राष्ट्रमत न्यूज,रायपुर/ बीजापुर(ब्यूरो)।झीरम कांड पर एनआईए का फैसला आने के बाद कई सवाल उठ रहे हैं। झीरम कांड में जो शामिल थे वो बड़े नक्सली सरकार की गोद में ऐश कर रहे हैं। सरकार अभी तक उनसे पूछताछ क्यों नहीं कर रही है। जितने भी बड़े नक्सली हमले में शामिल थे वो सरेंडर कर दिये है। जिन्हें फांसी देने का फैसला आया है उनका कहना है कि सरकार एक बार पुर्नविचार करे। जिन्हें फंासी की सजा हुई है क्या वो झीरम कांड के असली दोषी हैं। सरकार के पास मामले की तहकीकात के कई साधन और तरीके हैं। ऐसे में झीरम कांड के असली गुनगहारों का भी खुलासा होना चाहिए।

सरकार से पुनर्विचार की मांग
झीरम घाटी हमले के मामले में विशेष NIA अदालत द्वारा सुनाई गई मृत्युदंड की सजा के बाद बीजापुर जिले में इस फैसले को लेकर ग्रामीणों और परिजनों ने सरकार से पुनर्विचार की मांग की है। मनकेली पंचायत की सरपंच कमला कोरसा के नेतृत्व में ग्रामीणों और परिजनों ने मीडिया से मुलाकात कर अपनी पीड़ा सामने रखी।

फैसले पर पुनर्विचार किया जाए
परिजनों के अनुसार, सुमित्रा मोडियाम निवासी मनकेली, चेतु लेकाम निवासी मुनगा और प्रमिला मोडियाम निवासी गोरना करीब दस वर्षों से जेल में बंद हैं और झीरम मामले में विशेष NIA अदालत ने उन्हें फांसी की सजा सुनाई है।सरपंच कमला कोरसा सहित परिजनों ने कहा कि जिस दौर में बस्तर में नक्सलवाद का प्रभाव बेहद ज्यादा था, उस समय ग्रामीणों के सामने भय, दबाव और मजबूरी की परिस्थितियां थीं , उन्होंने सरकार और NIA से अपील करते हुए कहा कि उस समय की परिस्थितियों, आरोपियों की भूमिका और पूरे मामले के मानवीय पहलुओं को ध्यान में रखते हुए फैसले पर पुनर्विचार किया जाए।

बड़े नक्सली ऐश की जिंदगी जी रहे
घटना के जिम्मेदार बड़े नक्सली ऐश की जिंदगी जी रहे, छोटे कैडर जेल में।परिजनों ने गंभीर सवाल उठाते हुए कहा कि “जिन बड़े नक्सलियों के दबाव में ग्रामीण संगठन के साथ रहने को मजबूर थे, उनमें से कई आज आत्मसमर्पण के बाद अधिकारियों और नेताओं के साथ तस्वीरें खिंचवा रहे हैं और आराम की जिंदगी जी रहे हैं। दूसरी ओर, छोटे कैडर और ग्रामीण, जो परिस्थितियों के चलते उनके साथ रहे, वे वर्षों से जेल में बंद हैं।

परिवारों पर आर्थिक बोझ पड़ रहा है
परिजनों का कहना है कि जेल में बंद लोगों से मिलने के लिए परिवारों को बार-बार बीजापुर से दंतेवाड़ा और जगदलपुर तक जाना पड़ता है , हर मुलाकात में आने-जाने और अन्य खर्चों के कारण परिवारों पर आर्थिक बोझ पड़ रहा है। उन्होंने बताया कि हर पेशी पर वकीलों को करीब 2 हजार से 10 हजार रुपये तक देने पड़ते हैं , लगातार कोर्ट और जेल के चक्कर लगाते-लगाते परिवार आर्थिक और मानसिक रूप से परेशान हो चुके हैं , परिजनों का कहना है कि वर्षों से चली आ रही इस प्रक्रिया ने उनके परिवारों को बेहद कठिन परिस्थितियों में पहुंचा दिया है ।

सरकार और NIA फैसले पर विचार करे
परिजनों ने सरकार से भावुक अपील करते हुए कहा कि “हम कोर्ट और जेल के चक्कर लगाते-लगाते हर स्थिति से टूट चुके हैं। हमारे परिवार बेहाली की जिंदगी जी रहे हैं। सरकार और NIA एक बार अपने फैसले पर विचार करें और सजा में राहत दें।परिजनों ने यह भी कहा कि यदि उनकी मांग पर सरकार ने विचार नहीं किया तो वे रायपुर – जगदलपुर पहुंचकर विरोध-प्रदर्शन करने पर मजबूर होंगे।
घातक नक्सली हमला था
हालांकि झीरम घाटी हमला एक गंभीर और घातक नक्सली हमला था। परिजनों का कहना है कि प्रत्येक आरोपी की व्यक्तिगत भूमिका, तत्कालीन परिस्थितियों और मामले में उसकी वास्तविक भागीदारी को अलग-अलग देखते हुए सजा पर पुनर्विचार होना चाहिए। उनका दावा है कि जिन लोगों को फांसी की सजा सुनाई गई है, उनमें कुछ लोग परिस्थितियोंवश नक्सली संगठन के संपर्क में आए थे। इस दौरान सरपंच कमला कोरसा, परिजन चमरू मोडियाम, मुन्ना मोडियाम, सुभाष लेकाम, चमरू कुरसम, लकमी कोरसा, सोमली हेमला सहित सैकड़ों ग्रामीण मौजूद रहे।परिजनों की मांग है कि लंबे समय से जेल में बंद तीनों ग्रामीणों के मामले में सरकार और संबंधित न्यायिक प्रक्रिया के तहत उपलब्ध कानूनी विकल्पों पर पुनर्विचार किया जाए और उन्हें राहत दी जाए।

अजयसिंह ने कहा NIA का फैसला आधा – अधूरा*
झीरम कांड के चश्मदीद पूर्व कांग्रेसी नेता ने अजय सिंह ने भी NIA कोर्ट के फैसले को हैरान कर देने वाला बताया उन्होंने कहा कि जिनको आरोपी बताकर फांसी दी गई है उनमें कोई बड़ा नक्सली नही है जो घटना के मास्टर माइंड थे वो आज समर्पण भी कर चुके है एंव घटना में शामिल होना स्वीकार भी कर चुके है फिर उनको रिहायत क्यो दी जा रही है एंव इन छोटे कैडर के नक्सलियों को सालो से जेल में बन्द रहने व सजा भुगतने के बाद फांसी की सजा देना उचित नही है सरकार एंव कोर्ट एक बार पुर्नविचार करें