इमली चाची / कहानी - rashtrmat.com

इमली चाची / कहानी

महेश कुमार केशरी की कहानी इमली चाची बताती है जिस औरत को समाज ने जाति के कारण कभी अपने बराबर नहीं माना, वही अपने स्नेह और सेवा से उस घर की आत्मा बन गई और जब उसका सम्मान करने का समय आया, तब वह नहीं थी।इस कहानी का मुख्य भाव जातिगत भेदभाव के बीच मानवीय आत्मीयता और अधूरे रह गए सम्मान का है।

       

   इमली चाची / कहानी

राकेश का बचपन गांव में ही बीता था। राकेश को दादी अच्छी तरह  याद है। और  याद है उसका गांव और इमली चाची। उसके घर में रहने वाले सैकड़ों नौकर-चाकर। हाथी घोड़े, बग्धियाँ, कार-मोटर, उसका बचपन बहुत ही ऐशो-आराम में बीता था। उसे अपने बचपन की लगभग हर बात अच्छी तरह से याद थी। गांव का भूतिया कुंआ, आम का बगीचा। राजा की हवेली। इन्हीं स्मृतियों में उसे याद थी, इमली चाची। इमली चाची हवेली में आती थी। दादी और मां की हमेशा मालिश करती। ये उनका रोज का काम था। नियम से वो सुबह-शाम दादी और मां की मालिश करने के लिए आती थी। जहां मालिश की जाती उस कमरे में किसी को आने-जाने की इजाजत नहीं थी। एक तरह से वो जनानियों का कमरा था। राकेश उस समय छोटा था। इसलिए उसको उस कमरे में आने-जाने की आजादी थी। राकेश को ये कमरा बड़ा अजीब लगता था। बड़ा ही रहस्मयी। इमली चाची का मालिश का काम अधिक देर चलता। वो अक्सर वो राकेश के घर पर ही रुक जाती थी। इमली चाची के खाने  के लिए एक थाली वहीं आँगन में पड़ी रहती थी। जिसमें दिन दोपहर का खाना इमली चाची को दिया जाता था। जिस थाली में उनको खाना दिया जाता था। गंदा और काला सा था। दरअसल, इमली चाची का पूरा जीवन ही उपेक्षित था। जब इमली चाची चली जाती। तो उस पूरे कमरे को नौकर पानी और सर्फ से धोते। कमरे के साथ-साथ दादी भी राकेश को रहस्मयी लगती थी। वैसे तो दादी इमली चाची से दूर-दूर ही रहती थी। लेकिन मालिश के समय वो अपनी

कमर, पैर, पीठ, हाथ, कंधे बहुत प्रेम से मलवाती। लेकिन मालिश के बाद इमली चाची से दूर-दूर ही रहना पसंद करती। बात-बेबात झिड़क देती थी।

दादी का अजीबो-गरीब तरह का मनोविज्ञान था। जो हमारे समझ से बाहर का था। एक ही समय में वो इमली चाची से अलग-अलग कैसे व्यवहार कर सकती थी ? मैं समझ नहीं पाता था। राकेश देखता उसके घर में इमली चाची से तो लोग और सब बातों में हँसी-मजाक करते। लेकिन पलंग पर जाने की इजाजत इमली चाची को नहीं थी। घर की चीजों को छूआ जाने का डर था।

राकेश देखता इमली चाची से इस घर में दो तरह का व्यवहारलोग करते थे। उनके लिये एक अलग तरह का वर्तन, चाय पीने का काँच का ग्लास उस रहस्यमी कमरे के बाहर  औंधे मुँह घर के आंगन में बरगद के पेड़ के नीचे पड़ा रहता था। जिसमें घूल जमीं होती। जब तक दादी और मां जीवित रहीं। उसी ग्लास को पानी से धोकर इमली चाची को चाय दी जाती थी।

राकेश अक्सर अपनी दादी से पूछता- ‘दादी मां, इमली चाची को आप लोग कप में दूध वाली चाय क्यों नहीं देते। उनको आँगन में खराब पडे फेके हुए काँच के ग्लास में ही लाल चाय क्यों देते हैं? दादी, हँसती ‘बेटा वे लोग नान जात के हैं।’

इमली चाची जब अपने घर जाती। तो उनको रात की बची हुई बासी रोटियाँ एक कपड़े में बांध कर दी जाती। यही इमली चाची की मजदूरी थी। चंद बासी रोटियों को लेकर ही इमली चाची हवेली पर आकर मां, दादी और घर की जनानियों को तेल से घंटों मालिश  किया करतीं थीं।

खैर, इमली चाची मेरे लिये कौतूहल का विषय थी। मां और दादी इमली चाची को विधवा कही। मैं एक बार विधवा का मतलब मां से जानना चाहता था। मां ने ही मुझे बताया था। विववा का मतलब बेवा होता है। इमली चाची जवानी के दिनों में ही विधवा हो गई थी। उनके कई लड़के और बच्चे थे। उनका घर मिट्टी का था। जब भी मैं उधर से गुजरता आँगन में मुर्गे, मुर्गियाँ इधर-उधर भागते हुए दिखाई देते। इमली चाची के आँगन में बकरियाँ बँधी होती। कई बार जब मुझे तेज बुखार आता। गांव के वैद्य चाचा बकरी का दूध पिलाने को कहते। ये दूध मुझे इमली चाची के यहां से मिलता था।

इसके अलावे इमली चाची खेतों में मजदूरी भी करती थी। भड़‌भूजन के वहां जब मूँजा, पूँजाता था, तो इमली इमली चाची जंगल से पत्ते बटोरकर लाती। लकड़ियाँ चुनकर लाती।

राकेश धीरे-धीरे बड़ा होता गया। राकेश की नसें भींग आई थी। अब जनानियों के कमरे में राकेश को जाने की इजाजत नहीं थी। फिर, राकेश पढ़ाई के लिए शहर चला गया। धीरे-धीरे राकेश अब शहर का होकर रह गया। शहर से कुछ दिनों के लिए गांव चला जाता तो गाहे-बगाहे उसकी नजर इमली चाची पर पड़ ही जाती थी। वो इमली चाची को देखता तो उसे वो रहस्मयी कमरा फिर अपने पास बुलाता। वो सोचता कि वो फिर से जाकर देखे कि दादी मां या मां की मालिश इमली चाची क्या पहले की तरह ही करती हैं। वो उस चटाई के बारे में सोचता। उसके बाद फर्श के पानी और सर्फ से घुलाई के बारे में सोचता। कि क्या वे चीजें पहले की तरह ही क्रमवत वैसे ही चल रहीं हैं। या फिर शहर की तरह वहां भी अब बदलाव आ गया है।

खैर, राकेश जब भी इमली चाची से मिलता तो वो अभिवादन में उनके पैर जरूर छूता। शिक्षा का प्रभाव राकेश पर पड़ना तो अवश्यंभावी था। हालांकि इस बात से राकेश की दादी राकेश पर बहुत गुस्सातीं। और उसको बुरा-भला कहतीं। राकेश की शादी गांव में ही हुई थी। उसकी पत्नी अभी सास-ससुर की सेवा में दिन-रात लगी रहती थी। राकेश की पत्नी इधर गर्भ से थी। जिस दिन राकेश की पत्नी को बच्चा होने वाला था। उस दिन ही रात को अचानक से राकेश की पत्नी को बहुत तेज दर्द उठा। रात को ही राकेश इमली

चाची के घर से बुलाकर ले गया था। सारी रात इमली चाची ने जागकर ही बिताई। सुबह-सुबह राकेश की पत्नी को बच्चा ठीक-ठाक हो गया। राकेश इस बार इमली चाची का ऋणी हो गया था। गांव आता तो इमली चाची के लिये कोई-ना-कोई उपहार साड़ी, कपड़े या मिठाई लेकर जरूर आता।

धीरे-धीरे राकेश का गांव आने-जाने का सिलसिला थम गया था। इधर एक दिन दादी मां के बाद मां का भी स्वर्गवास हो गया। दादी मां के स्वर्गवास में राकेश गांव गया था। उस समय इमली चाची से उसकी मुलाकात हुई  थी। राकेश इमली चाची से मुखातिब होकर बोला- ‘चाची, आपने, अपने बहू की उस रात बहुत सेवा की। आपके कारण ही मेरा बच्चा सकुशल इस धरती पर जन्म ले सका। मन करता है, आपके पाँव दबाऊँ। कहते हैं, ना लोग कि मां के चरणों में ही स्वर्ग होता है। एक दिन मैं आपके घर आऊँगा। और आपके पैर दबाऊँगा।’

इमली चाची हँसकर कहती- ‘बबुआ, मुझे नरक में भेजोगे क्या? कहाँ तुम ऊँची जाति के होके मेरे पाँव दबाओगे। कहां हम नान्ह जात के लोग और कहां तुम ऊँची जाति के लोग ।’

‘इमली, चाची मैं जाति की हैसियत से नहीं। बल्कि बेटे की हैसियत से आपके पाँव दबाऊँगा।’

राकेश की पत्नी को जो लड़का पैदा हुआ था। उसका एक पैर टेढ़ा था। इमली चाची ने सौरी वाले दिन से ही विक्रांत (राकेश का लड़का) के पैरों में तेल मल-मलकर पैर को ठीक किया था। करीब चार-पाँच महीने की मालिश के बाद विक्रांत का पैर सीधा हो गया था। इस बात को बीते चार पाँच-साल हो गये थे। राकेश, विक्रांत को जब भी क्रिकेट खेलते हुए या दौड़ते हुए देखता तो इमली चाची याद आ जाती। तब राकेश अपने आपको कोसता कि कितनी सीधी-साधी स्त्री के साथ उसके घरवालों ने दुर्व्यवहार किया।

दादी मां की मृत्यु के दो-तीन महीने बाद राकेश की मां लंबी बीमारी के बाद चल बसीं।मां की अंत्येष्ठि के बाद एक दिन राकेश लायब्रेरी में कोई किताब उलट-पलट रहा था कि डी तभी उसकी नजर बरगद के पेड़ पर चली गई। ही टहलते टहलते राकेश ने बरगद के आसपास नजर दौड़ाई लेकिन अल्मुनियम की वो थाली ई उसे कहीं नहीं दिखी। उसकी नजर काँच के गंदे ग्लास को ढूँढ रही थी। लेकिन वो भी बरगद आसपास कहीं नहीं दिखा राकेश तेजी से बैठक पार करते हुए  नौकरों के कमरे में गयाlऔर, एक नौकर से पूछा ‘वो ग्लास और अल्मुनियम की गँदी थाली। जिसमें इमली चाची खाना खाती थी। वो नहीं दिख रही है। तुम लोगों ने फेंक दिया क्या?’

‘अब, उसकी क्या जरूरत है?’ नौकर बोला। ‘क्यों?’ “क्यों क्या? इमली चाची गुजर गईं?’ ‘कब?’ ‘हो गये करीब बीस-पच्चीस दिन ?’ राकेश का कलेजा धक्क से करके रह गया।

‘तुमलोगों को एकबार फोन करना चाहिए था।’

‘अब एक चमईन के मरने पर आपको फोन करना हमें ठीक नहीं लगा। ये बहुत छोटी सी बात थी।’

‘वो चमईन नहीं मेरी मां थी… मां।’ ‘क्या?’ नौकर कुछ समझ नहीं पाया।

राकेश की आखिरी ख्वाहिश थी कि वो एक बार अपने हाथों से इमली चाची का पैर जरूर दबाये।टहलते हुए राकेश उस कमरे तक गया। कमरे में चटाई वैसे ही फैली हुई थी। लगा जैसे, इमली चाची मां को तेल लगा रही हो!

 महेश कुमार केशरी

श्री बालाजी स्पोर्ट्स सेंटर  मेघदूत मार्केट फुसरो,

बोकारो- झारखंड 829144

मोबाइल 903 1991 875

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