डॉ संगीता सक्सेना की कविता - rashtrmat.com

डॉ संगीता सक्सेना की कविता

डॉ संगीता सक्सेना की कविता भाव के स्तर पर बहुत सच्ची और प्रभावी है। इसमें बीमारी के डर, आस्था के डगमगाने और फिर माँ के दिव्य स्नेह से लौटे विश्वास का अनुभव बहुत स्वाभाविक ढंग से आया है। यह कविता दरअसल भक्ति, विश्वास और आंतरिक शक्ति की यात्रा है।

शरणागत मैं

मारक, जीवन-संहारक

बीमारी का समाचार

सुनते ही थर्रा गया मन,

क्षण भर को

डगमगा गई आस्था भी।

ईश्वर से शिकायत का भाव,

विश्वास छोड़ देने का विचार

मन में उमड़ आया।

याद आई मां—

धार्मिक, अति पूजापाठी,

परोपकार में लीन।

फिर भी अंतिम क्षणों में

उनकी आवाज तक

हम सुन न सके।

तन कष्ट में था,

मन ऊहापोह में।

उसी रात स्वप्न आया—

सिरहाने खड़ी थीं मां,

सिद्धमूर्ति-सी,

मेरा सिर सहला रही थीं।

उस दिव्य स्पर्श से

फूट पड़ा प्रश्न—

“मैं ही क्यों मां?

मेरी आराधना, प्रार्थना,

सब व्यर्थ हो गई क्या?”

ममतामयी वाणी गूंजी—

“पुत्री, स्मरण करो

बीते वर्षों में

क्या तुम्हें कभी ज्वर आया?

क्या तुम कहीं रुकी, थमी?”

मैंने कहा—

“आपकी कृपा थी मां,

कभी नहीं।”

मां मुस्कराईं—

“तो क्या यह संकेत

पर्याप्त नहीं तुम्हारे लिए

कि अब तक तुम

मेरी शरण में थीं,

और अब

मेरी गोद में हो।”

नेत्रों से अश्रु बह निकले,

मन पुलकित हो उठा।

मैंने उठकर

उनके दर्शन करना चाहा—

पर मां अंतरध्यान हो चुकी थीं।

भोर का दिव्य प्रकाश

चारों ओर फैल रहा था।

मैंने शत-शत नमन किया—

पथ अब निर्मल था,

आलोकित और शांत।

उसी पथ पर

स्वास्थ्य से संघर्ष करना था

निश्चिंतता, विश्वास

और अटूट आस्था के साथ।

क्योंकि

शरणागत मैं

मां की गोद में थी—

पुलकित,

अति आनंदित।

डॉ संगीता सक्सेना

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हमने करीब से ज़िंदगी को टटोल कर देखा

हर  दिशा  में  पीड़ा की  बहती  नदी देखी।

चेहरे  होते,  तो  शायद  पहचान  भी लेते

पर मुखौटों  पर जमी  कई परतें  ही देखीं।

कुछ तो होगा जो अब भी बिकाऊ नहीं है

हमने तो सरेआम बिकती हुई मिट्टी देखी।

जिसे करुणा की सबसे अधिक ज़रूरत थी

सुना है कि उसे ज़हर-बुझी दवा दे दी गई।

अपनेपन से  लबालब  भरे थे  सारे रिश्ते

कच्चे रंगों में  झलक तहज़ीब की  देखी।

ज़ख़्म इतने गहरे थे कि टीस उठती रही

हमने जार-जार रोती हुई एक नदी देखी।

हमने  नज़दीक  से ज़िंदगी को  परखा है

हर  ओर बहती  हुई दर्द  की  नदी  देखी

डॉ संगीता सक्सेना

MO-9413395928