मंदिर में चोरी \ कहानी - rashtrmat.com

       मंदिर में चोरी \ कहानी

संदीप पांडेय “शिष्य” की कहानी की  सबसे बड़ी सीख है धन की चोरी से बड़ा अपराध विश्वास की चोरी है, और सच्चा दंड वह है जो अपराधी को तोड़ता नहीं, उसे बदल देता है। गरीबी इंसान को मजबूर कर सकती है, लेकिन लालच उसे अपराध की ओर ले जाता है। वहीं विश्वास और सही मार्गदर्शन उसके भीतर का इंसान फिर जगा सकते हैं।

     मंदिर में चोरी \ कहानी

कुशलपुर नगर के पुराने मोहल्ले में स्थित संतोषी माता का मंदिर केवल आस्था का केंद्र नहीं था, बल्कि लोगों के दुःख-सुख का भी आश्रय था। नगर का यह एकमात्र संतोषी माता मंदिर था, इसलिए सुबह की पहली किरण से लेकर रात्रि की अंतिम आरती तक श्रद्धालुओं का ताँता लगा रहता। कोई संतान-सुख की कामना लेकर आता, कोई रोगमुक्ति की प्रार्थना करता, कोई व्यापार की उन्नति चाहता तो कोई केवल माँ के चरणों में कुछ पल बैठकर मन का बोझ हल्का कर लेता।

मंदिर की आत्मा थे।चंपत जी।लगभग साठ वर्ष की आयु, चेहरे पर अद्भुत शांति, वाणी में मधुरता और व्यवहार में ऐसी सहजता कि पहली बार मिलने वाला व्यक्ति भी उन्हें अपना मान ले। वे स्वयं को कभी पुजारी नहीं कहते थे। मुस्कराकर कहते, “मैं तो माँ का सेवक हूँ।”

प्रतिदिन ब्रह्ममुहूर्त में मंदिर पहुँच जाते। सबसे पहले पूरे प्रांगण की सफाई करते। सीढ़ियों पर पानी डालकर झाड़ू लगाते, फूलों की क्यारियों में जल देते, फिर बड़े प्रेम से माता का श्रृंगार करते। धूप, दीप और आरती के बाद आने वाले श्रद्धालुओं से धर्म, जीवन और कर्म पर चर्चा करते। उनके शब्दों में उपदेश नहीं, अनुभव बोलता था। लोग दर्शन के साथ-साथ उनके दो वाक्य सुनने भी आते थे।

मंदिर में चढ़ने वाला प्रत्येक रुपया दान-पात्र में ही डाला जाता था। चंपत जी का अटल नियम था कि कोई भी चढ़ावा सीधे हाथ में नहीं लिया जाएगा। शाम को दान-पात्र खोला जाता। प्राप्त राशि को वे स्वयं रजिस्टर में लिखते। मंदिर के लिए खरीदी गई प्रत्येक वस्तु का हिसाब दर्ज होता। यहाँ तक कि यदि परिवार के भरण-पोषण के लिए भी कुछ राशि निकालते, तो उसे भी स्पष्ट शब्दों में लिखते।”सेवक के गृह-व्यय हेतु।”

कई लोगों ने उनसे कहा भी, “इतना हिसाब रखने की क्या आवश्यकता है? कौन पूछता है?”

चंपत जी मुस्करा देते।

“दुनिया पूछे या न पूछे, मेरा अंतःकरण अवश्य पूछता है। ईश्वर के घर का हिसाब मनुष्य से नहीं, अपनी आत्मा से छिपाया नहीं जा सकता।”

उनकी यही ईमानदारी धीरे-धीरे मंदिर की सबसे बड़ी पूँजी बन गई। श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ी, दान बढ़ा और उसी दान से मंदिर में संगमरमर का फर्श बिछा, पेयजल की व्यवस्था हुई, यात्रियों के लिए विश्राम-कक्ष बना और गरीब बच्चों के लिए पुस्तकालय भी खुल गया। नगर में यदि किसी संस्था का उदाहरण पारदर्शिता के लिए दिया जाता, तो लोग संतोषी माता मंदिर का नाम लेते।

एक दिन दोपहर के समय, जब मंदिर लगभग खाली था, एक दुबला-पतला नवयुवक उनके सामने आकर खड़ा हो गया। कपड़े साफ थे, किंतु पुराने। आँखों में भूख से अधिक बेबसी थी।

“महाराज… मुझे अपने पास रख लीजिए।”

चंपत जी ने स्नेह से उसकी ओर देखा।

“क्या नाम है बेटा?”

“राघव।”

“क्या काम करते हो?”

“कोई काम नहीं मिलता। माता-पिता बचपन में ही चले गए। कई दिनों से रोजगार की तलाश कर रहा हूँ। दो समय का भोजन भी कठिन हो गया है। यदि मंदिर की सेवा मिल जाए तो जीवन संभल जाएगा।”

उसकी आवाज़ काँप रही थी।

चंपत जी कुछ क्षण मौन रहे। उन्हें लगा, जैसे माँ ने ही इस युवक को उनके पास भेजा है।

उन्होंने कहा, “मंदिर सेवा नौकरी नहीं, साधना है। यदि सेवा कर सको तो आज से यहीं रहो। भोजन, रहने की व्यवस्था और थोड़ा-बहुत खर्च भी मिलता रहेगा।”

राघव की आँखें कृतज्ञता से भर आईं।

उस दिन से उसका नया जीवन आरंभ हुआ।

वह परिश्रमी था। जो काम बताया जाता, पूरी लगन से करता। कुछ ही दिनों में उसने सफाई, पूजा की तैयारी, फूल सजाना, दीपक जलाना, प्रसाद वितरण, आगंतुकों का स्वागत,सब सीख लिया। उसकी तत्परता देखकर चंपत जी प्रसन्न रहते।

धीरे-धीरे उन्होंने उसे लेखा-जोखा भी सिखाना शुरू किया।

वे कहते, “रुपये गिनना कठिन नहीं, उन्हें पवित्र बनाए रखना कठिन है। यह धन किसी व्यक्ति का नहीं, लोगों की श्रद्धा का है। इसमें एक पैसा भी गलत स्थान पर गया तो सबसे पहले हमारी आत्मा गरीब हो जाएगी।”

राघव सिर झुकाकर सब सुनता।

छह महीने बीतते-बीतते वह मंदिर का अभिन्न अंग बन गया। श्रद्धालु भी उसे पहचानने लगे थे। चंपत जी को विश्वास हो गया कि यदि कभी वे अस्वस्थ हो जाएँ तो मंदिर की व्यवस्था यह युवक सँभाल लेगा।

लेकिन यहीं से उसके भीतर एक अदृश्य परिवर्तन शुरू हुआ।

विश्वास का बोझ यदि विनम्रता के साथ न संभाला जाए, तो वह अहंकार बन जाता है।

राघव के मन में धीरे-धीरे यह भावना घर करने लगी कि मंदिर की व्यवस्था अब उसी के कारण चल रही है। लोग उसे सम्मान देते तो वह भीतर ही भीतर स्वयं को चंपत जी के समकक्ष समझने लगता। बाहरी व्यवहार में आदर बना रहा, पर भीतर विनम्रता का स्थान महत्वाकांक्षा ने ले लिया।

एक शाम दान-पात्र खोलते समय उसके मन में पहली बार विचार आया।

“इतने सारे पैसे हैं… यदि मैं सौ-दो सौ रुपये रख भी लूँ तो किसे पता चलेगा?”

विचार आया और चला भी गया।

पर दूसरे दिन फिर आया।

तीसरे दिन और अधिक स्पष्ट होकर आया।

मन की यही विशेषता है।जिस प्रलोभन को पहली बार हम ठुकरा देते हैं, वह हार मान लेता है; लेकिन जिसे थोड़ी-सी जगह दे देते हैं, वह धीरे-धीरे हमारे व्यक्तित्व पर अधिकार जमा लेता है।

उस दिन राघव ने काँपते हाथों से दो सौ रुपये जेब में रख लिए।

रजिस्टर में हिसाब पहले की तरह ही लिखा गया।

उसका दिल तेज़ी से धड़क रहा था। उसे लगा, अभी चंपत जी पकड़ लेंगे। पर कुछ नहीं हुआ।

शाम शांति से बीत गई।

रात को उसने बहुत देर तक नींद लाने की कोशिश की। भीतर कोई उसे धिक्कार रहा था, किंतु दूसरे ही क्षण मन ने तर्क दिया।”इतनी मेहनत करता हूँ। थोड़ा-सा ले लिया तो कौन-सा अपराध हो गया?”

यहीं से आत्मा और लोभ का संघर्ष आरंभ हुआ।

पहली चोरी के बाद दूसरी आसान लगी, दूसरी के बाद तीसरी और फिर यह उसकी आदत बन गई। धीरे-धीरे छोटी रकम बड़ी होने लगी। उसके पहनावे में बदलाव आने लगा। पहले जहाँ वह साधारण चप्पल पहनता था, अब महँगे जूते पहनने लगा। जेब में नया मोबाइल दिखाई देने लगा। बातचीत में भी एक अनजाना आत्मविश्वास नहीं, बल्कि दंभ झलकने लगा।चंपत जी बहुत अनुभवी थे।उन्होंने हिसाब से पहले चेहरे पढ़ना सीखा था।

उन्होंने देखा कि रजिस्टर तो पहले जैसा है, लेकिन राघव की आँखों की निर्मलता कहीं खो गई है। उसके चेहरे पर एक अजीब-सी अस्थिरता रहने लगी थी। उन्हें समझते देर नहीं लगी कि मंदिर में कोई धन नहीं, बल्कि एक युवक की चेतना चोरी होने लगी है।

राघव के व्यवहार में आया परिवर्तन किसी और की दृष्टि से भले ही छिपा रह जाता, पर चंपत जी की अनुभवी आँखों से नहीं बच सका। उन्होंने न तो उससे कोई प्रश्न किया, न ही रजिस्टर उलट-पुलटकर जाँचने लगे। वे जानते थे कि मनुष्य का अपराध पहले उसके व्यवहार में प्रकट होता है, हिसाब की पुस्तकों में बाद में।

कुछ दिनों तक वे केवल उसे देखते रहे। जब भी राघव दान-पात्र के सामने बैठकर रुपये गिनता, उसकी उँगलियाँ पहले जैसी सहज नहीं रहतीं। कभी वह अनायास चौंक जाता, कभी किसी श्रद्धालु के आने पर जल्दी से नोट समेटने लगता। चंपत जी यह सब देखते, फिर भी मौन रहते।

एक दिन प्रातःकाल आरती के पश्चात् उन्होंने राघव को मंदिर के पीछे लगे पीपल के वृक्ष के नीचे बुलाया। मंद हवा चल रही थी। घंटियों की ध्वनि अब भी वातावरण में तैर रही थी।

उन्होंने मुस्कराकर पूछा, “राघव, तुम्हें यहाँ आए कितना समय हो गया?”

“लगभग सात महीने, महाराज।”

“और इन सात महीनों में सबसे बड़ी सीख क्या मिली?”

राघव ने बिना सोचे उत्तर दिया, “ईमानदारी।”

चंपत जी ने उसकी आँखों में गहराई से देखा। कुछ क्षण तक मौन छाया रहा। फिर बोले, “ईमानदारी केवल दूसरों के सामने नहीं होती बेटा, वह तब होती है जब कोई देखने वाला न हो।”

राघव का चेहरा एक पल को फीका पड़ गया, पर अगले ही क्षण उसने स्वयं को संभाल लिया।

उस दिन पहली बार उसे लगा कि कहीं चंपत जी सब कुछ जान तो नहीं गए। लेकिन उन्होंने आगे कुछ नहीं कहा। यही मौन उसके भीतर सबसे बड़ा प्रश्न बनकर बैठ गया।दिन बीतते गए।

लोभ की सबसे बड़ी विडंबना यह होती है कि वह कभी तृप्त नहीं होता। जितना मिलता है, उतना ही और पाने की इच्छा जगाता है। राघव अब केवल छोटे नोट नहीं निकालता था। अवसर देखकर बड़ी रकम भी अलग रखने लगा। उसने शहर में कुछ नए परिचित बना लिए थे। अच्छे कपड़े, महँगी घड़ी और चमकदार मोबाइल अब उसकी नई पहचान बन चुके थे।

श्रद्धालुओं को लगा कि शायद किसी रिश्तेदार ने सहायता कर दी होगी। किसी ने अधिक ध्यान नहीं दिया।लेकिन चंपत जी के मन में एक पीड़ा घर करती जा रही थी। उन्हें मंदिर के धन की चिंता कम थी, उस युवक की आत्मा की चिंता अधिक थी। वे सोचते,जिस बच्चे को माँ ने मेरी शरण में भेजा था, कहीं वह मेरी ही आँखों के सामने अँधेरे में तो नहीं उतर रहा?

इसी बीच नगर में मंदिर के वार्षिक महोत्सव की तैयारियाँ आरंभ हो गईं। दूर-दूर से भक्त आने वाले थे। दान भी सामान्य दिनों की अपेक्षा कई गुना अधिक होने की संभावना थी।

महोत्सव की पूर्व संध्या पर चंपत जी ने राघव से कहा, “कल भीड़ बहुत रहेगी। दान-पात्र रात में नहीं खोलेंगे। सुबह समिति के सभी सदस्यों की उपस्थिति में हिसाब होगा।”

यह सुनते ही राघव के मन में जैसे किसी ने हलचल मचा दी। उसने सोचा, इतनी बड़ी राशि सामने होगी। यदि उसमें से कुछ निकाल लिया जाए तो जीवनभर किसी को पता भी नहीं चलेगा।

उस रात वह बहुत देर तक जागता रहा। उसकी आँखों के सामने नोटों के ढेर घूमते रहे। दूसरी ओर चंपत जी का शांत चेहरा भी बार-बार उभर आता। भीतर से कोई कहता”रुक जा, अभी भी समय है।” लेकिन दूसरा स्वर उससे अधिक प्रबल था।”यही अवसर फिर नहीं मिलेगा।”

अगले दिन महोत्सव अत्यंत भव्य रहा। श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ा। दान-पात्र शीघ्र ही भर गया। लोगों ने उदारता से नकद राशि, चाँदी के सिक्के और अनेक भेंटें अर्पित कीं।रात्रि को मंदिर के द्वार बंद हुए।

चंपत जी ने थके स्वर में कहा, “राघव, मैं कुछ देर विश्राम करूँगा। प्रातः चार बजे सब लोग आ जाएँगे।”

राघव ने सिर हिलाया, किंतु उसके भीतर तूफान उठ रहा था।आधी रात बीतने पर वह धीरे से उठा। चारों ओर सन्नाटा पसरा था। उसने काँपते हाथों से दान-पात्र की चाबी निकाली। ताला खुलने की हल्की-सी आवाज़ भी उसे वज्रपात जैसी लगी। उसने ढक्कन हटाया। भीतर नोटों का अंबार था।और उसका हाथ आगे बढ़ा।

लेकिन जैसे ही उसने पहली गड्डी उठाई, मंदिर के गर्भगृह से आती दीपक की लौ उसकी आँखों में पड़ी। उसी क्षण उसे ऐसा लगा मानो माता की मूर्ति उसे निहार रही हो। उसके हाथ काँप उठे। माथे पर पसीना छलक आया।

वह स्वयं को समझाने लगा।”यह केवल भ्रम है…मूर्तियाँ किसी को नहीं देखतीं…”

परंतु मन तर्क नहीं मान रहा था। वर्षों पहले अपनी माँ का चेहरा, चंपत जी की करुणा, भूखे दिनों की स्मृतियाँ और उनका विश्वास—सब एक साथ उसके भीतर जाग उठे।

उसी समय पीछे से एक शांत स्वर सुनाई दिया,”राघव… बेटा, इतनी रात को हिसाब कर रहे हो?”

वह जैसे पत्थर का हो गया।धीरे-धीरे उसने पीछे मुड़कर देखा।चंपत जी वहीं खड़े थे।

उनके चेहरे पर क्रोध नहीं था, केवल अथाह करुणा थी।ऐसी करुणा, जो किसी अपराधी को दंड से अधिक अपनी ही दृष्टि से लज्जित कर देती है।

राघव के हाथ से नोटों की गड्डी फिसलकर दान-पात्र में गिर पड़ी। उसकी देह काँप रही थी। होंठ सूख गए थे। वह चाहकर भी चंपत जी की आँखों में नहीं देख पा रहा था। कुछ क्षणों तक मंदिर में केवल अखंड दीप की लौ की मद्धिम थरथराहट और बाहर बहती हवा की सरसराहट सुनाई देती रही।राघव घुटनों के बल बैठ गया।

“महाराज… मुझे क्षमा कर दीजिए। मैं अपराधी हूँ। केवल आज नहीं… कई महीनों से मंदिर के दान में हाथ डालता रहा हूँ। मैंने आपके विश्वास को भी लूटा और माँ की श्रद्धा को भी। यदि चाहें तो मुझे पुलिस के हवाले कर दीजिए। यही मेरे अपराध का उचित दंड होगा।”

उसकी आवाज़ रुद्ध हो गई। आँसू पत्थर की फर्श पर टपकने लगे।

चंपत जी धीरे-धीरे उसके समीप आए। उन्होंने उसके कंधे पर हाथ रखा और शांत स्वर में बोले, “तुम्हारा अपराध धन की चोरी नहीं है, राघव। धन तो फिर आ जाएगा। सबसे बड़ी चोरी वह है जो तुमने अपनी आत्मा से की है।”

राघव फूट-फूटकर रो पड़ा।

चंपत जी बोले, “जिस दिन तुम पहली बार यहाँ आए थे, तुम्हारी आँखों में अभाव था, पर मलिनता नहीं थी। आज तुम्हारे पास वस्त्र हैं, जूते हैं, मोबाइल है, पर मन निर्धन हो गया है। बताओ, लाभ किसका हुआ?”

राघव के पास कोई उत्तर नहीं था।

कुछ देर बाद चंपत जी गर्भगृह के सामने जाकर बैठ गए। उन्होंने दीपक की लौ को निहारा और बोले, “जानते हो, मैं आज रात सोया नहीं था। कई दिनों से मुझे सब ज्ञात था। रजिस्टर के आँकड़े भले मिल जाते थे, पर तुम्हारा चेहरा हिसाब नहीं दे पा रहा था।”

राघव ने विस्मय से उनकी ओर देखा।”फिर आपने मुझे रोका क्यों नहीं?” उसने काँपते स्वर में पूछा।

चंपत जी मुस्कराए, “क्योंकि डर से बदला हुआ मनुष्य अवसर मिलते ही फिर गिर जाता है। मैं चाहता था कि तुम्हारी चेतना स्वयं जागे। बाहर का ताला तो मैं बंद कर सकता था, पर भीतर का ताला तुम्हें ही खोलना था।”

ये शब्द राघव के हृदय में तीर की तरह उतरते चले गए।

चंपत जी ने आगे कहा, “यदि मैं तुम्हें उसी दिन चोर कह देता, तो शायद तुम अपने अपराध को छिपाने में और चतुर हो जाते। पर आज तुम स्वयं अपने अपराध के सामने खड़े हो। यही जागरण है। यही वह क्षण है जब मनुष्य पुनर्जन्म लेता है।”

राघव ने दोनों हाथ जोड़ दिए।

“महाराज, मैं सब लौटा दूँगा। एक-एक पैसा। चाहे वर्षों लग जाएँ।”

चंपत जी ने उसे उठाया।

“धन लौटाना आवश्यक है, पर उससे भी अधिक आवश्यक है विश्वास लौटाना। समाज का विश्वास टूट जाए तो उसे जोड़ने में वर्षों लगते हैं। कल प्रातः मंदिर समिति के सामने तुम स्वयं सब स्वीकार करोगे। मैं तुम्हारे साथ रहूँगा, पर सत्य तुम्हें ही बोलना होगा।”

सुबह जब समिति के सदस्य और श्रद्धालु एकत्र हुए, तब सबके सामने राघव ने सिर झुकाकर अपना अपराध स्वीकार कर लिया। मंदिर परिसर में सन्नाटा छा गया। अनेक लोगों के चेहरे पर आक्रोश था। कुछ लोग तत्काल पुलिस बुलाने की बात करने लगे।

तभी चंपत जी खड़े हुए।उन्होंने कहा, “यदि किसी ने मंदिर का धन चुराया है तो अपराध अवश्य हुआ है। पर यदि कोई अपने अपराध को स्वयं स्वीकार कर ले, पश्चाताप करे और सुधार का मार्ग चुने, तो क्या समाज का कर्तव्य केवल दंड देना है? क्या हम एक जीवन को बचाने का प्रयास नहीं करेंगे?”

उनकी वाणी में ऐसा नैतिक बल था कि वातावरण बदलने लगा।बहुत विचार-विमर्श के बाद निर्णय हुआ कि राघव मंदिर में नहीं रहेगा, पर उसे कारावास भी नहीं भेजा जाएगा। जितनी राशि उसने ली थी, वह श्रम करके धीरे-धीरे लौटाएगा। साथ ही नगर की गौशाला, वृद्धाश्रम और अनाथालय में नियमित सेवा करेगा, ताकि उसके भीतर का मनुष्य फिर से जीवित हो सके।राघव ने बिना किसी आपत्ति के यह निर्णय स्वीकार कर लिया।

समय अपनी गति से बहता रहा।दो वर्ष बीत गए।राघव ने दिन-रात मेहनत की। मजदूरी की, छोटे-छोटे काम किए और अपनी कमाई का एक भाग नियमित रूप से मंदिर में जमा करता रहा। उसने पूरी राशि लौटा दी। उससे भी बढ़कर उसने सेवा का आनंद पाया। अब वह किसी के सामने अपने अतीत को छिपाता नहीं था। वह युवाओं से कहता, “मनुष्य का पतन एक बड़ी चोरी से नहीं, एक छोटे समझौते से शुरू होता है। इसलिए अपने अंतःकरण की पहली आवाज़ कभी मत दबाना।”

एक दिन वह फिर संतोषी माता के मंदिर पहुँचा।पहले की तरह उसने सीढ़ियों पर माथा टेका। भीतर गया तो देखा, चंपत जी आरती की तैयारी कर रहे थे। उन्हें देखकर वह उनके चरणों में गिर पड़ा।चंपत जी ने उसे उठाकर गले लगा लिया।

उनकी आँखों में स्नेह था, गर्व था और एक गुरु की वह निस्सीम संतुष्टि थी, जो किसी शिष्य को सफल होते देखकर मिलती है।उन्होंने कहा, “राघव, तुमने मंदिर का धन तो बहुत पहले लौटा दिया था। आज तुमने अपनी आत्मा भी लौटा दी है।”

राघव की आँखों से अश्रुधारा बह निकली।उस दिन आरती के बाद चंपत जी ने उपस्थित श्रद्धालुओं से कहा।

“दान केवल धन का नहीं होता। अन्न का दान भूख मिटाता है, वस्त्र का दान तन ढँकता है, विद्या का दान जीवन सँवारता है; लेकिन सबसे दुर्लभ दान है।चेतना का दान। जिस मनुष्य के भीतर सोई हुई आत्मा जाग जाए, उसके जीवन का अंधकार स्वयं मिट जाता है।”

मंदिर की घंटियाँ गूँज उठीं।दीपक की लौ पहले की तरह शांत थी, किंतु आज वह केवल गर्भगृह को नहीं, एक जागी हुई आत्मा के भीतर भी प्रकाश फैला रही थी।

संदीप पांडे अजमेर ,Sandeep pande Durgesh  Pushker road

kotra  Ajmer 305004 Rajasthan

9414070143 phone