रमेश कुमार ‘रिपु’ की कहानी “नदी फिर बोलेगी” समकालीन भारतीय समाज में विकास, पर्यावरण और नागरिक चेतना के टकराव को एक संवेदनशील, प्रतीकात्मक और मानवीय दृष्टि से प्रस्तुत करती है। यह रचना उपदेश के बजाय अनुभव के माध्यम से यह प्रश्न उठाती है कि क्या हम सुविधा के बदले अपनी सामूहिक आत्मा का सौदा कर रहे हैं। नदी यहाँ केवल प्राकृतिक तत्व नहीं, बल्कि सामाजिक विवेक का रूपक है।
नदी फिर बोलेगी \ कहानी
रमेश कुमार ‘रिपु’
सोनपुर गांव में प्रकृति की गोद में लोग रहते थे। यहां के निवासी अपने आसपास के पर्यावरण के साथ गहरा जुड़ाव महसूस करते थे। यहाँ के लोग पेड़ों को अपने परिवार का हिस्सा मानते थे। नदियों को अपनी माँ की तरह पूजते थे, और हवा को अपने प्राणों की तरह सहेजते थे। प्रकृति के प्रति गहरा लगाव था यहां के लोगों का। नदी एक बीघा चैड़ी थी। गांव के ज्यादातर लोगों के खेत नदी के उस पार थे। नदी का पाट एक बीघा चौड़ा था। बारिश में नदी के दोनों कगार पानी से लबालब हो जाते थे। नदी में पुल नहीं होने से आवागमन ठप हो जाता था। गांव वालों बहुत कोशिश की कि नदी पर पुल बन जाए मगर,सफल नहीं हुए। गांव वाले अपनी सहुलियत के लिए नदी पर हर साल एक रपटा हर साल बना लेते थे। ताकि आया जा सका। गांव तक आने का दूसरा रास्ता भी था,मगर घूम कर आना पड़ता था। दूसरे रास्ते से गांव में गाड़ियां भी आ जाती थी। बावजूद इसके सोनपुर वालों के मन मन में मलाल नहीं था कि नदी पर पुल नहीं है। गांव में सड़क नहीं है। सरपंच दयानाथ दूसरी सोच के आदमी थे। गांव में अर्जुन ही एक मात्र लड़का था जो शहर में नौकरी के लिए पढ़ाई कर रहा था। बाकी उसके साथ अपने गांव में खेती किसानी करते थे।
पिछले चार पांच दिनों से गरमी बढ़ गयी थी। परीक्षा खत्म होने के बाद अर्जुन गांव आ गया था। गरमी की वजह से गांव में उसकी आँख देर रात लगी। आज भी वो देर से उठा। अजुर्न उठता भी न। वो क्या है, उसकी कल्ली रंभाने लगी। उसकी आवाज सुनकर अजुर्न हड़बड़ा कर उठा। घड़ी की तरफ देखा आठ बज गए थे।
उठते ही कहा,“कल्ली भूखी होगी इसलिए रंभा रही है। दूध दूहने का भी वक्त हो गया है। जल्दी से सभी को चारा दे दूं। उसके बाद दूसरा काम करूंगा।”
अजुर्न गाय भैस दूहने के बाद सभी की गेराई खोल रहा था। तब तक नौ बज गए थे। तभी उसकी नज़र पड़ी तीन चार कार उसके दरवाज़े के पास आकर रुक गयी हैं। कल्ली की पीठ पर हाथ मारते हुए कहा,“ शाम को चली आना सबको लेकर। आज घर में जरूरी काम है,इसलिए तुम्हारे साथ नदी तक नहीं जाऊंगा।
अजुर्न की ओर कल्ली देखी मानो कह रही हो,”ठीक है। तुम मत आना। मैं समय पर आ जाऊंगी सब को लेकर।
अजुर्न अपनी गाय भैसों को हांकते हुए यह देखने की कोशिश कर रहा था कि कार में कौन आया है? कार से निकल कर एक आदमी इधर- उधर देखने लगा। तभी उसकी नजर अजुर्न पर पड़ी। उसने इशारे से अजुर्न को बुलाया।
अजुर्न उसके पास पहुंचा। उसने गौर से सामने वाला व्यक्ति को देखा। मन ही मन कहा,“लगता है ये सरपंच का घर पूछ रहा है।इसलिए मुझे इशारे से बुलाया।”
उसके पूछने से पहले अजुर्न ने कहा,‘‘ सरपंच जी के घर जाना है क्या?
उस व्यक्ति ने मुस्काते हुए कहा,‘‘ हाँ सरपंच दयानाथ जी के ही घर जाना है। उनसे हम मिलने आये हैं। आप को कोई काम न हो तो हमारे साथ चल सकते हैं क्या?
अजुर्न ने कहा,‘‘ एक मिनट ठहरिये। हम अभी आए। अजुर्न अपने घर के ओसार तक गया और आवाज लगाते हुए कहा,‘‘ अम्मा,हम सरपंच दयानाथ जी के यहां से होकर आ रहे हैं। हमें आने में देर भी हो सकती है। तुम चिंता मत करना। गाय- भैसों को हम ढील दिये हैं।’’
गाड़ी वालों को लेकर अजुर्न सरपंच दयानाथ के यहां पहुंचा। दयानाथ की नज़र अंगद के साथ कार में आए लोगों पर पड़ी। वो भी हैरत भरी नज़रों से देखने लगा कि अजुर्न किसे अपने साथ लाया है। क्यों कि इससे पहले अजुर्न कभी किसी के साथ कार में नहीं आया था।
सरपंच दयानाथ ने सभी को बाहर बिछी खटिया पर बिठाया। और बड़ी नम्रता से कहा,‘‘ आप लोगों को मैडम कलेक्टर प्रतिभा ने तो नहीं भेजा है? हम उन्हें गांव वालों का हस्ताक्षर युक्त एक निवेदन पत्र पिछले माह दे आए थे। हमारे गांव की नदी में पुल बनवाने के लिए। वो क्या है, बारिश में इस गांव का संपर्क टूट जाता है। पुल बन जाने से बच्चों को स्कूल जाना आसान हो जाएग। क्यों कि स्कूल नदी के उस पार है।”
दयानाथ की बात को बीच में काटते हुए कहा प्रभाकर ने कहा,‘‘ आप जैसा सोच रहे हैं, वैसा कुछ भी नहीं है। हम आप से दूसरी बातें करने आए हैं। चूंकि यहां नदी है। इस गांव के लोगों का खेत नदी के उस पार है। उस पार पास ही जंगल है। गांव भी है। हमें आप की मदद चाहिए। आप सरपंच हैं। इस गांव के और उस गांव के भी। आप की बात गांव वालों कभी नहीं काटेंगे। दरअसल हमारे डायरेक्टर साहब यहां कागज और रासायन की फैक्ट्री डालना चाहते हैं। फैक्ट्री से आप के गांवों वालों को भी फायदा होगा। लोगों को रोजगार मिलेगा ही साथ ही खेत का मुआवजा भी। रहा सवाल नदी पर पुल बनने का तो आप उसकी चिंता न करिये हमारी कंपनी बनवा देगी। सरकारी काम जानते हैं,आसानी से नहीं होता। इस गांव के बच्चों के लिए एक अच्छी स्कूल भी कंपनी बना देगी। कागज की फैक्ट्री लगने से जाहिर सी बात है दोनों गांव सड़क से भी जुड़ जाएंगे।”
सड़क,स्कूल और पुल की बात सुनकर सरपंच दयानाथ की आँखें चमक उठी। उन्हें भी लगा यह तो अच्छी बात है। खेत का मुआवजा भी फैक्ट्री वाले दे रहे हैं। रोजगार अलग से।
“आप जो कह रहे हैं,बाद में मुकर तो नहीं जाएंगे? ऐसा न हो कि मैं गांव वालों से बात करूं और फिर जो वायदा कर रहे हैं वो न हो, तो गांव वाले अगली बार मुझे अपना सरपंच ही न चुनें।” अपनी आशंका जाहिर करते हुए सरपंच दयानाथ ने कहा।
अर्जुन दोनों की बातें चुपचाप सुन रहा था। लेकिन उसके मन में कागज की फैक्ट्री बात सुनकर खलबली मच गयी। कागज और रसायन की फैक्ट्री लगी तो स्कूल,पुल,सड़क और रोजगार के साथ प्रदूषण भी मिलेगा। पता नहीं कागज की फैक्ट्री से कैसा प्रदूषण होता होगा। लेकिन इतना तो जानता ही हूँ कि फैक्ट्री से प्रदूषण होता है। वह चाहकर भी कुछ नहीं बोला।
प्रभाकर ने कहा,‘‘ फैक्ट्री जैसे जैसे बनती जाएगी जो आप से कहा जा रहा है, वो भी धीरे- धीरे पूरे होते जाएंगे। आप के गांव वाले पहले क्या चाहते हैं,उनसे पूछ लें,वही पहले बनवा देते हैं।”
अर्जुन की ओर देखते हुए सरपंच दयानाथ ने कहा,‘‘ गांव वालों यही कहेंगे पहले पुल बन जाए। यदि पुल बन गया तो सबको भरोसा हो जाएगा कि स्कूल,सड़क आदि भी बन जाएंगे। क्यों अर्जुन सही कह रहा हूँ ना।”
अर्जुन अपनी मौन स्वीकृति में सिर हिला दिया। पर कुछ कहा नहीं।
प्रभाकर ने कहा,‘‘ ठीक है। आप गांव वालों से बातें कर लो। हम अगले सप्ताह फिर आएंगे। उससे पहले आप को सब से परिचय करा दूं। ये हैं जनरल मैनेजर रमन्ना जी,ये हमारे डायरेक्टर सर अनूप भाटिया जी है। मैं ही फैक्ट्री की जमीन के लिए आया- जाया करूंगा।
सरपंच दयानाथ ने कहा,‘‘ बाकी सब ठीक है। मगर ये तो बताते जाइये,खेत का मुआवजा किस रेट से मिलेगा।”
प्रभाकर ने कहा,‘‘ नदी के उस पार जिनकी जमीन है उन्हें दस लाख रुपए एकड़ दिया जाएगा। साथ ही घर से एक व्यक्ति को नौकरी। इस पार जिनके खेत है उन्हें पांच लाख रुपए प्रति एकड़। क्यों कि फैक्ट्री नदी के उस पार लगनी है।”
सरपंच ने कहा,‘‘नदी के उस पार वालों को ज्यादा कीमत और इस पार वालों को कम,ऐसा क्यों?इससे तो गांव वालों में नाराजगी फैलेगी। हो सकता है, इधर वाले अपना खेत फैक्ट्री को न दें। मुआवजा देना है तो सब को एक समान दें।”
तभी डायरेक्टर अनूप भाटिया ने प्रभाकर को इशारा करते हुए कहा,‘‘ सरपंच जी से समझ लो।”
प्रभाकर ने अर्जुन की ओर देखा फिर कहा एक मिनट,‘‘ उसने सरंपच को किनारे ले जाकर कहा,‘‘फैक्ट्री नदी के उस पार लगनी है।इस पार लगती तो यहां वालों को भी दस लाख रुपए प्रति एकड़ मुआवजा दिया जाता। बात को समझिये। एक काम कर सकता हूं। इस गांव के जिन लोगों के खेत नदी के पुल तक सड़क बनाने में फंसेगे, उन्हें पांच लाख मिलेगा ही साथ ही प्रति एकड़ पर आप को दो लाख रुपए अतिरिक्त देंगे। आप सरंपंच हैं। गांव वालों को कैसे समझाना है,ये आप को देखना हैं।”
दो लाख कमीशन की बात सुनकर सरपंच के मुंह में पानी आ गया। प्रभाकर सरपंच के चेहरे को देखकर भांप गया सरपंच फंस गया।और हमारा काम हो गया।
सरंपच ने मुस्काते हुए कहा,‘‘मैं कोशिश करूंगा। गांव वालों को समझाने की।”
कार से आने वालों के जाने के बाद अर्जुन ने सरपंच दयानाथ से कहा,‘‘ सरपंच जी गांव के इस विकास में कहीं हमारे गांव की पहचान न गुम हो जाए। बाप -दादाओं और पुरखे हमारे गांव की नदी को केवल नदी नहीं,देवी मान कर पूजते आए हैं। कागज और रसायन की फैक्ट्री से नदी बीमार तो नहीं हो जाएगी?’’
सरपंच अपनी मुंछ पर हाथ फेरते हुए कहा,‘‘ अरे नदी कोई आदमी है.. जो बीमार हो जाएगी।ये नहीं सोचते कि नदी पर पुल बन जाने से दोनों गांव जुड़ जाएंगे।सड़क गांव तक आ जाएगी। बच्चों को स्कूल मिल जाएगा। विकास के लिए थोड़ा बहुत त्याग करना चाहिए। गांव वालों की जमीन की कीमत जितनी दे रहे हैं उतना कभी नहीं मिलेगा। फैक्ट्री लगने से हमेशा विकास ही हुआ है। अब तुम गांव वालों को भड़काने मत लग जाना। नदी के उस पार तीन एकड़ खेत तुम्हारे पास भी है। क्या करोगे रख कर। कंपनी को दे देना। नौकरी भी मिल जाएगी। नौकरी के लिए ही शहर में पढ़ाई कर रहे हो। गांव में ही नौकरी मिल जाएगी। यह तुम्हारे लिए सोने में सोहागा वाली बात है।”
अर्जुन को यह बात समझ में आ गयी कि सरपंच के मन में लालच आ गया है। और यही लालच सारे गांव के मन में आएगा। पैसा से मालदार भी घृणा नहीं करते हम तो साधारण किसान हैं। किसी को मना भी नहीं कर सकता। किसी को फैक्ट्री के आने से नुकसान की गिनती भी गिनाऊंगा तो कोई यकीन नहीं करेगा। आगे चलकर सारा गांव देखेगा कि कागज और रसायन की फैक्ट्री लगने से उनके जीवन का पानी कैसे मरता है। नदी के उस पार बांस के जंगल हैं,इसलिए उस पार वालों को मुआवजा ज्यादा दिया जा रहा है। मुझे भी अपना खेत फैक्ट्री वालों को देना ही पड़ेगा। विरोध नहीं कर सकता। खेती भी वहां नहीं कर सकता। सारे गांव वालों के साथ अर्जुन भी अपना खेत फैक्ट्री को दे दिया।
गांव में पुल बन जाने से सारा गांव खुशी से झूम उठा। गांवों वालों का फैक्ट्री वालों पर भरोसा बढ़ गया। जबकि पुल फैक्ट्री वालों ने अपने फायदे के लिए बनाया था। स्कूल बन गया,सड़क से गांव जुड़ गया। चार- पांच साल बाद फैक्ट्री का गंदा पानी नदी में गिरने से नदी का पानी धीरे- धीरे जहरीला और प्रदूषित होने लगा।
सोनपुर गांव का चरवाहा मुकेश गाय- भैंस को नदी के किनारे चरा रहा था। अर्जुन की कल्ली को प्यास लगी और वो पानी देखकर पीने गयी। मगर पानी को सूंघ कर वापस लौट आई। मुकेश समझ गया अब नदी का पानी पानी मवेशियों के पीने के लायक भी नहीं रह गया। नदी प्रदूषित और बदबूदार हो गयी है। मुकेश ने यह बात सरपंच को बताया।
सरपंच दयानाथ ने कहा,‘‘ एक गाय पानी नहीं पी तो इसका यह मतलब नहीं कि सभी मवेशी नहीं पीते होंगे। जिसकी मवेशी है,वो चिंता करें। तू क्यों कर रहा है? तेरा काम है,गांव की मवेशियों को चराना। तू बस अपना काम कर। बेकार की बातें मत कर।”
अर्जुन की बात सरपंचप दयानाथ को याद आई। फैक्ट्री से नदी बीमार हो जाएगी। क्या वाकई नदी का पानी जहरीला हो गया है? अर्जुन यहां नहीं है, अच्छा है। नहीं तो गांव वालों को भड़काता और दो -चार बातें मुझे भी कहता। खैर! ’’
नदी कभी चुप नहीं रहती,यह बात अर्जुन बचपन से सुनता आया था।
उसके दादा कहा करते थे,“नदी बहती है,इसलिए जीवित है। जिस दिन रुक गई,समझ लेना कि समाज भी रुक गया।”
लेकिन आज अर्जुन के सामने बहती हुई नदी चुप थी।न पानी में कलकल की आवाज़ थी, न किनारों पर बच्चों की हँसी,न धोबी की थाप, न स्त्रियों के गीत।सिर्फ़ बदबू थी-कड़वी, तीखी और दम घोंटने वाली।
अर्जुन शहर से पढ़-लिखकर लौटा था। पर्यावरण विज्ञान में उच्च शिक्षा,एक नामी संस्थान की नौकरी-सब कुछ उसके पास था।लेकिन मन बेचैन था। शहर में रहते हुए उसने नदियों पर शोध किया, रिपोर्टें लिखीं,सेमिनारों में भाषण दिए। उसका अपना नाम था। शोहरत थी। एक दिन जब माँ बीमार पड़ी,वह गाँव लौटा,तो उसे समझ आया कि किताबों की नदी और ज़मीन की नदी में कितना फर्क है।
सोनपुर गांव में नदी के उस पार एक छोटी औद्योगिक इकाई लग गई थी-काग़ज़ और रसायन बनाने की। कंपनी के काग़ज़ों में सब कुछ “पर्यावरण अनुकूल” था,पर हकीकत में ज़हर सीधे नदी में गिरता था।लोग जानते थे। पर चुप थे। कुछ कह भी नहीं सकते थे। इसलिए फैक्ट्री प्रबंधन से सभी मुआवजा ले चुके थे।
गाँव के चौपाल पर अर्जुन ने पहली बार बात उठाई।“यह नदी मर रही है,और इसके साथ हम भी।”
लोगों ने एक-दूसरे की ओर देखा। किसी ने उसे झुठलाया नहीं।लेकिन किसी ने स्वीकार भी नहीं किया।स्वीकृति और झूठ के बीच एक तीसरी अवस्था होती है-उदासीनता की।
किसी ने कहा,“बेटा, कंपनी में हमारे लड़के काम पा रहे हैं।”
किसी ने जोड़ा,“सरकार की इजाज़त है, हम क्या करें?”
एक बूढ़ा बोला,“नदी पहले भी गंदी होती थी,तब भी लोग जीते थे।”
अर्जुन को पहली बार समझ आया,समस्या सिर्फ़ प्रदूषण नहीं,स्वीकृति है।
रात को अर्जुन ने सपना देखा-नदी बोल रही है।उसकी आवाज़ में शिकायत नहीं थी,केवल थकान थी।
“मैं बहती रही, तुम चलते रहे। मगर अब मैं बह नहीं पा रही हूँ। मेरे घाट पर कोई नहीं आता। मैं सांसे नहीं ले पा रही हूँ। मेरे पानी में ऑक्सीजन नहीं है।” नदी ने कहा
उस रात वह नदी किनारे बैठा रहा।पानी में चाँद का धुंधला प्रतिबिंब कांप रहा था।
उसे दादा की बात याद आई-“नदी बोलेगी,अगर सुनने वाला हो।”
अर्जुन ने तय कर लिया,वह सुनने वाला बनेगा।
अगले दिन से उसने अकेले शुरुआत की।सबसे पहले उसने नदी का पानी जाँच के लिए भेजा।रिपोर्ट आई..भयानक।फिर उसने तस्वीरें लीं,वीडियो बनाए,डेटा इकट्ठा किया।लेकिन वह जानता था,काग़ज़ और आंकड़े तब तक बेकार हैं, जब तक लोग साथ न हों।
अगले दिन से अर्जुन ने लड़ाई नहीं,संवाद शुरू किया।वह बच्चों के पास गया,क्योंकि उसे पता था,जहाँ भविष्य सवाल पूछता है,वहीं से बदलाव जन्म लेता है।उसने बच्चों से बात की।स्कूल में जाकर उसने एक साधारण सवाल पूछा,“तुम इस नदी को कैसा देखना चाहते हो?”
बच्चों ने जवाब दिए-“साफ़।”
“मछलियों वाली।”
“जहाँ नहा सकें।”
यहीं से नदी संवाद शुरू हुआ।हर रविवार बच्चे नदी किनारे आते,कचरा उठाते,चित्र बनाते,कविताएँ लिखते।धीरे-धीरे उनके माता-पिता भी आने लगे। जब बच्चे नदी के किनारे अपने सपनों के चित्र बना रहे थे,तब पहली बार गांव वालों के साथ सरपंच दयानाथ का सिर शर्म से झुक गया।
गाँव की सबसे मुखर स्त्री थी शारदा देवी।वह स्वयं सहायता समूह चलाती थी।एक दिन उसने कहा,“अगर नदी नहीं बचेगी,तो खेती नहीं बचेंगे।और खेती नहीं बचेगी,तो हमारी आज़ादी नहीं बचेगी। नदी हमारी माँ नहीं,हमारी जिम्मेदारी है।”
उस वाक्य में भावुकता नहीं,निर्णय था।
स्त्रियाँ आगे आईं।उन्होंने तय किया-नदी में कचरा नहीं फेंकेंगी,घरों में रसायन कम करेंगी,और कंपनी से जवाब माँगेंगी।
कंपनी को पहली बार लगा कि कुछ बदल रहा है।प्रबंधन ने अर्जुन को बुलाया।
“आप पढ़े-लिखे आदमी हैं। ”
एक अधिकारी ने कहा,“भावनाओं में मत बहिए। विकास ज़रूरी है।”
अर्जुन शांति से बोला,“विकास और विनाश में फर्क होता है।”
कंपनी के दफ्तर में अर्जुन ने जब रिपोर्ट और आंकड़े सामने रखे,तो कमरे में सन्नाटा छा गया। वे सिर्फ़ काग़ज़ नहीं थे,वे नदी की गवाही थे।
विरोध हुआ।डर फैलाया गया।रोज़गार का भय दिखाया गया।लेकिन इस बार गाँव ने डर को पहचाना।
मामला अब ज़िले तक पहुँचा।अख़बारों में खबरें छपीं “सोनपुर की नदी: मौत के कगार पर”
प्रशासन हरकत में आया।जाँच बैठी। गाँव में पहली बार लोगों को लगा,आवाज़ उठाने से फर्क पड़ता है।लेकिन राह आसान नहीं थी।
एक दिन हालात बिगड़ते देख सरपंच दयानाथ से प्रभाकर मिला और उसे सारी योजना समझाया। सरपंच को पैसा दिया और कहा,“अर्जुन का विरोध गांव वालों से किसी भी तरह कराओ। जितना पैसा लगे,मेरे से ले जाओ।”
सरपंच दयानाथ ने कहा,‘‘पूरा गांव अर्जुन के पक्ष में है। मुझसे यह नहीं होगा।”
प्रभाकर ने कहा,‘‘ पैसे में बड़ी ताकत होती है। कोशिश करके देखो। नौजवानों से बातें करके देखो। जो हमारी फैक्ट्री में काम करते हैं। वो तैयार हो जाएंगे। मुझे पूरा यकीन है। बेरोजगारी का भय दिखाओ।”
सरपंच पैसा पाकर कुछ नौजवानों के कान भरे। और उन्हें पैसा दिया। वो अर्जुन के विरोध में खड़े हो गए।
कहा गया-“यह बाहर का एजेंडा है।”
“यह नौकरी छिनवाएगा।”
एक रात अर्जुन के घर के बाहर पोस्टर लगे “नदी बचाओ नहीं,रोज़ी बचाओ।”
अर्जुन डगमगाया।माँ ने कहा,“बेटा, सही रास्ता हमेशा अकेला होता है।”
निर्णायक मोड़ तब आया,जब नदी का पानी पीने से कई बच्चे बीमार पड़े। कई मवेशी मर गए। सरपंच दयानाथ की तीन भैंस मर गयी। सरपंच अंदर से तिलमिला गया। कई दिनों तक घर से निकाला नहीं। फैक्ट्री के लोग आये,मिलने से इंकार कर दिया।अब चुप रहना असंभव था।गाँव एकजुट हुआ। पंचायत ने प्रस्ताव पास किया,“कंपनी को अपशिष्ट शोधन संयंत्र लगाना होगा,वरना काम बंद।”
छह महीने लगे।संघर्ष,बैठकें,धमकियाँ,समझौते।अंततः कंपनी को झुकना पड़ा।
नदी में गिरने वाला ज़हर रुका।
बरसात आई।पहली बार,वर्षों बाद नदी में मछलियाँ दिखीं। किनारों पर हरियाली लौटी।
एक दिन अर्जुन ने देखा,बच्चे नदी में काग़ज़ की नावें चला रहे थे।नदी फिर बोल रही थी। गाँव में उत्सव हुआ।
शारदा देवी बोलीं,“नदी बची नहीं है-हम बचे हैं।”
अर्जुन मुस्कराया।उसे लगा-समस्या बड़ी नहीं होती,उदासीनता बड़ी होती है। आज अर्जुन शहर लौट गया है,लेकिन हर महीने सोनपुर आता है।नदी अब भी बह रही है।और जब भी पानी की सतह पर सूरज चमकता है,अर्जुन को दादा की आवाज़ सुनाई देती है-“देखा,नदी कभी चुप नहीं रहती।”
रमेश कुमार ‘रिपु’
प्रयागराज,बाई के बाग के पास, यूपी
मो.7974304532


