सेवाराम त्रिपाठी मानते हैं सत्ताएं कोई भी हों एकदम दूध की धुली नहीं होतीं,लेकिन इतनी बेगैरत और निर्लज्ज नहीं होतीं जो अपने से असहमत रखनेवालों को देशविरोधी, विदेशी,टुकड़े- टुकड़े गैंग के रूप में साबित करने के लिए किसी भी प्रकार का और कोई भी हथकंडा अपनाएं और विपक्ष को हर हाल में ध्वस्त करने में दिन -रात लगी रहें।

मूर्खताओं और घृणा के ज्वार में \ व्यंग्य
मूर्तियाँ तोड़ी जा रही हैं।इतिहास को विकृत किया जा रहा है। यह किसकी शह पर हो रहा है। किस की मर्ज़ी चल रही है।कौन है इस प्रवृत्ति को उकसाने वाला।ये विध्वंसक इरादे एक दिन ढह जाएंगे।मूर्तिभंजक घृणा और कट्टरता के पैरोकार हैं और कुंठाओं में आपाद मस्तक डूबे हुए।दरअसल तानाशाही रुझान यही सब कुछ तो करता है। उसका काम निर्माण और विकास नहीं बल्कि विध्वंस में होता है। धार्मिकता के बाने के रूप में मंच में सजता है और विद्वेष अंदर – अंदर पलता है।घृणा के बल पर सतही यात्रा ही की जा सकती है।चमक – दमक, गर्व और हर अच्छी चीज़ को बाज़ार बना देना और नष्ट कर देना, यही उसकी हक़ीक़त भी है और अंतिम परिणति भी।नागरिकता, मूल्य, नैतिकता और सच को धरती के नीचे गाड़ देना।
यूँ तो मूर्तियाँ सामाजिक सांस्कृतिक स्वीकार के उच्च शिखर हैं। इनके रूप जितना मूर्तियों में होते हैं उससे हज़ार गुना हमारे दिलों में।उन्हें तोड़कर किसी भी स्थिति में ख़त्म नहीं किया जा सकता।वो हमारे हृदयों में हैं। हमारी आत्मा की गहराइयों में हैं।
यूँ मूर्ति तोड़ने के उठ रहे प्रश्न सामान्य नहीं हैं वो बेहद ज्वलंत और एकदम समसामयिक भी हैं बल्कि एक तरह से अनिवार्य भी हैं। सत्ताएं कोई भी हों एकदम दूध की धुली नहीं होतीं,लेकिन इतनी बेगैरत और निर्लज्ज नहीं होतीं जो अपने से असहमत रखनेवालों को देशविरोधी, विदेशी,टुकड़े- टुकड़े गैंग के रूप में साबित करने के लिए किसी भी प्रकार का और कोई भी हथकंडा अपनाएं और विपक्ष को हर हाल में ध्वस्त करने में दिन -रात लगी रहें। नफ़रत की लार्ज स्केल खेती करने में भारत की संस्कृति और संवैधानिकताओं को कुचलती रहे और इतनी क्रूर, अमानवीय और राक्षसी हो जाए कि उसे आने वाले दिनों में वहशी के रूप में याद किया जाए? इस दौर में हम घृणा और नफ़रत के चक्रव्यूह में हैं। घृणा अब नेपथ्य में नहीं बल्कि संसद और विधानसभाओं में विभिन्न रूपों में अभिव्यक्त की जा रही है। उसके लिए भाषा का नीचतम रूप निर्लज्जता से जारी है। ये वास्तविकताएं सामाजिक सांस्कृतिक समरसता को समाप्त कर रही हैं।कितने ज़मीर वालों और सच कहने वालों को मौत के घाट उतार दिया गया।उदाहरण देने की ज़रूरत नहीं हैं, सैकड़ों मिल जाएंगे। ऐसी प्रवृत्ति को क्या कहें उन्हें न कोई पीड़ा होती और न कोई पछतावा। यह उनका धंधा और यह उनकी स्वाभाविक वृत्ति है।मूर्तियाँ तोड़ना उनका अत्यंत सुविधाजनक और प्रिय काम है। ज़ाहिर है कि इस दौर में हम कट्टरता,अज्ञानता, अंधविश्वास और कूपमंडूकता के उपनिवेश बनाये जा रहे हैं।और यही ऐसी सच्चाई है कि न तो मूर्तियाँ बचेंगी और न जीवन यथार्थ बचेगा और न ही मनुष्यता बचेगी।हम लगातार एक अँधेरी सुरंग में समा रहे हैं।दिन- ब – दिन हम सच्चाइयों से मुँह मोड़ रहे हैं और महाझूठ हर यथार्थ को अँगूठा लगा रहा है।

राहुल सांकृत्यायन, सुदामा पांडे’ धूमिल’ ही नहीं जो भी सच की राह पर होगा उसे नेस्तनाबूद करना उनका विशिष्ट शौक है और स्वाभाविक वृत्ति भी। मैं पूर्व की घटनाएं स्मरण कर रहा हूँ। लेनिन की मूर्ति ढहाई गई, बुद्ध के बुत ध्वस्त किए गए। बाबा साहेब अंबेडकर की मूर्तियां ढहाई और विकृत की गई।मुझे लगता है कि केवल भर्त्सना करने से इसकी क्षतिपूर्ति नहीं की जा सकती।वे ज़िंदा हैं और हमेशा ज़िंदा रहेंगे और उन्हें याद किया जाता रहेगा। वो समय समाज की ज़िंदा हक़ीक़त हैं ।यह मात्र लेखकों कलाकारों की मूर्तियाँ तोड़ना भर नहीं है बल्कि हमारी निष्ठाओं ,संस्कृति, सामाजिकता और लोकतांत्रिक चेतना पर आक्रमण है।इसे इस रूप में देखा जाना चाहिए कि जिनके घर शीशे के होते हैं वो दूसरों पर पत्थर नहीं फेंकते।वर्तमान और इतिहास सब कुछ देखता है और उसका वृहत्तर परिप्रेक्ष्य भी होता है।यह हमें नहीं भूलना चाहिए।अपने कवि मान बहादुर सिंह की हत्या हम लेखक नहीं भूले हैं।न गौरी लंकेश को, न नरेंद्र दाभोलकर को न गोविंद पानसरे को और न एम .एम .कलबुर्गी को।नाम बहुत हैं।
तमिल लेखक पेरूमल मुरुगन ने बड़ी पीड़ा से कहा था -”लेखक मुरुगन मर चुका है।” मनोज रूपडा को किस तरह बेइज़्ज़त किया गया और हमारे लेखक वहाँ तमाशबीन की मुद्रा में मुलर – मुलुर देखते रहे ।यह एकदम तयशुदा तथ्य है कि कितना भयभीत है हमारी सामाजिकता। ज़ाहिर है कि लेखकों की प्रतिमाएँ तोड़कर न तो उनकी आवाज़ को ख़त्म किया जा सकता और न उनके विचारों की अग्निशिखाओं को मारा जा सकता और न बुझाया जा सकता।यह काम संकीर्णताओं और दक्षिणवर्ती मनोविज्ञान की शह पर विराट पैमानों पर सुनियोजित तरीके से हो रहा है।
1967 के आसपास कांग्रेस के ख़िलाफ़ एक विशेष अभियान चलाया गया था. उसे गैर कांग्रेसवाद के नाम से जाना जाता है. यहीं से आयाराम -गयाराम और संविद सरकारों की नींव पड़ी।अंग्रेजी विरोधी अभियान अंग्रेजी हटाओ के रूप में सामने आया।उत्तर दक्षिण के कोण उभरे।इस मनोविज्ञान ने अंग्रेजी पढ़ाने वालों तक को नहीं बक्शा। भाषा तो बहता हुआ निर्मल जल है। हमारा संघर्ष अंग्रेजियत या उस नज़रिए से है जिसका दोहरा मनोविज्ञान है।ऐसे मनोविज्ञान का वायुमंडल आपातकाल के बाद में वैध होने की प्रक्रिया में शुरू हुआ था लेकिन इसके बावजूद उसमें शंका भी थी और एक असमंजस भी था. ऐसी घातक प्रवृत्तियां भीतर ही भीतर सनसना रहीं थीं और पल्लवित हो रही थीं।वो हिटलरी -मुसोलिनी प्रवृत्तियों के रूप में फनफ़ना रहीं थीं।
असहमति को तानाशाही के उफान में अपराध और देशद्रोह बना दिया जाता है।तानाशाहियत की कोख से अन्यान्य ,अनीति , अनैतिकता और हिंसा के लावे फूटते हैं और जहाँ भी मूल्य, नैतिकता और सच कहने की हिम्मत होती है, उसे तोड़ने और विध्वंस को करिश्में में ढाल देने प्रकट करने के बड़े- बड़े माध्यम विभिन्न रूपों में अभिव्यक्त होते हैं।मूर्तियों को तोड़ने और हर सच को ख़त्म करने के उद्यम होते हैं।यह असामाजिकता भर नहीं है बल्कि एक सुनियोजित प्रविधि है जिसमें ऐसी नकारात्मक सोच का खुला हुआ अभीष्ट ही शामिल होता है।महानायकों के स्थान पर जिनकी क़ीमत कौड़ी भर की नहीं होती उनको बिठाने और उनका कसीदा पढ़ने का रिवाज़ विकसित करने की मुहिम होती है। झूठ बोलना और इतिहास को अपनी मूर्खताओं से नेस्तनाबूद किया जाता है।खलनायकों को, हत्यारों, तड़ीपारों और लुगदी विचार की सरणियाँ उच्च रूपों में प्रतिष्ठित की जाती हैं।अहंकार और निर्लज्जता की यात्रा में समूचा समाज परिवेश, जनतंत्र और संविधान सिस्टम डर के बड़े – बड़े रूपों में बदल दिया जाता है।ऐसा वायुमंडल निर्मित कर दिया जाता है जिसमें मूर्खताएं किल्लोल करती हैं लेकिन ये किसी भी सूरत में टिकाऊ नहीं बल्कि खोखली होती हैं और एक दिन समय की अदालत उन्हें अपदस्थ कर देती है।
भारत एकदम बदल गया सा लगता है हालाँकि उसके भीतर वृहत्तर सामर्थ्य और अनेक विविधताएं अब भी विद्यमान हैं।ऐसा नहीं है कि बुद्धिजीवियों से घृणा करने वाले पूर्व में नहीं थे लेकिन उनकी आत्मा एकदम खोखली नहीं हो गई थी।सांप्रदायिक मनोविज्ञान, धर्मांधता के तमाम रूप कमोवेश पूर्व में भी हुआ करते थे,लेकिन वो इतने प्रभावी और दुस्साहसी और मूल्यहीन नहीं हो गए थे।घृणाओं के बावजूद उनमें कहीं न कहीं कुछ बचा हुआ था और एक विशेष किस्म का डर भी था जिसका एक रूप नैतिकताओं के आसपास साँस लेता था।महात्मा गाँधी की हत्या करने के बाद दक्षिणवर्ती मनोविज्ञान एक तरह से स्तंभित हो गया था।गाँधी को गोली मारने वाले में नैतिक साहस नहीं था। मात्र कठहुज्जती थी।
वीरेन डंगवाल की पंक्तियाँ हैं -”हर दौर कभी तो खत्म हुआ ही करता है /हर कठिनाई कुछ राह दिखा ही देती है/”जब विद्वता और बुद्धिमता को नैतिकताओं ,आचरणों और मूल्यों को दरकिनार कर अंधविश्वासों और मूर्खताओं की कबड्डी खेली जाए, इतिहास की मनमानी व्याख्या की जाए और सफ़ेद झूठ सिंहासन में विराजमान हो तो कुछ भी हो सकता है।अंत में ओमप्रकाश वाल्मीकि का कहा याद दिला रहा हूँ – “मैं कहता हूँ शब्द चुप्पी तोड़ें, सच को सच, झूठ को झूठ कहें।”
अक्सर देख रहा हूँ कि कुछ उस्तादनुमा अधकचरे मूर्तियाँ स्वयं नहीं तोड़वाते हैं या बाज़ीगरी के द्वारा ऐसी करतूतों को प्रयुक्त करते हैं. अब तो मूर्तियाँ तोड़ने का धंधा ही चालू हो गया है.कुछ बातें दिमाग़ में कौंधती रहीं। उन्हीं को कह रहा हूँ हालांकि यह मुद्दा बेहद महत्वपूर्ण और बहस तलब है।

सेवाराम त्रिपाठी
रीवा मध्यप्रदेश
मो.7987921206