चन्द्रवती शुक्ला बता रही हैं कि प्रेस लिखे वाहनों को छोटे शहरों में अक्सर पुलिस वाले नहीं रोकते। वे सोचते हैं कि किसी अखबार या चैनल का पत्रकार होगा। लेकिन दिल्ली में तो प्रिंटिंग प्रेस का काम करने वाले भी वाहनों पर प्रेस लिखवा लेते हैं। मेरे एक मित्र बड़े संकोची स्वभाव के हैं। यह पंद्रह साल से पत्रकारिता के पेशे में हैं। दोपहिया वाहन से चलते हैं, लेकिन वाहन पर कहीं भी प्रेस नहीं लिखा। कहते हैं ट्रैफिक वाले को अपना परिचय दे देते हैं। वह मानता है तो ठीक नहीं तो चालान कटवा लेते हैं।
प्रेस’ है तो डर काहे का \ व्यंग्य
चन्द्रवती शुक्ला
दिल्ली में आईटीओ चौराहा पत्रकारों का चौराहा भी कहलाता है। कई बड़े समाचार-पत्रों के कार्यालय इस चौराहे के पास हैं। अक्सर पत्रकार यहां जुटते हैं। खबरों पर चर्चा करते हैं और अपने-अपने काम पर निकल जाते हैं। बीते दिनों एक मित्र से मिलने मैं उनके कार्यालय गया। वापस लौटते वक्त एक घटना का साक्षी बना, जो प्रेस, पत्रकारों और चैनलों से जुड़ी थी। चौराहे पर पहुंचते ही मैंने देखा कि यो पुलिस वाले बड़ी तेजी से मोटरसाइकिल चलाते हुए एक कार की बगल से गुजरे और उसे रुकने का इशारा किया। कार वाले ने साइड में कार लगा दी और शीशा उतार कर पूछा क्या बात है। तब तक मैं भी कार के पास पहुंच गया था।
कार पर उत्तर प्रदेश का नंबर था और बड़े-बड़े अक्षरों में आगे-पीछे लिखा था ‘प्रेस’। पुलिस वाले चालक को समझा रहे थे कि आप फ्लाईओवर वाली रेडलाइट जंप करके आए हो. चालान होगा। पुलिस वालों के इतना सुनते ही कार में से एक व्यक्ति बाहर निकला। उसके हाथ में एक चैनल की माइक आईडी थी। मैंने अपने दिमाग पर बहुत जोर डाला, लेकिन मुझे उस चैनल के वजूद के बारे में पता नहीं चला। मैंने सोचा चलो आगे का माजरा देखते हैं क्या होता है। पुलिस वाले बोले, ‘चलिए निकालिए आरसी, चालान होगा। माइक आईडी वाले सज्जन बोले, भाई प्रेस की गाड़ी है। खबर पर जा रहे हैं। गलती से लाइट जंप हो गई। सॉरी।
लेकिन पुलिस वाला नहीं पसीजा। बोला कौन से चैनल के हो आप? सज्जन बोले, ‘आप नहीं समझोगे। हमारा चैनल इंटरनेट पर आता है।’ पुलिस वाला और खीज गया। बोला ‘इंटरनेट तो हम भी जानते हैं। खैर, आप किसी भी चैनल के हों. चालान तो होगा ही। इतने में कार में से एक सज्जन और उत्तरे डीलडौल से वह पत्रकार कम प्रॉपर्टी डीलर ज्यादा लग रहे थे। बोले, ‘बार तुम लोग प्रेस वालों की गाड़ी भी रोक लेते हो?’ पुलिस वाला बोला. प्रेस वालों को क्या नियम तोड़ने का लाइसेंस मिला हुआ है। आप किस प्रेस की बात कर रहे हो? हमने तो पहली बार इसका नाम सुना है। खैर, हम बहस नहीं करते। आप चालान कटवाओ आरसी निकालो।
तथाकथित पत्रकार महोदय उलझ पड़े। बोले, ‘आप अपने सीनियर से बात कराओ। पुलिस वाला बोला. ‘पहले चालान कटवाओ। उसके बाद चाहे कमिश्नर से बात करनी हो कर लेना। चार कदम की दूरी पर ही कमिशनर का ऑफिस है। चले जाओ और कंपलेंट कर दो।पुलिस वालों के तेवर देख कर भाई लोगों ने चालान कटवाया और निकल लिए। यह प्रसंग मैं इसलिए बता रहा हूं कि आजकल ‘प्रेस’ लिखे वाहन और किसी चैनल का ‘प्रेस’ वाहनों को छोटे शहरों में अक्सर पुलिस वाले नहीं रोकते। वे सोचते हैं कि किसी अखबार या चैनल का पत्रकार होगा। लेकिन दिल्ली में प्रिंटिंग प्रेस का काम करने वाले भी वाहनों पर ‘प्रेस’ लिखवा लेते हैं।
नाम लेकर कुछ कथित पत्रकार सक्रिय हैं दूसरे पंचों में। कुछ के पास एलसीआर के चैनलों की आईडी भी है. जिसके दम पर भाई लोग खेल करने में लगे हुए हैं। ऐसे लोगों को न तो पत्रकारिता के मूल्यों से कुछ लेना-देना होता है और न ही उन्हें किसी गाबर के मूल्यांकन में कोई दिलचस्पी होती है। ऐसे लोग इन दिनों बहुत सक्रिय हैं। मैंने एक बड़े चैनल में पूछताछ की तो वहां से मुझे बहुत चौंकाने वाला जवाब मिला। उन्होंने बताया कि वह अपने स्टाफ को भी गाड़ी पर चिपकाने वाला स्टीकर नहीं देते। उस स्टाफ को स्टीकर मिलता है, जिसके नाम गाड़ी के कागजात होते हैं। कागज देखने के बाद ही प्रेस लिखा स्टीकर दिया जाता है। तो फिर गाड़ियों पर चैनल प्रेस लिखा हुआ स्टीकर कहां से आता है।
उन्होंने कहा कि उनका एक स्ट्रिंगर पता नहीं कैसे प्रेस लिखा स्टीकर ले गया। उसने उस स्टीकर की रंगीन फोटो कॉपी करा ली और दूसरे शहरों के स्ट्रिंगरों को बांटने लगा। कुछ लोगों को तो उसने बाकायदा पैसे लेकर स्टीकर वटि। इस बात की शिकायत जब मिली तो चैनल ने जांच करवाई। लेकिन तब तक चिड़िया खेत चुग चुकी थी।
आप प्रेस की धमक से वाहन क्यों नहीं चलाते? यह बोले ‘मार, कहां ज्यादा गाड़ी चलाने का वक्त मिलता है। घर से दफ्तर और दफ्तर से घर। कभी कोई मौका मिला तो बच्चों को घुमा दिया, या फिर कभी घर जाना हुआ तो लंबी ड्राइव कर ली। वरना हम कहां ऐसी गाड़ी चलाते हैं, जो ट्रैफिक के नियमों को तोड़ें। एक चैनल में काम करने वाले शख्स के वे विचार थे।
लेकिन इधर विल्ली में जिस सड़क से निकलता हूं, प्रेस लिखे दस-बीस वाहन दिखाई पड़ ही जाते हैं। इन प्रेस लिखे वाहनों से पुलिस वाले तो परेशान हैं ही. साथ ही अब चैनल और अखबार वाले भी परेशान होने लगे हैं। उनके पास शिकायतें आ रही हैं कि उनके पते लिखे वाहन में बैठे लोगों ने ये हरकते की। इन्हें अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए। इनसे प्रेस की गलत छवि पनप रही है।

चन्द्रवती शुक्ला,नोएडा,सेक्टर 76 यूपी
मो. 9300244876