जय प्रकाश मानस की लघु कथाएं अपने समय के ज्वलंत समस्याओं का दस्तावेज है। इनकी लघुकथाओं में केवल सवाल ही नहीं है बल्कि जीवन,चिंतन और व्यवस्था के चेहरे पर तमाचा भी मारती है।वैचारिक खुलापन और सजगता के साथ अपने समय और समाज और संघार्षो का मूल्यांकन भी करती है। उनकी लघुकथा पढ़िये और खुद से सवाल करिये।
जयप्रकाश मानस की लघुकथाएँ
प्रेम का प्रतिरोध
प्रेमिका ने कहा – “तो फिर क्या? हम यूँ ही मर जाएँ?”
लड़के ने अपनी जेब से एक पुराना फोटो निकाला – उसकी मौसी की, जिसने बीस साल पहले भागकर शादी की थी। आज भी गाँव में उसे “भगोड़ी बुआ” कहते थे।
“मैं तुम्हें इस फोटो की तरह पीली नहीं पड़ने दूँगा,” उसने कहा।
लड़की ने फोटो को उलटा कर दिया। पीछे लिखा था – “प्रेम विवाह, 2003″।
“तुम्हारा रास्ता आसान है,” लड़के ने उसके हाथ को थामा, “मेरा मुश्किल। मैं नहीं चाहता कि तुम्हारी साँसें हर सुबह ‘कुलटा’ शब्द से जगें।”
वह रोने लगी।
“रोओ मत,” उसने कहा, “हम लड़ेंगे। हर उस आईने से जिसमें तुम्हारा चेहरा विकृत होकर दिखे। हर उस दरवाज़े से जो तुम्हारे लिए बंद किया जाए।”
अगले दिन लड़के ने अपने पिता के सामने घुटने टेक दिए, पर हाथ नहीं जोड़े। “पिताजी, मैं उससे शादी करूँगा,” उसने कहा, “पर भागकर नहीं, तुम्हें मनाकर।”
तीन महीने बाद जब दोनों परिवार शादी में बैठे थे, लड़की की माँ ने फोटो खींचवाई। लड़के ने कहा – “इसे ‘प्रेम विवाह’ मत लिखना। बस ‘विवाह’ लिख देना।”
उस रात लड़की ने पूछा – “तुम्हारी जीत हुई?”
लड़के ने उसकी चूड़ियों को छुआ, “नहीं, बस तुम्हारी हार टली।”
ढक्कन
खुशबू की उँगलियाँ प्लास्टिक के ढक्कन से एक अजीब ताल बजा रही थीं – टिक-टिक-टिक। हर बार की वह चटखती आवाज़ मेरी हड्डियों तक उतर जाती। मैं जानता था यह उसका दूसरा रोना था, जो आँखों से नहीं, हाथों से बह रहा था।
“तुम्हारे पापा ने लाइब्रेरी वाली लाइन काट दी है,” मैंने कहा। मेरी आवाज़ में वही पुराना डर था जो उस दिन था जब हमने पहली बार हाथ छुआ था।
उसकी नसें उभर आईं, जैसे नक्शे पर बनी नदियाँ। मैंने देखा कैसे उसकी कोहनी का निशान वह जन्मचिह्न जो मुझे इतना प्यारा था – लाल हो उठा। “मैं चाहती हूँ…” उसके होंठ काँपे। वह वाक्य जो हर फ़िल्म में इतना सुंदर लगता है, हमारे कमरे में एक गन्दी गाली की तरह लटक गया।
बोतल फर्श पर गिरी तो पानी ने हमारे बीच की दूरी नाप ली। मेरी पैंट का नीला रंग गहरा होता गया, जैसे समुद्र रात को।
“तुम्हारी इज्ज़त! हमेशा तुम्हारी इज्ज़त!” उसका गला फटा, “मेरी साँसों का क्या?”
मैंने ढक्कन उठाया। उस पर एक खरोंच थी, ठीक वैसी जैसी मेरे पिता के चेहरे पर थी जब उन्हें पता चला कि मैं किसी से प्यार करता हूँ।
“देख,” मैंने उसे वह खरोंच दिखाई, “हम दोनों इससे ज्यादा टूटे नहीं हैं।”
सुबह मिला नोट अब मेरे बटुए में है। कभी-कभी, जब कोई सिक्का गिरता है, तो मैं उसे छू लेता हूँ। वह ठंडा होता है, ठीक उस रात की तरह जब खुशबू ने आख़िरी बार मेरा हाथ छुआ था।
गोबर–गणित
विश्वविद्यालय की दीवारों पर गोबर लिपते हुए कुलपति जी का चश्मा धुंधला हो गया था। उनकी उँगलियाँ मिट्टी के घोल में डूबी थीं, जैसे कोई प्राचीन ग्रंथ लिख रहा हो।
“ये है नई शिक्षा नीति,” उन्होंने छात्रों से कहा, “गाय के एक गोबर में 33 करोड़ देवता!”
पीछे खड़े प्रोफेसर ने कागज़ पर हिसाब लगाया —
-एक गोबर = 33 करोड़ देवता
-एक दीवार = 108 गोबर
-पूरा कैंपस = ?
उसी शाम लैब के बाहर टँगा बोर्ड हवा में झूल रहा था— “विज्ञान विभाग स्थायी रूप से बंद। अब हम यज्ञ-विज्ञान पढ़ाएँगे।”
बौद्धिकता
कॉफ़ी हाउस के कोने में बैठा वह व्यक्ति सार्त्र की किताब उठाए चिल्लाया— “मनुष्यता तो पशुत्व है! असली प्रगति तो बौद्धिक उन्नति में…”
उसी क्षण एक बच्चे ने उसकी मेज़ से सैंडविच गिरा दिया। “ओह सॉरी अंकल!” बच्चे ने तुरंत झुककर टुकड़े उठाने शुरू किए।
वह ‘बुद्धिजीवी’ अपनी किताब से झाँकता रह गया— उसकी नज़रों के सामने बच्चे की उँगलियाँ रोटी के टुकड़ों और फर्श की धूल को एक साथ उठा रही थीं।
चाक पर ज़िंदगी
सुबह की धूप में पिता के हाथ चाय के कप को थामे हुए थे – उन उँगलियों पर ईंटों के पुराने घाव अब मिट्टी के सूखे निशानों जैसे लग रहे थे।
“बेटा, ये…” उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखा। वही हाथ जो कभी पचास किलो के बोरे उठा लेते थे, आज मेरे झोले के हल्क़े से दबाव से भी काँप उठे।
रसोई से माँ की आवाज़ आई – “अब तो सेब काटने में भी दाँत थरथराते हैं।” उनकी हँसी अब वह नहीं रही जो कभी पूरे गली को जगा देती थी।
शाम को उनके पुराने बटुए से एक चमकता सिक्का निकला – “देख, एक आना। इसपर तुम्हारे दादा ने…”
अचानक घुटनों से वही चरचराहट – ठीक वैसी ही जब वे ईंटों के ढेर से उतरते थे। मैंने देखा – चाय का कप अभी तक उनकी उँगलियों में था, पर अब पूरी तरह ठंडा हो चुका था।
पिंड और प्रसाद
सुबह की पहली किरण जब मंदिर के शिखर को छू रही थी, भक्त ने अपनी थैली से केसरिया चुनरी निकाली। उस पर सोने के धागे से “जय माता दी” कढ़ा हुआ था। पिछले महीने तक वह “ऊँ नमः शिवाय” वाला रुद्राक्ष पहनता था।
पंडित जी ने आरती की थाल सजाई। उनकी उंगलियों के निशान घी के दीपक पर साफ़ दिख रहे थे। भक्त ने हाथ जोड़े, “पंडित जी, पिछले जन्म के पाप…इस बार माँ भगवती…”
“क्या पिछले जन्म के पाप?” पंडित जी ने चिमटे से दीपक की लौ सम्हाली। “कल तक तुम शिवजी के भक्त थे, आज माता रानी के। क्या परमात्मा बदल गए? गीता, कुरान, बाइबल – सब एक ही सत्य के अलग-अलग रास्ते हैं।”
भक्त के माथे का कुमकुम टपककर ज़मीन पर गिरा। उसकी जीभ पर रखा तुलसीदल अचानक कड़वा लगने लगा।
“देखो,” पंडित जी ने प्रसाद की थाली भक्त के सामने रखी, “जैसे माँ अपने बच्चे को बिना शर्त दूध पिलाती है, वैसे ही ईश्वर की कृपा है। तुम्हारा डर ही तुम्हारा सबसे बड़ा पाप है।”
बाहर प्रांगण में एक बूढ़ी माँ अपने लंगड़े बेटे के लिए प्रसाद ले रही थी। उसकी आँखों में न कोई शंका थी, न ही माँग। मंदिर के कगार पर बैठे कौए ने लड्डू का टुकड़ा उठाया और उड़ गया।
भक्त ने अपनी छाया देखी – वह अब भी वही थी, बस उसमें कुछ हल्कापन आ गया था।
तीसरा विश्वास
क्लिनिक की दीवार पर टँगा डिग्री का फ्रेम झुका हुआ था। डॉक्टर साहब ने रेसिपी पर वही पुरानी दवा लिखी—’एसिटालोप्राम 10mg’। मरीज की उँगलियाँ कागज़ के कोने को मोड़ने लगीं, “डॉक्टर साहब, ये तो मैं छह महीने से खा रहा हूँ… पर रात को वही सपने : कोई मुझे पीछे से दौड़ा रहा है, मेरी साँसें…”
पंखे की चेन टूटी हुई थी। डॉक्टर ने स्टेथोस्कोप गर्दन से उतारा, “हमारी मेडिकल बुक्स में लिखा है—ये दवा सेरोटोनिन बढ़ाती है। पर किताबों में ये नहीं लिखा कि जिस आदमी को अपनी ही छाया से डर लगे, उसका सेरोटोनिन कहाँ जाता है?”
एक सन्नाटा टपका। फिर उसने दवाई के नाम के आगे तीन शब्द जोड़े :
- ये दवा काम करेगी
- मैं अच्छा डॉक्टर हूँ
- तुम ठीक हो जाओगे
“ये तीसरा पॉइंट तुम्हारे हिस्से का है,” डॉक्टर ने पर्ची थमाते हुए कहा, “जिनकी नसों में यकीन की नस डरी हुई हो, उनकी दवा फ़ार्मेसी में नहीं, आईने में मिलती है।” । डॉक्टर को पूरा विश्वास था – दवा, डॉक्टर और खुद पर यकीन करने वाले मरते नहीं, बाकी सिर्फ़ ज़िंदा रहते हैं। बाक़ी सिर्फ़ ज़िंदा रहते हैं।
मरीज ने देखा—रेसिपी के उलटी तरफ़ खुद का चेहरा छपा था।
प्रतिध्वनि
डिपार्टमेंटल स्टोर के इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्शन में वह लड़का सबसे पीछे खड़ा था, जहाँ पुराने रेडियो और टेपरिकॉर्डर रखे थे। उसकी नीली यूनिफॉर्म पर ‘प्रशिक्षु’ लिखा था – तीन महीने से वही शब्द उसके सीने पर चिपका था जैसे कोई दोषसूचक लेबल।
मैंने सुना जब मैनेजर ने उसके कान पकड़कर कहा : “तुम्हारी फ़ाइल में लिखा है – पिता का देहांत, माँ घर पर सिलाई करती हैं। हमने तुम्हें दया देकर रखा है।” वाक्य के हर शब्द ने उस लड़के के चेहरे पर एक नई झुर्री खोद दी।
वह बोला: “साहब, मैं…” पर मैनेजर ने उसका हाथ ज़ोर से पकड़ लिया: “यहाँ देखो! तुम्हारे नाखून कितने गंदे हैं! ग्राहकों को लगेगा हम जानवर रखते हैं?” लड़के ने अपनी उँगलियाँ मोड़ लीं – वही उँगलियाँ जो कल रात तक माँ के लिए कपड़ों के बटन सी रही थीं।
मैं उस समय वहीं खड़ा था जहाँ दस साल पहले मेरे पिता ने मुझे पहली बार नौकरी के लिए भेजा था। मालिक ने तब कहा था : “इसके हाथ देखो – ये किताबी कीड़ा है, काम नहीं करेगा।” आज वही शब्द मेरे कानों में गूँज रहे थे।
लड़का चला गया तो मैंने उसके स्टेशन पर रखा नोटबुक देखा – उसमें ग्राहकों के नाम और पसंद के उत्पादों की सूची थी। अंतिम पृष्ठ पर लिखा था: “कल मिस्टर शर्मा को कॉल करना – उनकी बेटी के लिए हेडफ़ोन आया है।” नीचे एक और पंक्ति कटी-फटी थी : “माँ के लिए दवा…”
मैंने अपनी जेब से पेन निकाला और उसकी नोटबुक में लिखा : “तुम्हारे नाखून साफ़ हैं – मैंने देखा है तुम्हारे हाथों की मेहनत।” जब मैं बाहर निकला तो शीशे में अपना प्रतिबिम्ब देखा – वह अब उतना काँपता नहीं था।
ए-7, फेज-3, सिया रेसीडेंसी,एमएमआई के पीछे, लालपुर
रायपुर, छत्तीसगढ़, 492001
मो.- 9424182664




