रश्मि गौड़ की कहानी बारहवीं पास का मूल भाव एक पिता के अंधे प्रेम और गलत महत्वाकांक्षा के कारण बच्चे के भविष्य के साथ होने वाले खिलवाड़ का है। जब माता-पिता बच्चे की योग्यता बनाने के बजाय उसका रिजल्ट बनाने लगते हैं, तब शिक्षा ज्ञान नहीं, सौदेबाजी बन जाती है।
बारहवीं पास \ कहानी
आज नंदलाल हलवाई के घर में बेटा पैदा होने की खुशी में बधाइयां गाई जा रही थी। मोहल्ले में लड्डू बांटे जा रहे थे, चार बेटियों के बाद भगवान ने उसकी मुराद पूरी की थी। अपने स्वस्थ गोल मटोल बेटे को देख उनकी आंखें जुड़ा गईं, पंडित जी को भी उसने मालामाल कर दिया । सब ने दांतों तले उंगली दबा ली इतना कंजूस मक्खी चूस नंदलाल इतना पैसा कैसे खर्च कर रहा है! ताई ने टोका भी ” अरे नंदलाल क्यों लुटा रहा है इतना पैसा ? बोला ” देख ताई, आज मुझे न रोक, भगवान ने मेरी मन मांगी मुराद पूरी कर दी,मेरे घर बेटा पैदा हुआ है , यह हलवाई नहीं, अफसर बनेगा अफसर ! बेटे का नाम रखा गया चंदन लाल।
चंदन लाल चार बहनों और मां बाप के लाड़ में पलने लगा। उसका पेट दिन दूनी और रात चौगुनी प्रगति करने लगा। अक्लमंदी के कोई लक्षण न थे उसमें, वो तो था बना बनाया छोटा नंदलाल । पैसा पकड़ना खूब जानता था और खाने पीने में खूब तेज। नंदलाल ने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की। चंदन तीन बरस का हुआ तो शर्माजी को, जो पब्लिक स्कूल में अंग्रेजी पढ़ाते थे, चंदन के अक्षर ज्ञान के लिए रख दिया। जब वो पहुंचते चंदन को बड़ी परेशानी होती, मास्टरजी के सामने बैठ कर पढ़ने की उसे आदत कहां? उसने समय कम से कम करने का सोचा। पहले तो पेट भर कर पानी पीता, कुछ देर बाद सु सु के लिए जाता और बाथरूम में बैठा रहता। बेचारे मास्टरजी ने सब्र रख काफी कोशिश की। सख्ती वो कर नहीं सकते थे क्योंकि सबका लाडला एक बार झूठे भी रो देता, तो उनकी छुट्टी समझो। शर्मा जी जरूरतमंद थे, कई कंपटीशंस में परीक्षा दे रहे थे,फीस,कमरे का खर्चा काफी हो जाता था। सो चार पैसे कमाने के लिए चुप रहते। मुश्किलतमाम पूरे साल में बहला फुसला के A B C D….Z सिखला सके। नंदलाल जब अपने सुपुत्र के मुखारविंद से एबीसीडी सुनते तो खुशी से फ़ूल जाते, लगता कि बेटा आज ही कलेक्टर बन गया। खैर कस्बे के एकमात्र पब्लिक स्कूल में मास्टरजी ने ही सिफारिश कर जनाब को अपने ही स्कूल की नर्सरी क्लास में दाखिला दिलवा दिया।
जैसे तैसे चंदनललाल दूसरी कक्षा में आ गए मास्टरजी की कृपा थी ! तीसरा साल आया, मास्टरजी को बैंक परीक्षा में सफलता मिली और एक बड़े बैंक में नौकरी मिल गई। सो वे स्कूल छोड़ कर चले गए। अब तीसरी कक्षा में चंदनलाल फेल हो गए। घर में उदासी पसर गई, चिंता होने लगी।कुछ समझ नहीं आ रहा था किया क्या जाए।
शर्माजी की जगह एक नए मास्टरजी नियुक्त हुए नाम था निपुण मिश्र । उनका बेटा चंदन मिश्र भी तीसरी कक्षा में दाखिल हुआ। वे बहुत अच्छा पढ़ाते थे, बड़े ईमानदार और अनुशासनप्रिय। नंदलाल ने उनसे मिलने का समय लिया।नियत समय पर उनके घर पहुंच गया।एक छोटे से घर के कमरे में चार कुर्सियां रखी थी ,एक रैक में बड़े करीने से स्वामी विवेकानंद,राजा राममोहन राय जैसे महानुभावों की पुस्तकें रखी हुई थी ।उनके उपर एक छोटे से फूलदान में चार गुलाब के फूल सजे थे। मिश्र जी सफेद कुर्ते पाजामे में जैसे ही कमरे में आए नंदलाल ने मास्टरजी की प्रशंसा करनी शुरू कर दी। कई बार रटकर आए थे बेचारे तो जल्दी जल्दी उगल दिया`मास्टरसाहब आपने आते ही स्कूल का चोला बदल दिया।अब हमारे कस्बे का स्कूल नए नए कीर्तिमान स्थापित करेगा।`कोई प्रतिक्रिया ना देते हुए मिश्रजी ने प्रश्नवाचक मुद्रा में उनकी ओर देखा तो नंदलाल बोले`सर मेरी एक अदना सी मिठाई की दुकान है।हम देसी घी के अलावा और कुछ इस्तेमाल नहीं करते.. हें हें…जब भी आदेश होगा मिठाई आपके घर पहुंच जाएगी` मिश्र बोले` बताइए मैं आपके लिए क्या कर सकता हूं?`नंदलाल बोले “साहेब.. मेरा बेटा चंदनलाल आप का ही शिष्य है..क्या कहूं हमारे खानदान में कोई भी पढ़ा लिखा नहीं है।आपकी कृपा हो जाए तो हम भी धन्य हो जायेंगे।”हूं ` कहकर मिश्रजी चुप रहे। नंदलाल के पास मास्टरजी की ख्याति पहुंच चुकी थी ,वो डरते डरते बोले”जी आप मेरे बच्चे के लिए कुछ समय निकाल पढ़ा सकें तो बड़ी मेहरबानी होगी।” वह मनमानी फीस देने को भी तैयार थे,परंतु मिश्रजी तो ट्यूशन के बेहद खिलाफ थे, उन्होंने ट्यूशन के लिए साफ मना कर दिया । नंदलाल अपना सा मुंह लेकर लौट आए, उन्हें अपने बेटे का भविष्य अंधकारमय दिखने लगा।
कुछ दिन पश्चात एक चमत्कार हुआ, खबर आई कि चंदनलाल के अंग्रेज़ी पेपर में शत प्रतिशत नंबर आए हैं। नंदलाल दुकान से दौड़े आए, कानों पर तो विश्वास हो गया था पर अपनी आंखों से वे उस कॉपी को देखने चाहते थे जिसमें उसे पूरे नंबर मिले थे। मिठाई लेकर घर पहुंचे तो दिल धक से रह गया! ये क्या, ये तो कोई और चंदन है, उनका चंदनलाल नहीं! उनका लाडला उनकी लाई मिठाई पर हाथ साफ करने में लगा था, उसे कहां चिंता?
पहली बार नंदलाल को अपने बेटे पर क्षोभ हो आया, डपटते हुए पूछा” बेवकूफ ये किसकी कॉपी उठा लाया” पहली बार पिता की कड़क आवाज सुनकर चंदन लाल सकपका गया, रूआंसा सा होकर बोला “यह तो मास्टर जी के लड़के की कॉपी आ गई शायद , उसका नाम भी चंदन है।”
“ हैं” कहकर नंदलाल माथे पर हाथ रखकर बैठ गया। थोड़ी देर सोचकर बोला “जा उसे बुलाकर ला,बताना के तेरी कॉपी भी लेता आए। छुटकारा पाते ही चंदनलाल ,चंदन (मिश्र) को लिवाने चल पड़ा। चंदन भी अपनी नई नामराशी हमनाम की कॉपी लेकर परेशान था । वो चंदन के साथ उसकी हवेली में पहुंचा। चंदन को नंदलाल ने प्यार से बैठाया, दुकान से बढ़िया लस्सी और जलेबी, समोसे मंगवाए और बोले” बेटा तुम तो बहुत होशियार हो, और विषयों में भी अच्छे नंबर आए होंगे?” “ जी अंकल मैं हमेशा कक्षा में प्रथम आता हूं”
“बेटा देखो ,हम हैं अनपढ़ गंवार, पर हमारी भी इच्छा है की हमारा बेटा भी थोड़ा पढ लिख ले,क्या तुम उसकी मदद करोगे”, नंदलाल की आवाज में मिश्री घुली हुई थी।अब आठ वर्ष का बच्चा अपने सहपाठी की क्या मदद करता। फिर भी लस्सी और जलेबी समोसे का स्वाद इतना गजब था की उसने पूछा, ” क्या करना है, अंकल? अब नंदलाल को पता चल चुका था कि लाख सर मारें पर उनका लाल अफसर नहीं बन सकता, हिम्मत जुटा कर बोले,”बेटा क्योंकि तुम एक ही नामराशि के हो तो जरूर ही इम्तिहान में आगे पीछे बैठते होंगे?”जी अंकल,” तो बस बेटा, इतना करना कि इसे अपनी कॉपी नकल करने को देते रहना”, चंदन को सोचता देख बोले” बेटा ,देखो मेरे लिए जैसा चंदनलाल वैसे ही तुम! रोज़ दुकान से बेड़मी आलू, जलेबी या जो भी मिठाई तुम्हें भाती हो जब चाहे आ जाना,दुकान अपनी ही समझो।” चंदन यह सुनकर सकपका गया,आखिरकार संस्कारी पिता का बेटा जो था।परंतु जलेबी और मिठाई उसे अपनी ओर खींच रहे थे। बालमन बड़ी दुविधा में था क्या करे कि मिठाई और बेडमी भी मिलती रहें और उनका काम भी बन जाए।कुछ सोचकर वो बोला” अंकल ऐसा है मैं भय्या को अपनी होमवर्क की कॉपी दे दिया करुंगा और खाली पीरियड में पढ़ा भी दूंगा।” नंदलालजी को क्या चाहिए था पिता न सही पुत्र ही पढ़ा दे,कौन अफसर बनेगा ये गधा।
आगे की क्या बताएं साहेब..कड़क पिता की संतान स्वादिष्ट मिठाई के आगे बेबस हो गई और नंदलाल को बेटे के लिए फ्री ट्यूशन मिल गया ,चंदनलाल पास होने लगा चंदन के लिए टिफिन में नंदलाल हलवाई की दुकान से गाहे बगाहे पकवान आने लगे और नंदलाल को भरोसा हो गया कि उनके खानदान की एक औलाद तो बारहवीं पास कर ही लेगी।
रश्मि गौड़ ,UP –MO -9318369546 है


