टूटा हुआ ताजमहल \ कहानी - rashtrmat.com

टूटा हुआ ताजमहल \ कहानी

रमेश कुमार ‘रिपु’ की कहानी कहती है कुछ प्रेम विवाह नहीं बनते,लेकिन जीवन की सबसे सच्ची स्मृति बन जाते हैं।कुछ प्रेम इसलिए अधूरे नहीं रह जाते कि उनमें प्रेम कम था, बल्कि इसलिए कि उन्हें समय पर सम्मान और स्वीकार नहीं मिला। यह केवल प्रेम-विछोह की कथा नहीं, संवाद, सम्मान और सामाजिक पूर्वाग्रहों की कीमत की कहानी है। यही इसे साधारण प्रेम कहानी से अलग बनाता है।

टूटा हुआ ताजमहल \ कहानी

सुबह की पहली घंटी के साथ मंदिर का प्रांगण खुल जाता था।

घंटी की आवाज़ के साथ गाँव की नींद खुलती और मंदिर का खुला प्रांगण धीरे-धीरे बच्चों से भर जाता। वहीं पुरानी चटाइयाँ बिछतीं,उसी चटाई के कोने पर हमेशा बैठता था समीर।टूटी स्लेटें रखी जातीं। मंदिर के पीछे नीम का पेड़ था,जिसकी छाया में  गाँव के मास्टरजी बिना फीस लिए बच्चों को पढ़ाया करते थे।

समीर की दुनिया छोटी थी। उसका कोई अपना नहीं था। माता-पिता कब चले गए,उसे ठीक से याद भी नहीं। गाँव के लोगों की दया,मंदिर का प्रसाद और पढ़ाई ही उसकी दुनिया थी। कपड़े हमेशा धुले तो होते,मगर पुराने। जूते अक्सर अलग-अलग जोड़ी के।लेकिन आँखों में एक अजीब चमक थी, जैसे उसे मालूम हो कि गरीबी स्थायी नहीं होती। गाँव वाले उसे “अच्छा लड़का” कहते थे, मगर कोई उसका इंतज़ार नहीं करता था।

मास्टरजी अक्सर कहते,“यह लड़का दूर जाएगा…बहुत दूर।”

धीरे-धीरे गाँव के संपन्न घरों के बच्चे भी वहाँ आने लगे। उन्हीं दिनों पहली बार मंदिर के बाहर सफेद कार रुकी।गाँव के सेठ की बेटी पूर्वी पहली बार वहाँ आई।उसने बैठने से पहले चटाई झाड़ी। समीर ने पहली बार महसूस किया कि उसके कपड़ों की धूल किसी और की दुनिया में दिखाई देती है। साफ सुथरी किताबें, सुगंधित रिबन और आत्मविश्वास से भरी चाल।

पहले दिन वह समीर से थोड़ा दूर बैठी। दूसरे दिन मास्टरजी ने सवाल पूछा।पूरी कक्षा चुप रही।समीर ने जवाब दिया।उसने देखा,मास्टरजी का कठिन सवाल पूरी कक्षा में सिर्फ समीर ने हल किया। तीसरे दिन उसने अपनी कॉपी आगे बढ़ाते हुए पूछा,“यह सवाल समझा दोगे?”

समीर ने सिर हिलाया।वह समझाता रहा, मगर पहली बार शब्दों से ज्यादा अपनी आवाज़ सुन रहा था।पूर्वी ने उसे देखा,ध्यान से,जैसे पहली बार किसी को समझने की कोशिश कर रही हो।समझाते-समझाते जब उसने सिर उठाया, पूर्वी मुस्कुरा रही थी।

यहीं से उनकी बातचीत शुरू हुई।एक दिन बारिश में मंदिर की छत टपकने लगी। बच्चे भाग गए, मगर समीर चटाइयाँ समेट रहा था। पूर्वी भी रुक गई।

“तुम रोज़ इतना काम क्यों करते हो?” उसने पूछा।

समीर हँसा,“मंदिर ने मुझे पढ़ाया है,थोड़ा लौटाना पड़ता है।”

पहली बार पूर्वी ने उसे अलग नज़र से देखा।गरीब लड़का नहीं, ज़िम्मेदार इंसान।उस दिन घर लौटकर उसने माँ से कहा,“मंदिर वाला लड़का बहुत होशियार है।”

माँ ने सहज पूछा,“किस घर का है?”

पूर्वी चुप हो गई।उसे पहली बार लगा,कुछ लोगों का कोई घर नहीं होता।

कॉलेज में दोनों फिर साथ हो गए। अब समीर कम बोलता था। अमीर लड़कों के बीच उसकी चुप्पी और गहरी हो जाती। बातें पढ़ाई से आगे बढ़ने लगी थीं। लाइब्रेरी में नोट्स शेयर करना,कैंटीन में जब सब महँगा खाना मँगाते, वह चाय लेकर बैठ जाता। पूर्वी भी चाय मँगाती।कैंटीन में एक चाय दो लोगों में बाँटना,परीक्षा के बाद लंबी सैर।

एक बार उसने पूछा,“तुम हमेशा चाय ही क्यों पीते हो?”

समीर मुस्कुराया,“आदत बदलने में पैसे लगते हैं।”

पूर्वी हँसी नहीं।उसे पहली बार उसके भीतर छिपी झिझक दिखी।

एक बार कॉलेज में वाद-विवाद प्रतियोगिता थी। विषय था, “सफलता जन्म से तय होती है या कर्म से।”

वाद-विवाद प्रतियोगिता में समीर ने कहा,“किसी का जन्म उसकी मंज़िल तय नहीं करता।गरीबी कोई पहचान नहीं, बस शुरुआत है।”

तालियाँ देर तक बजती रहीं।भीड़ में बैठी पूर्वी के भीतर कुछ बदल गया।उसे लगा,यह लड़का सिर्फ अच्छा नहीं, विश्वास करने लायक है।उस शाम उसने धीरे से पूछा,“अगर सब ठीक रहा तो तुम जिंदगी में क्या चाहते हो?”

समीर ने कहा,“अपना होना।”

उस दिन लौटते समय उसने धीमे से पूछा,“समीर तुम शादी कैसी लड़की से करोगे?”

समीर मुस्कुराया,“जो मेरे साथ सपने देखने से न डरे।”

पूर्वी कुछ देर चुप रही।शायद वह जवाब अपने लिए सुन रही थी। उनके बीच कभी प्रेम-प्रस्ताव नहीं हुआ।लेकिन प्रेम मौजूद था।

समीर का परीक्षा के दिन पूर्वी के लिए अतिरिक्त पेन लाना।,समीर ने उसके प्रोजेक्ट रात भर बनाकर दिए।

पूर्वी का उसके इंटरव्यू के लिए शर्ट खरीद देना और कहना,“दोस्त का गिफ्ट है।”

फोन पर रात-रात भर भविष्य की बातें करना। यह सब रोज की दिनचर्या में शामिल हो गया था। दोनों भविष्य की बातें करते, मगर एक-दूसरे का नाम उसमें नहीं लेते क्योंकि दोनों जानते थे,

नाम लेते ही सपना कठिन हो जाएगा।

जब समीर की नौकरी आगरा में लगी,वह खुश भी थी और उदास भी।बस स्टैंड पर विदा लेते समय पूर्वी ने कहा,“जरूरी है जाना? “रुक नहीं सकते?”

समीर ने पहली बार उसकी आँखों में देखा। धीरे से जवाब दिया,“रुक गया तो शायद आगे बढ़ने की हिम्मत नहीं होगी।”

पूर्वी बहुत कुछ कहना चाहती थी।पर शब्द गले में ही रह गए।

पूर्वी कहना चाहती थी,मेरे लिए रुक जाओ।लेकिन शब्द समाज से हार गए।

फोन कॉल्स शुरू हुए।रात की बातें लंबी होतीं, भविष्य छोटा। लेकिन एक शाम सब बदल गया।पूर्वी के पिता ने उसे समीर से बात करते देख लिया।घर का माहौल अचानक कठोर हो गया। घर में अचानक “इज़्ज़त,परिवार,स्टेटस” जैसे शब्द बढ़ गए। पिता ने फोन छीन लिया।

“बेटा,शादी है घर में। आ सको तो आ जाना,हाथ बँट जाएगा।”लाइन कट गई।

कुछ ही दिनों में रिश्ते आने लगे।पूर्वी ने विरोध करने की कोशिश की।लेकिन विरोध हमेशा आवाज़ नहीं बन पाता।कभी-कभी वह सिर्फ चुप्पी रह जाता है।शादी तय हो गई।शादी वाले दिन फोन पर उसकी आवाज़ काँप रही थी,“समीर..सब बहुत जल्दी हो गया।”

शादी के दिन रोशनी बहुत थी।लोगों की भीड़ में समीर चुपचाप खड़ा था। कुछ लोगों ने उसे काम करने वाला समझकर कुर्सियाँ उठाने को कहा। उसने मना नहीं किया।

आँगन रोशनी से भरा था।ढोल की आवाज़, रिश्तेदारों की हँसी और बारात आने की तैयारी।समीर भीड़ के किनारे खड़ा था।कुछ लोग उसे पहचानते नहीं थे। किसी ने ट्रे पकड़ाई, किसी ने कुर्सी सरकाने को कहा। उसने विरोध नहीं किया।तभी पूर्वी की नज़र उस पर पड़ी।क्षण भर के लिए सब धुँधला गया।वह सीधे उसकी ओर चली आई।

“तुम आ गए…”

समीर हल्का मुस्कुराया,“बुलाया था,कैसे नहीं आता।”

दोनों कुछ देर चुप रहे।उनके बीच हजारों अनकहे शब्द खड़े थे।समीर ने अपने बैग से निकाल कर एक पैकेट बढ़ाया।

“ये.. तुम्हारे लिए।”

पूर्वी ने खोला।संगमरमर का छोटा ताजमहल चमक उठा।उसकी आँखें भर आईं।

“समीर..अगर मैं कहूँ कि रुक जाओ..?”

समीर ने धीरे से कहा,“आज कहने से क्या बदल जाएगा पूर्वी?”

पूर्वी ने अचानक निर्णय लिया।

“रुको..कहीं मत जाना।”

वह मुड़ी और तेज कदमों से भीतर चली गई।कुछ ही क्षणों बाद वह अपने पिता को साथ लेकर लौटी।

सेठजी की आँखों में कठोरता और असहजता दोनों थीं।

“क्या बात है?” उन्होंने धीमे मगर भारी स्वर में पूछा।

पूर्वी ने पहली बार बिना झिझक कहा,“पिताजी,यह समीर है। वही..जिससे मैं बात करती थी।”

भीड़ का शोर दूर हो गया।समीर ने सम्मान से हाथ जोड़ दिए।कुछ पल सन्नाटा रहा।

फिर पिता बोले,“बेटा, अगर यह बात पहले बताई होती तो मैं सोचता। रिश्तेदारों से बात करता। समाज है,लोग हैं..सब देखना पड़ता है।”

उन्होंने गहरी साँस ली।“अब बहुत देर हो चुकी है। बारात दरवाज़े पर है।”

पूर्वी की आवाज़ काँपी, मगर टूटी नहीं,“देर आपने की है, पिताजी..मैंने नहीं।”

पिता चौंककर उसे देखने लगे।

“आपने मुझे कभी बताने का मौका ही नहीं दिया।आप अपने पुराने ख्यालों से बाहर नहीं आ पाए।”

उसने समीर की ओर देखा।

“आज भी जब आपको हमारे बारे में पता चला,आपने समीर को उस सम्मान से नहीं देखा जिसका वह हकदार है।”

भीड़ अब ध्यान से सुन रही थी।पूर्वी की आँखों में आँसू थे, मगर आवाज़ स्थिर।

“अगर आप इसे सिर्फ गरीब लड़का नहीं,एक इंसान की तरह देखते,तो मुझे दुख नहीं होता।”

पिता की आँखें झुक गईं।

पूर्वी आगे बोली,“आपने मेरे दोस्त की कद्र नहीं की,मेरी चाहत को समझने की कोशिश नहीं की।”

उसने हाथ में पकड़ा ताजमहल उठाया।

“देखिए…मेरा ताजमहल।”

हाथ काँपे।ताजमहल ज़मीन पर गिरा।संगमरमर के टुकड़े चारों ओर फैल गए।पूर्वी की आवाज़ धीमी हो गई,“मेरी चाहतों का ताजमहल,मेहमानों के सामने ही टूट गया।”

सन्नाटा।

ढोल अचानक रुक गया।समीर ने नीचे झुककर टूटे टुकड़ों को देखा.. फिर पूर्वी को।

उसने बस इतना बोला,“तुम खुश रहना।”

और मुड़ गया।

पिता ने उसे जाते हुए देखा।उनके चेहरे पर पहली बार पछतावे की हल्की रेखा उभरी।लेकिन सच यही था,बारात सचमुच दरवाज़े पर आ चुकी थी।समीर जा रहा था।मंदिर की घंटी कहीं दूर बज रही थी।समीर ने जेब में हाथ डाला।ताजमहल का एक छोटा-सा टूटा टुकड़ा अब भी उसके पास था।

रमेश कुमार ‘रिपु’

राममंदिर के पास,अवधपुरी कालोनी

भाटागांव,रायपुर छत्तीसगढ़, मो. 7974304532

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