डॉ. यशोधरा भटनागर की कहानी“हथेलियों में बसी दरारें” बताती है कि गरीबी केवल अभाव नहीं होती, वह संघर्ष की मिट्टी भी होती है जिसमें भविष्य उगता है। मां के फटे हाथ यहाँ केवल मजदूरी का निशान नहीं हैं, बल्कि आने वाली पीढ़ी की शिक्षा की कीमत हैं। बच्चा जब मां को पढ़ना-लिखना सिखाने की बात करता है, तब कथा एक सुंदर मोड़ लेती है—यह सिर्फ बेटे की सफलता नहीं, बल्कि मां के आत्मसम्मान और जागरण की कहानी भी बन जाती है।
हथेलियों में बसी दरारें \ कहानी
डॉ. यशोधरा भटनागर
दूर क्षितिज में भोर ने हल्की सी दस्तक दी और आकाश के कोने में सिंदूरी रेखा उभर आई जैसे रात के काले आँचल पर किसी ने हल्का-सा सिंदूरी चाक चला दिया हो। झिमली भी खटिया छोड़,पीठ सीधी कर उठ खड़ी हुई। फिर लाड़ से मुन्ने के माथे को चूम लिया।
मुन्ने के चेहरे पर एक नन्ही-सी मुस्कान ठहरी हुई थी। झिमली कुछ क्षण उसे देखती रही। कैसी गहरी नींद में सो रहा है? फिर अनायास उसकी दृष्टि अपनी हथेलियों पर जा टिकी-सूखी ज़मीन की तरह दरारों से पटी हुई हथेलियाँ। उसने धीरे-धीरे उँगलियों से उन्हें छुआ। हथेलियों के बीच वाली दरार में से तरंग सी उठी और वह दर्द से सिहर गई।
बाहर झोंपड़ी के टप्पर पर कौआ बोल रहा था।
इस मुए को भी यही झोंपड़ी मिलती है काँव-काँव करने को। कोई मेहमान आ भी गया तो खिलाएगी क्या और बिठाएगी कहाँ? खुद ही अपनी किस्मत पर हँसते हुए उसने एक नज़र अपनी झोपड़ी में सिमटे सामान पर डाली…बस दलिद्दर से भरी हुई है।
म्यूनिसिपलिटी के नलके से प्लास्टिक के गगरे भर कोने में रख,चूल्हा बाल दिया। दाल-भात रांध कर,मुन्ने को नहला कर स्कूल के लिए तैयार कर दिया।
“अम्मा कल मास्टर जी ने हमाई संटी से खूब पिटाई लगाई हती।”
“काय?तुम ढंग से पढ़ाई-लिखाई नईं कर रहे का?
अम्मा नई कापी मंगाई है न मास्टर जी ने। तुमने हमें ला कर ही न दी।”
झिमली निरुत्तर हो गई।
कंस्ट्रक्शन साइट पर पहुँचते ही झिमली के एक कठोर और निर्मम दिन की शुरुआत हो जाती।सरियों के काटने की आवाज़ें, मशीनों की घर्र घर्र और अपनी भूख-थकान से जूझते मजदूरों का शोर,सब मिलकर ऐसा वातावरण रच देते जिसमें संवेदना के लिए शायद कोई जगह नहीं बचती।
झिमली ने तगारी उठाई, उसमें ईंटें भरीं और सिर पर उठा कर चल दी…पहली ढुलाई… दूसरी… तीसरी…हर बार जब वह झुकती,उसकी पीठ जैसे और थोड़ी झुक जाती और हर बार जब वह उठती तो पूरी देह दर्द से सिहर जाती।
धीरे-धीरे धूप सिर पर चढ़ आयी।जेठ की दोपहरी का सूरज तगारी संग उसकी हथेलियों पर उतर आया। जलन और पीड़ा असह्य हो उठी।
“झिमली हाथन पै कपड़ा लपेट लो ।थोड़ा आराम मिल जै है।” रधिया काकी ने उसकी हथेलियों की ओर देखते हुए कहा।
झिमली ने एक नज़र अपनी हथेली पर डाली फिर फीकी हँसी के साथ बोली-“काकी हम जा पै कपड़ा बाँध ले हैं तो ईंट कैसे पकड़ हैं?” शायद झिमली जानती थी कि दर्द को भी काम के हिसाब से ही जगह देनी पड़ती है।
दोपहर उतरने तक उसकी हथेलियाँ में जलन बढ़ गई। कहीं-कहीं दरारों से खून रिस आता। उसने जल्दी से पल्लू से हथेली को दबाया।
आज सुबह जब वह काम पर निकल रही थी तब मुन्ना ने कहा था-“अम्मा, आज जल्दी आना…”
“हओ।” झिमली ने बस सिर हिलाते हुए यूँ ही हाँ कह दिया था।
कहने को उसके पास बहुत कुछ था पर शब्द हमेशा उसकी हथेलियों की तरह खुरदुरे हो,गले में ही कहीं फंस कर रह जाते हैं।
शाम को जब वह लौटी तब आकाश धूल और लालिमा से भरा था। दिन भी जैसे थककर पसर रहा था।झोपड़ी के बाहर मुन्ना बैठा उसका इंतजार कर रहा था। उसके हाथ में एक पुरानी कॉपी और पेंसिल थी।
“अम्मा! देखो, मैंने अपनी कॉपी में कुछ लिखा है!”
खुशी से चिल्लाते हुए मुन्ना दौड़कर उसके पास आ गया। झिमली ने कॉपी अपने हाथों में ले ली। उन टेढ़े-मेढ़े अक्षरों की भीड़ देखकर झिमली की सारी थकान काफूर हो गई और आँखें खुशी से चमकने लगीं।
“खूब अच्छो लिखो है रे तूने…”
उसने धीमे से कहा।मुन्ना की आँखें चमक उठी।
“तुम सोई लिखना-पढ़ना सीख जाओ अम्मा!”झिमली के आँचल को थाम, कुछ जिद्दाता हुआ मुन्ना बोला।
झिमली ठिठक गई।।उसने अपनी उँगलियों को देखा।ओह!इन दरारों के बीच अक्षर कैसे उगेंगे? ये अक्षर इन हाथन में पहले उग आए होते तो दरारें काहे पड़ती।
उसने धीरे से पेंसिल थाम काँपते हुए कॉपी पर ‘अ’ लिखने की कोशिश की। दर्द और पीड़ा से पेंसिल हाथ से छूट गई।
खाना खाकर मुन्ना सो गया,कॉपी उसके सिरहाने खुली रह गई थी।झिमली बाहर बने चबूतरे पर आकर बैठ गई।आकाश में चाँद,तारे धुंधले से दिखाई दे रहे हैं।शहर की धुंधलाहट ने इन्हें भी धुंधला कर दिया है।
उसने अपनी हथेलियाँ चाँदनी की मध्दिम रोशनी में फैलाईं।कम रोशनी में भी दरारें साफ दिख रही थीं जैसे सूखी नदी की पथरीली तलहटी हो। वह उन्हें सहलाने लगी।
हथेलियों को सहलाते हुए उसे अपना बचपन याद हो आया।माँ की गोद, आँचल की खुशबू .मिट्टी की महक और बारिश में भीगती उसकी हँसी…तब हथेलियाँ मुलायम और जीवन सरल था। फिर गुड्डे-गुड़ियों ब्याह रचाते-रचाते उसका भी ब्याह हो गया। हाथों में मेहंदी सजा पाँव में महावर रचा वह सुसराल आ गई।
शुरुआत में तो सब कुछ ठीक रहा फिर अचानक भाग्य ने करवट बदली। पति को बीमारी ने ऐसा घेरा कि उसके इलाज ने उसे कहीं का न छोड़ा। डॉक्टर की फीस,दवा-दारू में उसके सामने कर्ज़ का पहाड़ खड़ा हो गया। इस सबके बाद भी मन में आस थी कि एक दिन सब कुछ ठीक हो जाएगा।पर विधि को कुछ और ही मंजूर था। एक काली अंधियारी रात में उसकी हथेलियों से मेहंदी का रंग हमेशा के लिए उतर गया और ज़िंदगी गहरे अंधकार में डूब गई।
झिमली ने आँसू पोंछ चूड़ियाँ उतार अपनी तमाम इच्छाओं को इन्हीं हथेलियों में दफन कर दिया। घर बेच थोड़ा क़र्ज़ चुकता किया। बाकी कर्ज अपने कांधे पर लाद,सामान सहित मुन्ने को गोद में लिए वह गाँव से शहर की ओर चल दी।अब उसके हाथों में ईंटें और भाग्य में ढोना ही बचा था।
चाँदनी में बैठी झिमली की आँखों से एक बूँद ढुलक कर उसकी हथेली की दरार में समा गई जैसे सूखी नदी ने एक बूँद पानी पी लिया हो। फिर एक के बाद एक झरती बूंदों के प्रवाह को झिमली ने अपनी हथेलियों में ही समेट लिया।
“रोने से का हुइए ?धरती माँ भी तो बारिस के इंतज़ार में फट जात हैं,तबई तो बे हरियाली उगा पात हैं।”खुद से बतियाते हुए उसने धीरे से मुन्ने की कॉपी उठाई और फिर ‘अ’ लिखने की कोशिश की। कागज़ पर ‘अ’ टेढ़ा-मेढ़ा ही सही, लेकिन अपने पैरों पर खड़ा था।झिमली ने उस अक्षर को ऐसे छुआ जैसे कोई माँ अपने बच्चे के पहले कदम को देखती है।
फिर हथेलियों की भीगी दरारों को की पीड़ा को पीते हुए, काँपते हाथों से उसने पेंसिल उठाई।
“अ”
एक हल्की-सी रेखा खिंची… फिर दूसरी…अक्षर पूरा तो नहीं बना, पर उसकी आकृति उभर आई।उसकी आँखों में चमक कौंध गई।
“देख… झिमली! दरारन में भी कुछ उग सकत है…”
अगले दिन से एक नया क्रम शुरू हुआ।सुबह मजदूरी…दोपहर तपती ज़मीन…शाम को चूल्हा…और रात को ‘जबरन कॉलोनी’ के चबूतरे पर लगने वाली प्रोढ़ शिक्षा की क्लास।
“अरे झिमली!काय अब पढ़-लिख के कलेक्टर बन हो का?”
रधिया काकी की बात सुनकर झिमली भी मुस्कुराकर कहती-
“कलेक्टर तो मुन्ना बन है काकी। हम तो बस उसके साथ चलना सीख रये हैं।”
धीरे-धीरे अक्षर उसके हाथों में उतरने लगे।दर्द अब भी था पर अब उस दर्द में केवल पीड़ा नहीं थी बल्कि कुछ पा लेने की खुशी भी थी। जो उसके हाथों में मेहंदी सी रच-बस गई थी।
बदलती ऋतुओं संग दिन, सप्ताह और महीने यूँ ही बीतते चले गए।
एक दिन मुन्ना स्कूल से लौटा तो उसके चेहरे पर खिंची चिंता की लकीरों को देखकर झिमली भी चिंता में पड़ गई।
“काय मुन्ना का हो गओ?तुमाई तबीयत तो ठीक है?”
“कछु नई अम्मा!आज मास्टर जी कह रये हते कि हमाई आगे की पढ़ाई के लाने पैसे का इंतजाम हो जाए तो वे हमाओ एडमिशन शहर के बड़े स्कूल में करवा दे हैं।”
“हो जै है सब इंतजाम।तुम कछु चिंता न करो।”
झिमली ने चेहरे पर मुस्कान लिए मुन्ने को थपथपाया। मुन्ना कुछ आश्वस्त हो गया पर झिमली चौके में डब्बा-डब्बी खड़खड़ाने लगी।इन डिब्बों में खनखनाते-शोर मचाते सिक्के थे पर इतने नहीं कि उसके और मुन्ने सपनों की कीमत चुका सकें।
फिर उसने अपनी हथेलियों को देखा।“मुन्ना के भविष्य के लाने इन ससुरी दरारन को और गहरा करना पड़ है… सो भी कर लें हैं।”
अगले दिन से उसने और काम पकड़ लिया।रात में पास के मकानों में बर्तन माँजने का।अब दिन और रात के बीच का फर्क मिट गया था। कुछ शेष था तो वह था एक टिमटिमाता सपना।
कई बार थककर झिमली चूल्हे के पास ही बैठी ऊँघने लगती तो मुन्ने की आवाज़ उसे उठा देती-“अम्मा, ‘क’ लिखो न…”और वह कोयले से फर्श पर अक्षरों का संसार उतार देती।
समय की नदी अपने प्रवाह से बहती जा रही थी।
“मुन्ना! मुन्ना!”
मुन्ना तीर सा बाहर गया और उतनी ही तेज़ी से अंदर लौट आया।
“अम्मा मास्टर जी आए हैं।”
झिमली घबरा कर बाहर गई।
“झिमली तुम्हारा बेटा बहुत तेज है। छात्रवृत्ति मिल गई है इसे।” मास्टर जी ने मुन्ना के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा।
झिमली ने कुछ नहीं कहा बस हाथ जोड़कर खड़ी रही।
“अम्मा अंदर चलो मास्टर जी चले गए हैं।”
मुन्ना ने झिमली का हाथ खींचते हुए कहा।
“साबास मुन्ना!”
अपने अंदर उठ रहे खुशी के तूफान को अंदर ही समेटते हुए उसने अपनी हथेलियाँ देखीं।उसे लगा जैसे ये हथेलियाँ अब खेत बन चुकी हैं जिनमें अक्षर उग रहे थे,जहाँ सपने अंकुरित हो रहे थे।
आकाश में पूरा चाँद मुस्कुरा रहा था पर आज तारे धुंधले नहीं थे।झिमली ने अपनी हथेलियाँ चाँदनी में फैलाईं और धीमे से बुदबुदाई-“जै दरारें बुरी नहीं हैं।”
डॉ. यशोधरा भटनागर,देवास
MO-9425306554

