स्त्रियों के संसार की बेपर आवाजें \ किताब समीक्षा - rashtrmat.com

स्त्रियों के संसार की बेपर आवाजें \ किताब समीक्षा

स्त्री विमर्श को केन्द्र में लिखी गयी बेपर आवाजें” संग्रह की कहानियां खास ढंग का तेवर लिये हुए है.संग्रह मे स्त्रियों के अनुभव का संसार वक्त की खिड़कियों से झांकती हुई दिखती है.

स्त्रियों के संसार की बेपर आवाजें किताब समीक्षा

डॉ.स्वाति तिवारी 

गोवर्धन यादव एक सधे हुए और सजग लेखक के रूप में सामने आते हैं.उनकी बेपर आवाजें की कहानियां जीवन के ऐसे प्रसंगों से उपजी हैं जो अपने लोगों के बीच अस्मिता जगाने का काम करती है. स्त्री विमर्श को केन्द्र में लिखी गयी इस संग्रह की कहानियां खास ढंग का तेवर लिये हुए है.संग्रह मे स्त्रियों के अनुभव का संसार वक्त की खिड़कियों से झांकती हुई दिखती है.

स्त्री विमर्श की दृष्टी से लिखा गया है बेपर आवाजें .नारी प्रधान 15  कहानियों के इस संग्रह को पढ़ते हुए हम माध्यम वर्गीय और निम्न मध्यमवर्गीय समाज के अलग अलग तरह के संघर्षों से बावास्ता होते हैं .ये कहानियाँ समाज के मध्यमवर्गीय संघर्षों  के केवल यथार्थ से ही रूबरू नहीं करवाती  बल्कि  एक नजरिया भी देती हैं उस यथार्थ को समझाने .परखने और विश्लेषित करने का ,जिसके चलते पाठक पढ़ते हुए परत दर  परत उस यथार्थ महसूस करने लगता हैं .

ये कहानियां  केवल कल्पना का लेखन ना होकर बहुत निकट से देखा  और अनुभूत सामाज का आइना लगती हैं. प्रेमचंद के ‘गोदान’ की धनिया की तरह ही, गोवर्धन यादव की धनिया भी संघर्ष, त्याग और जिजीविषा  की प्रतिमूर्ति है। धनिया एक ऐसे परिवार से ताल्लुक रखती है जो घोर आर्थिक तंगी और सामाजिक असमानता से जूझ रहा है।   कहानी में दिखाया गया है कि किस तरह ग्रामीण समाज का एक विशेष वर्ग (शोषक वर्ग) गरीब और सीधे-सादे लोगों की मजबूरी का फायदा उठाता है।

गोवर्धन यादव की ‘धनिया’ सिर्फ एक महिला की कहानी नहीं है, बल्कि यह हमारे समाज के उस हाशिए पर खड़े वर्ग की आवाज़ है जो हर रोज़ अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहा है। इस रचना में ग्रामीण जीवन के उस कड़वे सच को सामने रखा है, जिसे अक्सर मुख्यधारा की चकाचौंध में भुला दिया जाता है.

रेत के घरोंदे’  एक बेहद गहरी, सांकेतिक और यथार्थवादी कहानी है। यह कहानी मुख्य रूप से मानवीय रिश्तों की कशमकश, आधुनिक जीवन की असुरक्षा और बदलते सामाजिक मूल्यों के इर्द-गिर्द घूमती है।कहानी मध्यवर्गीय समाज की उन मजबूरियों और छटपटाहट को उजागर करती है, जहाँ इंसान अंदर से टूट रहा होता है, लेकिन बाहर से उसे सब कुछ सामान्य दिखाने का ढोंग करना पड़ता है। ‘रेत के घरोंदे’ ज़िंदगी की नश्वरता, रिश्तों की नाजुकता और इंसानी उम्मीदों के उतार-चढ़ाव को बयां करती संवेदनशील  कहानी हैं.

कहानी ‘भेड़िया’ सीधे तौर पर सामाजिक विसंगतियों, व्यवस्था के क्रूर चेहरे और इंसानी फितरत में छिपी दरिंदगी पर कड़ा प्रहार करती है।’भेड़िया’ कहानी आज के दौर में और भी प्रासंगिक हो जाती है। यह हमें सचेत करती है कि यदि समाज में नैतिक मूल्यों का पतन इसी तरह होता रहा, तो इंसानियत पूरी तरह इस ‘भेड़िया-संस्कृति’ की भेंट चढ़ जाएगी।

‘फांस’ कहानी  को बहुत ही संवेदना के साथ बुना हैं. ‘फांस’ उनकी एक अत्यंत मार्मिक, संवेदनशील और यथार्थवादी कहानी है। जहाँ कथाकार संजीव का ‘फांस’ उपन्यास विदर्भ के किसान संकट पर केंद्रित है, वहीं  गोवर्धन यादव की कहानी ‘फांस’ ग्रामीण और अर्ध-शहरी जीवन की विसंगतियों, आर्थिक कशमकश और आंतरिक मानवीय पीड़ा को बयां करती है।

इस संग्रह में लगभग सभी  कहानिया चाहे वह “रूपान्तर” हो  “पुष्पा दी” हो चाहे “चन्द्रमुखी” कहानियों की यह विशेषता है कि उनके पात्र हमारे आसपास के समाज से ही लिए गए साधारण लोग होते हैं,जो अपनी परिस्थितियों से जूझ रहे होते हैं। इन कहानियों को रोचक शैली में लिखा गया है.

सगुन चिरैया एक स्वयम्भू बाबा के आसपास रची गई है .रूपान्तर एक  स्त्री की कथा है जिसका पति बिना बताये चला जाता है और वह स्त्री अपनी बच्ची की परवरिश करती है औरअचानक बेटी के  विवाह पर पति  महाशय टपक आते हैं .तब वह स्त्री खुश नहीं हो पाती उसके संघर्ष विद्रोह कर देते  हैं .और स्त्री आक्रोशित हो जाती है उसका रूपान्तर  हो जाता हैं .एक स्त्री बिना सहारे समाज में अपना बच्चा पालती हैं पोस्ती हैं और कितने संघर्ष करती हैं और वही संघर्ष पति की वापसी पर क्रोध में बदल जाते हैं जो स्वाभाविक हैं  इस तरह सभी कहानिया पठनीय हैं .

‘बेपर आवाजें ‘ कहानी का मख्य पात्र एक एसा व्यक्ति है जिसका पालन पोषण गाँव में हुआ है और अब वह शहर में नौकरी कर रहा ही एक मेहनती ,निष्ठावान कर्मचारी लेकिन वह शहरी वातावरण में घूल नहीं पा रहा हैओर अपने गाँव की स्मृतियों में खोया रहता है. उसके मन में गाँव की समस्याए और शहरी सुविधाओं  की तुलना चलती रहती ही ,वह एक खाना बनानेवाली महिला को रखता है जो उसकी सहायता करती है वह उसे कामवाली बाई कहने में संकोच करता है .इस कहानी में उसके द्वन्द की पीड़ा बेपर आवाजें बन कर उसका पीछा करती है.

डॉ.स्वाति तिवारी -समीक्षक

लेखक-गोवर्धन यादव
प्रकाशक -ए.आर.पब्लिशिंग कंपनी दिल्ली
कीमत- 295 रुपए