शर्म \ कहानी - rashtrmat.com

शर्म \ कहानी

शोभनाथ शुक्ल की कहानी शर्म केवल एक व्यक्तिगत घटना नहीं है, बल्कि हमारे समाज की कई परतों को एक साथ खोल देता है। यह घटना हमें बताती है कि आज का समाज तीन संकटों से गुजर रहा है-नैतिकता के नाम पर हिंसा,पीड़ित को दोष देने की प्रवृत्ति भीड़ की संवेदनहीन चुप्पी और सबसे दुखद बात,शर्म अपराधी को नहीं, पीड़िता को महसूस होती है।

              शर्म \ कहानी

शोभनाथ शुक्ल ,सुलतानपुर यूपी

वाक्‌या दिल्ली महानगर का है। आप इसे एक मामूली सी घटना भर जानिए। गाँव-कस्बे की बात होती तो इसे एक हादसा मान सकते थे। चूंकि बात दिल्ली महानगर की है तब तो आप को इसे मामूली घटना ही मानकर चलना होगा। आप चौंक रहे होंगे या आप को अफसोस हो रहा होगा कि आपके शहर की चर्चा क्यों नहीं की जा रही है तो भाई। जैसे सभी गाँवों का चरित्र एक सा होता है वैसे ही सभी महानगयों का चारित्र भी एक सा ही होता है। वह चाहे बम्बई हो, चाहे कलकता अथवा मद्रास हो या दिल्ली, इन स्थानों पर आदमी ही रहता है और सभी आदमियों का चरित्र एक सा होता है। अब आप फिर चौंक गये होंगे। हो सकता है आपको इस बकवास से गुस्सा भी आ गया हो। शायद आप इस बात से सहमत नहीं होना चाहते या हो ही नहीं सकते क्योंकि आप बुद्धिजीवी हैं और बुद्धिजीवियों को आम लोगों से अलग हटकर सोचना ही पडता है। इस तरह उनकी एक सत्ता होती है एक जैसी यह चाहे इस शहर में हों या उस शहर में।

हाँ. तो मैं आपके शहर का भी नाम लेना चाहता था लेकिन बात तो दिल्ली शहर की है। वैसे आप इस घटना को सुनकर हो सकता है यह कह बैठे कि ऐसा तो मेरे शहर में रोज ही होता रहता है। हो सकता है सुनने के बाद इसे आप एक सामान्य हरकत ही कह डाले। अब आप जानिये इतनी छोटी-सी घटना को मैं कहानी का विषय बना रहा है और यह कहानी आपको सुनाकर ही दम लूँगा। आपका दम फूलने लगा होगा वैसे मजेदार कहानियों के लिए श्रोता नहीं इको करने पड़ते उन्हें तो श्रोता और पाठक अपने आप मिल जाते हैं इसलिए कि उनके साथ सत्य शब्द जुड़ा होता है सत्य कथायें सच्ची कहानियाँ। मेरे भाई! आपको जानकर आश्चर्य होगा कि यह घटना जिसकी मैं कहानी कह रहा है एकदम सत्य घटना है। अब आप चौकें न !

न। मैं जानता था, यह सुनते ही आपकी आँखों में चमक आ जायेगी. हो सकता है आपका रक्तचाप भी बढ़ जाय… आप एक साँस में सारी

घटना सुन लेना चाहते होंगे ‘कि किस प्रकार किसी खूबसूरत तरुणी ने अपने गदराये वदन की खुशबू से कार वाले को बेहोश कर डाला होगा फिर उसके लाख विरोध करने पर भी वह कार वाला अपनी गाड़ी निर्जन की ओर भगा दिया होगा और फिर किस तरह उसके एक-एक कपड़े राज बब्बरी स्टाइल में उतरवाये होंगे… और उसकी तड़पती मांसल देह के साथ….।’

शायद आपको मजा नहीं आया। आप बुद्धिजीवी हैं न! आपको यह तरीका पुराना लगा होगा, आपको तो 21वीं शदी वाले तरीके से घटी किसी घटना का विवरण चाहिए ‘कि किस तरह कम्प्यूटर ने एक विश्वविद्यालय की कुँआरी लड़कियों के यौन परीक्षण सम्बंधी तथ्य का विश्लेषण करते हुए निष्कर्ष निकाला कि 80 प्रतिशत कुआरियाँ अपने दूने उम्र के साथ यौन सम्बंध स्थापित करने में आनन्द का अनुभव करती हैं और तब भविष्य में उन्हें विवाह से कुछ खास उम्मीद नहीं होती है। साथ ही आने वाले दिनों में फ्रायड अधिक प्रासंगिक हो जायेंगे।’ अथवा ‘किस तरह आसमान में उड़ते एक विदेशी रोबोट ने नगर सुन्दरी का अपहरण कर लिया और उसे लेकर आसमान में उडते दूर पहुँच गया जहाँ कई रोबोटों ने बारी-बारी से उसे अपनी लौह बाँहों * में दबोचने के बाद उसे साबूत उसके घर छोड़ दिया। उस सुन्दरी की सहन शक्ति पर रससिक्त बातें सुनते आपके कन्धे उचक पड़ेंगे… लेकिन ऐसी सत्य घटना यह नहीं है। इस कहानी में तो ऐसा कुछ भी नहीं है जहाँ आपके शरीर में ज्वार आये और तनाव से मुक्त होने के लिए आप एकान्त तलाशें।

अरे! आप तो नाराज हो रहे हैं। मेरा मकसद आपकी सेक्स-ग्रन्थि पर टिप्पणी करने का नहीं है। मैं आपको ब्लादिमिर न्येवाकोब तो समझता नहीं हूँ और न ही मेरी कहानी में ‘लौलिता’ ही है. लेकिन एक बात कहूँगा। मेरी कहानी की स्टेनो सुरुचि और लोलिता में काफी कुछ परिस्थितिजन्य समानता है वैसे ही, जैसे कहानी का बॉस और ब्लादिमिर न्येवाकोब काफी करीब दिखाई पड़ते हैं। हैं। लेकिन आप न तो ब्लादिमिर जैसे हैं और न स्टेनों सुरुचि के बॉस जैसा। आप तो बस में बैठे उन नपुंसक यात्रियों जैसे हैं जिनका उत्साह उबाल आने के पूर्व अथवा चूतड़ों के नीचे सीट आने के बाद ठंडा हो जाया करता है। कहाँ की बात कहाँ ले बैठा, लेकिन क्या करूँ? मुझे सभी मनुष्यों का चरित्र एक जैसा दीखता है, जैसा कि सभी शहरों में मुझे समानता दिखायी पड़ती है। हाँ, तो मैं दिल्ली शहर की घटना पर एक कहानी बता रहा था। क्षमा करेंगे मैं आप पर कुछ ज्यादा ही बोल गया हूँ। अब कहानी पर ही आता हूँ।

….गर्मी का मौसम था। दिल्ली तप रही थी। अभी-अभी सुबह के नौ बजे थे पर लगता था कि चमड़ी जल जायेगी। लेकिन ‘चमड़ी जल जाय पर दमड़ी न जाय’, की स्टाइल में जगह-जगह बस स्टॉपॉ पर सरकारी-गैर सरकारी कर्मचारियों का रेला बढ़ता ही जा रहा था. -। यह भीड़ देखकर ही जी मिचलाने लगता है लेकिन मजबूरी है कि उसी में लटककर अथवा सटकर चलना है, अब चाहे नाक में पसीने की बदबू ही क्यों न भरे। भरती भी है, हाँ कभी-कभी राहत भी मिलती है जब किसी महिला के पास बैठने की जगह मिल जाय अथवा कॉलेज जाती कोई लड़की बीच में रत्ती भर जगह तलाशने की कोशिश में इधर-उधर खिसके तो उस समय बस की ठ्सम-ठूस बरी नहीं लगती। उस समय तो आपके हाथ परोपकार के लिए चुलबुला उठेंगे।

भीड से बचती हई सुरुचि थोडा अलग हटकर खड़ी थी। उसकी निगाहें बेसब्री से बस की प्रतीक्षा कर रही थीं। भीड की कई निगाहें उसके सौम्य चेहरे पर सेक्स अपील की रेखायें तलाश रही थी और चार-पाँच का एक जत्था, जो रंगीन मिजाज का लग रहा था. बस में उसी के बगल खडे होने और आज इस कटार से घायल हो जाने की योजना बना रहा था और इस ललक से देख रहा था कि उसकी निगाह में उन सबों के लिए कब आमंत्रण के भाव पैदा होंगे शायद यह पुरुष की जिन्दगी का सबसे नाजूक मौका होता है। जब वह सिर्फ यह भ्रम उसमें खासकर उस समय पैदा होता है जब वह किसी युवती भ्रम में जीता है। भ्रम में जीना कमी-कमी बड़ा सुखद भी लगता है। यह भ्रम उसमें  खास कर उस समय पैदा होता है जब वह किसी युवती

को अपनी तरफ ताकते देखता है तब उसकी अमित निगाहें स्वयं को उस युवती का एकलौता प्रेमी मान बैठती हैं। और आप अपने बालों पर हाथ फेर कर उन्हें सँवारने की चेष्टा करने लगते हैं। तब तक वह किसी और की ओर नजर घुमा देती है या अपना रास्ता पकड लेती है। आप आसमान से गिरते हैं लेकिन खजूर पर अटक जाते हैं क्योंकि तब तक लडकियों का एक और झुण्ड आपके सामने आ खड़ा होता है और आप पुनः नये सिरे से जमने की कोशिश करने लगते हैं।

अचानक भीड में हलचल हुई। कुछ विलम्ब से आई डी०टी०सी० की एक बस ज्यों ही स्टॉप पर रुकी कि सवारियाँ ठेलम-पेल करती दौड़ पड़ी। स्टेनो सुरुचि ने ज्यों ही बस की छड पकड़ कर पैर पायदान पर रखा कि बस के पीछे-पीछे आये एक शरीफ से दिखने वाले स्कूटर धारी का हाथ देखते ही देखते उसके गले पर फिरा और दूसरे क्षण उसके गले की ‘गोल्डेन चेन’ नदारत हो गयी। उसने प्रतिरोध भी किया पर अप्रत्याशित ढंग से हुये इस आक्रमण से वह बच नहीं पायी। उसके इस प्रतिरोध को भीड में कइयों ने अनदेखा कर दिया। बस आगे बढ़ी तो कुछेक में युवती के प्रति सहानुभूति पैदा हुयी। लोग-बाग अब तक या तो सीटें पा चुके थे अथवा खड़े होने के लिये जगहें बना लिये थे। युवकों का वह जत्था, जो स्टाप पर उसके प्रति काफी संवेदनशील हुआ था और कुछ अतिरिक्त उम्मीदों के साथ उसकी तरफ ललचायी निगाहों से ताक रहा था, अपने को नपुसक साबित कर चुका था। उनमें से एकाध की निगाहें गोल चौडाई में खुले उसके गोरे गले पर अवश्य टिकी थीं जहाँ अब भी खरोंच के निशान बुनाये हुये थे। सीट पर आराम से बैठे दो-तीन शिक्षित प्रौढों में अवश्य इस घटना पर विचार विमर्श चल रहा था और बतौर निष्कर्ष उस स्कूटर वाले के दुस्साहस की प्रशंसा करते हुए यह घोषणा की जा रही थी कि देश में ही नहीं विदेशों में भी इस ढंग की बद्तमीजियाँ दिनों-दिन बढ़ती जा रही हैं। आने वाला दिन शायद इससे भी बदतर हो। ताज्जुब की सरे आम ऐसी हरकत हुयी और लोग-बाग देखते रह गये। उसे पकड़ा जा सकता था लेकिन… फिर उनके चेहरों पर अफसोस की घटायें उमड़ आयीं और अफसोस से मुक्ति पाने के लिए

उन्होंने कीमती सिगरेट की पैकेट जेब से निकाल ली… क्या हुआ? आप चौंकिये मत! उस समय ये लोग भी उसी बस पर सवार हो रहे थे और सुरुचि के गले से खिंचती चेन की तरफ से मुख मोड़ लिये थे।

-सुरुचि जब ऑफिस पहुँची तो दस बजकर दस मिनट हो रहे थे। बॉस ने तुरन्त किसी जरूरी कागजात के सन्दर्भ में उसे अन्दर बुलाया। अन्दर पहुँचकर उसने ‘नमस्ते सॅर’ कहा और बैठने के लिए अनुमति की प्रतीक्षा करने लगी। बॉस ने निगाहें उठायी तो सबसे पहले वे खरोंच लगे गले पर जा अटकीं फिर धीरे-धीरे गले के नीचे उतरने लगी कि तभी उसने सारी बात बता दिया।

– ‘ओफ्फ ! बडा अफसोस है! रियली इट्स साकिंग… खैर अब गहने मत पहना करो। यू नो आल… अब तो औरतों को गहने पहनकर सफर करना ही नहीं चाहिए… उस पर दोष ठोंकते हुए बॉस ने सहानुभूतिपरक ढंग से समझाया। वह झल्ला उठी। उसके मन में आया कह दे, कल को लोग औरतों की साडियाँ खींचेंगे। लडकियों के डुपट्टे खींचेंगे तो तुम कहोगे कि कपडे पहनने की क्या जरूरत…. आखिर इज्जत बचाना है तो ‘सादगी’ से रहना ही पडेगा। पर कह नहीं पायी। एक-एक शब्द अन्दर ही अन्दर सुलग कर रह गये।

– तुम अभी तक खड़ी ही हो बैठो बैठो…’ सामने कुर्सी की ओर इशारा करते हुए बॉस ने मानो अपनी भूल का प्रायश्चित सा किया. ‘एक आवश्यक लेटर डिक्टेट कराना है। वेरी इम्पॉर्टेण्ट लेटर वट नाट सो अर्जेण्ट… मेरा मतलब इतना नहीं कि तुम्हारे मन को कष्ट पहुँचा कर पूरा कराया जाय। आज तुम्हारा मूड….बॉस ने उसके जेहन में झाँकने की पूरी-पूरी कोशिश की। – ‘नो सर, आयम रेडी… प्लीज डिक्टेट… कहते हुए वह टाइपराइटर पर जा बैठी।

बॉस के एक-एक शब्द को उसकी उँगुलियाँ आश्वस्त भाव से टाइप राइटर पर दाबती रहीं। बॉस आज कुछ ज्यादा ही कनिंग हो उठे हैं। वे सोच रहे थे कि शिकार आज कुछ आहत हो चुका है। थोडी सी चोट पर वह काबू में आ सकता है। तीर निशाने पर लगा

नहीं कि शिकार झोली में … उनकी निगाहें कुछ इसी अन्दाज से टाइप करती हुई सुरुचि के गले के नीचे सरक आयीं और वक्ष के उन्नत उभार को आहिस्ता आहिस्ता पार करने की चेष्ठा करने लगी।

– सुरुचि… वे आतुर होकर पुकार उठे।

– एस सॅर… बिना ताके हुए उसने उत्तर दिया।

– ‘क्या लोगी ठंडा या गर्म !’ और उत्तर की प्रतीक्षा किये बगैर उन्होंने मेज पर रखी घन्टी दबा दी।

अचानक फोन की घन्टी बज उठी। फोन उनकी पत्नी का था जो डॉ० मिश्रा के यहाँ अपने बच्चों के साथ बैठी थीं। पति को तुरन्त वहाँ बुलाया था। सुरुचि बॉस के चेहरे की चमक खत्म होते देख रही थी और बॉस हाथ में आते-आते शिकार के छूट जाने का दर्द झेलता हुआ उठ खड़ा हुआ।

शाम को ऑफिस से लौटने के बाद सुरुचि ने अपने को काफी हलका महसूस किया था। माँ से थोडी बातचीत के बाद उसने खाना पकाया। छोटे भाई का ‘होम वर्क पूरा कराकर जल्दी ही बिस्तर पर पड़ गयी। आँखें बन्द करते ही उसके होंठ चंचल हो उठे।

– सागर बहुत तनहा हो गयी हूँ। तुम्हें कैसे समझाऊँ कि अब मैं अकेले नहीं रह पाती। घर से लेकर ऑफिस तक असुरक्षा के तंग घेरे से बमुश्किल से निकल रही हूँ।’ सोचते-सोचते नींद आहिस्ता आहिस्ता उसकी आँखों में करवटें बदलने लगी। फिर वह ६ गीरे से अपने सागर की बाँहों में सिमट आयी जो इस समय फैक्ट्री के मजदूरों की माँगों को लेकर आन्दोलनरत होने पर दो वर्ष का कठोर कारावास झेल रहा है।

मेरे भाई! आपका थोड़ा, वक्त और लूँगा, आप जमुहाई ले रहे हैं न! मैं जानता हूँ कि आपका समय कीमती है। इस समय आपके बच्चे सो रहे होंगे। अब तक तो आपने बी०सी०आर० पर कई एक ब्लू फिल्में देखी होती। कल ही तो शायद आपको किसी अखबार में लेख के हवाले या किसी गोष्ठी में माइक के सहारे यह बताना है कि कितने शर्म की बात है कि हमारे युवकों में ओझी हरकतें बढ़ती जा रहीं है।और हमारी वैदिक संस्कृति पर ब्लू फिल्मों का प्रभाव हावी हो रहा है।सेक्सोन्मुखी पाश्चात्य संस्कृति अन्ततः युवक-युवतियों को देह मुक्तता की ओर प्रेरित कर रही है… और बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ उन्हें नंगा करने पर उतारू हैं….हमें इनका बहिष्कार करना ही होगा तभी युवकों में नैतिक भाव पैदा होंगे… आप थोड़ा सा और समय दें। मेरी कहानी बस खत्म ही होने वाली है। आप को पाने के बाद मुझे यही लगता है कि आप एक अच्छे श्रोता हैं। हाँ तो आगे की घटना कुछ इस प्रकार घटी।

दूसरे दिन ठीक उसी समय जब फिर सुरुचि बस स्टॉप पर पहुँची तो उसे आज भी कल जैसी भीड़ दिखायी पड़ी। थोड़ी प्रतीक्षा के बाद बस आयी और ज्यों ही वह बस पर चढ़ने को हुयी कि उसी स्कूटरधारी ने उसकी ‘गोल्डन चेन’ उसके ऊपर फेंककर एक जोरदार थप्पड मारते हुए कहा….

– साली नकली जेवर पहनते हुए शर्म नहीं आती, बेहया कहीं की.

-. जब तक सँभल पाती वह शर्मदार आदमी स्कूटर लेकर चम्पत हो गया था। बस में बैठी सुरुचि को लगा जैसे सामने बैठे लोगों के बीच वही एक है जिसकी आँखों में शर्म का पानी मर चुका है। उसने निगाह उठायी। कल की तरह आज भी लोगों की आँखों में आक्रोश की जगह मात्र विस्मय भाव तैर रहा था…।

लीजिए, कहानी खत्म भी हो गई, और आप ऐसे बैठे हैं जैसे आपने कुछ सुना ही न हो। मैंने तो पहले ही शंका व्यक्त की थी कि अन्त तक आते-आते आप इसे कहानी मानेंगे ही नहीं। हुआ भी यही। मेरे लिए यह एक गौर तलब घटना है आपके लिए सिर्फ सामान्य हरकत है।

क्षमा करिये मैंने आपका बहुत वक्त जाया किया। अब आप चाहें तो इस घटना से अपने दिमाग को मुक्त कर लें और अचानक बाहर हो रही बारिश की हल्की फुहार के खुशनुमा मौसम में पकौडी खाइये और पतली चादर ओढ़ कर सो जाइये…।

शोभनाथ शुक्ल ,सुलतानपुर यूपी

मो.  9415136267