पहाड़ के शब्द शिल्पी - rashtrmat.com

पहाड़ के शब्द शिल्पी

पहाड़ी पन्नों के नायकों को भुलाया नहीं जा सकता।लोक से शिखर तक उत्तराखंड के लेखकों ने अपनी कलम की कीर्ति दूर- दूर तक फैलाई है। हिमालय की गोद से निकले साहित्यकार सुमित्रानंद पंत की कृति बूढ़ा चांद हो या फिर मनोहर श्याम जोशी की कुरू कुरू स्वाहा अथवा मगलेश डबराल की लिखी किताब पहाड़ पर लालटेन,शमशेर बहादुर की किताब बात बोलेगी,लीलाघर जुगड़ी आग में तपे लोग, लिख कर लोगों के दिल में बस गए। देव भूमि के 18 साहित्य साधकों के बारे में खास बातें बता रहे हैं डाॅ चन्द्रशेखर तिवारी।

पहाड़ के शब्द शिल्पी\ विशेष लेख

डॉ. चन्द्रशेखर तिवारी

उत्तराखण्ड की पावन धरा केवल अपनी नैसर्गिक छटा के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी मेधा और वैचारिक प्रखरता के लिए भी वरेण्य है। हिमालय की इन कन्दराओं और ढलानों ने हिन्दी साहित्य के आकाश को वे दीप्त नक्षत्र दिये हैं, जिन्होंने न केवल भाषा को संस्कारित किया, बल्कि समाज को देखने की एक नई दृष्टि भी प्रदान की। प्रस्तुत आलेख उत्तराखण्ड के उन अठारह शब्द-शिल्पियों के अवदान को रेखांकित करता है, जिनकी लेखनी ‘पुरवाई’ की तरह शीतल भी है और समय की शिराओं में स्पन्दन पैदा करने वाली भी।

सुमित्रानन्दन पन्त (1900-1977) इस श्रृंखला के सर्वाधिक देदीप्यमान नक्षत्र हैं, जिनका जन्म कौसानी में हुआ। ‘प्रकृति के सुकुमार कवि’ के रूप में विख्यात पन्त जी को उनकी कालजयी कृतियों के लिए अनेक शीर्ष सम्मान प्राप्त हुए। उन्हें वर्ष 1960 में काव्य संग्रह ‘कला और बूढ़ा चाँद’ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार, वर्ष 1961 में सम्पूर्ण साहित्यिक अवदान हेतु भारत सरकार द्वारा पद्म भूषण, वर्ष 1968 में ‘चिदम्बरा’ के लिए हिन्दी का प्रथम ज्ञानपीठ पुरस्कार और महाकाव्य ‘लोकायतन’ हेतु सोवियत लैण्ड नेहरू पुरस्कार प्रदान किया गया। उनकी काव्य-दृष्टि की व्याख्या उनकी इन अमर पंक्तियों में निहित है— “छोड़ द्रुमों की मृदु छाया, तोड़ प्रकृति से भी माया, बाले तेरे बाल-जाल में कैसे उलझा दूँ लोचन!” यहाँ कवि प्रकृति के प्रति अपनी उस अनन्य आसक्ति को प्रकट कर रहे हैं, जहाँ भौतिक आकर्षण प्रकृति के नैसर्गिक सम्मोहन के सम्मुख गौण हो जाता है। यह पन्त जी के प्रारम्भिक छायावादी दौर का वह वैचारिक पूर्वापर है, जहाँ हिमालय का सौन्दर्य उनके लिए किसी भी अन्य मानवीय मोह से ऊपर था।

इस मेधा की अगली कड़ी में डॉ. श्याम सिंह शशि (जन्म 1935) का नाम आता है, जिन्होंने समाजशास्त्र और साहित्य के समन्वय से ‘नृवंश-साहित्य’ की नींव रखी। वर्ष 1990 में उन्हें उनके बहुआयामी शोधपरक लेखन और सामाजिक योगदान के लिए भारत सरकार द्वारा पद्म श्री प्रदान किया गया। उन्हें केन्द्रीय हिन्दी संस्थान का राहुल सांकृत्यायन पुरस्कार (2000) और उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान का साहित्य भूषण भी प्राप्त हुआ। उनकी 300 से अधिक पुस्तकों में ‘रोमा : द जिप्सी वर्ल्ड’ और महाकाव्य ‘अग्निसागर’ मील के पत्थर हैं। उनका चिन्तन विश्व-नागरिकता पर आधारित है; वे मानते हैं— “मनुष्य की पहचान उसके जन्म से नहीं, बल्कि उसके कर्म और वैश्विक संवेदना से होनी चाहिए।” इस विचार के माध्यम से वे मनुष्य को जातियों और सीमाओं से ऊपर उठकर एक वैश्विक इकाई के रूप में स्थापित करते हैं।

​     हिन्दी उपन्यास में मनोवैज्ञानिक विधा के प्रवर्तक इलाचन्द्र जोशी (1902-1982) ने ‘संन्यासी’, ‘जहाज का पंछी’, ‘पर्दे की रानी’ और ‘मुक्तिपथ’ जैसे उपन्यासों में पात्रों के अन्तर्मन का सूक्ष्म विश्लेषण किया। वर्ष 1982 में उन्हें भारत-भारती सम्मान से मरणोपरान्त नवाजा गया। वे कहते थे— “संसार में सबसे कठिन कार्य अपने भीतर के अन्धकार को पहचानना है।” यहाँ जोशी जी स्पष्ट करते हैं कि बाह्य जगत की चुनौतियों की तुलना में मनुष्य का अपने ही अवचेतन और दमित ग्रन्थियों से साक्षात्कार करना सर्वाधिक साहसी कृत्य है। उनके उपन्यासों का पूर्वापर इसी आत्म-अन्वेषण की जटिलता को व्याख्यायित करता है।

यथार्थ के एक अन्य बेजोड़ चितेरे शैलेश मटियानी (1931-2001) ने ‘कबूतरखाना’, ‘हौलदार’ और ‘बोरीवली से बोरीबन्दर तक’ जैसे उपन्यासों से शोषित समाज को स्वर दिया। उन्हें वर्ष 1977 में उनके उपन्यास ‘हौलदार’ के लिए फणीश्वरनाथ रेणु पुरस्कार और वर्ष 1999 में लोहिया सम्मान मिला। मटियानी जी कहते थे— “लेखक का धर्म केवल कहानी कहना नहीं, बल्कि सोये हुए समाज की रगों में चेतना फूंकना है।” यहाँ वे साहित्य को केवल मनोरंजन का साधन न मानकर उसे एक प्रखर सामाजिक उत्तरदायित्व के रूप में परिभाषित करते हैं।

मसूरी को कर्मस्थली बनाने वाले रस्किन बॉन्ड (जन्म 1934) की अंग्रेजी लेखनी में पहाड़ों की मासूमियत झलकती है। उन्हें वर्ष 1992 में उनके कहानी संग्रह ‘आवर ट्रीज़ स्टिल ग्रो इन देहरा’ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार, वर्ष 1999 में पद्म श्री और 2014 में पद्म भूषण मिला। ‘द ब्लू अम्ब्रेला’ जैसी उनकी रचनाएँ हिमालय के जनजीवन का जीवन्त दस्तावेज़ हैं। वे कहते हैं— “पहाड़ केवल पत्थर और मिट्टी नहीं हैं, वे हमारे भीतर की शान्ति का विस्तार हैं।” यह विचार प्रकृति को बाह्य वस्तु न मानकर उसे मानवीय संवेदना का ही एक हिस्सा मानने की उनकी आत्मीय दृष्टि को पुष्ट करता है।

​      आधुनिक गद्य के पुरोधा मनोहर श्याम जोशी (1933-2006) ने ‘कुरु कुरु स्वाहा’, ‘कसप’ और ‘हरिया हरक्यूलिस की हैरानी’ जैसे उपन्यासों से हिन्दी शिल्प को नई ऊंचाइयॉं दीं। वर्ष 2005 में उनके उपन्यास ‘क्याप’ के लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। ‘हम लोग’ और ‘बुनियाद’ जैसे धारावाहिकों के इस सृजक का मानना था— “किस्सागोई वही है जो पाठक को अपने ही यथार्थ से डरा दे या हँसा दे।” जोशी जी यहाँ उस जादुई यथार्थवाद की व्याख्या कर रहे हैं, जहाँ यथार्थ अपनी नग्नता में कभी व्यंग्यात्मक तो कभी भयावह प्रतीत होता है।

वहीं नई कहानी के स्तम्भ शेखर जोशी (1932-2022) को वर्ष 1987 में महावीरप्रसाद द्विवेदी पुरस्कार और 1995 में प्रतिष्ठित पहल सम्मान मिला। उनकी ‘कोसी का घटवार’ और ‘दाज्यू’ जैसी कहानियाँ मानवीय सम्बन्धों की गहनता को उकेरती हैं। उनका विचार था— “साधारण आदमी का संघर्ष ही सबसे बड़ा महाकाव्य है।” इस पंक्ति के माध्यम से वे स्थापित करते हैं कि साहित्य के लिए महानायकों की नहीं, बल्कि एक आम मज़दूर या शिल्पकार के दैनिक जीवन की गहन संवेदनाओं की आवश्यकता है।

संवेदनशील कवि मंगलेश डबराल (1948-2020) ने ‘पहाड़ पर लालटेन’ और ‘घर का रास्ता’ जैसे संग्रहों से अपनी अलग पहचान बनायी। वर्ष 2000 में उनके काव्य संग्रह ‘हम जो देखते हैं’ के लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। उनकी प्रसिद्ध पंक्ति है— “कवि के पास बस एक ही घर होता है, और वह है उसकी भाषा।” यहाँ ‘घर’ केवल निवास नहीं, बल्कि वह वैचारिक और सांस्कृतिक आधार है जहाँ एक कवि विस्थापन के दर्द के बीच अपनी जड़ों और हिमालय की स्मृतियों को सुरक्षित रख पाता है।

​      जनवादी चेतना के कवि वीरेन डंगवाल (1947-2015) को वर्ष 2004 में उनके संग्रह ‘दुष्चक्र में सृष्टा’ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार और शमशेर सम्मान मिला। उन्होंने ‘इसी दुनिया में’ के माध्यम से साधारण वस्तुओं को कविता का विषय बनाया। उन्होंने लिखा— “दुनिया को देखने के लिए ज़रूरी है कि हम अपनी खिड़कियाँ खुली रखें।” यहाँ ‘खिड़कियाँ’ वैचारिक संकीर्णता से मुक्ति और लोक-जीवन के प्रति संवेदनशीलता का प्रतीक हैं।

‘कवियों के कवि’ शमशेर सिंह बहादुर (1911-1993) को वर्ष 1977 में उनके काव्य संग्रह ‘चुका भी हूँ नहीं मैं’ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार और वर्ष 1989 में कबीर सम्मान मिला। उनकी प्रसिद्ध पंक्ति है— “बात बोलेगी, हम नहीं, भेद खोलेगी बात ही।” यह उनके विशिष्ट काव्य-शिल्प की व्याख्या है जहाँ ‘शब्द’ कवि के व्यक्तिगत हस्तक्षेप से स्वतंत्र होकर अपनी स्वायत्तता में सामाजिक और दार्शनिक अर्थ सिद्ध करते हैं।

कविता को नये मुहावरे देने वाले लीलाधर जगूड़ी (जन्म 1944) को वर्ष 1997 में ‘अनुभव के आकाश में चाँद’ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार, वर्ष 2018 में व्यास सम्मान और 2004 में पद्म श्री मिला। वे कहते हैं— “जो लोग आग में तपे नहीं, वे रोशनी क्या देंगे?” यहाँ ‘आग’ जीवन के कठिन अनुभवों और सामाजिक संघर्षों का प्रतीक है, जिससे तपकर ही सच्चा और प्रकाशमान सृजन सम्भव है।

​      जन-आन्दोलनों को अपनी लेखनी से ऊर्जा देने वाले गिरीश चन्द्र तिवारी ‘गिर्दा’ (1945-2010) ने ‘नगाड़े खामोश हैं’ जैसे नाटकों से चेतना जगायी। उन्हें वर्ष 1995 में पन्त मेमोरियल सम्मान मिला। उनका कालजयी आह्वान है— “जैंता एक दिन तो आलो, उ दिन यो दुनीं में…” (एक दिन वह भी आएगा, जब इस दुनिया में सुख की सुबह होगी)। यह कुमाऊँनी पंक्ति केवल एक गीत नहीं, बल्कि शोषणमुक्त समाज के प्रति जन-मानस की सामूहिक आकांक्षा का स्वर है।

प्रखर आलोचक और उपन्यासकार रमेशचन्द्र शाह (जन्म 1937) को वर्ष 2014 में उपन्यास ‘विनायक’ के लिए साहित्य अकादमी और वर्ष 2001 में व्यास सम्मान मिला। ‘गोबर गणेश’ उनकी अन्य महत्त्वपूर्ण कृति है। वे कहते हैं— “संस्कृति जड़ता नहीं, बल्कि वह निरन्तर प्रवाहित होने वाली चेतना है।” शाह जी यहाँ संस्कृति को एक गतिशील प्रक्रिया मानते हैं जो परम्परा और आधुनिकता के बीच निरन्तर संवाद करती है।

गढ़वाली भाषा के साधक अबोध बन्धु बहुगुणा (1927-2004) ने ‘भूमि्याल’ जैसे नाटकों और ‘गढ़वाली व्याकरण’ से महत्त्वपूर्ण कार्य किया। उन्हें साहित्य भूषण और गढ़वाल विभूति सम्मान प्राप्त हुए। वे मानते थे— “अपनी भाषा को भूलना अपनी आत्मा को भूलने जैसा है।” उनके लिए मातृभाषा एक पूरी सांस्कृतिक विरासत और अस्मिता की संवाहिका है।

​   वरिष्ठ कथाकार नवीन जोशी (जन्म 1950 का दशक) को उनके उपन्यास ‘दावानल’ के लिए यशपाल सम्मान मिला, जो पहाड़ के जन-आन्दोलनों का जीवन्त दस्तावेज़ है। वे कहते हैं— “सत्य को केवल आँकड़ों में नहीं, संवेदनाओं में भी तलाशा जाना चाहिए।” यह विचार सिद्ध करता है कि मानवीय सत्य केवल भौतिक तथ्यों से नहीं, बल्कि उस सामूहिक पीड़ा से निकलता है जिसे साहित्य स्पर्श करता है।

आधुनिक माध्यमों में हिन्दी की शक्ति स्थापित करने वाले प्रसून जोशी (जन्म 1971) को वर्ष 2006 में पद्म श्री और दो बार सर्वश्रेष्ठ गीतकार का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। उनकी पंक्तियाँ— “धूप के मकान में, बादलों के पायदान में…” हिमालय के सरल जीवन का संवेदात्मक रेखांकन है, जहाँ प्रकृति ही सबसे बड़ा ऐश्वर्य है।  समकालीन आलोचना और कविता के प्रमुख नाम हेमन्त जोशी (जन्म 1954) को उनकी विशिष्ट सेवाओं हेतु राजीव गाँधी स्मृति पुरस्कार मिला। वे कविता को सामाजिक बदलाव का एक धीमी लेकिन स्थायी औज़ार मानते हैं। उनका विचार है कि आलोचना का कार्य साहित्य के उन अन्तर्निहित सूत्रों को पहचानना है जो भविष्य की समाज-रचना में वैचारिक खाद का कार्य करें।

​      उत्तराखण्डी लोक साहित्य के ‘भीष्म पितामह’ कहे जाने वाले डॉ. गोविन्द चातक (1933-2007) का नाम बरबस ही ज़ेहन आता है, जिन्होंने मध्य हिमालय की लोक-संस्कृति को शास्त्रीय गरिमा प्रदान की। टिहरी गढ़वाल के सरकास गाँव में जन्मे चातक जी ने लोकगाथाओं, लोकगीतों और नाट्य विधाओं पर ऐसा शोध किया जो आज की पीढ़ी के लिए प्रस्थान-बिन्दु है। उन्हें डॉ. पीताम्बर दत्त बड़थ्वाल पुरस्कार, भारतेन्दु पुरस्कार, रामनरेश त्रिपाठी पुरस्कार और उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान का साहित्य भूषण प्राप्त हुआ। चातक जी ने ‘मध्य पहाड़ी की भाषिक परम्परा और हिन्दी’ जैसे ग्रन्थों के माध्यम से वैज्ञानिक रूप से सिद्ध किया कि गढ़वाली का उद्भव राजस्थान की शौरसेनी से हुआ है। उन्होंने ‘बाँसुरी बजती रही’, ‘केकड़े’ और ‘अॅंधेरी रात’ जैसे मौलिक नाटकों के साथ-साथ ‘प्रसाद के नाटक : स्वरूप और संरचना’ जैसी कृतियों से हिन्दी नाट्य-आलोचना को नयी दिशा दी। 1960 के दशक में आकाशवाणी दिल्ली में नाट्य निर्देशक के रूप में कार्य करते हुए उन्होंने गढ़वाली लोक संगीत को वैश्विक मंच दिया। उनके द्वारा सम्पादित ‘गढ़वाली लोकगाथाएँ’ और ‘हिमालय की लोककथाएँ’ मौखिक परम्पराओं का अक्षय कोष हैं। उन्होंने स्पष्ट कहा था— “लोक-संस्कृति ही हमारी पहचान का मूल आधार है।” चातक जी की दृष्टि में लोक-तत्त्व वह मूल बीज है जिससे शिष्ट साहित्य का विशाल वृक्ष फलित होता है। उनका अवदान केवल संकलन तक सीमित नहीं था, बल्कि वे लोक को आधुनिक सन्दर्भों में व्याख्यायित करने वाले गम्भीर मनीषी थे।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि ये अठारह मनीषी न केवल उत्तराखण्ड के गौरव हैं, बल्कि वे उस वैश्विक मानवीय चेतना के संवाहक हैं, जिसकी जड़ें हिमालय की दृढ़ता में हैं और जिसकी शाखाएँ सम्पूर्ण मानवता को अपनी छाँव दे रही हैं।

डॉ. चन्द्रशेखर तिवारी

रेणुसागर, सोनभद्र (उ.प्र.)

MO-7905167669