चौखट तोड़ती तस्वीर कहानी त्वचा रोग की नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर छिपे डर, सामाजिक पूर्वाग्रह और अंततः प्रेम की विजय की कहानी है। कहानी धीरे-धीरे बताती है कि असली बीमारी शरीर में नहीं, समाज की सोच में है। समाज बाहरी रूप देखकर दूरी बनाता है। लोग “संक्रमण के डर” से रिश्ते तोड़ते हैं।सच्चा पिता हिसाब नहीं रखता,वह केवल लौटते कदमों की आहट सुनता है। यही कहानी का भावनात्मक शिखर है।
चौखट तोड़ती तस्वीर \ कहानी
डॉ. विपिन पवार
मुंबई से नई दिल्ली एवं नई दिल्ली से देहरादून की लंबी एवं उबाऊ रेल यात्रा के पश्चात जब भुवन देहरादून से पंतनगर के लिए रोडवेज़ की बस में बैठा, तो सूरज ने बस आंखें खोली ही थी। उसकी सीट खिड़की के पास थी, तो उसने अपना सामान ऊपर रैक में जमाया और आराम से अपनी सीट पर पसर गया। यह उसकी दूसरी घर- वापसी थी। उसकी पलकें थकान एवं नींद के कारण जब बंद होने लगी, तो पहली घर-वापसी चलचित्र -सी जेहन में घूम गई। पहली बार घर-वापसी में वह अपनी शादी के लिए पंतनगर जा रहा था और इस दूसरी घर-वापसी में पत्नी को लिवाने के लिए।
वह चौथी कक्षा में था। नौ-दस बरस का रहा होगा। अपने दोस्तों के साथ रोज लंबा पहाड़ी रास्ता तय कर स्कूल जाता था। वापसी में सारे दोस्त मटरगश्ती करते हुए लौटते थे। बर्फबारी की लंबी छुट्टियों में तो सब अपने-अपने घरों में कैद हो जाते थे, लेकिन सर्दी की लंबी छुट्टियों के बाद जब स्कूल खुला, तो सारे दोस्त स्कूल से वापसी में पास ही के एक झरने पर रुक गए। आज धूप खिली हुई थी, धूप का नरम, रेशमी तथा गुदगुदा-सा स्पर्श शरीर के रन्ध्रों से होते हुए मन की परतों पर काई -सा जमता जा रहा था। ऐसा दिन पहाड़ों पर किसी उत्सव से कम नहीं होता।
बर्फ से आच्छादित हिमालय की श्वेत पर्वत श्रृंखलाएं सूर्य की किरणों से जब अपना स्नान प्रारंभ करती है, तो एक सुनहरी आभा से समूची पर्वत श्रृंखला नहा उठती है और स्वर्ण बूंदों से समूचा वातावरण एक स्वर्णिम अहसास से भर जाता है। दोपहर को जब आसमान साफ होता है, तो शीशे से दमकते हिमालय को देखना तन-मन में एक मादक उल्लास भर देता है।
सारे दोस्त झरने में खूब मस्ती करने के बाद ऊपर आकर गीले जांघियों में ही चट्टानों पर बैठ गए तथा नरम एवं नशीली धूप में अपना नंगा बदन सुखाने लगे कि अचानक उसके पीछे बैठे गजेंद्र ने कहा-
‘ भुवन ! ये तेरी पीठ पर कैसा सफेद दाग है ? ‘
हूं ! मुझे क्या पता ? क्या मुझे अपनी पीठ दिखाई देती है ? ‘
भुवन ने मुस्कुराते हुए कहा।
‘ बिलकुल पीठ के बीचो-बीच है। क्या तुझे इससे कोई परेशानी नहीं होती ?’
‘अरे ! गज्जू, जब मुझे पता ही नहीं है कि मेरी पीठ पर कोई सफेद दाग भी है , तो मुझे क्या परेशानी होगी ? ‘
लेकिन भुवन की आवाज में चुभती हुई परेशानी की किरचें साफ महसूस की जा सकती थी।बात आई-गई हो गई। साल भर बाद परीक्षाएं खत्म हुई और शीतकालीन छुट्टियां प्रारंभ हो गई। शीत का प्रकोप। तेज बारिश। बर्फबारी। आसान नहीं होती पहाड़ों की जिंदगी। अब वह छठवीं कक्षा में था। एक दिन उसने देखा कि उसके बाएं होंठ के कोने, ठोड़ी तथा कान के निचले हिस्से में भी हलके- से सफेद दाग दिखाई दे रहे हैं। वह परेशान हो गया, लेकिन करता भी क्या ? एक दिन ईजा (माँ) की नजर उस पर पड़ी तो ईजा और बाजू (पिता) उसे गांव के वैद्यजी के पास ले गए। उन्होंने बताया कि कोढ़ फूटा है। लगाने के लिए लेप तथा खाने की दवाई देता हूं। शुरुआत ही है, तो ठीक हो जाएगा। रोग ठीक क्या होता ?.बढ़ता ही गया। महीने-दो-महीने में तो पूरे शरीर पर सफेद दाग दिखाई देने लगे। उसका रंग वैसे ही सांवला था, तिस पर पूरे शरीर पर छिटके हुए सफेद दाग। वह भुवन से चितकबरे बकरे में बदल चुका था। तब उसने स्कूल जाना बंद कर दिया।
दाज्यू लाम पर थे। जब महीने भर की छुट्टी पर घर आए, तो तुरंत उसे लेकर ऋषिकेश के बड़े अस्पताल पहुंचे। त्वचा रोग विशेषज्ञ डॉ. रावत ने पूछा,“क्या आपके माता-पिता, दादा-दादी या नाना-नानी में से कोई इस रोग से पीड़ित है ?”
” नहीं ! डॉक्टर साहब, ऐसा तो नहीं है ।”
” देखो ! जवान, मैं तुम्हें समझाता हूं।जब व्यक्ति के शरीर में ‘मेलनोसाइट्स’ यानि त्वचा का रंग बनाने वाली कोशिकाएं नष्ट हो जाती है अर्थात ‘मेलेनिन’ का उत्पादन बंद हो जाता है तो उसे सफेद दाग की बीमारी या ल्यूकोडर्मा या विटिलिगो कहते हैं। वैसे तो यह बीमारी आनुवंशिक है, लाइलाज है, असंक्रामक है यानि यह छूत की बीमारी नहीं है। इस बात को अच्छी तरह से समझ लो कि यह कोढ़ या खाज नहीं है। छूने, साथ रहने, मरीज के साथ खाना खाने या उसकी चीजें इस्तेमाल करने से यह नहीं फैलती है।”
दाज्यू की पनीली आंखों में झांकते हुए डॉ. रावत ने कहा।
” लेकिन, डॉक्टर साहब ! अभी तो यह बच्चा है। पहाड़-सी जिंदगी पड़ी है इसके आगे। इस चितकबरे शरीर को लेकर कैसे जियेगा? बच्चे इसे कितना चिढ़ायेंगे ? कैसे इसकी शादी होगी ? कौन इसे अपनी लड़की देगा? ”
दाज्यू बस रो-पड़ने की कगार पर थे।
” हिम्मत और भरोसा रखो। सब ठीक हो जाएगा। बस ! नियमित रूप से इलाज कराना होगा। समय पर दवाईयां लेनी होगी। बीमारी ठीक तो नहीं होगी। हां ! पूरे शरीर का रंग एक जैसा हो जाएगा।”
डॉक्टर रावत ने मुस्कुराते हुए कहा, जिसके लिए वे पूरे इलाके में जाने जाते थे।
दाज्यू ने अपनी छुट्टियां बढ़ा दी। हिम्मत और भरोसा रखा गया। नियमित रूप से इलाज कराया गया। समय पर दवाईंयां ली गई और इसका परिणाम बड़ा सुखद रहा। एक दिन भुवन का संपूर्ण शरीर साफ-शफ़्फ़ाफ़, बेदाग, दूध-सा उजला और बर्फ-सा श्वेत हो गया..और वह भी हलकी-सी गुलाबी आभा लिए हुए। अब पूरे इलाके में उस जैसा गोरा- चिट्टा, चिकना तथा पके सेब से गालों वाला लड़का ढूंढे से नहीं मिलता था। सारे इलाके में वह फिरंगी भुवन के नाम से विख्यात हो चुका था।
जिंदगी की रेल समय की पटरी पर उसी तरह चल पड़ी, जिस तरह उसे चलना था। जब भुवन ने बी. कॉम. कर लिया तो दाज्यू ने उसे फोन किया,“”अब आगे पढ़ने से कोई फायदा नहीं है। तुमने अच्छे नंबरों से बी.कॉम. कर लिया है। मैं रेलवे भर्ती बोर्ड का फॉर्म भिजवा रहा हूं। ध्यान से पूरा फॉर्म पढ़ना। सावधानी से भरना और हां! परीक्षा की तैयारी शुरू कर दो । अगले महीने मेरा साथी नायक खंडूरी गांव आ रहा है। उसके हाथ कुछ पुस्तकें,पत्रिकाएं तथा नोट्स भिजवा रहा हूं। अच्छे से तैयारी करोगे, तो मेरी तरह केंद्रीय सरकार के नौकर हो जाओगे।”
भुवन ने दिन-रात खूब अच्छी तरह से परीक्षा की तैयारी की और लिखित परीक्षा के लिए देहरादून पहुंच गया। उसे खुशी हुई कि उसकी तैयारी काम आई। सारे सवाल हल हो गए। दो महीने बाद परीक्षा परिणाम आया। वह चुन लिया गया। मेडिकल के लिए उत्तर रेलवे के केंद्रीय चिकित्सालय, नई दिल्ली जाना था । मेडिकल ठीक-ठाक हो गया और उसे रेलवे में स्टोर क्लर्क की नौकरी मिल गई । बंबई में रिपोर्ट करना था। उमर थी उसकी कुल जमा बाईस साल।
लंबा कद, काले, घने घुंघराले बाल, छरहरा पुष्ट शरीर, काई जमी झील-सी हरी आंखें, शिराओं में उफनता यौवन का लावा, शरीर के रोम-रोम से फूट पड़ता ऊर्जा से प्रदीप्त मदमाता सौंदर्य जब बोज्यू ने अपने भाई को देखा, तो बस देखता ही रह गया।रात के अंधेरे में उफनती सांसों पर काबू पाने के बाद उसने बांहों के घेरे में कैद पत्नी से कहा,“देख रही हो अपने भुवन को ? कैसा बांका जवान हो गया है छैल छबीला। अब कामदेव के इस अवतार को नौकरी पर बंबई भेजने से पहले यदि इसका ब्याह नहीं कर दिया गया, तो बंबई की हवा इसे बर्बाद करके छोड़ेगी। यदि इसका ब्याह कर देते हैं, तो एक तो यह बंबई की रंगीनियों में नहीं फंसेगा और दूसरा बार-बार घर आता रहेगा । देखो ! ईजा से बात करके।”
जब दूसरे दिन का सूरज उदित हुआ तो भुवन की बोज्यू ने अपना काम प्रारंभ कर दिया। हफ़्ते भर में ही गांव के जोशी जी ने खबर दी कि पिथौरागढ़ में भुवन की तरह ही बीमारी से सफेद हुई लड़की ब्याह लायक है । बात चली और पक्की हो गई। लड़की पढ़ी-लिखी थी। सबको पसंद आ गई। और नौकरी पर जाने से पहले रेलवे के चयनित स्टोर क्लर्क भुवनचंद्र पंत की शादी पूरे रीति-रिवाजों सहित धूमधाम से पिथौरागढ़ की अल्पवयीन राधा भट्ट के साथ संपन्न हो गई।
दोपहर को सारा कुनबा पालक और मेथी से बने उत्तराखंड के पारंपरिक भोजन ‘काफुली’ का आनंद लेने के बाद गुनगुनी धूप सेंकते बैठा था। पहाड़ों पर हौले-से चोरी-छिपे सांझ कब उतर आती है ? .पता ही नहीं चलता। पांच बजते-न-बजते आसमान सुरमई आभा से भर उठता है । बहू रधूली ने देखा कि घर के सारे पुरुष न जाने कहां गायब हो गए हैं ? हालांकि पहाड़ों की बेटी होने के कारण वह अच्छी तरह से जानती थी कि ‘सूरज अस्त और पहाड़ी मस्त’। रात गहराने से पहले ही सारे आदमी झूमते-झामते अलग-अलग समयों पर सही-सलामत घर पहुंच गए।
एक ओर रेलवे की पक्की और शानदार नौकरी ज्वॉइन करने का उत्साह, उमंग एवं आकर्षण था तो दूसरी और नवपरिणिता रधूली का मोहपाश शिथिल नहीं हो पा रहा था। उधर ज्वॉइनिंग का समय निकट आता जा रहा था तो एक दिन बोज्यू ने भुवन को आड़े-हाथों लिया,“‘ नहिं परागु नहिं मधुर मधु, नहिं बिकास इहिं काल ।अली कली ही सौं बध्यौ, आगैं कौन हवाल ।।’
लताड़़ खाकर भुवन बाबू ने जी कड़ा किया और बंबई के लिए रवाना हो गए। पहली रेल यात्रा। बचपन में सुना था कि दैत्य-सा विकराल इंजन चिंघाड़ता तथा काला धुआं उगलता हुआ लोहे की पटरी पर दौड़ता है और उसके पीछे जुड़े सवारी डिब्बे एक-दूसरे का हाथ थामे पीछे-पीछे भागते रहते हैं। कैसे कलेजा हथेली पर लेकर सफ़र करते होंगे लोग ? जब भुवन खुद देहरादून से नई दिल्ली के लिए मसूरी एक्सप्रेस में बैठा तो उसने दांतों तले उंगली दबा ली क्योंकि जब गाड़ी ने गति पकड़ ली, तो पेट का पानी भी नहीं हिल रहा था।
नई दिल्ली से चलकर जब गाड़ी बंबई पहुंची तो सपनों के शहर में शाम ने अपनी रंगीनियां बिखेरना प्रारंभ कर दिया था। मायानगरी की धरती पर कदम धरते ही भुवन सनाका खा गया। रोशनी से चकाचौंध सड़कें, बिजली के जगमगाते लट्टू, तेजी से इधर से उधर भागते लोग, चिल्लपों, शोर-शराबा, कानफाडु, कर्णकटु आवाजें। एक छोटे-से पहाड़ी कस्बे के भुवन को लगा कि ‘भुवन’ तो यह है और वह तो है इसका मात्र एक ‘अणु’।
उसे राहत महसूस हुई, जब रिपोर्टिंग और अन्य औपचारिकताओं के पश्चात उसे पता चला कि उसकी पोस्टिंग दूर-दराज के इलाके में की जा रही है, क्योंकि बंबई बछड़े को तो अपने पास नहीं रखती। जाओ!पहले तपती धूप की चिलचिलाती गर्मी, हड्डियों को कंपा देने वाली शीत तथा मूसलाधार बारिश में खेत जोतो। गरदन पर जुए के भार का दर्द महसूस करो। दावनी में फंसकर किसान के चाबुक की मार सहो, फिर कर्मठ, सहनशील और पक्के बैल बनकर बंबई आओ।
सिद्धेश्वर एक्सप्रेस से दूसरे दिन मुंह-अंधेरे जब वह कुर्डुवाड़ी पहुंचा, तो उसकी जान में जान आई। लगा कि वह मैदानी पंतनगर में आ गया है। दो साल मन लगाकर काम सीखा। यहां दिक्कतें तो बहुत सारी थी,भाषा की, बोली की, खानपान की, मौसम की, हवा की, पानी की, बानी की, रवानी की लेकिन धीरे-धीरे स्थितियां ठीक होती चली गई। मराठी के बहुत से शब्द उसकी बोली सोरयाली से मिलते जुलते थे।
दो साल बीतते-न-बीतते उसने अपना तबादला बंबई के करी रोड डिपो में करवा लिया। अब मैदानी पंतनगर यानी कुर्डुवाड़ी से स्थानांतरित होकर वह मायावी स्वप्ननगर बंबई आ चुका था। कुछ दिन खानाबदोशों की तरह जिंदगी गुजारने के पश्चात उसने बंबई से बहुत दूर एक छोटे-से गांव बदलापुर में किराए पर एक छोटा-सा कमरा ले लिया और अब वह पत्नी को लिवाने के लिए अपने गांव पंतनगर जा रहा था। एक झटके के साथ जब बस रुकी तो वह स्मृतियों के जंगल से निकलकर पंतनगर के बस अड्डे पर पहुंच चुका था।
समुद्र तट से दूर होने के कारण बदलापुर में वह उमस एवं घुटन नहीं थी, जो करी रोड पहुंचते ही उसे परेशान कर देती थी। हालांकि पहाड़ी राधा की परेशानियां कम नहीं हो पा रही थी। भयानक गर्मी, उमस, घुटन, अकेलापन, शोर-शराबे एवं धमाचौकड़ी की अनुपस्थिति, काट खाने को दौड़ता सूनापन। दिन तो काटे न कटता उसे तो इंतजार रहता बस रात का,जब उसका भुवन घर लौटेगा। ससुराल का वह एक महीना याद आता, जब प्रतिबंधों, लिहाजों, असुविधाओं, उलाहनों एवं चुहलबाजियों में भी भुवन किसी न किसी तरह मौका निकाल ही लेता था और यहां खुले आसमान में उन्मुक्त विचरण करते पंछियों के इस जोड़े को दूर-दूर तक देखने वाला अपना कोई भी नहीं था। उन्मुक्तता तथा वर्जना से प्राप्त सुख- दुख उस समय की परिस्थितियों पर निर्भर करते हैं। कभी हमें उन्मुक्तता से ऊब होने लगती है और हम वर्जनाओं की अपेक्षा करने लगते हैं।
समय की हवा जिंदगी की किताब के पृष्ठ-दर-पृष्ठ पलटाती रही और एक दिन सुबह आंख खुलते ही रधूली ने भुवन को पिता बनने की खुशखबरी देकर सातवें आसमान पर पहुंचा दिया । जिस आनंद एवं उमंग से सराबोर होकर भुवन ऑफिस गया था,उसके विपरीत पीड़ा का लबादा ओढ़े भारी कदमों से घर लौटा। उसके चेहरे पर उड़ती हवाईयां देखकर राधा कांप गई। उससे कुछ न पूछते बना।
” रधूली! मेरा बड़ा बाबू पूछ रहा था कि क्या तुम्हारा बच्चा भी तुम्हारे जैसा ही उजला होगा?”
कुर्सी पर बैठते-बैठते भुवन ने कहा,“देखो जी ! आप परेशान न हो । मां नैना देवी सब कुछ ठीक ही करेंगी। अब तक सब कुछ ठीक-ठाक हुआ है न ? तो आगे भी सब कुछ ठीक ही होगा ।”
रधूली के स्वर में जबरदस्त आत्मविश्वास झलक रहा था। डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर मेमोरियल अस्पताल, मध्य रेल , भायखला की प्रमुख स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. संतोष चोपड़ा ने कहा था कि,इस बात की पूरी-पूरी संभावना है कि बच्चा भी तुम दोनों के समान ही पैदा होगा।”
लेकिन उस नीली छतरी वाले की लीला को कौन समझ पाया है ? यह डॉ. चोपड़ा ही थी जिन्होंने उसे खुशखबरी देते हुए कहा था कि,“ ऐ सुनो!तुम किस्मत वाले हो I तुम्हारा बेटा नॉर्मल पैदा हुआ है यानि कि वह तुम दोनों के समान नहीं है I ऐसा लाखों में किसी-किसी के साथ ही होता है I ”
सातवें आसमान में उड़ते भुवन और रधूली ने अस्पताल में ही फैसला कर लिया था कि उन्हें अब दूसरा बच्चा नहीं चाहिए, क्योंकि हर बार तो किस्मत बुलंद नहीं हो सकती न ! बस यही हमारे सपनों का राजकुमार काफी है हमारे लिए Iजिंदगी की रेल को ग्रीन सिगनल मिलते रहे और उसने समस्याओं की पटरी पर धीरे-धीरे आगे बढ़ना प्रारंभ कर दिया।अब दोनों के सपनों का राजकुमार आकाश भुवनचंद्र पंत दसवीं कक्षा में पहुंच चुका था। कल्याण के प्रतिष्ठित रेलवे स्कूल में पढ़ रहा था । जुलाई का महीना मुंबई की घमासान बारिश थमने का नाम नहीं लगातार दो दिन रेल की पटरिया पानी में डूब गई सड़क मार्ग बंद पानी की निकासी ही न हो तो क्या होगा? इधर बारिश का पानी तेजी से समंदर में घुसने को तत्पर तो उधर समंदर की विशाल जलराशि का महानगर की भूमिगत जलनिकास वाहिनियों में अनधिकार प्रवेश का प्रयास।समूचा जनजीवन अस्तव्यस्त।और ऐसी भयावह स्थिति में राधा के पेट में तेज दर्द उठा। रात में पूरी सोसाइटी एकत्रित हो गई। सारे प्रयास कर लिए गए। कोई एंबुलेंस नहीं पहुंच पाई । कोई डॉक्टर सोसाइटी में नहीं पहुंच पाया। आखिरकार रिटायर्ड स्टेशन मास्टर अवध बाबू अपनी कार से तीनों को लेकर निकल पड़े। बड़ी मुश्किल से किसी तरह बदलापुर के एक नर्सिंग होम में पहुंचे, तो डॉक्टर ने बताया कि काफी देर हो चुकी है। अब कुछ नहीं हो सकता।
भुवन की तो दुनिया ही लुट गई। यहां उसके घर- परिवार का था ही कौन ? ऐसे समय पर उसके बड़े बाबू और उनकी पत्नी ने उसकी बड़ी मदद की। उसे सहारा दिया। उसका संबल बने। तब उसे अहसास हुआ कि बड़े वही होते हैं, जो समय पड़ने पर बड़ी मदद करते हैं ।
हवाई जहाज से रधूली का शव लेकर दोनों बाप-बेटे पंतनगर हवाई अड्डे पर पहुंचे। नीले आसमान में उड़ते हुए हवाई जहाज से नीचे दिखाई दे रहे श्वेत बादलों के तेजी से पीछे भागते सफेद कपास के गुच्छों को देखकर भुवन सोच रहा था कि मेरी रधूली गई तो थी जीवित जमीन पर और निष्प्राण लौट रही है आसमान की बुलंदियों पर । यह कैसी माया है तेरी, हे ! नैना देवी।
सारी औपचारिकताएं निपट चुकी थी। बुझे मन और क्लांत शरीर के साथ बाप-बेटे मुंबई लौट रहे थे। भुवन सोच रहा था कि जन्म से लेकर मृत्यु तक जीवन में हम सिर्फ औपचारिकताओं का निर्वहन करने में ही लगे रहते हैं। पूरी यात्रा के दौरान उसे लगातार महसूस होता रहा कि रधूली उसके साथ ही है। केवल दिखाई नहीं दे रही है। कभी-कभी नजदीकियों की अपेक्षा उनका एहसास बड़ा सुकून दे जाता है। जिंदगी की रेल को पुनः पटरी पर आना था और वह आ गई। जब वन बी.एच.के. में भुवन का बेडरूम पढ़ाई के नाम पर बेटे ने हथिया लिया, तो भुवन चुपचाप ड्राइंग रूम में आ गया।

ड्यूटी पर जाने से पहले एक दिन भुवन सामान की साज-संभार कर रहा था, तो सूटकेस में पुराने अखबार में लिपटी रधूली की फ्रेम की हुई तस्वीर पर उसकी नजर पड़ी ।
” अरे ! यह किसने रख दी मेरे सामान में ? ”
” बोज्यू ! और कौन हो सकता है ? ”
सोचते-सोचते उसकी पलकें आंसुओं से तर हो गई। उसने दीवार पर कील तो ठोंक दी, लेकिन तस्वीर लगाते समय उसके हाथ कांप रहे थे, लिहाजा तस्वीर सोफे पर गिर पड़ी और उसका एक निचला कोना हलका-सा टूटकर लटक गया। उसने आकाश को तस्वीर दी और स्कूल से लौटते समय ठीक करा कर लाने को कह दिया। काफी दिन बीत गए। आकाश तस्वीर ठीक नहीं करा पाया। जबकि फ्रेम वाले की दूकान उसके स्कूल के गेट से निकलते ही पास ही स्थित थी। मां के बिछोह की पीड़ा थी, पढ़ाई का दबाव था, किशोर मन की उलझनें थी या उसे यह काम इतना जरूरी नहीं लगा, जो भी हो, टूटी हुई तस्वीर उसके स्कूल के बैक पैक में ही पड़ी रह गई।
भुवन सुबह 08:10 की सी.एस.एम.टी. फास्ट पकड़ता, तो शाम 05:59 की बदलापुर फास्ट से 07:30 तक ही स्टेशन पहुंचता है। सब्जी-भाजी, दूध और अन्य घरेलू चीजें लेते-लेते आठ-साड़े-आठ तक ही घर आ पाता है। वह सारे घरेलू काम खुद ही कर लेता है। झाड़ू-पोंछा, कपड़े, बर्तन, साफ-सफाई, खाना बनाना लेकिन अब उसने आकाश के कहने पर वाशिंग मशीन ले ली थी और जब आकाश ने कपड़े धोने की पूरी जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली तो उसे काफी आराम हो गया। मुंबई में रहते बाई रखने की उसकी हैसियत नहीं थी। इससे व्यायाम भी हो जाता है और मन किसी तरह रधूली की यादों से दूर होता हुआ महसूस होता है केवल महसूस होता है दूर होता नहीं,क्योंकि जाने वाले की स्मृतियां तो धुंधली पड़ जाती है, लेकिन यादों की एक फांस हृदय में गड़ी रह जाती है, जो गाहे-बगाहे टीस देती रहती है । हम जाने वाले को जीवन की आपाधापी में भले ही कभी भूल जाए, लेकिन हृदय में गड़ी उस फांस की टीस जब उभरती है तो हमारा समूचा अस्तित्व ही शोक के सागर में डूब जाता है।
भुवन के कोई बहिनी (बहन) नहीं थी, तो जिस तरह उसकी ईजा ने सारे भाइयों को घरेलू कामकाज के मामले में आत्मनिर्भर बनाया था, भुवन ने भी आकाश को उसी राह पर चलाने का फैसला कर लिया, क्योंकि अब वही उसकी ईजा था और वही उसका बाजू। उसके तो कोई बहिनी नहीं थी लेकिन आकाश के तो ईजा भी नहीं थी ।
एक दिन भुवन ने आकाश के बैक पैक से चौखट टूटी तस्वीर निकाली और दीवार में ठुकी हुई कील पर लटका दी। उन दोनों की शादी की तस्वीर से रधूली की तस्वीर को अलग किया गया था और फ्रेम करवा लिया गया था। तस्वीर में भुवन का बायां कंधा साफ नजर आ रहा था।आकाश ने जब ड्राइंग रूम की दीवार पर टंगी दुल्हन बनी अपनी ईजा की तस्वीर देखी तो उसके चेहरे का रंग फीका पड़ गया भुवन सोफे पर बैठा अखबार पढ़ रहा था। आकाश तेजी से अपने कमरे में पहुंचा फटाक से दरवाजा बंद किया और बिस्तर पर औंधे मुंह गिरकर जोर-जोर से रोने लगा। पता नहीं वह कब तक रोता रहा ? ममता की शीतल छाया की याद के साथ ही तस्वीर को ठीक न करा पाने का अपराध बोध तो था ही, जो आंसुओं के रास्ते बह निकला था। जब आंसुओं की बाढ़ में तन-मन का सारा मैल धुल गया, तो वह निर्मल एवं हलका हो चुका था। दरवाजा खोला, तो बाजू खाने पर उसका इंतजार कर रहे थे । उन्हें बंद बेडरूम से बाहर आती आकाश के रोने की आवाज तो सुनाई दी होगी, लेकिन उन्होंने आकाश की सूजी हुई लाल-लाल आंखों को देखकर भी कुछ नहीं कहा। दोनों ने बिना कुछ बोले चुपचाप अपना खाना खत्म किया। कभी-कभी मौन भी बहुत कुछ कह जाता है।
आकाश कॉलेज से लौटते ही अपना कमरा बंद कर लेता। बंद कमरे में पढ़ाई के अलावा भी बहुत कुछ होता है अब धीरे-धीरे भुवन की समझ में आने लगा था। रात को आते ही भुवन जब सोफे पर अपना बैग पटकता और बैठकर जूते के फीते खोलता, तो दीवार पर टंगी टूटी फ्रेम से निकलकर रधूली उसके पास आकर बैठ जाती। दोनों कुछ देर तक बातें करते रहते। फिर भुवन फ्रेश होता और किचन में घुस जाता। आहट पाकर आकाश कमरे से बाहर आता। देखता बाजू किचन में खाना बनाते हुए किसी से बातें कर रहे हैं।
” बाजू ! आप अकेले ही किससे बातें कर रहे हैं ? ”
” अकेले कहां ? …हां..नहीं….मैं…तो….ऊं…हूं….चलो ! तुम्हें भूख लग गई होगी। तुम्हारी ईजा ने बढ़िया खाना तैयार करवा दिया है।”
” ईजा ने ? ” आकाश चौक पड़ता।
“ ऊं…..हूं….अरे……यानि मैंने..। तुम्हारी ईजा को याद करते हुए। ”
किचन के कोने में खड़ी हुई रधूली की ओर देखते हुए भुवन बड़े दुलार से कहता।
रात में सारे कामकाज निपट जाने के बाद जब थककर चूर हो जाने पर भुवन अपने सोफे को बेड में बदल देता, तो रधूली तस्वीर के टूटे कोने से निकलकर चुपचाप उसके पहलू में आकर लेट जाती और जब नीम-अंधेरे सुबह चार बजे भुवन की आंख खुलती, तो वह वापस अपनी तस्वीर में लौट चुकी होती।

दशहरे पर हर पहाड़ी अपने गांव जरूर जाता है। इस दशहरे पर भुवन भी अपने बेटे के साथ गांव गया, लेकिन इस बार दशहरा मनाने के लिए नहीं, बल्कि रधूली की पहली बरसी पर गया था। साल भर बीत चुका था। पहला रिश्ता भी उसकी बोज्यू ने ढूंढा था और अब यह दूसरा वाला भी। एक दिन उसने इस विषय पर भुवन से बात की तो भुवन की त्यौंरियां चढ़ गई –
” न ! न ! बोज्यू। मैं इस बारे में कभी सोच भी नहीं सकता। रधूली मेरे लिए हमेशा जीवित रहेगी। आइंदा से मुझसे इस बारे में कभी कोई बात मत करना।”
बोज्यू ने उसे समझाने-मनाने की बहुत कोशिश की कि अभी वह अच्छा खासा जवान है। पहाड़-सी जिंदगी उसके आगे पड़ी है। नारी शरीर की चाह तो पुरुष की आदिम जरूरतों में शामिल ही रहती है और फिर आकाश को भी तो मां की जरूरत पड़ेगी न। लेकिन बात पूरी होने से पहले ही भुवन रूठकर घर से बाहर निकल चुका था। उसके बड़े बाबू भी उसे समझा- समझा कर हार चुके थे, लेकिन वह अपने निर्णय से टस से मस नहीं होता था। उसके बड़े बाबू और उसकी बोज्यू थोड़े ही जानते थे कि वह रधूली की निकटता के एहसास से ही अपनी देह की जरूरतों को पूरा कर लिया करता है। विरले होते हैं ऐसे मर्द, जो आत्मरति में ही संतुष्टि पा जाते हैं।
आकाश ने कंप्यूटर साइंस में ग्रेजुएशन कर लिया। आकाश और अरूणिमा थपलियाल के अफेयर के बारे में भुवन को तब पता चला, जब वाशी में नौकरी करते-करते आकाश को दो साल बीत चुके थे। इन दो सालों में आकाश ने भुवन के कहने पर कई लड़कियां देखी, लेकिन उसे कोई भी लड़की पसंद ही नहीं आती थी। भुवन को जब यह पता चला कि आकाश की प्रेयसी सजातीय है, तो उसे बेहद खुशी हुई थी। सजातीय न भी होती तो भुवन क्या कर लेता ? हालांकि आकाश ने जाति देखकर थोड़े ही प्रेम किया था। अरु तो उसकी स्कूल की सहपाठी थी और उसे बचपन से ही बेहद पसंद थी। पसंद कब मित्रता में बदल गई और मित्रता कब प्रेम के बंधन में बंध गई, दोनों को पता ही नहीं चला। घर- गृहस्थी और नौकरी की उलझनों में भुवन इस कदर फंसा रहा कि उसे यह सब जानने, देखने, समझने की फुरसत ही नहीं मिली।
अरुणिमा के पिता भी मुंबई में ही सरकारी नौकरी में थे। दोनों परिवारों की इच्छा थी कि शादी उत्तराखंड में ही हो, लेकिन आकाश और अरुणिमा के लिए उनके सारे मुंबईया मित्र ज्यादा जरूरी थे। एक साथ सबको छुट्टी मिले, यह तो संभव नहीं हो पा रहा था। देखा जाए, तो असल बात यह थी कि वे सब के सब उत्तराखंड नहीं जाना चाहते थे, क्योंकि वैसे भी उनकी पहाड़ों के गांवों में कोई रुचि नहीं थी। वे तो धूप, उमस, रेत एवं समुद्र की गोद में जन्में, पले,बढ़े थे। लिहाजा दोनों परिवारों के सदस्य पहाड़ से समुद्र तट पर नीचे उतरे और मुंबई में परंपरागत ढंग से विवाह संपन्न कराकर ऊपर पहाड़ों पर चढ़ गए।
कोई बहन न होने एवं लड़कों के स्कूल में पढ़ने के कारण भुवन के जीवन में कभी कोई लड़की नहीं रही। अब उसके जीवन की सबसे बड़ी कमी पूरी हो रही थी। उसने दोनों हाथों से भर-भर कर बहू पर स्नेह उंडेलना प्रारंभ कर दिया। वह उसे कोई काम नहीं करने देता था। आज की आई.टी. पीढ़ी भी तो शायद यही चाहती है। ब्रेकफास्ट एवं डिनर के लिए ही दोनों थोड़ी देर तक कमरे से बाहर रहते। पांच दिन का तो सप्ताह था। वे सप्ताहांत में पूरे- पूरे दिन गायब रहते। कभी आकाश को लेकर अरुणिमा अपने मायके नेरल चली जाती। कभी सैर-सपाटा, शॉपिंग, मूवी आदि में सारा दिन निकल जाता। सोबो यानी साउथ बॉम्बे दोनों का पसंदीदा हैंग आउट था। दक्षिण मुंबई तो युवाओं के लिए हॉटस्पॉट है ही। दोनों को सुस्त, आलसी एवं लापरवाह बनाने में भुवन में कोई कसर नहीं उठा रखी थी।
पिछले कुछ महीनों से भुवन को यह अनुभव हो रहा था कि बहू उससे कुछ खींची-खींची सी रहती है। ठीक से बात नहीं करती। न तो उसके पास आकर बैठती है और न हीं आकाश को बैठने देती है। पहले उसे लगा कि यह उसका भ्रम है, लेकिन बाद में ऐसी अनेक घटनाएं हुई कि उसे भारी एवं टूटे मन से इसे स्वीकार करना ही पड़ा। उस रात जब टूटी चौखट से निकलकर रधूली ने उसके सिर को अपनी गोद में रख लिया, तो उसका मन भर आया और वह फफक-फफक कर रो पड़ा।
जब हमें कोई अच्छी खबर मिलती है, तो हमारा समूचा अस्तित्व, उल्लास एवं उत्सव के माहौल में डूब जाता है और यह खुमारी उतरने से पहले ही जब हमें कोई बुरी खबर मिल जाती है, तो हमारा दिल दर्द के गहरे सागर में इतना नीचे तक डूब जाता है कि पिछले दिनों दिल की दीवारों पर लिखी उमंग एवं उल्लास की इबारतें पूरी तरह से धुल-पुछ जाती है। भुवन के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ, जब एक सुबह नाश्ते पर आकाश ने उसे बताया कि वह दादा बनने वाला है, तो वह खुशी के मारे पागल हो गया और उसने आकाश को अपने कलेजे से लगा लिया।
ऑफिस रवाना होने के पहले जब वह रधूली से विदा लेने के लिए टूटी हुई चौखट के नीचे आ खड़ा हुआ, तो उसने उसे कह दिया था कि आज शुक्रवार है, तो बेटा और बहू वाशी से ही नेरल चले जाएंगे और वह उसके ऑफिस से लौटते ही चौखट से उतरकर नीचे आ जाए, ताकि वह उसे एक बड़ी खुशखबर सुना सके।
भुवन ने दोपहर को ही बाजार गेट के श्रीजी फूड्स से रधूली का पसंदीदा माहिम का हलवा खरीद लिया था। वह यह मीठी खुशखबरी उसे उसकी पसंदीदा मिठास के साथ ही देना चाहता था। उसे पता था कि आज घर पर कोई नहीं है, तो स्वाभाविक रूप से उसका हाथ कॉलबेल पर जाने की बजाय चाबी से ताला खोलने लगा, पर उसे याद आया कि रधूली तो दरवाजा उढ़काकर उसके इंतजार में सोफे पर बैठी हुई होगी। जरा-सा धक्का देते ही दरवाजा तुरंत खुल गया और उसने अंदर प्रवेश किया। दरवाजा शायद खुला ही हुआ था। उस रात दोनों देर तक बातें करते बैठे रहे दूसरे दिन छुट्टी थी। रधूली ने उसकी पसंद का खाना बनाकर रखा था -‘ काफुली’ । दोनों ने साथ ही खाना खाया। आज की रात उसके जीवन में बड़े दिनों के बाद आई थी। भुवन ने इस रात का पूरा लाभ उठाया। दूसरे दिन आकाश ने भुवन को फोन पर बताया कि वे दोनों, अरू की तबियत ठीक न होने के कारण दोपहर को ही घर पर आ गए थे और दोनों ने यू ट्यूब पर देख-देख कर ‘काफुली’ बनाकर किचन में रख दिया था। आपने खाया क्या ? बताना कैसा लगा?
रविवार देर रात बेटा-बहू घर लौटे। भुवन ने पूरा खाना बनाकर तैयार रखा था। आते ही उसे बताया गया कि वे दोनों नेरल से ही खा-पीकर लौट रहे हैं। भुवन को बहुत बुरा लगा, लेकिन कुछ न बोलना उसके स्वभाव में शामिल था। जब आकाश की हिम्मत न हुई, तो उसने एक रात पत्नी के कंधे पर बंदूक रखकर गोली चलाई और भुवन का सीना छलनी कर दिया।
” बाजू जी !हमने फैसला कर लिया है कि हम वाशी में रहेंगे, क्योंकि अब इस हालत में मैं बदलापुर से ठाणे एवं ठाणे से वाशी एवं वापसी का सफर तो नहीं कर पाऊंगी न ? डॉक्टर ने भाग-दौड़ से मना किया है।”
उसे पता है कि यह मात्र एक औपचारिक सूचना भर है।
बाप के सीने में गोली दागने के बाद बेटा, बहू के पीछे से निकलकर सामने आया और कहने लगा कि,”बाजू !मेरे पास इतने पैसे नहीं है कि मैं नवी मुंबई में फ्लैट खरीद सकूं। मेरे पास केवल दस लाख रुपए ही है घर खरीदने के लिए। आप इसी महीने रिटायर हो रहे हैं। यदि आप अपने रिटायरमेंट फंड में से मुझे पचास लाख का लोन दे दें, तो साठ लाख का एक फ्लैट मैंने देख रखा है। उसे हम ले लेते हैं। बाद में धीरे-धीरे करके मैं आपका लोन चुकाता रहूंगा।”
“ बिट्टू ! अरे ! लोन की क्या बात है ? क्या बाप- बेटे के बीच ऐसी बातें भी कभी होती सुनी है ? मेरा सारा पैसा किसका है ? तुम्हारा ही तो है ।”
यह कहकर भुवन ने बिना सोचे- समझे सारी बातों के लिए हामी भर दी। यह भी न सोचा कि वह अपने जीवन भर की पूरी कमाई बेटे को सौंप रहा है। आगत खुशियों के परदों ने उसकी सोच को पूरी तरह ढंक जो दिया था। उसे लगा कि बदलापुर वाले इस फ्लैट को किराए पर चढ़ा देंगे, तो पेंशन के अलावा आय का एक और अतिरिक्त साधन हो जाएगा।
गृहप्रवेश की पूजा निपट जाने के पश्चात जब सब लोग खाना खा रहे थे, तो भुवन ने बेटे को अपने ससुर जी से यह कहते हुए सुना कि,” नहीं पापा ! बाजू तो हमारे बदलापुर वाले फ्लैट में ही रहेंगे, क्योंकि अरु को डर है कि कहीं हमारे होने वाले बच्चे को भी उनकी बीमारी न लग जाए। ”
बात इतनी जोर से कही गई थी कि भुवन भी सुन लें। भुवन के हाथ से खाने की प्लेट जमीन पर गिरकर चकनाचूर हो गई और दिल चकनाचूर होने के कारण वह गश खाकर जमीन पर गिर पड़ा। एम.जी.एम. हॉस्पिटल, वाशी में पूरी जांच के बाद पता चला कि भुवन तो उच्च रक्तचाप एवं शुगर का मरीज है।
जब सब कुछ पहले से ही तय हो चुका था, तो होता भी वैसे ही। बेटा-बहू भग्न हृदय रूग्ण पिता को छोड़कर अपने सपनों के आशियाने में पहुंच चुके थे। भुवन ने दिल पर पत्थर रखकर स्थितियों से समझौता कर लिया था। रधूली अब टूटी हुई चौखट से इस बार जो निकली, तो भुवन ने उसे वापस नहीं जाने दिया था।
उस दिन बदलापुर स्टेशन के पास स्थित बनारस चाट भंडार से भुवन पानी-पुरी, रगड़ा-पेटिस एवं दही-समोसा लेकर आया था और रधूली के साथ बैठकर चटखारे लेकर खा रहा था कि आकाश का फोन आया,” बाजू ! बधाई हो ! आप दादा बन गए हैं । मैं एक नन्ही परी का बाप बन गया हूं।
सुबह होते ही सब कुछ भूलाकर भुवन वाशी पहुंच गया था। वह जच्चा-बच्चा के निकट जाने से अपने आपको रोक ही रहा था कि उसके समधी ने उसका हाथ पकड़ा और उसे खींचकर झूले के पास खड़ा कर दिया। उसे लगा कि झूले में लेटी हुई नन्ही- सी परी ठीक रधूली की तरह उसकी ओर देखकर हौले-हौले मुस्कुरा रही है। उसके दोनों गालों पर वैसे ही गड्ढे पड़ते थे, जैसे रधूली के थे।
समय की सुईयां जीवन की घड़ी पर टिक-टिक करती हुई आगे बढ़ रही थी। प्रसूति अवकाश के पश्चात जैसे ही अरुणिमा ने नौकरी पर जाना प्रारंभ किया, तो जल्दी ही उसका सामना जीवन की वास्तविकताओं से होने लगा। जीवन उतना आसान नहीं था, जितना दिखाई देता था। टूटे सपनों की किरचें जब दोनों के पांवों को लहूलुहान करने लगी, तो उनकी आंखें धीरे-धीरे खुलने लगी। मायके में ऐसा कोई नहीं था, जो उसके पास आकर रहता। उसकी मां ने अपना फैसला सुना दिया। बच्ची को लेकर यहां आ जाओ। यहीं से ऑफिस जाओ। नेरल से ठाणे और फिर ठाणे से वाशी यह तो संभव नहीं था फिर आकाश इसके लिए तैयार नहीं हुआ। थक-हार कर क्रेश (पालनाघर) पर सहमति बनी पर इसमें हजार दिक्कतों का सामना करना पड़ा। घर पर एक बाई रखी गई पर इससे समस्या सुलझने की बजाय और उलझती गई। बच्ची की तबियत खराब रहने लगी। दोनों परेशान हो गए रूआंसे नौकरी पर विपरीत असर पड़ने लगा टारगेट पूरा होने में समय कम बचा,तनाव,डिप्रेशन बढ़ने लगा आकाश जान-बूझकर अधिक से अधिक समय अब ऑफिस में ही गुजारने लगा । अरुणिमा की आंखों के आगे अंधेरा-सा छाने लगा।
तबियत अधिक खराब होने पर बच्ची को लेकर दोनों एम.जी.एम. हॉस्पिटल पहुंचे, तो बड़ी सीनियर बुजुर्ग स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. संतोष चोपड़ा ने बच्ची की जांच की और दोनों को कड़ी फटकार लगाई कि,” बच्ची की हेल्थ ठीक नहीं है। ग्रोथ ठीक से नहीं हो पा रही है। बच्ची मानसिक रूप से भी कमजोर लगती है। क्या बात है ? अपने में ही मस्त रहोगे, तो बच्ची को कौन देखेगा ?
” डॉक्टर मैम ! हम तो बड़ा ध्यान रखते हैं इसका। पैदा होने के पहले से ही । आपको पता है कि हमने अब तक इसके त्वचा रोगी दादा जी को इसे छूने भी नहीं दिया है । ”
अरूणिमा ने अपनी होशियारी का प्रदर्शन किया।
अरुणिमा की ओर एक तीखी नज़र डालते हुए डॉ. चोपड़ा ने आकाश से विस्तारपूर्वक बात की, तो उन्हें पता चला कि यह बांका जवान तो उसी रेल कर्मचारी का बेटा है, जो बरसों पहले भायखला अस्पताल में उसके पास इस आशंका को लेकर आया था कि कहीं उसकी संतान भी तो उसकी और उसकी पत्नी जैसी त्वचा रोगी तो नहीं होगी ? और इस जवान को मां के पेट से उसी ने तो निकाला था, जो आज एक बच्ची का बाप बना उसके सामने खड़ा है।
जब डा. चोपड़ा को सब कुछ साफ-साफ याद आ गया, तो उन्होंने दोनों को खूब आड़े हाथों लिया और जमकर खरी-खोटी सुनाई। पर्याप्त लताड़ने के बाद उसने दोनों को बच्ची के जीवन की रक्षा एवं उसके बेहतर भविष्य हेतु तुरंत अपने घर बदलापुर लौट जाने की सलाह दी।
एक दोपहर भुवन दोनों हाथों में बड़े-बड़े थैले लटकाए डी-मार्ट से लौट रहा था, तो उसने देखा कि उसकी बिल्डिंग ए-3 के सामने मूवर्स एवं पैकर्स का एक ट्रक खड़ा हुआ है और आकाश और अरूणिमा दोनों अपने-अपने फोन पर लगे हुए हैं और दो-तीन साल की एक बच्ची सड़क पर अकेली खेल रही है,जैसे ही भुवन उस बच्ची के पास पहुंचा.उसके हाथों से दोनों थैले छूटकर जमीन पर गिर गए…नन्ही-सी रधूली उसके सामने खड़ी मुस्कुरा रही थी और भुवन उसके गालों में पड़े गड्ढों में गुम हो चुका था।

– डॉ. विपिन पवार
पूर्व निदेशक ( राजभाषा ), रेल मंत्रालय, रेलवे बोर्ड,
फ्लैट नंबर 805, टॉवर नंबर 19, जॉयविल हड़पसर एनेक्स, शेवाळेवाड़ी गाँव ,
भारत पेट्रोल पंप के सामने, पोस्ट – मांजरी फार्म,
पुणे 412307 ( महाराष्ट्र ) फोन – 8850781397