डॉ जेन्नी शबनम की कविता - rashtrmat.com

डॉ जेन्नी शबनम की कविता

डॉ जेन्नी शबनम की कविता जीवित रहने और सचमुच जीने के अंतर, इच्छाओं, अधूरेपन और जीवन के अर्थ की तलाश पर दार्शनिक चिंतन है।“जिंदगी सिर्फ सांसों का नाम नहीं, बल्कि अपनी इच्छाओं और अधूरेपन के साथ उसे पूरी तरह जीने का नाम है।”

Poetry of dr jenny shabnam

डॉ जेन्नी शबनम की कविता

अपनों का अजनबी बनना 

अपनों का अजनबी बनना

समीप की दो समानान्तर राहें

कहीं-न-कहीं किसी मोड़ पर मिल जाती हैं

दो अजनबी साथ हों तो कभी-न-कभी अपने बन जाते हैं।

जब दो राह-

दो अलग-अलग दिशाओं में चल पड़े फिर ?

दो अपने साथ रहकर अजनबी बन जाएँ फिर ?

सम्भावनाओं को नष्टकर नहीं मिलती कोई राह

कठिन नहीं होता-

अजनबी का अपना बनना

कठिन होता है, अपनों का अजनबी बनना।

एक घर में दो अजनबी

नहीं होती महज एक पल की घटना पलभर में अजनबी अपना बन जाता है

लेकिन अपनों का अजनबी बनना

धीमे-धीमे होता है।

व्यथा की छोटी-छोटी कहानी होती है पल-पल में दूरी बढ़ती है बेगानापन पनपता है

फिक्र मिट जाती है

कोई चाहत नहीं ठहरती है।

असम्भव हो जाता है ऐसे अजनबी को अपना मानना।

2

 जादू की एक अदृश्य छड़ी

तुम्हारे हाथ में रहती है

जादू की एक अदृश्य छड़ी जिसे घुमाकर करते हो

अपनी मनचाही हर कामना पूरी

और रचते हो अपने लिए स्वप्निल संसार।

उसी छड़ी से छूकर बना दो मुझे वह पवित्र परी

जिसे तुम अपनी कल्पनाओं में देखते हो

और अपने स्पर्श से प्राण फूंकते हो।

फिर मैं भी हिस्सा बन जाऊँगी तुम्हारे संसार का

जाना न होगा मुझे, उस मृत वन में

जहां हर पहर ढूँढती हूं मैं, अपने प्राण।

3

  जीवन के मायने हैं

जीवित होना या जीवित रहना क्या सिर्फ सांसें ही तकाजा हैं?

फिर क्यों दर्द से व्याकुल होता है मन

क्यों कराह उठती है आत्मा पूर्णता के बाद भी

क्यों अधूरा-सा रहता है मन?

इच्छाएं कभी मरती नहीं

भले कम पड़ जाए जिन्दगी पल-पल ख़्वाहिशें बढ़ती हैं तय है कि सब नष्ट होना है

या फिर छिन जाना है।

सुकून के कुछ पल क्यों कभी-कभी पूरी जिन्दगी से लगते हैं?

यथार्थ से परे न सोचना है,

न रुकना है जिन्दगी

जीना या चाहना पाप तो नहीं?

डॉ जेन्नी शबनम  

5/ 7 द्वितीय तल, सर्व प्रिय, विहार

नई दिल्ली 1100 16 , मोबाइल 9810 743 437

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *