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नीलम शंकर की कहानी  कहती है कि हर त्योहार में घर का दीपक सिर्फ तेल से नहीं जलता, कई बार वह पिता के त्याग से जलता है। मध्यवर्गीय पिता की जेब भले छोटी हो, लेकिन अपने परिवार की खुशियों के लिए उसका दिल हमेशा बड़ा होता है। मध्यवर्गीय पिता की जिम्मेदारी, त्याग और परिवार की खुशियों के लिए अपने सुखों को कुर्बान करने से जुड़ा है।

              उम्मीद की रोशनी \ कहानी

रमेश ने उल्टी गिनती गिनना शुरू कर दिया था। इंतजार करते-करते दशहरा तो बीत गया। उम्मीद अभी भी बंधी थी कि शायद छह महीनों से बकाया पगार इकट्ठी ही मिलेगी जैसे पहले होता आया था। अब वह अखबार कहां लेता था। सबसे पहले उसने अपने खर्च में यही कटौती की थी कि सौ सवा सौ भी बच जाएगा तो कम से कम दाल की बैंक का, घी खर्चा तो निकल आयेगा। अखबार तो यह रोज-सबेरे पान की दुकान पर जाकर एक अठ्ठनी का गुटका पाउच लेकर अपने मतलब की खबरों को देख लेता। पर खबर पढ़-पढ़कर मन ही मन कुढ़ता कि आज इस संस्थान को सरकार इतने दिनों का बोनस डिक्लेयर कर रही, कल उस संस्थान का। मन ही मन बुदबुदावा ‘साले… तनख्वाह न सही कम से कम बोनस ही दे देते, तो अच्छा रहता।

सबसे छोटा वाला कितना दुखी होता हैं, जब उसे त्योहार पर नए कपड़े नहीं खरीद पाते। पत्नी अलग ‘चार साल से मरी फैक्टरी तरसा के रख दे रही है, पूजा को भी नयी साडी नहीं ले पाये, बाकी फंक्शन की तो बात दूर।’ बस नहीं शिकायत थी तो अपनी बड़ी बेटी से, पता नहीं किस मिट्टी की बनी थी। आजकल का समय न नाज-नखरे, न फैशन, न सजने संवरने का शौक बस एक ही काम पढ़ाई और मन बहलाने को माँ के साथ काम में हाथ बंटा लेती। वह सोचता उसकी हर सहेली के पास मोवाइल है, पर उसकी बेटी ने कभी कहा तक नहीं। एक दिन उसके दिल ने कचोटा ‘क्यों बेटा तुम्हे जरूरत नहीं पड़ती न, तुम तो मेरे मोबाइल से ही काम चला लेती हो कितनी अच्छी हो।’ कहते हुए उसने बेटी को

अपने से सटाया तो नहीं, लेकिन अपना सर उसके सर पर रख दिया था। वह उसे कभी बेटी नहीं बेटा ही कह कर पुकारता था। ऐसा नहीं कि वह किसी प्रगतिशीलता की वजह से कहता, उसे बेटा कहने में सहजता महसूस होती थी।

फिर अब दूसरा त्योहार नजदीक आ रहा दीवाली। जुलाई-अगस्त से न, त्योहार ही त्योहार आते रहते हैं। पता नहीं किसने इतने सारे त्योहार बना दिए। हम हिन्दुस्तानी भी न, बिना उत्सव-त्योहार के जी ही नहीं सकते। अब तो बिना पैसों के कोई भी त्योहार की कल्पना नहीं की जा सकती। बचपन में तो कुछ भी खाने को बन गया, तो त्योहार हो गया, पर अब तो…? आज के समय में त्योहार क्या खाली-पीली लातों, गानों से मनाएँ जा सकते हैं। इन्हीं सब बातों से उसकी टेंशन बढ़ने लगती थी। ड्यूटी तो वह रोज जाता था टिफिन लेकर। काम हो न हो पर आठ घंटे तो बिताना ही पड़ता था। जो ऊपरी आदेश था। तभी तो चार-चार, छह-छह महीने की इकठ्ठी तनख्वाह मिल जाती थी। अब तो हद कर दी है आठ महीने हो गए, खबरें हवा में उड़ती कि जल्दी ही फैक्ट्री पर ताला लगने वाला है। कभी ‘फलां कम्पनी इसका अधिग्रहण कर लेगी, कभी ताला बंदी हो जाएगी।’ तो छंटनी तो करेगी ही। अपने हिसाब से रखेगी। कहीं ‘मैं भी न आ जाऊँ छटनी के दायरे में’, यह भय उसे सबसे अधिक सताता।

उम्र के पचास बरस पार कर रहा। इस उमर में किसी दूसरे शहर जाकर काम करना इतना आसान होता है क्या? हर घड़ी यही कसमकस । घर में पत्नी से अलग झांव झांव, खर्चे पानी को लेकर। कभी गाँव से थोड़ा बहुत आनाज आ गया l

तो राहत, पर बाकी खर्चे तेल, मसाला, सब्जी, दूध अब वह क्या क्या गिनाए। बाहर शहर में तो बरतन मांजना हो तो भी पैसा ही खर्च करो गाँव थोड़े ना कि चूल्हे की राख निकाली, मांजा बरतन चकाचक हो गए। साला… पानी का भी बिल मुंह बाए खड़ा रहता हैं। बिजली तो है ही। जब से बिलिंग का काम निजी कम्पनियों को मिला गया है अब चालाकी भी नहीं कर पाता।

जैसे-जैसे दीवाली नजदीक आ रही रमेश की चिंताएं बढ़ रही। एक दिन पत्नी ‘कहो जी पिछले सारे त्योहार तो कम्पनी की सुखाड़ में भेंट चढ़ गए। सब त्योहार घर की चारदीवारी में ही किसी तरह निपटा लिया। कोई नहीं ही जान पाया होगा। पर दिवाली ? इसमें तो ढेर सारा इंतजाम करना पड़ता है। लाइटिंग, घी-तेल के दिए, पटाखे। पहले तो ठीक था पास-पड़ोस में लाई, खील-खिलौना गरी ही प्रसाद में बाँट दिया जाता था। ससुरा पता नहीं कहां से अब तो यह सब बंद हो गया सीधे-सीधे

मिठाई का डिब्बा चलन में आ गया। खील बतासे खिलौना आउटडेटेड हो गया। घर में आता तो सभी के हैं, बस भगवान जी को भोग लगाओ और जो बचे उसे उसका नया संस्करण दे कर खत्म करो। अब तो कोई भी बच्चा खील-खिलौना नहीं खाता।

रमेश बीबी के साथ त्योहार पर खर्च का हिसाब कम से कम में करने की भी सोंच रहे, तो भी जुगाड़ नहीं हो पा रहा। पत्नी के दिमाग में एक तरकीब सूझी ‘क्यों जी क्यों न इस बार हम सभी गाँव चल चले बहुत साल हो गए, कोई भी त्योहार वहां नहीं मनाया। केवल आने-जाने का भाड़ा ही तो लगेगा।’ रमेश को सुझाव तो जंचा पर उसमें भी कई पेंच आ गए। त्योहार का इंतजाम न करना पड़ेगा तो क्या घरवालों को कपड़ा न दिलाना पड़ेगा? वह भी कर ही दिया तो बच्चे पीछे पड़ जायेंगे। पत्नी न भी बोली मन ही मन तो सोंचेगी जरूर। जब सब का बजट बन सकता था तो क्या मेरा नहीं आ सकता ?

बहुत गुणा-भाग लगाने के बाद भी यह सुझाव असफलता की भेंट चढ़ गया। जब इंसान पर हल्की सी निराश की परत चढ़ती है और परिस्थितियां विषय ही होती जा रही हो, हो, तो हताशा परत दर परत चढ़ने लगती है। अनेक तरह के पलायनवादी विचार जन्मने लगते हैं। उसे एक अजीब और भयानक विचार आया। क्यों न पली से कह दूँ कि माँ का फोन आया था अब की पट्टीदारी में कोई मर गया है, फिलहाल बरसी होने तक त्योहार नहीं मनाया जा सकता। सभी खर्चों से मुक्ति मिल जायेगी। पर इतना बड़ा झूठ बोलने का जिगरा भी तो होना चाहिए। तभी अपने मासूम बच्चों का चेहरा याद आने लगता, उनकी उम्मीदे तो सीधे पापा रमेश पर ही आकर टिकती हैं। अपने आपको धिक्कारता, अपने पौरुष पर भी गाहे-बगाहे प्रश्नचिन्ह लगता। इतना परेशान वह कभी भी नहीं हुआ था।

इस मामले में वह खुशनसीब था कि पत्नी बच्चे ज्यादा तंग न करते। पर अपना भी तो जमीर होता है, जो इन सब से मुक्त नहीं होने देता है। ऐसा नहीं कि इन परेशानियों से वही गुजर रहा होगा आखिर उसके सहकर्मी भी तो हैं उसी के जैसे। ताज्जुब कि कोई आपस में साझा नहीं कर रहा है। समय भी बदलता जा रहा। सुख-दुःख ब-दुःख जैसे अब बाँटने की परम्परा ही कम होती जा रही हैं। जैसे हर भारतीय परंपरा पर बाजारवाद चढ़ गया। वैसे ही सुख-दुःख बाँटने की परम्परा भी कोई नया रूप ले लेगी।

सौर दर्शन बधारने से रमेश का काम नहीं ही चलेगा, असलियत में आना ही पड़ेगा। रोज अखबार देख रह्य अब शायद कोई खबर आ जाये कि कर्मियों का बकाया भुगतान दीवाली के पहले होगा। सभी महकमों की खबरें आ रही, नहीं आ रही तो रमेश की उस कंपनी की जिसमें वह काम करता हैं। केवल त्योहार की ही चिन्ता हो रमेश को, ऐसा नहीं था। बेटी के कंप्यूटर कोर्स की सेकंड सेमेस्टर फीस भी है। कई दिनों से उसे टाल रहा। उसे बेटी के सामने सर उठाने में भी ग्लानि हो रही, क्योंकि अब वह चुप चुप-सी रहने लगी थी। अब कोर्स तो पूरा कराऊंगा ही कराऊंगा। शादी तो बाद की बात है।

कई दिनों की ऊहापोह। पली को बताएं की न बताएं। फिर वही दर्शन घुमड़ रहा। वर्तमान खुशहाल तो भविष्य अपने आप ठीक हो जायेगा, बस अपने पौरुष पर भरोसा होना चाहिए। बैंक गया अपनी फिक्स्ड डिपाजिट तुड़ा देने के संकल्प के साथ। पहले घर में दिए तो जले, रोशनी तो हो, फिर देखा जायेगा। रोशनी तो घर में होनी ही चाहिए पारंपरिक या आधुनिक या दोनों ही…। कभी-कभी बाहर का उजाला ही भीतर के अँधेरे को कम करता है। फिलवक्त रमेश के पास उम्मीदों की रोशनी थी।

नीलम शंकर

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