अपने-पराये \ कहानी - rashtrmat.com

अपने-पराये \ कहानी

-देवी नागरानी की यह कहानी अपने-पराये ,रिश्ते समय, संवाद और विश्वास माँगते हैं। जहाँ ये तीनों कम पड़ जाते हैं, वहाँ अकेलापन गलत फैसलों को जन्म देता है। लेकिन यदि प्रेम सच्चा हो, तो क्षमा और त्याग उस रिश्ते को दूसरा जीवन भी दे सकते हैं।”

                       अपने-पराये \ कहानी

रजनी आज अपने आप को तन्हा और बेबस महसूस कर रही थी। बेचैनियों की छटपटाहट ने उसका सारा सुख चैन छीन लिया था। एक दिन अचानक बेहिसाब दर्द की अंगड़ाइयों ने उसे इतना मजबूर किया कि उसे हॉस्पिटल में आकर खुद को नर्स और डॉक्टरों के हवाले कर दिया। नीम बेहोशी की हालत में वह स्ट्रेचर पर निढाल, निहायत कमज़ोरी की हालत में लेटी रही। तुरंत ही उसे चेकअप रूम में ले जाया गया। कुछ ही पल में डॉक्टर ने आकर उसकी नब्ज़ थामी टटोलते हुए निहायत ही धीरे से उसका हाथ पलंग पर रखा। स्टेथेस्कोपे से उसकी छाती को जाँचते हुए ‘गहरी सांस लीजिये’ कहकर उसकी जांच की। न जाने क्या था उसकी आवाज़ में जो अनायास ही रजनी ने आँखें खोलने का प्रयास किया और जब अधखुली आँखों से उपचार करते हुए डॉक्टर के चेहरे पर उसकी नज़र पड़ी तो निहायत ही रूठी हुई मुस्कान उसके चेहरे पर उभरी। दर्द को सहने की कोशिश करते हुए उसने गौर से डॉक्टर के चेहरे को देखते हुए अत्यंत धीमी आवाज़ में कहा डॉ. आनंद तुम—हां रजनी मैं आनंद- तुम्हें इस हालत में देखकर हैरान भी हूँ– और खुश भी हूँ–कि तुम सही जगह पर इलाज के लिए लाई गई हो। अब तुम एक शब्द भी नहींकहोगी हमें अपना अपना काम करने दो। कहते हुए डॉक्टर ने उसके हाथ को हल्के से दबाते हुए सहलाया।

हिदायत अनुसार खून जांच के लिए भेजा गया कुछ– भी लिए गए।अब उनकी रिपोर्ट का इंतज़ार था। डॉक्टर आनंद की तजुर्बेकार नज़र ने रजनी के मर्ज़ और उसकी वेदना को अच्छी तरह समझ लिया था, फिर भी रिपोर्ट आने तक कुछ कहना मुश्किल था-

डॉक्टर आनंद को बीस साल पहले की रजनी याद आ गई जो रजनीगंधा के फूल की तरह महकती थी, खिलखिलाती थी और हमेशा एक भवरों के हुजूम के बीच घिरी रहती। हर कोई उसकी हाँ में हाँ मिलाने को तत्पर रहता ऐसे जैसे वहकोई क्लियोपैट्रा हो और वे सभी उसके शायक। क़ादर ने रजनी को बनाया भी इतना सुंदर था कि उसे एक बार देखने वाला उसे बार-बार देखने की चाह मन में पाल लेता। वह थी भी ऐसी जैसे किसी शायर के लफ़्ज़ों में तराशी हुई एक मुमताज़ ग़ज़ल। बेपनाह सुख सुविधाओं के बीच पली बड़ी रजनी, रईस घराने की इकलौती औलाद शादी करके रणजीत सोढ़ा की पत्नी बनकर जब अपने ससुराल आई तो दरवाज़े पर आरती लिए उसे सास मिली, जो बहू का स्वागत करते हुए उसकी बालाएँ लेती रही, दुआएं देती रही। अपने बेटे का घर आबाद होने की खुशी में कई दिन महल नुमा हवेली में जश्न मनाए गए गरीबों में बेहिसाब दौलत बांटी गई। ऐशो आराम की ज़िंदगी उसे यहाँ भी मयस्सर हुई। घर में नौकर चाकर हर सुविधा का सामान मिला। पति ‘रणजीत’ मिलिटरी में कैप्टन थे और कुछ सख्त क़ायदे-कानून की तहत ज़िंदगी बसर करने के आदी थे। घर में भी वे निहायत संजीदा रहते, जब कभी छुट्टियों में घर आते, बड़ी ही सादगी से अमन-चैन की ज़िंदगी बिताते वह भी शासन में। ज़्यादा शोर शराबा उन्हें कभी रास नहीं आया।

शादी के लिए भी उन्हें एक माह की छुट्टी मिली थी। रीति-रस्मों और जश्ने महफ़िलों में हंसी-खुशी से तीन हफ़्ते गुज़र गए और अब वापस ड्यूटि पर लौट जाने की तैयारी शुरू होने लगी।

रजनी बेटे ज़रा ये मट्ठियाँ तो बक्से में पैक कर देना, और हाँ वह मोठ भी अलग से बांध कर रणजीत के बैग में डाल दो… इस लड़के तो सिर्फ मिलिटरी के कायदे कानून समझ आते हैं, परिवार के लिए तो मन में जैसे मोह ही नहीं रहा !कहते हुए उसकी सास अपने दुलारे के लिए खाने की चीज़ें बनवाने में लगी रही।

मौका देखकर रजनी रोनी सी सूरत लिए, उसके साथ जाने की ज़िद पर अड़ी हुई थी। रणजीत उसे समझाते-समझाते थक गया कि वहाँ मिलिट्री कॅम्पस में औरतों के रहने की इजाज़त नहीं। मिलिट्री वाले सख्त तरह की ज़िंदगी बसर करते हैं। वहाँ कभी उन्हें ट्रेनिंग लेनी भी पड़ती है और देनी भी पड़ती है। तुम वहाँ कैसे बसर कर पाओगी फिर भी रजनी अड़ गई और साथ जाने कि ज़िद करने लगी। और कोई रास्ता न दिखा तो रणजीत ने हर हफ़्ते आने का वादा करते हुए रजनी से विदा ली और माँ के आशीर्वाद के रूप में उनके हाथों से बनी हुई खाने की चीज़ें।

ज़िंदगी अपनी रफ़्तार से चलती रही, रणजीत हर हफ़्ते आता और एक दिन रहकर चला जाता। फिर धीरे-धीरे आने-जाने के फ़ासले में इज़ाफ़ा हुआ। कभी वह महीने में दो बार तो कभी दो महीने में एक बार आने लगा। जब भी वह आता माँ उसे समझाती- तुम रजनी को वक़्त नहीं देते, आते हो तो एक दो दिन रहकर लौट जाते हो और फिर वादे करके चले जाते हो। उसका भी तुम्हारे सिवा घर में मन नहीं लगता। लगेगा भी कैसे परिवार में समृद्धि हो तो जीवन में रस आए उजाले जगमगाए।“ मगर रणजीत छुट्टियों में एक महीने के लिए आने का वादा करके चला गया। इस तरह कुछ बढ़ती हुई नीरसता में अब रजनी के कदम डगमगाने लगे। वह घर बैठे ऊब जाती तो सास को पिता के घर जाने का कहकर अपने दोस्तों से जा मिलती, शामें क्लब में बिताती। धीरे धीरे वह शराब भी पीने लगी और रात देर से घर चली आती। इस तरह और दो वर्ष बीत गए। तीसरे वर्ष भी सूने आँगन में किसी चहल-पहल का कोई आसार नज़र नहीं आया। माँ भी पोते-पोती के इंतज़ार में मुरझा सी गई। कभी बहू तो सहलाती तो कभी बेटे को समझाती। रजनी साथ चाहती, पर रणजीत साथ निभा नहीं पाता ! उसकी सख्त नौकरी उसे इजाजत नहीं देती।नौकरी से समय नहीं निकाल पाते तो मुझे वहीं ले चलो–अब मैं आपके बिना यहाँ अकेली नहीं रहूँगी।“ऐसे में माँ का क्या होगा, वह भी तो अकेली हमारे बिना नहीं रह पाएगी रणजीत समाधान में सुविधाएं ढूँढने लगा।

“मैं आपके बिना यहाँ अब एक दिन नहीं रहूँगी, अपने पिता के घर जाकर रहूँगी ।

आप तय कर लें कि आपको अपनी नौकरी प्यारी है या माँ, या मैं– अपनाअंतिम निर्णय सुनाते हुए रजनी ने आपने कुछ कपड़े और ज़रूरी सामान बांधकर जाने की तैयारी कर ली। रणजीत उसे समझा -समझा कर थक गया पर नारी हठ के सामने उसकी एक न चली। आखिर दोनों अपनी अपनी चुनी हुई दिशाओं के लिए निकल पड़े और पीछे रह गई अकेली माँ और घर की सार सँभाल करने वाली पुरानी दो करनियाँ। बस शादी के समय ली हुई सारी कसमें कागज़ी बनकर रह गई। सात साल बीते थे पर घर आँगन सूना का सूना ही रहा। रजनी के जाने के बाद तो वह और उदास और तन्हा हो गई। बस उम्र का सफर तय करते हुए ढलती उम्र में पोते के सुख न देखने का दुख सीने में लिए इस संसार से चल बसी।

धीरे धीरे रजनी और रणजीत भी जैसे नाम मात्र को पति-पत्नी रह गए उनकी राहें अलग अलग हो गयी। रणजीत अपनी मिलिट्री की ड्यूटि निभाते-निभाते घर से और रजनी से बेरुख होता गया। रजनी भी उसकी बेरुखी के ज़हर का जाम पीती रही। फिर वक़्त ने करवट कुछ इस तरह बदली कि रजनी उस ज़हर के एवज़ शराब पीने लगी और सिगरेट के नशे में मदहोश रहने लगी। धन दौलत की चकाचौंध में मुफ़्त में खाने पीने वालों की संख्या बढ़ने लगी। जहां मुफ्त में पीने के लिए मय की मस्ती मिले, बिन चेष्ठा के खाने को मिले, जहां जलवेदार महफिल में रजनी जैसी हसीन शम्अ हो, वहाँ चरागों पर मंडराने वाले कुछ नाम के रिश्तेदार, कुछ दोस्त और उनकी पत्नियाँ, रजनी के आगे पीछे मँडराते उसके गुण-गान एवं वाह वाह में मस्त रहते।

ऐसी ही एक रंगीन महफिल में डॉ. आनंद उससे पहली बार मिला। उसे देखते ही उसके सौंदर्य और अदायगी पर आकर्षित हुआ। कुछ कशिश थी जो दोनों एक दूसरे की ओर आकर्षित हुए बिना नहीं रह पाये। उन दिनों आनंद डॉक्टरी के आखिरी साल में पढ़ रहा था। दूरंदेशी व सूझबूझ उनकी शख्सियत की ख़ासियत थी। वह जो भी करता सोच समझकर। जब उसे लगने लगा कि रजनी का झुकाव उसकी ओर कुछ अधिक हुआ जा रहा था तो वह पीछे हट गया।

रजनी की शादी-शुद्दा ज़िंदगी के बारे में उसने जो अफवाहें सुनी उनकी तह तक जाने के बाद उसने अपना रास्ता बदल लिया। उसके सामने अपनी ज़िंदगी का मक़सद था। वह इल्म का पुजारी था दौलत का नहीं। हुस्न का पुजारी था पर दीवाना नहीं! चुनने को तो उसने अपनी राह चुनी पर रजनी की याद को वह कभी भी दिल से निकाल नहीं पाया था। और आज रजनी उसके सामने निर्बल निसहाय तन्हा मरीज़ के रूप में पड़ी थी। भावनाओं का बवंडर भीतर उमड़ रहा था और बाहर–डॉक्टर मरीज़ की रिपोर्ट आ गई है कहते हुए नर्स ने लाई हुई रिपोर्ट उनके हाथ में दे दी। ख़यालों की दुनिया से बाहर आते ही डॉक्टर आनंद रिपोर्ट्स कोलेकर अपने कमरे में चले गए। जल्दी ही स्लाइड पर रखे और ध्यान से देखने लगे। देखते-देखते गहरी सोच में डूब से गए। जो नाज़नीन अपनी नज़रों के

तीर चलाकर महफिल में मर्दों को घायल किया करती थी, आज वही नितांत अकेली, कुछ बेसुध सी, सर्वथा घायल थकी-हारी सी हॉस्पिटल के बेड पर पड़ी है। कोई अपना उससे मिलने नहीं आया और न ही उन अपनों के हुजूम में से कोई उसे देखने आया. ये वही अपने थे जो सदा उसके सुख के साथी बनकर उसके आस-पास मँडराते थे।

रिपोर्ट से यह तय था कि उसके दोनों गुर्दे बिलकुल बेकार हो चुके थे । तुरंत ही डायलिसिस का इंतेज़ाम करवाने के आदेश देते हुए डॉ आनंद अपने कमरे में गए। वे चिंताग्रस्त तो हुए पर एक डॉक्टर होने की हैसियत से उन्हें समस्या का समाधान ढूँढने की इलाज की पहल करनी थी। रजनी को ट्रांसप्लांट की ज़रूरत थी गुर्दे की ज़रूरत ऑपरेशन के लिए किसी अपने की मंजूरी की

ज़रूरत का अंदाज़ा था उन्हें समय के रहते यह काम सम्पन्न करना था छः महीने के भीतर रजनी के लिए एक गुर्दे का ट्रांसप्लांट निहायत ज़रूरी था जो किसी भी अवस्था में टाला नहीं जा सकता था। इधर रजनी को जैसे होश आया वह गहरी सोच में डूब गई। आज वह हॉस्पिटल में अकेली पड़ी है और उसके चाहने वाले, अपने कहलाने वाली भीड़ में से कोई एक भी उसे ढूँढता हुआ वहाँ नहीं आया कि रजनी तुम कैसी हो। सच्चाई सामने थी –सभी सुख के साथी उसके पैसों की मिठास के मलूक थे हमदर्द एक भी नहीं।

अगर होता तो- रजनी कैसी हो आवाज़ में अपनेपन की मिठास थी दर्द को राहत देने की सलाइयत थी…आवाज़ दूर से आती हुई पर किसी अपने की थी .बंद आँखें खोलकर रजनी ने अपने सामने फूलों का गुंचा लिए रणजीत को खड़े पाया। उसके चेहरे पर एक थकी हुई मुस्कान थी। लगा बिछड़ने के ग़म ने उसे वक़्त से पहले ही बदल दिया था। जब वह छुट्टित्यों में घर आता उसे अपनी पत्नी और बिना माँ के अपना घर अपना नहीं लगता। ऐसा भी उसे महसूस होने लगा कि रजनी को उसके आने और जाने से कोई फ़र्क नहीं पड़ता। पहले वह तीन-तीन माह में आया करता था फिर छः महीने में, और फिर साल-साल। कई साल यूं ही गुज़रते गए रिश्तों के आईने पर अलगाव की धूल जमने लगी। रजनी अपने चाहने वालों के हुजूम में व्यस्त रहती और रणजीत अपने मन में दर्द का धुआँ लिए ज़िंदगी से दूर होता गया…होता गया ग्रेड में प्रमोशन मिला अख़बार की सुर्खियों में खबर पढ़कर रजनी ने रणजीत को बधाई का तार भेज दिया-एक रस्म की अदाईगी हो गईबस–रजनी का उसके साथ शायद इतना ही नाता रह गया था-कागज़ी। देखते हुए महसूस करते हुए रणजीत ने खुद को अपने काम में व्यस्त रखते हुए घर से लगभग नाता तोड़ ही दिया था….। घर भी कैसा? जहां न माँ रही, न पत्नी, न बच्चे…सिर्फ ईंट गारे की दीवारें थीं, जो उसके लिए बेमतलब की हो गईं।

और आज डॉक्टर आनंद का तार पाकर वह अपने आप को रोक न पाया,बस आ गया। रजनी के सामने खड़े होकर उसे बुला रहा है, अपनी ज़िंदगी को आवाज़ दे रहा है !रजनी की आँखें जब उठीं तो वे आंसुओं से तर थीं और फूल सा चेहरा उनसे नहाया हुआ था। रणजीत ने आगे बढ़कर अपने हाथों से उसके कोमल गालों से वे शबनमी बूंदें समेट लीं। स्नेह भरा छुहाव पाकर रजनी जैसे अपना सारा दुख भूल गई। मतलबी गैरों की भीड़ से, अपना एक, जो बिना किसी स्वार्थ के रिश्तों की मर्यादा का निर्वाह करने के लिए समय से पहले उसके पास है, उसके साथ है वह है उसका पति रणजीत। उसे देख कर रजनी के चेहरे पर एक ताज़गी छा गई।उसने रणजीत का हाथ अपने हाथों में लेकर उसे चूमा, और अपनी आँखों पर रख दिया- बीते दिनों के गिले-शिकवे, सभी स्नेह की आंच में पिघल गए!

”अच्छा हुआ डॉक्टर आनंद ने मुझे तार भेजकर तुम्हारी तबीयत के बारे में विस्तार से सब कुछ बताया और यहाँ आने की ताक़ीद की। बस फिर तो मुझसे रहा न गया…! अब कैसा लग रहा है रजनी?” रणजीत ने स्नेह से उसके गालों पर हाथ फेरते हुए कहा।

“क्यों क्या हुआ है मुझे? क्या कोई जटिल बीमारी है …. ?” अब रजनी ने अपनी उत्सुकता जताई। वह जानना चाहती थी कि उसे ऐसा क्या हुआ है, जो डॉक्टर आनंद के कहने से वह अपने काम से छुट्टी लेकर तुरंत यहाँ आ पहुंचा है।“कोई चिंता की या घबराने की बात नहीं, बस जो ज़रूरी है वह इलाज होगा, और फिर तुम बिलकुल पहले जैसी ठीक हो जाओगी।“ रणजीत ने उसे सान्त्वना देते हुए कहा।“कुछ बताओगे भी कि आख़िर मुझे हुआ क्या है….?”

“रजनी….तुम ……” रणजीत कुछ कहे उससे पहले डॉ. आनंद ने कमरे में क़दम रखा।“अरे रणजीत तुमने रजनी को बताया नहीं उसे क्या हुआ है…. और उसके लिए क्या सावधानी बरतनी है….?” डॉ.आनंद ने मरीज़ को मर्ज़ से आगाह करने के विचार से कहा।“नहीं अभी तक नहीं !….आप ही…..! कहकर रणजीत कुछ संजीदा हो गया।

“रजनी कल तुम्हारे इलाज की शुरुवात का पहला दिन है, और कुछ घंटे यहाँ आराम के बाद मैं तुम्हें घर जाने की इजाज़त दे दूँगा… । क्यों ठीक है न?”

“हाँ, ठीक है, पर मुझे….!” वह डॉक्टर आनंद की ओर और फिर रणजीत की ओर बारी- बारी सवाली निगाहों से देखने लगी।

“रजनी डॉक्टर हमें घर जाने की अनुमति देंगे तो हम…घर …!”

“घर…” रजनी ने जैसे घर की परिभाषा ही भुला दी थी। अब डॉ. आनंद और रणजीत के मुंह से घर जाने की बात पर उसे आश्चर्यजनक रूप से हैरानी भी हुई और खुशी भी…!

“हाँ, घर। पर एक शर्त पर, कि तुम अब कोई भी सवाल नहीं करोगी। बस चुपचाप वही करोगी जो कहा जायेगा।“ डॉ. आनंद ने बात बनाने की कोशिश की।

“हाँ, यही ठीक है रजनी, अब तुम्हारी कोई भी मनमानी नहीं चलेगी। जो कहा जाए वही करो…good girl…!” रणजीत ने प्यार से उसकी ओर देखते हुए कहा। और फिर डॉक्टर के ओर देखते हुए कहा-“ डॉक्टर, यह घर जाने की बहुत अच्छी ख़बर सुनाई। मैंने अभी-अभी अपने हैडक्वार्टर फोन करके दो महीने की छुट्टी मंजूर करा ली है। मैं भी घर में रहकर रजनी के साथ कुछ आराम करना चाहता हूँ, उसके साथ बीमार पड़ना चाहता हूँ, उसके साथ इलाज कराना चाहता हूँ। जो वह करती है, वही सब कुछ करना चाहता हूँ…! बहुत समय हुआ है कभी ऐसा साथ ही नहीं मिला है” कहते हुए रणजीत बच्चे की तरह खिलखिलाकर हंस पड़ा।

“यह तो बहुत अच्छी ख़बर है, मुझे तुमसे इस सिलसिले में कुछ ज़रूरी बातें करनी है…, जब तुम बाहर चलोगे तो बात करेंगे। अब रजनी को आराम करने दो!

तुम मेरे साथ आओ।” कहते हुए डॉक्टर कमरे से बाहर हो गए, उनके पीछे रणजीत साथ हो लिया। डॉक्टर आनंद ने तकनीक की रोशनी में रणजीत को समझाते हुए बताया था कि एक गुर्दे पर भी इंसान अच्छी स्वस्थ ज़िंदगी जी सकता है….। फैसला उसे

करना था। बस फिर क्या था, रणजीत ने तय कर लिया। दूसरे दिन रणजीत ने अपने खून की जांच करवाने की सभी रस्में पूरी की। रणजीत की ज़िद थी कि अगर उसका सब कुछ रजनी से मैच हो जाता है तो वह अपना गुर्दा उसे देने में पहल करेगा। और भगवान को भी शायद यही मंजूर था।दो दिन बाद रजनी और रणजीत दोनों का ऑपरेशन होना था, पहले रंजीत का फिर रजनी का । एक का गुर्दा निकाल कर दूसरे के शरीर में स्थापित करने की पूरी तैयारी हो गई। रजनी को इस बात से वाक़िफ़ कराया गया। उसने आनाकानी की पर रणजीत ने उसकी एक न चलने दी।

‘रजनी तुमने बहुत मनमानी कर ली, अब मैं तय करूंगा, क्या करना है, कैसे करना है। अब तुम अकेली नहीं, मैं भी तुम्हारे साथ हूँ। तुम ठीक हो जाओ फिर हम घर चलकर साथ-साथ ज़िंदगी जियेंगे।“

“हाँ घर चलेंगे ज़रूर चलेंगे मैं भी अब घर जाना चाहती हूँ उखड़े शब्दों में रजनी ने अपनी मनोभावनाओं का उच्चराण किया।

चार दिनों के पश्चात डॉ. आनंद की निगरानी में दोनों को ऑपरेशन थिएटर में ले जाया गया। रणजीत का गुर्दा निकाल कर रजनी के शरीर में स्थानांतरण किया गया। चार पाँच घंटे में ऑपरेशन सफलता के साथ सम्पूर्ण हुआ। दो दिन हॉस्पिटल में चेकअप होता रहा, जब सब नॉर्मल सा लगने लगा तब डॉक्टर आनंद ने उन दोनों को डिस्चार्ज करने का फैसला किया। डिस्चार्ज के कागज़ रणजीत के हाथों में देते हुए डॉ. आनंद ने उसे कई बातों की हिदायतें लिखत में दीं, जिसमें खाने पीने की सख्त परहेज की ताकीद थी।

जब दोनों हॉस्पिटल से घर जाने के लिए कार में बैठ, तो डॉ. आनंद एक सुंदर फूलों का गुंचा लेकर उनके सामने आए, फूल रजनी को देते हुए उसे नवजीवन की शुभकामनाएँ दी और रंजीत के कंधे पर हल्के से थपथपाते हुए उसके फैसले की दाद दी, और विशेष बधाई देते हुए कहा-“ रणजीत, तुमने एक बिखरते हुए आशियाने को फिर से नए व मज़बूत तिनकों से बुना है। मेरी दिली तमन्ना है कि तुम दोनों इसे अपनी नई ज़िंदगी की शुरुवात मानकर आने वाले जीवन को सही माइनों में जियो।“

“बहुत बहुत धन्यवाद डॉक्टर, मुझे फिर से यह नया जीवन जीने के दिया है। यह आपकी सूजबूझ की वजह से हुआ है।‘ रणजीत ने कहा। अब रजनी से भी नहीं रहा गया, कह उठी: “ आनंद तुमने और रणजीत ने मुझे एक मौका दिया कि मैं भी अपनी गलतियों का सुधार कर पाऊँ।“

“रजनी, रणजीत किस्मत वाला है। बहुत ही सस्ता सौदा हुआ, एक गुर्दे के एवज़ उसे एक हसीन ज़िंदगी मिली है। और हाँ, तुम भी अब इस धरोहर को संभालकर रखना, यह मौका बार-बार नहीं मिलेगा…” कहते हुए डॉ. आनंद ने अपने दोनों हाथों से रजनी के हाथों का स्पर्श किया।

‘मैं अपनी गलतियाँ अब नहीं दोहराऊंगी, यह मेरा वादा है आपसे, रणजीत से और खुद से…!’ कहते ही उसकी आवाज़ कुछ भर्रा गई। रणजीत ने अपने हाथों का घेराव उसके गले में डालते हुए कहा….”मैं उसे ऐसा कुछ करने दूँ तब न? डॉक्टर अब यह मेरी ज़रूरत बन गई है, मैं इसे दुबारा खोना नहीं चाहता।“

“मेरी दुआएं तुम दोनों के साथ है, ऑल द बेस्ट!’ कहते हुए डॉ. अन्नद ने हाथ हिलाकर दोनों को अलविदा किया। नव जीवन

के नवनिर्माण हेतु दो प्यार भरे दिल अपनी मंज़िल की ओर बढ़ते गए ।

देवी नागरानी 

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