*एनजेओआरटी की रिपार्ट ने मेडिकल स्टाफ की कमी बताया
राष्ट्रमत न्यूज,बालाघाट(ब्यूरो)। सीएमएचओ डॉ. दाहिया के अनुसार, हर जिले में एक महामारी विशेषज्ञ होता है, जो बालाघाट में नहीं है, लेकिन जिले में महामारी नियंत्रक व सर्विलांस अधिकारी के रूप में डा. प्रदीप गेडाम कार्य कर रहे हैं।उन्होंने कहा कि एनजेओआरटी की टीम अगस्त में बालाघाट आई थी। टीम ने विभाग को जो सुझाव अथवा अनुशंसा की थी, उसके अनुसार कार्य किए जा रहे हैं। इसमें घर-घर जाकर सर्वे करने, संदिग्ध बच्चों की जांच, उपचार सहित अन्य उन्हें बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं देने कहा गया था।

रोग निगरानी प्रणाली पूरी तरह विफल
बालाघाट जिले के बैहर व बिरसा अंचल में मलेरिया, खसरा सहित अन्य संक्रामक बीमारियों के चलते बच्चों की मौत के मामले में केंद्र सरकार की नेशनल ज्वाइंट आउटब्रेक रिस्पांस टीम (एनजेओआरटी) की रिपार्ट ने प्रभावित क्षेत्रों में महामारी विशेषज्ञ सहित मेडिकल स्टाफ की कमी को उजागर किया है। रिपोर्ट के मुताबिक, बालाघाट में बीमारी की निगरानी करने वाली रोग निगरानी प्रणाली पूरी तरह विफल साबित हुई है।

जन-स्वास्थ्य प्रयोगशाला ही नहीं है
जून-जुलाई के माह में जब प्रभावित क्षेत्रों में महामारी अपने चरम पर थी, तब इसकी निगरानी के लिए कोई विशेषज्ञ नहीं था। इसके अलावा रिपोर्ट में दावा किया गया है कि जिले में जन-स्वास्थ्य प्रयोगशाला ही नहीं है, जहां संक्रामक बीमारी के फैलने, उसके प्रभाव का पता लगाया जा सके। एनजेओआरटी ने अगस्त 2026 में प्रभावित क्षेत्रों का मुआयना किया था और 16 सितंबर को कलेक्टर बालाघाट से अपनी रिपोर्ट साझा की थी। सीएमएचओ ने बताया कि बालाघाट में महामारी विशेषज्ञ यानी एपिडेमियोलाजिस्ट के पद पर अल्का दुबे ने प्रभार संभाला था, लेकिन बाद में उन्हें भोपाल अटैच कर दिया गया।

मामला अब सुप्रीम कोर्ट में
विडंबना है कि बालाघाट के दूरस्थ व वनांचल क्षेत्र में विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी बनी हुई है। स्वास्थ्य विभाग के अनुसार, बैहर और बिरसा विकासखंड में विशेषज्ञ चिकित्सकों के कुल आठ पद स्वीकृत हैं। हैरानी की बात है कि सभी आठ पद अब भी रिक्त हैं। इसके अलावा मेडिकल आफिसर और पैरामेडिकल स्टाफ के भी कई पद अब भी रिक्त हैं। इधर, बालाघाट जिले के बैहर-बिरसा क्षेत्र में बैगा आदिवासी बहुल गांवों में बच्चों की मौत का मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है।