाया। एक सींकिया सा लड़का दौड़ता हुआ उसके पास आया।

‘क्या नाम है तुम्हारा? कौन सी क्लास में पढ़ते हो?’

‘मैडम जी, सच्छम, कक्षा सात। याद नहीं, कल हाथ में डस्टर से कस कर दिया था आपने।’

रूना चुप हो गई। पर बच्चा हुलस कर ऐसे बोल रहा था मानो उसे प्रसाद मिला हो।

रूना ने रुक कर पूछा, ‘तुम खंबे पर चढ़ सकते हो?’

गणित सिखाने वाली मैडम को खेल की बातें करता देख लड़का गदगद हो गया, ‘जी मैडम। बिलकुल। दो सेकंड में किसी भी खंबे पर चढ़ सकते हैं। दिखाएं आपको?’

‘तुम्हारे पास मोटी वाली पेन है?’

लड़के ने अपना कंपास बॉक्स खोल कर दिखाया। उसमें हाइलाइटर था। रूना ने हाथ में ले लिया और स्पष्ट आवाज में बोली, ‘ये जो सामने खंबा देख रहे हो, उस पर चढ़ कर जो पोस्टर लगा है ना, उसके नीचे लिखना है, माता जी याद कर रही हैं। जल्दी से घर आओ।’

लड़का उत्तेजित हो कर तुरंत खंबे पर चढ़ गया। उसे मास्टरनी का बताया जितना याद था, लिख दिया, मास्टरनी याद करे हे। जलदी आओ।

रूना ने उसे नीचे उतरने का इशारा किया। आगे के दो-तीन खंबों पर भी ऐसा ही कुछ लिखवा दिया।

लड़का थक गया। रूना ने तय किया अगली बार लड़के को गणित के एक्जाम में फेल नहीं करेगी। एक नहीं तो क्या, दूसरा हुनर तो है उसके पास। जी लेगा। कैसे भी। गणित हो या ना हो।

लड़का चला गया। वो भी घर आ गई। शाम ढल गई। अकेले चाय पीने में जरा भी मजा नहीं आया। पिया ही नहीं गया। रात होने लगी। खिचड़ी बनाने के लिए कुकर चढ़ा कर मां को देखने आई। मां लगभग बेहोश सी बिस्तर पर पड़ी थी। रूना ने झिंझोड कर कहा, ‘मां, सच कह रही हूं। मैंने बहुत कोशिश की, अंजुमन से मिलने की। नहीं मिल रही है मां। तुम समझो ना, प्लीज। उठ जाओ। हाथ-मुंह धो कर कुछ खा लो।’

मां नहीं उठी, पर घर की घंटी बज गई। रूना ने उठ कर दरवाजा खोला। वो खड़ी थी, काली टाई वाली। स्टाइल से, दरवाजे पर टेक लगाए।

‘मैंने सुना, मास्टरनी मेरी खोजबीन कर रही है…’

रूना ने दरवाजे से हट कर रास्ता बनाया, ‘हां, तुमने मां पर ना जाने क्या जादू कर दिया है। हम दोनों फोन लगा रहे हैं। तुम उठा नहीं रहीं।’

‘किसी पॉकेट मार ने मोबाइल पर हाथ साफ कर लिया था।’ अंजुमन हलकी आवाज में बोली।

‘किसकी हिम्मत हुई तुम्हारा मोबाइल चुराने की? जादू काम ना आया?’

‘आया ना। मैंने जब अपने नंबर पर कॉल लगाया तो कांपत हुए बोला, आधे घंटे में मोहन हलवाई की दुकान पर पहुंच कर मोबाइल ले कर जाओ। कहने लगा, जब भी फोन हाथ में उठाता है, लगता है भूचाल सा आ जाता है। कस्सम से अब मैं काम कभी नहीं करूंगा।’

अंजुमन कहते-कहते कमरे में आ गई। ऐसा लग रहा था जैसे यह चवन्नी छाप कहानी सुना कर मास्टरी का मजाक उड़ा रही हो। ठसके से सोफे पर बैठती हुई बोली, ‘क्या हुआ मास्टरनी? इतना याद क्यों कर रही थी? जगह-जगह खंबे पर संदेश देखे तुम्हारे।’

रूना ने ध्यान से उसका चेहरा देखा, इस समय थोड़े घमंड में थी।

‘मां को लग रहा है तुम उनकी दिक्कतें दूर कर सकती हो। खाना-पीना छोड़ रखा है।’

अंजुमन अजीब तरीके से सिर हिलाने लगी। फिर बोली, ‘मां समझदार हैं। तर्क नहीं करती। बस उनको काम पूरा होने से मतलब है। कोई नहीं, मैं करूंगी उनका इलाज। कहां है?’

अंजुमन की आवाज सुन कर मां खुद कमरे से उठ कर आ गईं। दो दिन में एकदम ढल गई थीं। चेहरा पिचका हुआ। आगे आ कर अंजुमन का हाथ पकड़ लिया, ‘तुम आ गई। अच्छा किया। मास्टरनी ने माफी मांगी तुमसे? देखो बेटी, ये दिल की बुरी नहीं है। इसका बुरा मत करना। मैं एक मां हूं, हर बच्चे का भला चाहती हूं। इसका भी।’

‘समझ गई। बोलो तुम्हें क्या दिक्कत है?’

मां उसके पास सोफे पर चिपक कर बैठ गई, ‘मेरा अपना दुख बहुत बड़ा नहीं है। मुझे अपने बच्चों की चिंता ज्यादा है। वो छोटी बेटी है ना, बेचारी है। नौकरी नहीं करती। पति गुस्सैल है। बेटा एक नंबर का गधा है। पढ़ाई में बिलकुल ध्यान नहीं देता। हर समय बस मोबाइल मोबाइल। हाथ में गांठ पड़ गई है। आंखें खराब हो गई हैं। बाहर खेलना-कूदना सब बंद है। चौबीस घंटे कमरे में बंद रहता है, दोस्तों से चैटिंग, रील देखना, फेस बुक अलामा ढिमाका… चौदह साल का हो गया है। दो बार फेल हो गया है। बेटी परेशान रहती है। उसका आदमी गुस्सा करता है उस पर। बेटे को मारता है। मैं मैं…’ मां कहते-कहते हांफने लगी।

अंजुमन के चेहरे पर अजीब सी मुस्कान आई, ‘सबका यही हाल है अम्मा जी। ये मोबाइल की लत, वो क्या है महामारी की तरह है। अभी हमें नहीं पता कितना नुकसान कर जाएगा। दस साल, बीस साल बाद देखिए, बच्चे-बूढ़े जोम्बी की तरह मिलेंगे। प्रेत की तरह सड़कों पर दिखेंगे, जिनकी आंखों में दूरबीन लगा होगा और हाथों में मोबाइल। किसी काम के नहीं रहेंगे। मर जाएंगे हाथ चलाते-चलाते। तभी तो कहती हूं, समय रहते इलाज करा लो।’

इस बार रूना भी चुप रही।

चाय बना लाई। साथ में खारी बिस्किट भी।

अंजुमन ने चाय में बिस्किट डुबो कर खाया। फिर पैंट में हाथ पोंछती हुई बोली, ‘अब बताओ माता जी, कहां से शुरू करना है? लड़का कहां है?’

‘लड़का तो भोपाल में है। पर सुनो। पहले मेरा इलाज करो। मैं संतुष्ट हो जाऊं, मुझ पर काम कर जाए तब मोंटू का करना।’

‘आपको क्या दिक्कत है?’ अंजुमन दमक गई।

‘अरे, मेरे हाथ से भी तो मोबाइल ना छूटता। दिन भर देखती रहती हूं अल्लम-गल्लम।’

रूना बीच में टपक पड़ी, ‘मां, तुम्हारी बात अलग है। तुम टीवी भी देखती हो। गॉसिप भी करती हो। लड़ती भी हो। मोबाइल में कभीकभार कोई रील देख लेती हो। तुम्हें तो ठीक से व्हाटसऐप चैट का भी जवाब देना नहीं आता। तुम दूर रहो।’

‘नहीं। मुझे भी लत है मोबाइल की। अंजुमन, जो करना है पहले मेरे साथ करो। दवाई दो, जादू करो। कुछ भी। मैं ठीक हो जाऊंगी, फिर बच्चे का करना।’ मां ने जिद में आ कर कहा।

रूना परेशान हो गई। अंजुमन उठ गई, ‘ठीक है माताजी, आज तो रात हो गई। कल से शुरू करते हैं आपका इलाज…’

अंजुमन के जाने के बाद मां चहकने लगीं। कहने लगीं, ‘अब देखना मोंटू ठीक हो जाएगा। वैसे होशियार लड़का है। बस मोबाइल का बीमार हो गया। इलाज हो जाएगा तो देखना, एकदम टॉप क्लास पढ़ेगा।’

रूना खिचड़ी बना कर लाई थी। मां को चम्मच से खिलाती हुई बोली, ‘कहां फंस रही हो माते? अंजुमन और उस जैसे लोग डॉक्टरी के नाम पर फ्रॉड करते हैं। लोगों की दुखती रंग पर उंगली रख कर अपना उल्लू सीधा करते हैं। मोबाइल की लत को ठीक करेगा एक साइकोलॉजिस्ट। वो समझाएगा, दवाई देगा, ध्यान भटकाने को कहेगा, तब जा कर होगा ठीक।’

‘वही तो अंजुमन भी करेगी। बस नाम दूसरा दे दिया है। डॉक्टर लोग सफेद कोट पहनते हैं, ये काली टाई पहनती है। इससे ये घटिया और वो बढ़िया हो गए क्या? इसे भी अपना काम आता होगा। इसलिए तो मैं पहले अपना इलाज करवा रही हूं। गड़बड़ हो तो मेरे साथ हो। फिर मोंटू का करवाएंगे।’

रूना ने मां को हर तरह से समझाने की कोशिश की। मां अड़ गईं कि वो कल अपना इलाज करवा के रहेंगी।

सुबह मां खुशी-खुशी सो कर उठीं। रूना ने झक मार कर स्कूल से छुट्टी ले ली। लगभग ग्यारह बजे अंजुमन घर पर आई। अपने साथ वो डॉक्टरी बैग भी लेकर आई थी।

लाल-पीली छोटी-छोटी गोलियां और पतली सी बोतल में खुशबूदार द्रव।

रूना डर गई। मां के ऊपर ये प्रयोग कहीं गलत तो नहीं हो जाएगा। उसने अंजुमन का हाथ पकड़ लिया, ‘तुम्हें पता है ना तुम क्या कर रही हो?’

अंजुमन ने घूर कर देखा, ‘तुम जब स्कूल में पढ़ाती हो तो बच्चे सवाल करते हैं कि यह क्या पढ़ा रही हो?’

अंजुमन ने मेज पर दवाइयों का बाजार लगाया। पीली और नीली गोलियों को कूट कर मां को पानी के साथ लेने को कहा। मां ने मुंह बना कर कहा, ‘मेरी बीमारी ज्यादा है। मैं दवाइयों से ठीक ना होने की। मुझ पर तो वो अपना राम बाण क्या है काला जादू करो।’

अंजुमन ने सिर हिलाते हुए कहा, ‘आपको जरूरत नहीं है माता जी। आप दवाइयों से ठीक हो जाओगी।’

‘ना, बिलकुल नहीं। मैं ना होती ठीक। तुम तो बस वो करके दिखाओ। जादू …’

रूना सकते में आ गई। मां के कान के पास जा कर फुसफुसा कर बोली, ‘दिमाग चल गया है क्या? इस उम्र में जादू-टोना करवाओगी? बस करो मां। दवाइयां खाओ और जादूगरनी को दफा करो।’

मां फुफकारती हुई बोली, ‘बच्चा समझा है क्या? मुझे मत सिखा। मुझे पता है क्या करना है। तू अलग रह। डॉक्टरनी को अपना काम करने दे।’

डॉक्टरनी? एक छद्मी दवाफरोश को इतनी इज्जत? अंजुमन उसे पीछे ढकेल कर आगे आ गई, ‘माता जी, जो आपको लगे, मैं वही करूंगी। आखिर मरीज आप हो। अच्छा मैं जब टोना करूंगी तो कमरे में आपके और मेरे सिवाय कोई ना होगा…’

मां ने रूना को कमरे से जाने का इशारा किया। रूना टस से मस ना हुई। अबकि मां ने कड़ाई से कहा, ‘बाहर निकल। काम करने दे इसे। मुझे बीमारी का ठीक से इलाज करवाना है।’

बेमन से रूना कमरे से बाहर निकली। बरामदे में जा कर अपनी बहन को फोन लगाया। बरनी के फोन उठाते ही रूना जैसे फट पड़ी, ‘मां जादू-टोना करवा रही हैं। एक ना सुन रही मेरी। पता है क्यों? तेरे बेटे के लिए।’

बरनी रुआंसी आवाज में बोली, ‘मां को क्या पागलपन सूझ गया? फिर मां के इलाज करवाने से मोंटू थोड़े ही ठीक हो जाएगा? कल रात फिर उसने पापा से मार खाया है। पर मजाल कि मोबाइल छोड़ दिया हो। पापा ने उसका मोबाइल छिपा दिया, तो सुबह से मेरा मोबाइल हथिया रखा है। क्या करूं दी? मैं मोंटू के लिए परेशान रहूं या मां के लिए?’

रूना रुक गई, बहन को कितना परेशान करे।

‘अच्छा सुन, बाद में बात करती हूं। लगता है अंजुमन बाहर आ रही है…’

दस मिनट बाद कमरे का दरवाजा खुला। रूना झटपट अंदर गई। मां आंखें बंद कर सोफे पर लेटी थीं। उनके दाहिने बाजू में काले रंग के धागे में एक तांबे की ताबीज बंधी थी। माथे पर काले रंग से बना त्रिपुंड।

रूना झटपट उनके पास चली आई, ‘मां, मां, तुम ठीक तो हो?’

अंजुमन ने भारी आवाज में कहा, ‘अभी कुछ नहीं बोलेंगी। गहरी नींद में है। नींद में ही अपनी गलत आदतें, लत छोड़ देंगी। उठेंगी तो एकदम नई बन कर।’

‘नई मतलब?’ रूना अकबका गई।

अंजुमन शांत आवाज में बोली, ‘मैंने इनका दिमाग खाली कर दिया है। समझी, क्या कहते हैं डिटॉक्स। अब इन्हें पुराना कुछ याद नहीं रहेगा।’

रूना हलके से चीखी, ‘पुरानी बातें भूल जाएंगी? इसका क्या मतलब है?’

‘हो भी सकता है, नहीं भी। कुछ बातें याद भी रह सकती है। यह तो बीमारी पर निर्भर करता है। जितनी बुरी बीमारी, उतना गहरा इलाज।’

रूना ने अपना आपा खो दिया, लपक कर अंजुमन की काली टाई पकड़ ली, ‘पाखंडी कहीं की। पता नहीं क्या खिलाती हो बीमारी भगाने के नाम पर कि लोग याददाश्त भूल जाएं। रुको तुम। तुम्हें पुलिस के हवाले ना किया तो देखना।’

‘पुलिस? मैंने तो पहले ही बता दिया था मैं क्या करने वाली हूं। तुम्हारी मां ने इजाजत दी थी। फिर मेरी गलती कैसे हुई?’

‘ऐसे हुई कि तुमने बहकाया है मां को। पहले क्यों नहीं बताया कि वो अपना पहले का सब भूल जाएंगी?’ रूना हांफती हुई बोली। मुंह से झाग सा निकलने लगा। अंजुमन उसकी पकड़ से अपने को बचाने की पूरी कोशिश कर रही थी।

‘छोड़ दो मुझे, जाने दो। मेरे मरीज मेरा इंतजार कर रहे हैं…’

अंजुमन चीखी, पर रूना की पकड़ मजबूत थी, ‘पहले मेरी मां को होश में ला कमीनी। अगर मां तुरंत होश में नहीं आई तो तेरी खैर नहीं!’

अंजुमन और रूना के बीच हाथापाई होने लगी। रूना ने अंजुमन की काली टाई पकड़ कर उसे जोर से खींचा। अंजुमन मुंह के बल गिर गई।

रूना ने पीछे से उसकी पीठ पर मुक्का जमाते हुए कहा, ‘जब तक मां होश में नहीं आतीं, तू यहीं रहेगी। मां अगर अपना अगला-पिछला कुछ भी भूलती हैं, तो तुझे छोड़ूंगी नहीं। मैं पुलिस बुला रही हूं। ठग हो तुम, स्काउंड्रल हो। लोगों की भावनाओं का फायदा उठा कर पैसे बनाती हो। अब जेल में बैठ कर करना काला जादू…’

अंजुमन दर्द से कराहते हुए बोली, ‘मैंने कुछ गलत नहीं किया। कुछ भी नहीं। हम अपनी मेहनत का खाते हैं। तुम बताओ बहन, अगर हम पुराना भूलेंगे नहीं तो नया सीखेंगे कैसे? लत पुरानी है, तो पुराना छोड़ना पड़ता है। अपने भीतर नया भरना पड़ता है…’

रूना ने उसे दबोचे रखा। अबकि अंजुमन गिड़गिड़ाई, ‘मुझे छोड़ोगी नहीं तो मां को होश में कैसे लाऊंगी? मेरा हाथ छोड़ दो…’

रूना ने उसका हाथ छोड़ दिया। अब उसे अपने ऊपर गुस्सा आ रहा था। उसने मां की बात क्यों मान ली? इस औरत के साथ अकेले कैसे छोड़ दिया?

अंजुमन मां के पास बैठ गई। बांह से खींच कर ताबीज उतार लिया। माथे पर बना त्रिपुंड अपनी जेब में रखे रूमाल से पोंछ दिया। मां के दुपट्टे में बंधी गांठ खोल दी, उसमें कुछ काला रंग पुता चावल और चमकती हुई मोतियां थीं।

मां के कान के पास जा कर उसने जोर से कुछ फूंका।

वह दूर जा कर बैठ गई और हांफती हुई बोली, ‘होश आ जाएगा अभी। मैंने अपना किया निकाल दिया…’

अंजुमन ने अपना सामान संभाला और दरवाजा खोलने को हुई। रूना ने लपक कर फिर से उसकी टाई पकड़ ली। अबकि टाई का आधा हिस्सा उसके हाथ में रह गया और बचे आधे हिस्से के साथ अंजुमन घर से बाहर हो गई। रूना चिल्लाती रही, पर अंजुमन रुकी नहीं। वो ऐसे बगटूट भागी कि पीछे कोई निशान ही नहीं छोड़ा।

मां को होश आया, उठीं भी। पर उनकी आंखें कहीं भी रुक नहीं पा रही थीं। हाथ थिर नहीं पा रहे थे। होंठ रुक नहीं पा रहे थे। रूना को देख कर ठहर जातीं, पहचानने की कोशिश करतीं, फिर मुंह नीचे कर लेतीं। जैसे होमवर्क ना करने पर छात्र टीचर को देख कर करते हैं। रूना फौरन मां को अस्पताल ले गई। सब ठीक है। डॉक्टर ने कहा। अच्छा खिलाओ-पिलाओ, लोगों के साथ रहने दो। किसी बात से धक्का लगा है, समय के साथ ठीक हो जाएंगी।

रूना ने उनके हाथ में मोबाइल देने की कोशिश की, मां ने छटपटा कर दूर फेंक दिया। ना वो बोलतीं ना सुनतीं। पर मन ही मन गुनगुन किए रहती।

उनसे यह भी बोलते नहीं बन रहा था कि मोंटू के लिए यह इलाज सही है या गलत।

खबर पा कर बरनी मोंटू को लिए भागी-भागी आई फिर भाई। रूना डर रही थी, सब उस पर चढ़ दौड़ेंगे, मां को ऐसे कैसे एक जाली डॉक्टर को सौंप दिया। पर किसी ने कुछ कहा नहीं। सबसे पहले भाई ने कहा, ‘मां को मैं साथ ले जाता हूं। शायद मेरी बीवी से मिल कर कुछ पुराना याद आ जाए।’

बरनी ने उस समय कुछ नहीं कहा, पर रात को रूना से लिपट कर भावुक हो कर बोली, ‘दीदी, मां ने अपने ऊपर  ले लिया ना। वो हमें बताना चाहती थी कि इलाज के बाद मरीज का हाल क्या हो जाता है। दीदी, सुनो ना। मां पुराना भूल गई हैं। उनकी उम्र नया सीखने की नहीं है। मोंटू तो लड़का है। पुराना भूलता है, भूल जाए। नया हम सिखा देंगे। कम से कम यह भूत सी लत तो छूटेगी। अभी तो यह हाल है कि दीदी कि किसी दिन अपने पापा के ही हाथों जान गंवा देगा। उससे अच्छा है… दीदी, प्लीज एक बार फिर से उसको बुला दो…’

‘किसे?’ डर के मारे रूना का मुंह खुला का खुला रह गया।

घर के नीचे से फटा पोस्टर उठा लाई थी कमबख्त बरनी, रूना की आंखों के सामने रख दिया, मोबाइल के मरीजों की डॉक्टर…‘इसे…’

जयंती रंगनाथन

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