झारखंड में नेहा बोरा के चेहरे पर काली स्याही फेंक दी जाती है।यह घटना बताती है कि कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन को लेकर संघ परिवार अंदर से कितना डरा हुआ है । उस पर रमेश कुमार ‘रिपु’ की यह कविता है-
स्याही \ कविता
किसी ने
चेहरे पर स्याही फेंकी है,
शायद उसे लगा होगा
चेहरा काला कर देने से
आवाज़ भी काली हो जाएगी।
उसे कौन समझाए-
स्याही चेहरे पर टिकती है,
विचारों पर नहीं।
विचार तो
कागज़ की तरह होते हैं,
जितना मोड़ो,
उतनी नई लकीर निकल आती है।
वह लड़की
छात्रों के बीच खड़ी थी,
हाथ में कोई बंदूक नहीं थी,
सिर्फ कुछ सवाल थे
और उन सवालों के पीछे
कुछ बेचैन आँखें।
स्याही आई-
चेहरे पर फैल गई।
भीड़ ने देखा,
कैमरों ने देखा,
और लोकतंत्र ने
चुपचाप अपनी डायरी में
एक तारीख लिख ली।
किसी ने पूछा-
“डर गई?”
वह मुस्कुराई।
बोली-
“स्याही से डरती
तो कलम क्यों उठाती?”
अजीब है न-
जो लोग कहते हैं
कि उनके पास जवाब हैं,
वे सवालों से क्यों डरते हैं?
क्यों नहीं
एक मंच पर आते,
माइक पकड़ते,
और कहते-
“तुम गलत हो।”
क्योंकि शायद
बहस में जीतने के लिए
दलील चाहिए होती है,
और स्याही फेंकने के लिए
सिर्फ हाथ।
लेकिन याद रखना-
चेहरे धुल जाते हैं,
कपड़े धुल जाते हैं,
दीवारें भी धुल जाती हैं।
इतिहास नहीं धुलता।
वह
हर छींटे को
अपनी किताब में रख लेता है।
और एक दिन
जब आने वाली पीढ़ियाँ पूछेंगी-
“उस दिन
जब एक आवाज़ पर स्याही फेंकी गई थी,
तब लोकतंत्र कहाँ था?”
तो शायद
हवा धीरे से कहे-
“वहीं था…
उस लड़की की आँखों में,
जो स्याही के बाद भी
सवाल पूछ रही थी।”
स्याही सूख जाती है,
सवाल नहीं।

रमेश कुमार ‘रिपु’
M0- 7974304532
