लड़कियों की हँसी / कहानी - rashtrmat.com

लड़कियों की हँसी / कहानी

उर्मिला शिरीष की कहानी“लड़कियों की हँसी” के भीतर कई पीढ़ियों का सामाजिक इतिहास समाया हुआ है। इसका केंद्रीय संदेश यह है कि स्त्री की हँसी, शिक्षा और स्वतंत्रता पर लगाए गए प्रतिबंध अंततः टिकते नहीं हैं। जो अधिकार कभी छीन लिए जाते हैं, उन्हें आने वाली पीढ़ियाँ वापस हासिल कर लेती हैं।

लड़कियों की हँसी / कहानी

‘‘एक राजा था। उसकी चार रानियाँ थी। राजा अपनी एक रानी को सबसे ज्यादा प्रेम करता था क्योंकि वह अत्यंत सुंदर थी। चंचल थी। उसकी मन मोहक अदाओं का राजा दीवाना था। उसे भी राजा को खुश रखना आता था। राजा अपने राज्य पर, राज व्यवस्था पर दूसरे राजाओं के साथ या अन्य रानियों की पुत्रियों तथा पुत्रों से कैसे संबंध रखता था रानी इन बातों पर ध्यान न देकर केवल अपने रूप सौन्दर्य, अपनी देह, अपनी मुस्कराहट पर ध्यान देती थी। राजा से मिलने वाले उपहार ही उसकी संपत्ति थे। कहा जाता है कि एक बार वह सुंदर रानी राजा का उपहास (उपहास का कारण बस इतना सा था कि राजा की पगड़ी एकाएक गिर गयी थी जिससे उसका गंजापन सारे दरवार वालों ने देख लिया था) उड़ाते हुए सबके सामने खिलखिलाकर हँस दी थी। बस फिर क्या था वो हँसी राजा के दिल में कांटे की तरह चुभ गयी। रानी बहुत रोई गिड़गिड़ायी पर राजा का दिल न पिघला। राजा एक रात उसे चुपचाप उसका मुँह बांधकर घने जंगल में छोड़ आया। कहते हैं उस जंगल में आज भी किसी स्त्री के हँसने और रोने की आवाजें सुनाई देती हैं।‘‘ दादी कहानी सुनाते-सुनाते एका एक रुक गयी और लंबी सांस लेकर बोली,‘रानी को एक मौका तक नहीं दिया राजा ने।‘‘विशाखा लिखते-लिखते रूक गयी।नताशा और सुरेखा दादी का चेहरा देखे जा रही थी।
‘‘दादी, आगे क्या हुआ?‘‘
‘‘आगे की कहानी कल सुनायेंगे।‘‘
‘‘कल क्यों दादी, आज ही सुनाओ न। कल आप दूसरी कहानी सुनाने बैठ जाओगी।‘‘
‘‘उनका अंत तो हमेशा छूट ही जाता है।‘‘
टी.वी. पर कोई फिल्म शुरू हो गयी थी। नताशा और सुरेखा ठहाका मारकर हँसे जा रही थी।
‘‘थोड़ा धीमे नहीं हँस सकती।‘‘
‘‘क्यों।‘‘
‘‘कौन उलझे तुमसे। थाली लग गयी है पापा को दे दो। हमारी अम्मा तो हँसी की आवाज सुनकर आग बबूला हो जाती थी और हम थे कि हँसते ही जाते थे। अम्मा थप्पड़ मारती तब भी हँसी रुकती न थी पर तुम तो हमारी नाक कटवाकर मानोगी!‘‘
‘‘आसमान ने उनकी हँसी निगल ली थी।‘‘
‘‘आसमान कब से इतना दुष्ट हो गया? क्यों आसमान दोस्त! तुम भी हँसी निगल लेते हो। हाँ हवाएं जरूर भंवर बनाती है।‘‘
‘‘क्या…? क्या फितूर चढ़ा रहता है तुम सब पर।‘‘
‘‘अम्मा, आप भी क्यों गड़े मुर्दे उखाड़ रही हो।‘‘
‘‘बताओ न दादी।‘‘ विशाखा, नताशा और सुरेखा तीनों दादी के पास आकर उन्हें घेरकर बैठ गयी।
‘‘तुम्हारी मम्मी नाराज होगी। उन्हें लगता है कहीं वही अभिशाप तुम्हारी हँसी न छीन ले।‘‘
माहौल एकाएक रहस्यमय, खामोश और बैचेनी से भर गया।
‘दादी। दादी मेरे भीतर गुब्बारे फूल रहे हैं।‘‘
‘क्या कोई सीरियस बात है दादी?‘‘
‘‘कहीं ये राजा हमारे परदादा और रानी परदादी ही तो नहीं थी?‘‘
‘‘दरवाजा बंद कर दो। तुम्हारे पापा ने सुन लिया तो चिल्लायेंगे।‘‘
‘‘दादी, आप भी पापा से डरती हो? बूढ़ी औरतों को तो आदमियों से नहीं डरना चाहिए। आखिर इन आदमियों में ऐसा क्या होता है कि ये बच्ची, जवान, बूढ़ी सबको डराकर रखते हैं।‘‘
‘‘नहीं। मैं डरती नहीं हूँ पर…..।‘‘
विशाखा ने दरवाजा बंद कर दिया। नताशा ने टी.वी की आवाज धीमी कर दी। सुरेखा अपनी मुस्कराहट समेटकर मुँह पर हाथ रखकर बैठ गयी।
‘‘तुम्हें ये जो हँसी मिली है। खिलखिल करती, छरहरी काया की तरह, छरहरी हँसी जिसमें सूरज की उजास और पत्तों की मर्मर ध्वनि होती है, कह लो पक्षियों की चहचहाहट होती है वो अपनी परदादी से मिली है।‘‘
‘‘और ये जो संुदरता है न तुम्हारी जिस पर तुम तीनों इतराती हो वो भी परदादी से उतरकर आई है।‘‘
‘‘और बुद्धि…?‘‘ नताशा ने पूछा।
‘‘बुद्धि, वो दादा जी से मिली है।‘‘
‘‘हमारी माँ से हमें क्या मिला है?‘‘
‘‘तुम खुद देख लो। क्या मिला है? जिसने डरके मारे हँसना ही बंद कर दिया है। वो किसी को क्या देगी।‘‘
‘‘दादी, हम लड़कियाँ जब भी हँसती हैं तो सब टोकते क्यों हैं। अम्मा तो हमारी हँसी के पीछे पड़ी रहती हैं। एक बार तो इतना तक बोल दिया था कि‘अगर द्रोपदी दुर्योधन के ऊपर न हँसी होती तो महाभारत का युद्ध न होता। किसी एक औरत की हँसी इतना बड़ा युद्ध करवा सकती है? अब हम क्या करें दादी,काॅलेज में मैडम टोकती रहती है, क्लास में लड़कियाँ, घर में अम्मा आखिर हम इस उम्र में नहीं हँसेगे तो कब हँसेंगे? हमारी हँसी क्या इतनी मायने रखती है?‘‘
‘‘हँसने की भी कोई उम्र होती है? हँसी तो अजर-अमर होती है जैसे फूलों का रंग पक्का होता है। जैसे पानी बहती नदी में ही संुदर लगता है। जैसे समन्दर में उठती लहरें नज़रे नहीं हटने देती हैं। जैसे बादल अपना आकार बदलते रहते हैं। जैसे सितारे और गृह अपनी चमक नहीं खोते हैं। वैसे ही हँसी होती है संगीत की स्वरलहरियों की तरह, झरनों की तरह, ठण्डी हवा की तरह क्या-क्या कहूँ। तुम्हारी परदादी तो हँसी की पर्याय थीं। हँसी की रानी!‘‘
‘‘अरे वाह दादी आप तो कविता की भाषा बोल रही हो। पर दादी, आज आप परदादी की कहानी तो सुना दो।‘‘
‘‘तुम्हारी परदादी बहुत सुंदर थी। सिनेमा की जो नायिकाएँ होती हैं न उनकी तरह। लंबे बाल,गोरा दही सा चिकना रंग,भरी-भरी देह, कजरारी आँखें और उनकी चाल तो ऐसी कि लोग देखते रह जाते थे। तुम्हारे परदादा उनकी पहरेदारी करते हुए आगे-पीछे चलते थे। मजाल कि गाँव का कोई आदमी उनका चेहरा देख ले। परदादा ने उन्हें कैद करके रखा था। परदादा की इस दुष्टता से तुम्हारी परदादी जिनका नाम श्यामा था एकदम घबरा गयी थी। उनकी बैठक तक सुनाई देने वाली हँसी धीरे-धीरे गुम होती गयी। परदादा जब भी उन्हें हँसता हुआ देखते उनके तन-बदन में आग लग जाती। ‘मुँह कुचल दूँगा। जीभ काट दूँगा।‘ पर दादा के ये दो वाक्य उनकी जवान पर रखे रहते। दादा जितना चिढ़ते श्यामा उतना ही मुँह में धोती का छोर दबाकर हँसती। जैसे ही दादा बाहर जाते वैसे ही दादी घर से बाहर निकल जाती। सबसे मिलना-जुलना। हँसी ठिठोली करना। लोगों को छेड़ना। वे चिड़ियाँ की तरह उड़ने लगती। तालाब में जाकर बाल धोती। हाथ पाँव घिसकर नहाती। झूला झूलती और फिर अंदर जा घुसती। उनकी हँसी का एक और कारण होता कि कैसे उन्होंने अपने पति को बेवकूफ बनाया है। लो कर लो कैद! जियेंगे तो हम अपनी मरजी से ही। उनके ठहाके गूँजने लगते। स्त्रियों की टोली का यह साप्ताहिक कार्यक्रम बिना किसी रोक-टोक के चलता रहता। दादा जी इतना तो जानते थे कि श्यामा उनकी बातों को हवा में उड़ा देती है। उनके सामने सीधी सच्ची बनकर हाँ में हाँ मिला देती। वे मन ही मन मिसमिसाकर रह जाते।
‘‘हम खेत पर जायें क्या?‘‘ श्यामा उनसे पूछती।
‘‘हमारे घर की औरतंे बाहर का काम नहीं करती।‘‘
‘‘हमको खेती बाड़ी का काम आता है।‘‘
‘‘तो क्या हुआ? ये आदमियों का काम है, आदमी करेंगे।‘‘
फिर श्यामा नया रास्ता निकालती- दुर्गा जीजी मशीन का काम सिखा रही है हम सीख लें?‘‘ मन ही मन वे हँसती बेवकूफ आदमी, हम पूछ रहे हैं यही क्या कम है?
‘‘फिर कहोगी सिलाई मशीन ला दो।‘‘
‘‘हाँ तो…।‘‘ वे अपने पति को ऐसी कठोर और उपेक्षाभरी निगाहों से देखती कि परदादा भीतर ही भीतर सिहर उठते।
श्यामा कुछ दिन शांत रहीं फिर बिना पूछे ही दुर्गा जीजी के घर जाने लगी। दुर्गा जीजी के पिताजी पढ़े लिखे थे। स्कूल में मास्टर थे। उन्होंने अपनी लड़कियों को भी थोड़ा बहुत पढ़ाया-लिखाया था। श्यामा का मन भी पढ़ने के लिए मचल उठा।
‘‘पढ़ोगी?‘‘
‘‘आप पढ़ा दो ना!‘‘
वे सिलाई-कढ़ाई छोड़ के पढ़ाई में लग गयी।
वर्णमाला, गिनती, फिर वाक्य बनाना, धीरे-धीरे पढ़ना। श्यामा को पढ़ाई में मजा आने लगा था। दुर्गा जीजी बताती थी कि श्यामा का दिमाग बहुुत तेज था। घर में किसी को पता ही न था कि श्यामा पढ़ने-लिखने लगी है। परदादा को उनकी हँसी सुनाई नहीं दे रही थी इसलिए वे निश्ंिचत थे उन्होंने मान लिया था कि श्यामा की हँसी उन्होंने दबा दी है। एक दिन परदादा ने देखा कि श्यामा पोस्ट ऑफिस से कार्ड लेकर आ रही है।
‘‘किसके लिए ला रही थी? तुम पोस्ट आॅफिस कैसे गई?‘‘
‘‘अपने लिए।‘‘
‘‘कौन किसको चिट्ठी लिखता है।‘‘
‘‘हम खुद लिखते हैं।‘‘
‘‘अनपढ़ औरत मज़ाक उड़ाती है।‘‘ परदादा बीच गली में चिल्ला रहे थे। बाहर जाने की आज्ञा क्या दे दी तू तो कुतिया की तरह द्वार-द्वार जाकर पूँछ हिलाने लगी।‘‘
‘‘अनपढ़ आदमी को हर बात मजाक ही लगती है।‘‘
‘‘एक बार बाहर क्या जाने दिया तू तो खसमखानी हो गयी।‘‘
ये दखें! ये श्यामा ने चीखकर कहा था, ‘‘आज गाली दी है, बर्दाश्त कर रहे हैं दुबारा दोगे तो बर्दाश्त नहीं करेंगे। तुम्हारी खरीदी गयी जोरू नहीं हैं हम, समझे। अपनी जवान को लगाम लगा लो वरना…।‘‘
परदादा हक्के-बक्के श्यामा का चेहरा देखते रह गये। हाथ उठाते-उठाते रह गये। अंदर से डर रहे थे कहीं श्यामा पलटकर हाथ न पकड़ ले।


‘‘आजकल चिरैया बहुत उड़ रही है। हरा….म।‘‘ आखिरी शब्द मुँह के भीतर फंस गया।
‘‘तो क्या पिंजरे में बंद रहें?‘‘
इस औरत को हो क्या गया है। ये तो मरखू गाय बनती जा रही है। इसके सींग तोड़ना पड़ेंगे या खूंटे से बांधकर मुँह पर मस्क बांधना पड़ेगा। परदादाजी चारपाई पर पड़े करवटें बदल रहे थे और श्यामा किसी के साथ बैठकर मुँह में धोती का छोर दबाकर लगातार हॅस हँसकर आज का घटनाक्रम बयान कर रही थी।
श्यामा खेत पर किसी काम के बहाने निकल जाती। वहाँ काम करने वाली औरतों, आदमियों से गप्पें लगाती और परदादा के लौटने के पहले लौट आती। उनके ठहाकों से हरे-भरे गेहूँ के खेत में पकी बालियाँ तक हँसने लगती। काम करते हाथ क्षणभर के लिए रुक जाते और फिर वे सब भी हँस देते। उनकी हँसी पत्तों पेड़ो, आकाश, बादल, कुँआ-बावड़ी सबके बीच अंदर बाहर गूँजती रहती थी।
श्यामा की हँसी को एक झटका तब लगा था जब तुम्हारे परदादा ने उनके सामने एक औरत को लाकर खड़ा कर दिया था।
‘‘एक औरत! कौन औरत?‘‘
‘‘हाँ। परदादा ने दो शादियाँ की थी।‘‘
‘‘क्यों!‘‘
‘‘क्योंकि श्यामा को बच्चा नहीं हुआ था।‘‘
‘‘अब तक किसी ने बताया नहीं।‘‘
‘‘कैसे बताते? श्यामा को तो सबने एक कोने में धकेल दिया था।‘‘
‘‘फिर क्या हुआ?‘‘
‘‘श्यामा ने उस औरत से कुछ नहीं कहा। हाँ तुम्हारे परदादा को पूरी तरह से त्याग दिया था। वे इतनी अभिमानी थी कि उस औरत के आने के बाद एक घण्टे भी न रुकी। अपनी दो साड़ियाँ लेकर अकेली ही घर से निकल पड़ी।‘‘
‘‘कहाँ?, परदादा ने उन्हें रोका नहीं।‘‘
‘‘किसी ने नहीं रोका। उनकी हँसी उस घर से, उस मुहल्ले से, उस गाँव से ऐसी गायब हुई कि आज तक उस तरह हँसने वाली कोई औरत नहीं आई। सबका मानना था कि श्यामा की हँसी ने तुम्हारे परदादा का जी जला दिया था। उनका अपमान किया था सो उन्होंने दूसरी औरत लाकर उनसे बदला लिया था।‘‘
नताशा ने एक लंबी सांस ली हमें पता ही नहीं चलता है कि कब कौन हमारी हँसी से खार खाकर बैठ जाता होगा।
‘‘दादी, क्या श्यामा फिर कभी नहीं लौटी….।‘‘
‘‘नहीं, उनके मायके के लोग बताते हैं कि उन्होंने अपने मायके जाकर खेती बाड़ी का काम संभाला। अपने माता-पिता की सेवा की। वे न मांग भरती थी न काली पोत (मंगलसूत्र) पहनती थी। न ही बिछिया। सब उतार फेंका था। लोग उन्हें ताने मारते। समझाते। पर श्यामा पर कोई असर न पड़ता। श्यामा तो आँधी की तरह थी। जब आँधी आती है तो सारा सामान उड़ा देती है। श्यामा ने भी परदादा के खानदान की नींद उड़ा दी थी क्योंकि वो ब्याहता तो अब भी उन्हीं की कहलाती थी। परदादा ने परेशान होकर एक बार संदेश भेजा कि लौट आओ। अपनी औलाद न हुई तो क्या हुआ तुम्हारी बहिन (सौत) की औलाद को ही अपना मान लो। पर श्यामा के स्त्रीत्व को चोट पहुँचाने वाले परदादा भूल गये थे कि श्यामा से छुपाकर उन्होंने दूसरी औरत को लाने की (श्यामा के अनुसार- कुकर्म) गलती की थी।‘‘
श्यामा ने अपनी माँ की बड़ी दालान में बच्चों के लिए छोटा सा स्कूल खोला जिसमें पढ़ाने के लिए, दूसरे गाँव से एक मास्टर जी आया करते थे। मास्टर जी रंग रूप में राजा महाराजाओं की तरह दिखते थे और श्यामा से उनकी खूब बनती थी। श्यामा ने बाद के दिनों में उनके परिवार को वहीं रख लिया था। मास्टर जी, उनकी पत्नी और उनका बेटा श्यामा के परिवार के हिस्सा बन गये थे।
गाँव देहात का चलन श्यामा को समझ में नहीं आया। उनका खुला स्वभाव पति को त्यागने की बात और मास्टर जी का वहाँ रहना सबने मिलकर एक नयी कहानी रच दी जो श्यामा के चरित्र को लांछित करने वाली थी।
वो दूसरा मौका था जब श्यामा की हँसी पर ब्रेक लगा था। ये देह औरत की बड़ी दुश्मन बन जाती है। अगर ये देह न हो तो किसके साथ उठना बैठना, खाना-पीना, हँसना बोलना सब कुचर्चा से परे रहें। पर देह की खूबसूरती और देह की माया इंसान को भ्रमित कर देती है। श्यामा को वहाँ से भी निकलना पड़ा क्योंकि माता-पिता ने श्यामा की इतनी मरम्मत की थी कि श्यामा चार दिन उठ नहीं पाई थी। मरम्मत का कारण था गाँव वालों ने मास्टर को लेकर उनके कान भर दिए थे। जब उठी तो सुबह के चार बज रहे थे। अभी अंधेरा था पर पक्षियों की आवाजें आ रही थी। श्यामा ने अपनी दो तीन साड़ियाँ रखी। कुछ रुपये-पैसे लिए और माता-पिता की देहरी लांघकर निकल पड़ी। न ये पता था कि कहाँ जाना है? किसके पास जाना है। रात कहाँ रूकेंगी? खायेगी-पियेगी कहाँ?, मर क्यों नहीं जाती।‘‘ माता के कठोर शब्द पीछे से धक्का दे रहे थे। मैं क्यों मरूँ? उनका मन कह रहा था। मैंने कौन सा अपराध किया है। मैं किसके साथ भाग गयी? किसके साथ मैंने संभोग कर लिया? किसके साथ में रास रचा रही थी? मैं क्यों मरूँ? नहीं, नहीं मरूँगी। मैं हँसती ही तो थी तो पति नाम के आदमी ने बहाना बनाकर त्याग दिया। एकबार किसी वैद्य को, डाॅक्टर को नहीं दिखाया। यहाँ इतनी मेहनत की बच्चों के लिए स्कूल शुरू किया। माँ-बाप ने एक बार नहीं पूछा कि सच्चाई क्या है? पता नहीं औरतें सहन क्यों करती हैं। अगर एक भी औरत ने पलटकर जवाब दिया होता तो हम सबके लिए रास्ता खुल गया होता। श्यामा पैदल-पैदल चलती जा रही थी और रोती जा रही थी। बहुत याद करने पर भी उन्हें याद नहीं आ रहा था कि कोई उसकी जान पहचान का आदमी या औरत है भी या नहीं।
श्यामा दूसरे दिन अपने मामा के घर पर थी।
मामा चुपचाप बैठे थे। गहरी सोच में डूबे।
उनके धर में भी तो वही हाल है। कोई मेहमान दो दिन नहीं रह सकता।
‘‘चलो मेरे साथ।‘‘
‘‘कहाँ।‘‘
मामा का चेहरा उतरा हुआ था। उदासी और ग्लानि के कारण वे श्यामा से सीधे मुँह बात नहीं कर पा रहे थे।
एक बंगले के सामने उन्होंने अपनी गाड़ी रोकी और सीधे अंदर जा पहुँचे। बरामदें में चार-पाँच कुर्सियाँ पड़ी थी।
‘‘अरे हरिनारायण। आप कैसे?‘‘
‘‘ये मेरी भानजी है।‘‘
‘‘बैठो। चाय पिओंगी?‘‘
‘‘नहीं।‘‘
‘‘आप कह रहे थे कि कोई किरायेदार हो तो बता दूँ। ये एकदम अकेली है।‘‘
‘‘बच्चें? पति।‘‘
‘‘कोई नहीं है। आपको कोई असुविधा न हो तो ये यहाँ रह सकती है?‘‘
‘‘हमें क्या असुविधा होगी। आप लोग सोच लीजिए। मैं अकेला आदमी। एक जगह बंधकर तो रहता नहीं हूँ। इनको रहना है तो ये समझ लें।‘‘
अकेला आदमी…? मामा ने मन ही मन दोहराया फिर ये सोचकर कि ये जान- पहचान के हैं। वर्षों पुरानी पहचान है। भरोसा तो रहेगा।
‘‘ठीक है साहब! हम चलते हैं। ये आकर रहेंगी।‘‘
‘‘बहुत दिनांे से कमरा बंद पड़ा है। सफाई पुताई करवानी पड़ेगी।‘‘
‘‘वो मैं करवा देता हूँ।‘‘


मामा को एक-एक दिन भारी पड़ रहा था। कब मामी का पारा चढ़ जाये और कब वे निकल जाने का आदेश सुना दें। मामा इस सच्चाई को भली भाँति जानते थे।
अगले हफ्ते श्यामा वहाँ शिफ्ट हो गयी। अब चिंता थी तो पैसों की? कौन खर्चा उठायेगा? एक भले परिवार की औरत किसके घर के जूठे बर्तन धोयेगी? किसका खाना बनायेगी? मामा कब तक उनका खर्चा उठायेंगे।
‘‘श्यामा ने शायद उन्हीं के घर में खाना बनाना शुरू कर दिया था। उस व्यक्ति ने श्यामा को पढ़ाया। एक प्राईवेट स्कूल में नौकरी लगवाई। श्यामा ने नौकरी के साथ अपनी पढ़ाई जारी रखी। बी.ए. फिर बीएड. और फिर सरकारी स्कूल में नौकरी। उम्र की बाधा न होती तो वे काॅलेज तक पहुँच जाती फिर….। ये तो एक सामान्य औरत का जीवन है जो संघर्षों के बाद ही बनता है।‘‘
सब एकाएक खामोश हो गये।
‘‘उस रहस्यमयी की बात तो सुनो।‘‘
‘‘क्या?‘‘
‘‘तुम्हारी मम्मी ने तो बताया नहीं होगा।‘‘
‘‘नहीं।‘‘
‘‘उन्होंने अपने साथ पढ़ाने वाले आदमी से शादी भी कर ली थी।‘‘
‘‘ये कोई अनहोनी बात नहीं है।‘‘
अनहोनी बात ये है कि उन्होंने उस समय बड़ी निडरता के साथ बकायदा तुम्हारे परदादा को तलाक दिया था। तब गाँव-देहात में लोग औरत को ‘परित्यक्ता‘ के रूप जानते थे। तलाक तो विदेशों में दिया जाता है हमारे यहाँ तो औरतें त्याग दी जाती है या भगा दी जाती हैं।
‘‘ओ माई गॉड।‘‘ सुरेखा सिर थामकर बैठ गयी। बेचारी परदादी को कितना संघर्ष करना पड़ा होगा। दुनिया के तानों का। उपहास और गालियों का।‘‘
‘‘तो हम उन पर कैसे गये? हमारा तो कोई खून का रिश्ता बनता ही नहीं है।‘‘
‘‘क्योंकि तुम्हारे दादा उन्हीं की संतान थे।‘‘
‘‘आपने कहा था कि उनको संतान नहीं होती थी।‘‘
‘‘यह परदादा की उड़ायी कहानी थी। जब वे दादा को त्यागकर आई तो उनके पेट में दो माह का गर्भ था। ये बात उन्होंने छुपाकर रखी थी अन्यथा तुम्हारे परदादा अपनी संतान को किसी न किसी बहाने छीनकर ले जाते। उनके माता-पिता को मालूम था। श्यामा का किसी से कोई संबंध नहीं रहा। कभी नहीं रहा। वो अपनी संतान को जानबूझकर अपने माता-पिता के पास छोड़कर नहीं आई थी बल्कि उन्होंने उसको छीन लिया था। अपने पास रख लिया था।‘‘
‘‘ओह, तब से लेकर आज तक कुछ नहीं बदला। न आदमी की सोच, न समाज का नजरिया, न घरवालों का व्यवहार।‘‘
‘‘विशाखा, जब परदादी उस समय अपने मन से, अपने निर्णय ले सकती है यानी पति को त्याग सकती है। अपनी अस्मिता की रक्षा कर सकती है तो हम लोग हर वक्त क्यों डरे-डरे रहते हैं, कि हम तीन-तीन बहिनें हैं। हमारा कोई भाई नहीं है। हम क्यों हँसते, खिलखिलाते हैं? क्यों बाहर अकेले जाते हैं?‘‘
‘‘फिर वे कभी परदादा से मिली थी।‘‘
‘‘परदादा नहीं मिले थे।‘
‘‘क्यों!‘‘
‘‘क्योंकि उनके दिमाग में भर दिया गया था कि वे उन्हें छोड़कर चली गयी थी। यह भी बता दिया था कि किन छोटी सी बातों के कारण वे अपने पति को छोडकर चली आई थी। कई बार वे ताना मारते थे। ये भी तुम्हारे दादा ताने मारते थे कि तुम लोग भी अपनी परदादी पर गई हो। देखना नाक कटवायेंगी।‘‘
‘‘कब तक उन्होंने यह प्रताड़ना झेली थी।‘‘
‘‘पूरे सड़सठ साल तक ।‘‘
‘‘उनकी कोई तस्वीर है।‘‘
‘‘कौन उनकी फोटो निकालता। वो तो हम एक शादी में चुपचाप उनसे मिले थे। तुम्हारे परदादा को कभी पता नहीं चला था कि हम उनसे मिले थे। हाँ तुम्हारे दादा जरूर अपने बाप से मिलने जाते थे।‘‘
‘‘बाप के अपराधों को बेटे अपराध कहाँ मानते हैं बल्कि उनके प्रति सहानुभूति रखते हैं। श्यामा ने ही हमें समझाया था कि ‘‘तुम भले ही छुपकर पढ़ो पर पढ़ना जरूर। पढ़ लिख जाओगी तो जिंदा रह लोगी वरना गाय बैल की तरह जिंदगी भर हाँकी जाती रहोगी।‘‘ कहकर दादी ने एक लंबी गहरी सांस ली और अपनी आँखों को गद्दियों से ढाँप लिया।‘‘
‘‘दादी, रो रही हो?‘‘
‘‘हाँ, याद आ गयी उनकी।‘‘
‘‘साथ में तो रही नहीं फिर काहे का रोना।‘‘
‘‘एक बार का मिलना ही इतना कुछ भर गया था कि जीवनभर वे हमारे भीतर बैठी रहीं और हमें दादा से लड़ने का, विरोध करने का, जीने का सलीका सिखाती रही। वो अमृत की बूँद की तरह गिरी थी हमारे भीतर और जीवनभर उस अमृत बेल को फैलाती रहीं।‘‘
‘‘दादी, मैटर बहुत सीरियस हो गया है?‘‘
‘‘तुम तीनों को यही कहूँगी कि चाहे जो हो अपनी हँसी को कभी मत रोकना। हँसी रोकोगी तो तुम्हारी जिंदगी रूक जोयगी। तुम्हारे चेहरे की चमक चली जायेगी। हँसने वाली लड़कियाँ ही जीवन को जीतती हैं रोना तो हमें कमजोर बनाता है।‘‘
‘‘दादी, आपने मम्मी को ये बातें नहीं समझायी।‘‘
‘‘तुम्हारी मम्मी को समझा समझाकर थक गयी थी कि देखो आगे की पढ़ाई कर लो पर वो तो बस रोती ही रही और तुम्हारे पापा उसे रुलाते रहे। मैं कहती थी कि उसे दो-चार बार जवाब दो। उसको ना कहो। पतिव्रता आज्ञाकारी पत्नी मत बनो। जैसा तुम कर रही हो वैसा ही अपनी बेटियों को सिखाओगी। भगवान की कृपा है कि तुम तीनों में कोई उन पर नहीं गया है। कम से कम तुम तीनों हँसकर इस घर को मनसूनियत से तो बचाये रखती हो।‘‘
‘‘दादी, क्या आपने श्यामा दादी की कहानी मम्मी को नहीं सुनाई।‘‘
‘‘वो उनका नाम नहीं लेना चाहती है। औरत ही औरत की दुश्मन होती है, सुना है ना।‘‘ विशाखा ने तय किया कि वो श्यामा परदादी की तस्वीर खोजकर लायेगी। गुमनामी के अंधेरे में जो चेहरा आज तक छुपा था उसे उजाले में लायेंगी।
पुराने अलबम देखे जा रहे हैं। गत्थे के गत्थे फोटो भरे रखे है। ब्राउन कलर के लिफाफों में ठुँसे फोटो थैलों में कचरे की तरह भरे हैं। अलबम में कुछ फोटो इस तरह चिपक गये थे कि उनका चेहरा छितकबरा हो गया था।
फिर नताशा श्यामा परदादी के उस घर में गयी जहाँ उन्होंने एक शिक्षक से शादी की थी। वो शिक्षक जो एक तरह से उसके सौतेले परदादा होते थे। उनकी मृत्यु हो चुकी थी। उनके घर में उनके भाई का परिवार रहता था। नताशा के बहुत अनुरोध करने पर उन्होंने जितने फोटो अलबम थे सब लाकर पटक दिए। उसने चेहरा नहीं देखा था पर दादी जैसी छवि बताती थी उन्हीं की आकृति और छवि वाली एक दो फोटो वो उनसे ले आई। ‘मैं वापस कर दूँगी।‘ आते-आते नताशा ने कहा।
‘‘हमें क्या लेना-देना। रखना है तो रख लो। हमारे भाई अपने भाई के बेटे को गोद लेना चाहते थे। पर इस औरत ने कभी बेटे को गोद नहीं लेने दिया। जब तक ये मेरे भाई के साथ रही,हम लोग कभी यहाँ नहीं आये थे।‘‘
‘‘बाद में तो सब कुछ आपको ही मिल गया था।‘‘
‘‘छोड़ा ही क्या था, सब तो गाँव के स्कूल में भेजती रहती थी।‘‘
‘‘अच्छे काम के लिए ना।‘‘
वे चुप हो गये।
‘‘श्यामा दादी ने कितने दुश्मन बना कर दखे थे।‘‘
‘‘दादी, इनमें से कौन सी है श्यामा परदादी।‘‘
‘‘दोनों ही उनकी फोटो है।‘‘
‘‘सच्च।‘‘
नताशा ने जाकर दोनों फोटो इलार्ज करवाये और फ्रेम करवाकर ले आई।
‘‘पागल हो क्या?‘‘ मम्मी चिल्ला रही थी।
‘‘वे हमारी सगी परदादी थी।‘‘
‘‘तुम्हारे पापा का पारा चढ़ जायेगा।‘‘
‘‘चढने दो। पापा अपनी दादी को कैसे भुला सकते हैं।‘‘
‘जिससे कोई लेना-देना नहीं उनके पीछे तुम अपने पापा का दिमाग खराब करोगी, उन्हें नाराज करोगी?‘‘
‘‘उन्हीं से तो लेना-देना है पापा का।‘‘
‘दादी कुछ बोलो ना। आज अपने चुप्पी नहीं तोड़ी तो फिर कभी कोई चुप्पी को नहीं तोड़ पायेगा? हँसीं की विरासत हमसे भी छिन जायेगी।‘‘‘‘
‘‘अम्मा, आखिर आपके पेट में बात पची नहीं।‘‘


‘‘इस घर की एक औरत गलतफहमियों का शिकार होकर नफरत की पात्र बनकर रह जाये, क्या ये ठीक है! कहो सुमन। कितने समय से सब थूकते आ रहे हैं उनके नाम पर। उनके चरित्र पर। क्या कसूर था उनका कि वो हँसती, खेलती थी। पढ़ती थी। बाहर काम करना चाहती थी। हमारे ससुर ने झूठा किस्सा फैला दिया कि वो माँ नहीं बन सकती जबकि उनको चिढ़ाने के लिए दूसरी औरत ले आये। बच्चा तो उन्हीं का था। माँ-बाप का चले तो घर से निकाल दिया। बेचारी को उनका अपना बेटा तक नहीं दिया। बेटा भी नाना-नानी को छोड़कर जाने को तैयार न था। शहर में आकर पढ़ाई की। किसी की रखैल बनकर तो नहीं रही, शादी ही तो की थी।‘‘
विशाखा, नताशा और सुलेखा कभी दादी का चेहरा देखती तो कभी मम्मी का। आज दो औरते आमने-सामने खड़ी थी तीसरी औरत की लड़ाई लड़ने के लिए। उन तीनों ने दादी का गुस्से और दुःख से भरा चेहरा देखा। मम्मी बड़बड़ा रही थी कि ‘राजा रानी की कहानी सुनाते-सुनाते अपने ही घर की कथा-कहानी सुना डाली। लड़कियों को फालतू की बातों पर हँसी ठिठोली करने पर रोकने की बजाय उन्हें बढ़ावा दे रही हो क्यों? क्यों अम्मा। किस जन्म की दुश्मनी निकाल रही हो? आखिर यह सब बताकर क्या मिला आपको?‘‘
‘‘इसलिए कि तुम भी सब बातों से मुक्त होकर हँसना सीखो। और उस औरत को सम्मान दो जिसका स्वभाव प्रकृति ने संुदर बनाया था। तुम भी उनसे जीना सीखो। बस यही एक चीज कहो या आदत कहो या स्वभाव कहो तुम्हारी आखिरी सांस तक बची रहेगी।‘‘
‘‘उन्हें हँसी-मज़ाक से मतलब नहीं है। वे दुःख और उदासी को सहानुभूति पाने का हथियार मानकर चलती हैं।‘‘
‘‘ये हैं हमारे घर की असली रानी।‘‘ कहकर नताशा ने श्यामा की फोटो जड़ी फ्रेम को टेबल पर रख दिया।
‘‘ये तुमने सबसे अच्छा काम किया नताशा।‘‘ दादी फोटो को एकटक देखे जा रही थी।
‘‘रोना नहीं दादी, एक आँसू नहीं गिरना चाहिए। ये आपकी जीत है। आज तो जश्न मनाने का दिन है।‘‘ विशाखा उनके कंधों पर हाथ रखकर बोली।
‘‘तो कल की कहानी कहाँ छूटी थी।‘‘
‘‘दादी, राजा रानी की कहानी में अब असली रानी की एंट्री हो गयी है।‘‘
‘‘तो अब दूसरी कहानी सुनाते हैं।‘‘
पता नहीं किस बात पर लड़कियों के ठहाके पूरे घर में गूंज रहे थे। वे अंदर आई। दरवाजा खोला और चिल्लाकर बोली, ‘‘ये धुआँ कैसा है? गैस पर जल रहा है?‘‘
‘‘ये धुआँ नहीं मम्मी, हँसी के बादल तैर रहे हैं।‘‘


‘‘हँसी के बादल।‘‘ क्षणभर उन्होंने सोचा फिर हँसकर बोली, ‘‘हँस लो, हँस लो जब तक पापा बाहर हैं तब तक। उनके आते ही सब चुप हो जाओगी।‘‘
‘‘ऐसी की तैसी इनके बाप की और तुम्हारे पति की। अब से इस घर में केवल लड़कियों की हँसी ही गूंजेगी, किसी की दादागिरी की आवाज नहीं। मैं जब तक जिंदा हूँ तब तक कोई अपना हुकुम नहीं चलायेगा।‘‘ दादी ने ठसक के साथ कहा।
‘‘और आपके जाने के बाद।‘‘
‘‘भूत बनकर तीनों के साथ रहूँगी।‘‘ कहकर दादी ने श्यामा की फोटो को छाती से लगा लिया, ये न होती तो मैं इतना कुछ सीखती? कुछ कर पाती! वे मेरे जीवन में उजेला बनकर आई थी और जानती हो न, उजेला कभी खतम नहीं होता है।‘‘
‘‘किसी बुरी नजर वाले, काले धूसर बादल से जैसे चाँद और सूरज ढँक जाते हैं, उनकी चमक फीकी पड़ हो जाती टैपर उनका अस्तित्व हमेशा बना रहता है। मेरी ये बात हमेशा याद रखना।‘‘
‘‘वैसे ही तुम्हारी हँसी होनी चाहिए।‘‘
’‘दादी।‘‘ तीनों लड़कियों ने उनके आस-पास बैठते हुए एक साथ पुकारा।
‘‘बस हमेशा उनको चुनना जो तुम्हें जिंदगी जीना सिखायें। रात बहुत हो गयी है, तुम लोग भी सो जाओ। कल एक नयी कहानी सुनाऊँगी, क्योंकि हरेक का जीवन एक नयी कहानी लेकर आता है…..।‘‘
दादी ने ऊँघते ऊँघते सुना बहू किसी बात पर ज़ोर-ज़ोर से हँस रही थी। और बेटा पूछ रहा था क्या तुम्हें दैवी चढ़ गयी है जो इतना हँस रही हो।


उर्मिला शिरीष
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