-सेवाराम त्रिपाठी बता रहे हैं स्वांत: सुखाय की सबकी धारणाएं और नज़रें भी भिन्न- भिन्न होती है। स्वान्तः सुखाय की भावना जब उदात्त होती है तो सामान्यजन उसे उसके अनंत विस्तार में देखता समझता है। और जन कल्याण की भावना का उदात्त विकास भी होता है।अन्यथा ढूंढते रह जाओगे। वह छंछूदर के सिर में चमेली का तेल भी हो जाया करती है।
स्वान्तः सुखाय : अर्थ और सीमा \ विशेष लेख

हमारे जीवन में कई तरह की संकल्पनाओं का निवास है। जीवन के दो पहलू हैं-संकल्प और विकल्प। संकल्प के रूप भी अपने-अपने स्वार्थ सिद्ध के संसार की वजह से अक्सर बदलते रहते हैं। यह कभी-कभी बाज़ार के मायाजाल की वजह से होता हैं । इन्हीं के ऋण-धन और गुणा-भाग से हमारी ज़िंदगी गतिमान है। इसकी रेखाएं कभी सीधी होती हैं और कभी तिर्यक । इसी में हमारे मन की बंदूकें दगती हैं या दागी जाती हैं। कभी-कभी मन कई तरह के रूपक गढ़ता है और कभी इच्छाओं के संसार में चक्करदार फेरे लगाता है । हो यह रहा है कि कुछ बातें समझते हुए भी नहीं समझी जाती और इसके उलट कुछ न समझते हुए भी समझ ली जाती हैं या समझने के नाटक किए जाते हैं । नौटंकीबाज कहां-कहां नहीं होते ? वे तरह-तरह के रूपक गढ़ते हैं । इस वास्तविकता को किस खाने में मान लिया जाए । इसमें कई तरह के हेतु काम करते हैं । जैसे सूरदास ने कहा- “ऊधो मन माने की बात/दाख छुहारा छांडि अमृत फल विषकीरा विष खात/ “
यह मन एक अखंड ज्योति की भांति है। यह ज्योति कभी बुझती ही नहीं । जब तक आप जीवित हैं, यह आपका पीछा नहीं छोड़ती । वह तीन लोक चौदह भुवन में चकरघिन्नी की तरह बड़ी तेज़ी से घूम रही है । हालांकि इसकी यह तुलना किसी तरह सही नहीं मानी जा सकती है। उसकी गति और आवेग सीमातीत है। वह आकाशवाणी, रेडियो और तमाम इलेक्ट्रानिक मीडिया में आवाजाही कर रही है और जो जी में आता है खुल्लम – खुल्ला हाँकती रहती है। सच मानिए यह हमारी ज़िंदगी में उग आई स्वार्थ साधनाओं का एक विराट खेला भी हो चुका है। जिसे हम अपने तई स्वयं स्पष्ट समझकर अपने को बड़ा होशियारचंद मान बैठते हैं। उससे स्वार्थ साधनाओं की लीलाओं का महामायाजाल फैल जाता है। किंतु कभी-कभी उन पर नई दृष्टि डालने की आवश्यकता भी महसूस होती है। ऐसी ही एक संकल्पना है, स्वांतः सुखाय ! की । तुलसीदास ने लिखा है- “स्वांतः सुखाय तुलसी रघुनाथ गाथा ।”स्वान्तः सुखाय अंतरात्मा का जंतर- मंतर और असीम वैभव लोक है । आत्मा का कल्पना प्रवाह भी है । जो उसे नियंत्रित करने में सक्षम है और वही उसे ठीक से निबाह सकता है । जाहिर है कि हमारा हर काम पहले अपने सुख के लिए ही होता है और इस परिधि से बाहर निकलकर वह परहित की यात्रायें भी करता है ।

मैं समझता हूं कि स्वांत: सुखाय की सबकी धारणाएं और नज़रें भी भिन्न- भिन्न होती है । स्वान्तः सुखाय की भावना जब उदात्त होती है तो सामान्यजन उसे उसके अनंत विस्तार में देखता समझता है । और जन कल्याण की भावना का उदात्त विकास भी होता है ।अन्यथा ढूंढते रह जाओगे । वह छंछूदर के सिर में चमेली का तेल भी हो जाया करती है । यूँ मूल्य और मूल्यों की चीख चिल्लाहट जारी है लेकिन सबसे बड़े महामाया बाज़ार के मूल्य हो गए हैं. जिसके सामने लोग पसर – पसर जाते हैं या औंधे मुँह गिर जाया करते हैं. स्वार्थसिद्धि की लीला में एम.एल.ए. और सांसद गिर-गिरकर भी मूल्य-मूल्य की बातें करते हैं और समूची दुनिया को झुठलाते हैं । दोगलापन केवल राजनीति भर में नहीं है। समूची सामाजिक – सांस्कृतिक सच्चाइयों में क़ाबिज़ हो गया है। मंच पर कुछ और और व्यवहार में कुछ और।
सर्वप्रथम हमारा हर काम स्वांतः सुखाय ही होता है। चाहे वह लेखन हो या कोई कलात्मक अभिव्यक्ति हो या संगीत, नृत्य या किसी तरह का काम हो । जब वह डूबकर किया जाता है तो उसमें निखार आता है। जो बौरे हैं और डूबने से डरते हैं उनका कहाँ ठौर ठिकाना होगा?यदि हर काम स्वांतः सुखाय की दृष्टि से किए जाएं तो उनमें हमारी आंतरिकता का समावेश होता है लेकिन जो काम जबरिया कराए जाते हैं वह एक तरह के निबटान की भांति ही होते हैं। मैंने भोजन बनाने वाले लोगों को देखा है वे स्त्री हों या पुरुष ऐसा व्यंजन रच देते हैं कि उसके स्वाद का ठीक-ठीक बखान भी नहीं किया जा सकता । लोगों की आत्मा तक तृप्त हो जाती है.वे उस काम को पूजा अर्चना की तरह करते हैं । यह स्वांतः सुखाय का ही इलाका है। जब कोई काम डूबकर किया जाता है तो वह स्वयं को तो अच्छा लगता ही है बल्कि वह दूसरों को भी प्रभावित और आह्लादित करता है। वह काम भले ही व्यावसायिक हो या नौकरी के लिए ही क्यों न किया गया हो । कालांतर में आपका स्वांतः सुखाय बहुजन हिताय भी बनता है और बेहतर से बेहतर भी हो सकता है। इसमें हमारा सूक्ष्म अवलोकन भी शामिल है और हमारा ख़ास नज़रिया भी । जीवन भरा-पूरा हो या केवल उसकी असलियत प्रोफ़ाइल तक सीमित हो, इसको आब्जर्ब भी किया जाना चाहिए ।
क्या हम स्वांतः सुखाय के ठहाके लगाने में सुख मानें । इस दौर की फ़िज़ा यह है कि हमारा जीवन प्रशंसा के खोखले दायरों में आ गया है । भले ही होने जैसा कुछ न हो जो हो रहा हो वह एकदम विपरीत ही क्यों न हो । हम स्वांतः सुखाय की नदी में उतरकर खुश हो सकते हैं । हम कहने में कुछ हैं और करने में कुछ और हैं । हमारे जीवन में अनंत दुःख हैं लेकिन हम हर हाल में स्वांतः सुखाय में डुबकी लगाना चाहते हैं । स्वांतः सुखाय का एक जज़्बा होता है । हम कभी-कभी सुखी-दुःखी होते हैं और कभी-कभी दुःखी-सुखी होते हैं । स्वांतः सुखाय की गेंद आकाश मंडल के पार ले जाना चाहते हैं । अचानक विनय दुबे की कविता की कुछ पंक्तियां घुमड़ आईं – “मैं जब खुश होता हूँ/ तो पंजाब मेल हो जाता हूँ /और दनदनाते हुए गुजर जाता हूँ दिल्ली से/ मैं जब खुश होता हूँ/तो गंगा का पाट हो जाता हूँ बारिश में/ और खबर बन जाता हूँ इटारसी में/”
कुछ लोग कहीं भी सुख प्राप्त कर लिया करते हैं। हमारे किसान खेतों में बिना किसी बिछौने के कितने आराम से गहरी नींद सो लेते हैं । उनके पास उनके द्वारा उगाई हुई आश्वस्ति होती है । कुछ तो ऐसे हैं जो गुलामी में भी आज़ादी जैसा महसूस कर लिया करते हैं। तमाम तरह की दिक्कतों में भी समारोह का मज़ा उठा लेते हैं । उनके लिए महंगाई, बेरोज़गारी, अंधकार कुछ नहीं होगा । वे वहाँ भी स्वांतः सुखाय की दुनिया सजा लेंगे । गुलामी उनके लिए दुःख का कारण नहीं है। रोज़-रोज़ मृत्यु की परिस्थिति में हैं लेकिन स्वांतः सुखाय के जादू में हैं। वे दुःख, अवसाद और अभिव्यक्ति विहीन हैं। वे भांति-भांति के नरकों में हैं लेकिन स्वांतः सुखाय में ही जीवित होने का भ्रम पाले बैठे हैं ।
स्वांतः सुखाय के संसार का वैभव तीन लोक चौदह भुवन तक है। उसकी उड़ानों का कोई एरिया घोषित नहीं किया जा सकता। स्वांतः सुखाय सबके लिए अपनी तरह के रकबे बनाता है। अपनी तरह के आनंद देता है । अपनी ही तरह से दनदनाता है और न जाने कहाँ -कहाँ कूदता- फांदता है। यह किसी-किसी के लिए लागी लगन का मामला भी हो जाता है । जाहिर है कि स्वान्तः सुखाय के अर्थ को हम न छेंक सकते और न उसकी सीमा का कोई निर्धारण कर सकते। खुले हुए विस्तृत आकाश मण्डल से भी बड़ा उसका क्षेत्र है । वह एक विशेष अर्थ में अकल्पनीय है। और संभावनाओं का साक्ष्य भी बन सकता है.
-सेवाराम त्रिपाठी

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