छाड़-पत्र \ कहानी - rashtrmat.com

छाड़-पत्र \ कहानी

उर्मिला आचार्य की कहानी छाड़-पत्र बताती है कि समाज किसी स्त्री की शिक्षा, गरीबी या मानसिक स्थिति का निर्णय भले कर दे, लेकिन उसकी मातृत्व की गरिमा कभी समाप्त नहीं होती। अदालत रिश्ते तोड़ सकती है, समाज किसी को पागल या गंवार कह सकता है, लेकिन बेटी के मन में अपनी जन्मदात्री मां के लिए प्रेम और सम्मान अंततः जाग उठता है। यह कहानी मातृत्व, सामाजिक अन्याय, स्त्री-अस्मिता और रिश्तों की अधूरी तस्वीर को पूरा करने की कथा है।

     छाड़-पत्र \ कहानी

सुकन्या के पहुँचने के पहले ही मंडपाच्छादन की रस्में पूरी हो गई थीं । विवाह का घर था सुहागिनें मंगलध्वनि के बीच कलश को दीप दिखा रही थीं । जमुना दी गुड़  हल्दी की छोटी-छोटी भेली बनाए दुल्हन का आँचल पूर रही थी ।

पनिहारिनें  रसोई के लिए पानी भरके आलता की कटोरी सजाने में  व्यस्त  हो गई थीं  ।किशोरी कन्याएं फूलों की वेणी से वेदी का श्रृंगार करने बैठ गईं।

दहेज का विराट साम्राज्य आँगन में पसरा पड़ा था । दीप कलश मंगल गीत के बीच दहेज के दुर्गम -दुर्ग में खोट की सेंघ लगाने की कोशिश जारी थी।

ऐसे में सुकन्या को सामने पाकर जमुना दी ने जेठानी से पूछ ही लिया-“जीजी कौन है ये अँगरेजन?”

पाँव में आलता लगवाती जेठानी धवलर्णी,स्वर्णचम्पा सी सुकन्या को देखकर उसे अँकवार करने लपक पड़ी ।अरे मेरे भाई की बेटी है।”सुकन्या ने पास आकर सबको प्रणाम किया।विवाह का घर! संबलपुरी पाट साड़ी में उसकी छवि देखते ही बनती थी ।सुकन्या के चिबुक चूमती काकी ने  उसे पास बुलाकर बिठा लिया

“नाम बोल’’

काकू माँ – “सुकन्या हैभाई सुबोध की बेटी ।”

“कौन कुन्नी माँ”

‘‘अब कुन्नी माँ कहाँ रही? बड़ी हो गई है। सुकन्या नाम है इसका।”

“कुन्नी माँ हो या सुकन्या! जिसकी माँ नहीं उसकी ठाँव  नहीं ।”

बात अजीब सी थी ।

बुआ की  समवयस्क बेटी छाया ने भाँप लिया कि सुकन्या को इनकी बातें अच्छी नहीं  लगी । इसलिए उसने  सुकन्या का हाथ पकड़ा  और मनोहर वृक्ष के नीचे तख्त पर ला बिठा लिया ।

मनोहर वृक्ष -,मगरमस्त !

सुकन्या खीझ रही थी –

“बड़े असभ्य लोग हैं !नाम मेरा सुकन्या,घर मेरा बस्तर, माँ मेरी घर पर ,फिर माँ नहीं ,नाँव नहीं। गाँव नहीं, ठाँव नहीं ! क्या बकवास है !

वैसे भी थोड़ी देर पहले जनवासे में खड़े फुफाजी ने भी  कैसे बात  की थी? कैसे कहा था –

“कौन सी क्लास तक पढ़ लिया –

“जी एम.सी.ए.।”

“ओह !आखिर सुबोध ने तुम्हें पढ़ा लिखा कर इंसान बना ही दिया ।”

सुकन्या तब भी आहत हुई थी।

गाँव का परिवेश सरल होता है। यह खयाल कितना गलत था ?तभी तो पापा कह रहे थे-

“गाँव जाकर बोर हो जायेगी सुकन्या ।वैसे भी अब कितने दिन रहना है तुझे हमारे पास?”

“वही तो! थोड़ा  मिल आऊँ  न सबसे ।”

“तू इधर जाएगी उधर से  प्रभाकर चार दिन बाद आ जाएँगे ।”मम्मा चुप हो गई  थी ।

कितना चाहती हैं  मम्मा उसे ।

विचार के प्रवाह में प्रभाकर की याद  हो  आई सुकन्या को । पिछली बार मुंबई में शॉपिंग के दौरान मोबाइल पर प्रभाकर का मैसेज था ।

“रेस्ट इज ओके”

पर उसके बाद से प्रभाकर व्यस्त है ग्रीन कार्ड बनाने में ।जाने क्या पोजिशन है?

मगरमस्त फूलों  की मदमस्त  सुगंध में छाया और सुकन्या प्रभाकर की ही बातें कर रहीं  थीं।”तू कनाडा चली जायेगी और  मामा फिर अकेले हो जायेंगे।”

छाया ने जैसे सुकन्या की दुःखती रग पकड़ ली थी ।

“हाँ !मम्मा भी।”

“वो तो है ।”

“पापा की बात छोड़, मम्मा भी कितनी अच्छी हैं!”रुआंसी हो रही थी सुकन्या।

फिर इधर-उधर की ढेर सारी बातें ‘बतरस लालच लाल की, मुरली धरी लुकाय।’  बिहारी  के दोहे पर जाकर समाप्त  हुईं ।

हाई स्कूल में कभी एक साथ पढ़ा  था।दोनों  खिल- खिलाकर हँस रहीं थीं।सखियों  की हँसी, मीठी -मीठी गुदगुदाती सी।थोड़ा  संयत होकर सुकन्या  ने  अपने पर्स से चाँदी की दो  सुरमेदानी, मछली की आकृति  वाली जिसे वह  कज्जलपाती कहती थी,  निकाल कर  एक छाया को भेंट स्वरूप  दिया और एक पुरानी वाली अपने हाथ में रख लिया।

छाया ने देखा दोनों कज्जलपाती के पटल पर मैना का ही चित्र  है । एक समान।

“हाय  कितनी सुन्दर!”

” मेरे जाने के बाद भी इस मैना से बात करना छाया।

अच्छा तू  अभी भी इस मैना से बात करती है ?”छाया हँसने लगी ।

“मैना !वह तो अक्सर  मुझसे बात करती है। मेरी सच्ची  सहेली है ।जब भी  दुविधा  हो  ,बात कर लो इससे ।”

“अच्छा?”

पापा को मेरे विवाह की बड़ी चिंता थी। मुझे कोई  पसंद ही नहीं आता था। पर दहेज जुटाने और सुयोग्य वर ढूँढने  में माँ ने बड़ी भूमिका निभाई ।तब भी पिता आश्वस्त नहीं थे। मैंने ही ढाँढ़स बँधाया था।”

“पापा मैं लाचार नहीं हूँ । मेरी शक्ति है माँ की शिक्षा। और  पिता का प्यार।समय पड़ने पर यही मेरी तलवार  बनेगी।”

“पापा तब भी उदास ही थे। ”

“सच है !अकेली संतान माँ- बाप के लिए अंधे की लाठी होती है।”

सुकन्या की आंखें छलछला आईं ।

छायाऽऽऽ……

भीतर से कोई पुकार रहा था ।

छाया  तो उठकर चली गई पर सुकन्या पेड़ के नीचे कुछ देर और बैठी रही।

गाँव  की ठंडी हवा सुकून देने वाली।छाया के जाने के बाद अकेली बैठी सुकन्या ने कज्जलपाति की मैना से पूछा -“तू खुश है ना मैना ।”

जाने मैना क्या बोलती पर  मगरमस्त के फूल पहले ही  मुस्कराने लगे थे।

“पगली!”

सुकन्या की माँ के पास भी एक कज्जलपाति है। जो हर सुहागन को विवाह  वेदी पर देने की प्रथा चली आ रही  है ।उसके पटल पर मछली बनी हुई है ।

सुकन्या की मैना को  मछली से बात करने का मन नहीं करता था इसलिए सुकन्या अपनी  मम्मा से एक और कज्जलपाति बनवाने  की जिद किए बैठी थी।

उसमें  तोता हो !

एक में मैना तो दूसरे में तोता ।तोता -मैना ।

माँ ने हंस कर कहा,”बचपना छोड़ ।क्या करेगी उसका ?”पर सुकन्या को जिद पूरी करनी ही थी।

इस सोच के बीचसुकन्या की दुबारा  पुकार हो रही थी। वह भी उठकर  पिछवाड़े पहुँची, जहाँ मंडपाच्छादन के बाद सुहागिनें सूपे में  बड़ी सेंत रही थीं और बांस की चटाई पर कृष्ण -रासलीला की छवि उकेरने में  लगीं  थीं।

देखते ही देखते सप्तरंगी मयूर, कदंब के नीचे राधाकृष्ण की जुगल जोड़ी तैयार हो उठी थी।कदंब का पेड़  जैसे कह रहा था-“देखी है ऐसी कलाकारी !”

सच में किसी सधे चित्रकार ने  जैसे चित्रकारी की हो। शायद उससे भी  बेहतर।गुमनामी में  खोए ये कलाकार प्रकृति  के कितने निकट  हैं !यही तो महसूस करने आई है सुकन्या।

चतुष्कोण बेदी के  दीवारों  पर  कालिया जगन्नाथ की अतिशय भक्ति में किसी भक्त ने यह पंक्ति  भी लिख छोड़ी थी -कालिया कान्हू कुहुक जाणे,बाहरे देखई भीतरे हाणे

( काले कान्हा तुम्हारी मुस्कान इतनी मारक है कि मेरे अंतर्मन  को वह प्रेम में  घायल कर देती है ।)

ब्याह की दुल्हन ‘माया’ जब छोटी-छोटी रस्में पूरी कर भीतर जाने लगी तब सुकन्या भी पीछे हो ली ।

“थक गईं?”कमरे में पहुंचते ही सुकन्या ने माया से पूछ लिया।

“नहीं तो।”

फिर दोनों ही पलंग पर पसर गईं और भावी जीवन के गोपनीय प्रसंगों की पिटारी खोलने लगीं।बीच-बीच में कमरे की जासूसी करने छाया भी आ जाती थी।इस बीच  कमर सीधी करने के बहाने गदबदी काकी भी पलंग पर आ बैठती थीं ।

सुकन्या से दुनियादारी बतियाने के बाद  काकी ने एक और प्रश्न दाग दिया -“अच्छा बता, तुझे अपनी माँ  की याद आती है?”

काकी और करीब आ गई  थीं ।

“माँ–! वो सब तो घर पर हैं ।”

सुकन्या हैरान थी ।माया और छाया सकपका गईं।

हल्दी की गाँठ भी काँप उठी।

माया ने बात टालने के लिए  कहा,”क्या काकी !कहाँ की  पंचायत लगाए बैठी हो।”

पर काकी को कहाँ सुनना था।मौका मिला तो उसे ऐसे ही नहीं  गँवा सकती थीं न ।

“सुकन्या मैं तुझे जन्म देने वाली माँ की पूछ रही हूँ?

तुझे याद है कोलाब घाट? भैंसा झूड़ई नाला ?अरे मेरी गजामूंग सखी! तेरी माँ !”

जब तुझे रगड़-रगड़ कर गाती हुई नहलाती थी। याद है तुझे वह भजन?”

धीरे समीरे जमुना तीरे,बसती बने बनमाली

(यमुना  किनारे कृष्ण की बांसुरी  बज रही है। )

“कुछ याद नहीं ।”

“ओह!”

“वह हाड़ मांस की जीवित भावना यही आसपास के गाँव में ही है रानी ।“मिलेगी उससे?”

सुकन्या को लगा वह कोई अतल सागर में डूबी जा रही है ।कैसे निष्ठुर लोग हैं इस गाँव के !कितना स्नेह लेकर वह  मिलने आई थी सबसे और बदले में उसे क्या मिला ?

हाड़ मांस की जीवित भावना।

“छि! धिक्कार है! मां के  नाम पर कलंक!”

.”माँ नहीं, राक्षसी थी वो।

कितने स्नेही उसके पापा! क्या-क्या न झेला होगा उन्होंने!”

“मैं क्यूँ उसे याद रखूँ जो मेरे सुदर्शन,सुयोग्य पापा के योग्य नहीं थी।अनपढ़ !गवांर!”

“पर बेटी बचुवा तो जानते थे कि लड़की अनपढ़ है। गाँव की है ,फिर शादी..।”

“दादी ने करवाई होगी।”

“हाँ ! दहेज के लिए ।”तब तो मामा चुप थे ।”

“जानती है इसी वजह से अम्मा ,मामा से नाराज है।”

माया यह कह रही थी तो  सुकन्या की छाती में कील सी गड़ गई।यदि शादी का घर न होता तो वह तड़ से उसे एक तमाचा जड़ देती। उसकी इतनी हिम्मत अपने मामा का अपमान करे। नहीं वह बर्दाश्त नहीं कर सकती ।”ऊफ!बेकार ही आई वह।”

काकी आग लगाकर चली गईं।सुकन्या मुंह ढाँपे पड़ी रही।उसकी आंखों में मम्मा की छवि तैरने लगी।कभी तो माँ की ममता सौतेली नहीं रही है मैना!है ना!”

मैना चुप थी।उसे माँ की  कज्जलपाती की मछली अच्छी नहीं लगती थी।

“मैना! जन्म देने से कोई माँ नहीं हो जाती।माँ के लिए ममता चाहिए ।”इसी उधेड़बुन में सुकन्या को नींद आ गई पर नींद में भी मैना रात भर बोलती रही।उसे पता भी न चला कि खाना  खाने के लिए उसे कितना बुलावा आया था ।दूसरी सुबह सुकन्या की  आँखें तब खुलीं जब भोर के आँगन में सुनहरी किरणों की कलगी वाली मैना खेल रही थी ।

आज शाम माया की बारात थी ।कल वह विदा हो जायेगी साथ ही सुकन्या भी लौट जायेगी।

आज का दिन खाली था और दिन चढ़ते ही छाया,हल्दी कुंकुम का थाल सजाये आसपास के गाँव में रात्रि भोज का न्यौता देने चल पड़ी सुकन्या भी साथ चली।गाड़ी चला रहा था भाई अरुण। फागुन का महीना,फाग गीत और  बांसती बयार।सब कुछ भूलकर मस्त हो गई थी सुकन्या।गांव के मिट्टी की खुशबू परदेश में फिर कहाँ?

वेदी के सामने डंडारी नाच चल रहा था।

“ठीको-ठाको  डंडारी…।”

“कितना मोहक ये गाँव!”

आसपास के गाँवों,घरों में जाकर दोनों सखियों ने औरतों का ललाट हल्दी कुंमकुम से सजाया और भोज का न्यौता दिया ।

पुरुषों को न्यौता भाई ने पात्री में सुपाड़ी रखकर दिया ।

सुपाड़ी देना और लेना सम्मान की  बात होती है,ये आज सुकन्या ने भी समझा वरना रीति-रिवाज के बारे में उसे कुछ खास जानकारी नहीं थी ।इन न्यौता दारों को न्यौता देते देते  धूप सिर पर चढ़ आई थी ।

फागुनाई धूप-सिर चढ़कर बोलती है।बस ये आखिरी गाँव!

भाई आश्वस्त कर रहे  थे ।

धूल उड़ाती गाड़ी सुधापाल पहुँची। गाँव  के चौक -पुलिया में लिखा स्लोगन -“सुबह काम पर चलें शाम को पढ़ने चलें”ने हमारा स्वागत किया।

नीचे किसी ने एक और चुनाव का स्लोगन डाल दिया था ।

गाड़ी एक बड़े से गेट वाले घर के सामने खड़ी हो गई।घर के अधखुले कपाट से झाँकती एक अधेड़ औरत अजनबियों को सामने पाकर भीतर हो ली ।

ये लोग उसके पीछे थे ।चहारदीवारी से घिरे बड़े से आँगन के बीचों-बीच तुलसी चौरा पर कोणार्क मंदिर उकेरित था।

“वाह क्या कलाकार  हैं।” ये कहना चाह रही थी सुकन्या पर “और  ये  क्या—!”चौरा  के दोनों  कंधों पर एक में तोता और दूसरे में मैना चित्रित थे ।सच में जैसे बतियाते हुए से आमने -सामने।तोता-मैना को देख कर मन ही मन सुकन्या उल्लसित हो रही थी ।

आँगन में कुन्दकली महक रही थी और गेंदा शैवंती की डालियाँ सूख गई थीं ।

धान का विराट भंडार पसरा पड़ा था। लगता है अगहनी मिंजाई देर से शुरु हुई थी ।

“उधर से आइए ।” घर की सयानी महिला रास्ता बता रही थी ।भीतर जाती सुकन्या ने  पाया कि अधखुले कपाट से झाँकती नाटी दुबली सी काया पहचान तलाश रही है।हल्दी -कुमकुम का टीका और भोज का न्यौता दे दिया था छाया ने।

भाई बाहर ही बैठे थे।

“और ये कौन ?कहाँ  से?”

सुकन्या को देखकर घर की मुखिया ने जिज्ञासा प्रकट की ।

“अरे बस्तर  से ।”

घर की मुखिया चाय-पानी में  व्यस्त होने के कारण ठीक से सुन नहीं पाईं पर काफी देर से चुप बैठी अधेड़  उम्र की महिला एकाएक सक्रिय हो गई।

“अम्मा बस्तर से आए हैं। कुछ खातिर दारी करो।”

“जो आए बस्तर से, जिसे देखा, बस वही रट।चल भीतर ।”

मुखिया ने मीठी झिड़की लगाई  और जलपान की व्यवस्था कर पास आ बैठीं।

सुकन्या की आंखें भी जानना चाह रही थी कि कौन हैं ये लोग?रह -रह कर उसकी आँखें तुलसी चौंरा के तोता-मैना पर  अटक रहीं थीं।उसकी कज्जलपाति तोता- मैना।वाह बढ़िया है । एक से ।”

पर मुखिया छाया से कुछ बता रहीं  थीं,”क्या करूँ?बेटी पगला गई है।जहाँ बस्तर का नाम आया नहीं! बस एक रट-“अम्मा मेरे ससुराल से आए हैं ।कुछ खातिरदारी करो ।बस यही  रट ।”बस्तर !बस्तर का नाम आने पर सुकन्या  ने जानना चाहा कि कहाँ मेरिज हुई इनकी? किसके घर ?

पर छाया ने उसे रोकते हुए पहले ही पूछ लिया,” क्या इनकी तबीयत ठीक नहीं ?”अम्मा को बस छेड़ने की देर थी ।

“लगता है तैने पहचाना नहीं। मरी न सधवा है न विधवा। ”

“कितने चाव से ब्याह दिया था पर मिला क्या? छाड़पत्र! तलाक!

हमने तो सात पुश्तों में नहीं जाना ।बहुत हुआ तो आदमी नाराज होकर छोड़ देता है फिर लिवा ले जाता है ।”

“सात जन्मों का साथ क्या ऐसे ही छोड़ा जाता है ?

छाड़पत्र !तलाक! हमने तो कभी नहीं जाना।”

“मेरी बेटी पिंजरे में मैना सी थी ।जिसे बाहर उड़ना भी नहीं आता था राम-राम की रट लगाती ।संस्कारों के किस्से धुनती बचपन बीता था ।अचानक उसे हिस्से आया एक छाड़पत्र।

बंद मैना आकाश में उछाल दी गई । नाटी है,भद्दी है,गँवार,चोर है ।”सोने का पिंजरा गँवाकर मेरी मैना गाँव लौट आई।

तेरी अम्मा गवाह है कान्हू की बेटी ।”अनजाने ही सुकन्या की छठी इंन्द्रिय सजग हो गई।

छाया तल्लीनता में पूछ बैठी ।फिर …?

“फिर क्या ? अभागी ने एक  बेटी को जन्म दिया।बेटी के माँ -बाप हम भी थे। नाग रगड़ कर ससुराल छोड़ आए पर हाय रे विधाता!छै माह बीतते न बीतते मेरी बेटी बैरंग डाक की तरह लौटा दी गई ।साथ में उसकी बेटी भी नहीं।”

“टुकड़े में बँटी मेरी बेटी संतान- हंता का कलंक साथ लाई थी ।

अनपढ़, गँवार, राक्षसी! कोई भला अपनी ही संतान को पलंग के नीचे पटकनी देता है?”

. अम्मा सुबक रही थीं ।

सुकन्या को लगा,आईना उसकी ही छवि दिखला रही है।वह अनजाने ही सोचने लगी कि माना पापा ने दादी के बहकावे में आकर शादी कर भी ली और तलाक भी ले लिया पर..पर संतान तो अपनी ही है..नन्ही सी बच्ची को पलंग पर से पटकनी देना? आश्चर्य  ! बहुत बार सुना है ये किस्सा दादी से ।

“नहीं – नहीं! राक्षसी है ,माँ नहीं ।”है ना मैना !”

मुखिया की बात खतम नहीं हुई थी ।”बौराई सी बेटी को मैंने वैध, हकीम कराया सात घाट का पानी पिया।”दुख से बौराई है भौजी!”

“हकीम की बात मेरे अलावा कौन मानता भला? माँ थी न !”

मैंने लाख खबर भेजी, इसे टुकड़े में मत बाँटो समधन!ममता का ही भरम रख लो ”

“कोर्ट-कचहरी तो हमने कभी चढ़ी नहीं थी।दामाद सक्षम थे ।वकील थे।”

“पत्नी को पागल सिद्ध कर तलाक लेने में ज्यादा समय नहीं  लिया ।”

“अभागी को न पति मिला न बेटी। मिला तो छाड़पत्र ,तलाक!”

“मरी! क्या समझें छाड़पत्र क्या है ?आज भी पति के दीर्घायु होने के लिए वह वट सावित्री व्रत रखती है। हे सत्यवान ।”

“सास के गुजरने पर श्राद्ध कराने गई थी।पर अपने  ही संबंधों का श्राद्ध कराकर  लौट आई।सात जन्मों का संबंध।”।

“हमने जान लिया हमारे भाग फूट गए ।”बूढ़ी आँखें छलछला गईं ।

सुकन्या को काटो को तो खून नहीं!निःशब्द !

छाया सोच रही थी कि अशिक्षा समाज का कलंक है पर तलाक भी तो संस्कारों में शामिल नहीं है।पुरुष भले ही इसका फायदा उठा ले पर महिला तो  सदियों से पीड़ित है।

नहीं-नहीं पुरुष महिला दोनों के लिए तलाक एक शाप है ।

“मैना!”सुकन्या बौरा गई ।

किसकी बात हो रही है?

कौन है ये सपनों में लम्बे दाँत वाली, खून चूसती वो राक्षसी!नहीं-नहीं! बचपन की कहानियों में माँ की यही सौगात उसे मिली थी।पर ,नहीं-नहीं!फिर-फिर ये सामने नाटी दुबली अधेड़ काया! क्या!क्या उसकी..?नहीं-नहीं !उसकी आँखों में तो करुणा का समंदर है।वह सुबोध रथ की तलाक शुदा पत्नी हो सकती है पर खूनी माँ नहीं !पलंग  पर पटकने वाली..नहीं-नहीं–!

“बेटी तेरी ही उम्र की होगी अभागी की बेटी।”

बूढ़ी की बात सुनकर काँप उठी सुकन्या।छाया ने कसकर उसका हाथ पकड़ लिया।पल भर को सब थम गया ।छाया ने ही पहल की।

“देर हो गई चलें ?”

बौराई सी सुकन्या उसके साथ हो ली ।नाटी दुबली काया बाहर तक उन्हें छोड़ने आई । अधखुले कपाट से उसकी आँखे दूर तक दौड़ रहीं थीं ।किसकी प्रतीक्षा में है ये…?

सुकन्या के भीतर कोई आर्तनाद  कर रहा था ।थोड़ी दूर जाने के बाद सुकन्या ठहर गई ।

“क्या करना चाहती है तू?”

छाया की आवाज दूर से आ रही थी ।सुकन्या खुद नहीं जानती थी क्या करना चाहती है वह।क्या उसने पटकनी देने वाली उस स्त्री को क्षमा कर दिया है?क्या वह उसे घर ले जायेगी ?वह घर जहाँ से सप्ताह भर बाद अजनबी होने वाली है वह  या कि प्रभाकर उन्हें भी कनाडा ले जाएगा–।तलाक की जड़ें तोड़कर।पापा क्या उसे शाबासी देंगे! या कि सुकन्या घर जाकर कहेगी..पापा यू आर ग्रेट !

सुकन्या आपे में नहीं थी।छाया कुछ कह रही थी।

“सुकन्या सपने मत दिखा।

औरत  क्या है यह बताना समस्या का हल नहीं औरत की आत्मचेतना ही सबसे बड़ा हल है ।”

सुकन्या की समझ में कुछ नहीं आ रहा था वह चलते -चलते पलटी ।उसके पांव अपने आप आगे बढ़े..।सुकन्या के छूने से नाटी भद्दी दुबली काया काँप उठी ।

“माँ, मैं तेरी बेटी…।”

माँ ने जाने क्या समझा।आंखें  चमकी। धड़कते हृदय से कहा – “सुखी रहो बेटा।”दो कुलों की लाज रखना।सुकन्या  ने उफनते आँसुओं की धार से  देखा!क्या माँ के कंधों से

परम्पराओं का सलीब हट गया है–?तो फिर सुकन्या के कंधे किस भार से झुक गए !

झुकी आँखों से उसने तुलसी चौरा के कांधे को देखा एक में तोता एक में मैंना पर दोनों चुप। जड़वत! चित्र मात्र!अब किस मुँह से कज्जलपाति की मैना से वह बात कर सकेगी।

“सुकन्या”

“मैंना …”

.अरुण के गाड़ी चलाते ही धूल की आंधी भीतर-बाहर  फैल गई पर सुकन्या आपे में नहीं थी।वह सोच रही थी तोता-मैना की इस कला को उसे जीवित करना ही है ।वह अनगढ़ पत्थर ,पत्नी न सही माँ तो है ही ।

है न मैना।

उर्मिला आचार्य

ब्राह्मण पर जगदलपुर 494 001

बस्तर छत्तीसगढ़,मोबाइल नंबर 9575 665 624