एस के मिश्रा बता रहे हैं कि प्रसद्धि लेखकों के लिखने का समय हैरान करता है।काल मार्क्स ने अपनी विश्वविख्यात कृति ‘दास कैपिटल’ एक पैर पर खड़े होकर लिखी, वहीं महाकवि निराला ने अधिकांश रचनाएं अपनी ससुराल डलमऊ स्थित एक बुर्जे में बैठकर लिखी थीं। साहिर लुधियानवी लिखने से पहले स्वयं को एक ऐसे बंद कमरे में कैद कर लेते थे, जहां रोशनी तक नहीं पहुंच सकती थी।
महान लेखकों के लिखने के अजीबो गरीब अंदाज \ विशेष लेख
एस के मिश्रा
लेखन एक कला है। लेखन में शब्द-विन्यास का जितना महत्व है, उससे कहीं अधिक महत्व उस भाव का है, जिसके होने से शब्द स्वतः निस्तृत होने लगते हैं और वाक्य का आकार लेते चले जाते हैं। भाव की गहराई में शब्द जुटते हैं और इन शब्दों का प्रभाव और परिणाम गहरा एवं दीर्घकाल तक बना रहता है। कालजयी कृतियों का यही महत्व है। हर लेखक एवं कवि इस तथ्य से भलीभांति परिचित होता है। हर लेखक की लेखनशैली जुदा एवं भिन्न होती है। परंतु कुछ लेखकों का अंदाज इतना निराला होता है कि उसे देख अधरों पर मुस्कराहट बिखरने लगती है। उनकी अजीबोगरीब लेखन शैली जानने योग्य है।
हिंदी साहित्य के शिरोमणि महाकवि निराला की लेखनशैली अद्भुत थी और उनका जीवन भी निराला था। उन्होंने अपनी अधिकांश रचनाएं अपनी ससुराल डलमऊ स्थित एक बुर्जे में बैठकर लिखी थीं। वे कहते थे कि वहीं पर उनकी भावाभिव्यक्ति छलक उठती थी और शब्दों का रूप धारण कर लेती थी।
हिंदी के कथाकार मोहन राकेश नियमित रूप से अपने अध्ययन कक्ष में प्रातः से सायं चार बजे तक लिखते थे। लिखते समय वे किसी से मिलना पसंद नहीं करते थे। उनकी एक और आदत थी कि यदि किसी भी वजह से उनके लेखन में किसी भी तरह का व्यवधान आ जाता था तो वे आगे बढ़ नहीं पाते थे तो उन्हें फिर पहले पन्ने से ही लिखना प्रारंभ करना पड़ता था।
हिंदी गजल के जनक दुष्यंत कुमार को बीड़ी पीने की आदत थी। गजल लिखते समय वे इसका खूब सेवन करते थे। मजरूह सुल्तानपुरी उस समय तक शेर नहीं रच पाते थे, जब तक घर में कोलाहल और कोहराम न मचा हो। कोलाहल के बीच पता नहीं उनको कैसी प्रेरणा मिलती थी। और वे आह्वादि होकर अच्छा शेर रच लेते थे। वे कहते थे कि घर म जब बच्चे आपस में ऊधम मचाते हों या धर्मपत्नी महाभारत खड़ा कर रही हों या फिर नौकर वेतन बढ़ाने की धमकियां दे रहा हों तो उनकी रचना मुखर हो जाती थी। साहिर लुधियानवी लिखने से पहले स्वयं को एक ऐसे बंद कमरे में कैद कर लेते थे, जहां रोशनी तक नहीं पहुंच सकती थी। वे पसीने से तर-बतर होकर शेर लिखते थे। खुले स्थान पर आराम से बैठकर लिखना उनकी प्रकृति में नहीं था। ऐसी स्थिति में वे कुछ भी लिख नहीं पाते थे।
शायरे इनकलाब ‘जोश’ महीलाबादी प्रातः सैर समाप्त करके लिखते थे। बस यही समय उनके लिखने का था। शेष समय वे लिखने का मन नहीं बना पाते थे। प्रख्यात शायर अल्लामा इकबाल की लेखन शैली अनोखी थी। वे शायर के साथ-साथ विख्यात वकील भी थे। जब भी उनको अवकाश मिलता, वे फरशी हुक्का भरवाकर पलंग पर लेटजाते थे और अपने मुंशी को मुकदमों की कार्रवाई लिखवाने के बजाए उसी समय सूझने वाले शेर लिखवाना शुरू कर देते थे, परंतु लोकप्रिय गीत ‘सारे जहां से अच्छा उन्होंने अपने हाथ से लिखा था। उर्दू लेखिका इस्मत चुगताई ने अपनी अधिकतर कहानियां बरफ खाकर लिखी हैं। उनके लिखने का अंदाज अनोखा था। वे चारपाई पर कुहनियों के बल आधी लेट जाती थीं। सामने तकिए पर खुली कॉपी होती थी। एक हाथ में कलम होती और दूसरे हाथ में बरफ की डली। रेडियो की आवाज आती रहती थी और इस्मत का मुंह और कलम दोनों एक गति से चलते रहते थे। इस्मत लिखतीं तो ढेर सारा लिख जातीं और न लिखने पर महीनों यूं ही गुजर जाते थे।
उर्दू के सुप्रसिद्ध लेखक सादत हसन मंटो हमेशा कुर्सी पर उकडूं बैठकर लिखा करते और बीच में चाय के समान शराब का घूंट ले लेते थे। प्रख्यात समीक्षक डॉ. सैम्युअल जॉन्सन अपनी पालतू बिल्ली लिली को मेज पर बैठा कर ही लिख पाते थे। यदि लिली कहीं टहलने चली गई हो तो जॉन्सन साहब लिखने के बजाय सबसे पहले उसको ढूंढ़ते, उसे प्यार से पुचकारते और फिर अपने पास बैठाकर लिखते थे। लिली उनके लेखन की धुरी थी। इटली के लेखक जियो औच्किनी रौसिनी पहले लिखने का मूड बनाते थे और उनका विचित्र मूड तभी बनता था, जब वे नकली बालों की तीन विग एक साथ पहन लेते थे। प्रसिद्ध जर्मन कवि फ्रेडरिक बान शिलर की आदत हैरत भरी थी। वे जब तक अपने पैरों को बरफ के पानी में डुबो नहीं लेते थे, तब तक उनके भाव शब्द बन कविता का आकार ग्रहण नहीं कर पाते थे। वे अपने पैरों को बरफ के पानी में डूबो कर ही कविता लिख पाते थे।
सर आर्बल पिनेरी को केवल रात में ही लिखना पसंद था। दिन में उनको कुछ सूझता ही नहीं था. जिसके कारण दिन में वे कुछ भी लिख नहीं पाते थे। अमेरिकी लेखक मार्कट्वेन को औंधेमुंह लेटकर लिखने की अजीब आदत थी। इसी प्रकार अर्नेस्ट हेमिंग्वे फ्रांस के क्रांतिकारी लेखक विक्टर ह्यूगो और पंजाब के उपन्यासकार नानक सिंह को खड़े होकर लिखने की आदत थी। काल मार्क्स ने अपनी विश्वविख्यात कृति ‘दास कैपिटल’ एक पैर पर खड़े होकर लिखी, क्योंकि उन दिनों उनके नितंब पर फोड़ा निकला हुआ था, जिससे वे बैठ नहीं पाते थे। काल मार्क्स ने अपने मित्र से एक बार हंसी-हंसी में कहा था कि मेरा ये फोड़ा पूंजीपतियों को बहुत दर्द देगा और उनकी यह बात सच निकली।
विश्वविख्यात फ्रांसीसी लेखक वालजॉक की समझ में आया कि टाइम टेबल उलट देने से लिखने का भाव ज्यादा अच्छा होता है। अतः वे हर शाम को छह बजे सो जाते थे। वे पेरिस की मस्तानी शाम में निद्रा के आगोश में रहते थे। वे बारह बजे से लिखना शुरू करते। लिखने से पहले हर बार अपने आप से कहते-‘अब शुरू करो बालजॉक’ लिखने का समय हो गया है।’
महान फ्रांसीसी लेखक एलेक्जेंडर ड्यूमा का विचार था कि सभी प्रकार की रचनाएं एक ही रंग के कागज पर नहीं लिखनी चाहिए। वे उपन्यास को आसमानी रंग के कागज और अन्य रचनाओं को गुलाबी रंग के कागज पर लिखते थे। यही उनका क्रम था और उन्होंने इसे अंत तक नहीं बदला। ग्रहम ग्रीन साफ लकीरदार कागज पर लिखते थे। अगर उस पर फाड़ देते थे। उदासी की स्थिति में ही वे अच्छा लिख जरा भी कोई दाग-धब्बा लग जाता तो वह उसे फौरन उनके लेखन का सर्वोत्कृष्ट दिन होता था। चार्ल्स पाते थे। ऐसी उनकी मान्यता थी कि उदासी भरा दिन आउडिलायर नामक फ्रेंच कबि को हरे रंग से गहरा लगाव था। लिखने के लिए वे हरा पेपर, हरी स्याही आदि का उपयोग करते थे। पाकिस्तानी शायर कतील शिफाई लिखने से पहले प्रातः चार बजे दंड बैठक लगाते और उसी हालत में आकर लिखने बैठ जाते. थे। जब वे सामान्य स्थिति में होते तो अच्छी शायरी नहीं रख पाते थे।
हर लेखक एवं कवि का लिखने का अपना खास अंदाज होता है। वस्तुतः लेखन का अंदाज जो भी हो, मूल बात है कि लिखने के लिए भावदशा बन रही है या नहीं। अनुभवी कवि कहते हैं कि शब्द विन्यास पर ध्यान देने से रचना उतनी उत्कृष्ट नहीं होती, परंतु यदि भाव है तो उसकी अभिव्यक्ति में शब्द स्वतः फूट पड़ते हैं। महत्वपूर्ण बात यही है। प्रसिद्ध लेखकों कवियों को जानने की जिज्ञासा उनके अनोखे अंदाज के प्रति आकर्षण पैदा करती है। परंतु महत्वपूर्ण है कि क्या लिखा गया है? कैसे लिखा गया. यह नहीं।
महाकवि निराला ने अधिकांश रचनाएं अपनी ससुराल डलमऊ में स्थित एक बुर्जे में बैठकर लिखी थीं। वे कहते थे कि वहीं पर उनकी भावाभिव्यक्ति छलक उठती थी और शब्दों का रूप धारण कर लेती थी।
मजरूह सुल्तानपुरी उस समय तक शेर नहीं रच घाते थे, जब तक घर में कोलाहल और कोहराम न मचा हो। कोलाहल के बीच पता नहीं उनको कैसी प्रेरणा मिलती थी। और वे आह्लादित होकर अच्छा शेर रच लेते थे। वे कहते थे कि घर में जब बच्चे आपस में ऊधम मचाते हों या धर्मपत्नी महाभारत खड़ा कर रही हो या फिर नौकर बेतन बढ़ाने की धमकियां दे रहा हो तो उनकी रचना मुखर हो जाती थी।
साहिर लुधियानवी लिखने से पहले स्वयं को एक ऐसे बंद कमरे में कैद कर लेते थे, जहां रोशनी तक नहीं पहुंच सकती थी। वे पसीने से तर-बतर होकर शेर लिखते थे। खुले स्थान पर आराम से बैठकर लिखना उनकी प्रकृति में नहीं था। ऐसी स्थिति में वे कुछ भी लिख नहीं पाते थे।
इस्मत चुगताई ने अपनी अधिकतर कहानियां बरफ खाकर लिखी हैं। उनके लिखने का अंदाज अनोखा था। वे चारपाई पर कुहनियों के बल आधी लेट जाती थीं। सामने तकिए पर खुली कॉपी होती थी। एक हाथ में कलम होती और दूसरे हाथ में बरफ की बली। रेडियो की आवाज आती रहती थी और इस्मत का मुंह और कलम दोनों एक गति से चलते रहते थे।
एस के मिश्रा,सैनिक स्कूल,रीवा मध्यप्रदेश
मो.8319715534

