स्वास्थ्य मंत्री बालाघाट जाना भी जरूरी नहीं समझा
बैगा परिवार के बच्चे मरते रहे और सरकार सोती रही
राष्ट्रमत न्यूज,बालाघाट(ब्यूरो)। मध्यप्रदेश के बालाघाट जिले के बैहर और बिरसा ब्लाक के छह गांव में कुल 32 बच्चों की मोत हो गयी थी। जिसे प्रशासन छिपाता रहा। मौत की वजह भी नहीं बताया। जबकि राष्ट्रमत के ब्यूरो ने घटना स्थल का दौरा किया तो पता चला कि पीने का स्वच्छ पानी नहीं है। ग्रामीण गंदे नाले का पानी पीते हैं।नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने भी गांवों का दौरा किया था। एक अक्टूबर को राहुल गांधी मृत बच्चों के परिवारों से मिलकर जमीनी हालात समझेंगे। उनसे जानेंगे कि सरकारी योजनाओं का लाभ आदिवासी परिवारों तक क्यों नहीं पहुंचा। बच्चों को पोषण, दलिया, मच्छरदानी और टीकाकरण जैसी जरूरी सुविधाएं नहीं मिल पाईं।स्वास्थ्य मंत्री राजेन्द्र शुक्ला बालाघाट जाना भी जरूरी नहीं समझा। यह भी जानने की कोशिश नहीं किया कि स्वास्थ्य विभाग उनके लिए क्या कर रहा है।

राज्य की जमीनी हालत भी देखिए CMजी
राहुल गांधी का 13 दिन में मध्यप्रदेश में यह दूसरा दौरा होगा। इससे पहले वे 19 सितंबर को इंदौर आए थे। कार्यक्रम से पहले उन्होंने लिखा था- 30 से ज्यादा आदिवासी बच्चों की बीमारी, कुपोषण मौतें हो रही हैं, लेकिन कार्रवाई सुस्त रही। सरकार सोती रही।राहुल गांधी ने कहा था- मुख्यमंत्री जी, दीये जलाने और उत्सव मनाने से फुर्सत मिल गई हो तो जरा राज्य की जमीनी हालत भी देखिए। बीमारी, पोषण और साफ पानी की कमी है। चरमराती स्वास्थ्य व्यवस्था के कारण छोटे बच्चों की जान जा रही है।

मृत बच्चों के परिवारों से मिलेंगे राहुल
नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने कहा- राहुल गांधी मृत बच्चों के परिवारों से मिलकर जमीनी हालात समझेंगे। उनसे जानेंगे कि सरकारी योजनाओं का लाभ आदिवासी परिवारों तक क्यों नहीं पहुंचा। बच्चों को पोषण, दलिया, मच्छरदानी और टीकाकरण जैसी जरूरी सुविधाएं नहीं मिल पाईं।वहीं, मृत बच्चों के परिवारों को आर्थिक मदद देने पर सिंघार ने कहा कि सिर्फ सहायता देना काफी नहीं है। सरकार की जिम्मेदारी है कि उसकी योजनाएं हर जरूरतमंद तक पहुंचें। स्वास्थ्य मंत्री की जिम्मेदारी तय नहीं की गई। मुख्यमंत्री मोहन यादव ने चुप्पी साध ली।

बिरसा विकासखंड में पहली मौत 16 जून को
बालाघाट के बिरसा विकासखंड के बैगा आदिवासी बहुल इलाकों में बच्चों की मौत का सिलसिला जून 2026 से सामने आया। उपलब्ध जमीनी रिपोर्ट के मुताबिक पहली दर्ज मौत 16 जून 2026 को बोंदारी गांव में 16 वर्षीय रूपलाल धुर्वे की हुई थी।इसके बाद 26 जून को कोहनीमोड़टोला की 14 वर्षीय लमनिन धुर्वे और 27 जून को साहिल धुर्वे की मौत हुई। इसके बाद बोंदारी, कुंडेकसा, कोरका और आसपास के गांवों में बच्चों की मौतों का सिलसिला बढ़ता गया।

गांवों में लगातार बच्चों की मौत
मामला शुरुआत में स्थानीय स्तर तक सीमित रहा। प्रभावित गांवों में लगातार बच्चों की मौत के बावजूद इसकी व्यापक जानकारी बाद में सामने आई। अगस्त में स्थानीय ग्रामीणों, जनप्रतिनिधियों और मीडिया रिपोर्टों के जरिए मामला सार्वजनिक हुआ।22 जुलाई को अडोरी पंचायत के सरपंच ने बोंदारी में तीन बच्चों की मौत की जानकारी तत्कालीन अनुविभागीय अधिकारी को दी थी। इसके बाद 12 अगस्त को जिला प्रशासन ने प्रभावित गांवों में बीमारी के प्रकोप को लेकर पत्र जारी किया।

कई कारण सामने आए।
अगस्त के मध्य तक मीडिया रिपोर्टों में मौतों की संख्या बढ़कर सामने आने लगी और मामला प्रदेश स्तर पर चर्चा में आ गया। इसके बाद केंद्र और राज्य की स्वास्थ्य टीमें प्रभावित इलाकों में पहुंचीं। जांच में केवल मलेरिया ही नहीं, बल्कि खसरा, मलेरिया, दोनों का संक्रमण, कुपोषण, एनीमिया, निमोनिया, निर्जलीकरण और शॉक जैसे कई कारण सामने आए।