कविता विकास की ग़ज़लें - rashtrmat.com

कविता विकास की ग़ज़लें

कविता विकास की ग़ज़लें संघर्ष, प्रेम, आस्था और अधूरेपन के बीच मनुष्य की जिजीविषा को व्यक्त करती है। यह ग़ज़ल उस मनुष्य की आवाज़ है जिसके हाथों में आसमान है, दिल में प्रेम है और भीतर आस्था लेकिन उसके रास्ते में परिस्थितियों की दीवारें खड़ी हैं। फिर भी वह उम्मीद और प्रेम का दामन नहीं छोड़ता।

कविता विकास की ग़ज़लें

हमारे दिन अगर बेहतर से बेहतर आ भी जाएँ तो

जुड़े रहना है धरती से, शिखर पर आ भी जाएँ तो

इन्हीं  के  बीच से  रस्ते  हमें  आगे  बनाने हैं

बड़े-छोटे जो बाधाओं के भूधर आ भी जाएँ तो

यही चाहत है बच्चों को सदा खिलता हुआ देखें

चमन में ग़म के दर्दीले बवंडर आ भी जाएँ तो

सलीक़े से बहा देना, इन्हें पलकों की कोरों से

सताने के लिए यादों के लश्कर आ भी जाएँ तो

हमेशा ही  बँधे रहने हैं, चौखट से  हमारे पाँव

कमाने को भले ही घर से बाहर आ भी जाएँ तो

खुली आँखें रहें मन की, तभी मिलते हैं ईश्वर भी

नहीं तो  ढ़ूँढ़ते रहना वे घर पर आ भी जाएँ तो

अगर ठाना  है जीतेंगे, तो जीतेंगे  ही जीतेंगे

हज़ारों ही मुकद्दर के सिकंदर आ भी जाएँ तो

मेरी  मुट्ठियों  में  भरा  आसमाँ  है

मगर फिर भी उड़ने से महरूम जाँ है

रही तल्ख़ बोली सदा सुर्खियों में

दिलों में जो उतरी वो शीरी ज़ुबाँ है

जिसे प्रार्थनाओं में ढूँढा किए हम

वो कण – कण में बैठा, यहाँ है वहाँ है

ठहरती नहीं है  थकन पास उसके

हर इक गाम जिसने दिया इम्तिहाँ है

सरे-बज़्म जिसने मिलायी न आँखें

मेरा दिल उसी पर हुआ मेहरबाँ है

नहीं पास है तू तो लगता है मुझको

बहारों के मौसम में ठहरी खिज़ाँ है

हमारी मुहब्बत मुक़म्मल न होगी

अदावत की आँधी अगर दरमियाँ है

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