मुसीबत के मारे\ व्यंग्य - rashtrmat.com

मुसीबत के मारे\ व्यंग्य

खुदा न खास्ता कभी भाई फोन करके पूछ ले तो कहना कि पच्चीस दिए थे। दस में रखा लूंगा। साला रेप वाले केस को सेटल करने के लिए अपोजीशन वाले लीडर को देना है। तू अपन का बड़ा भाई है। अपन सोचेगा तेरे बारे में। भाई को बोलेगा। कोई नया काम दिलवाओ।

मुसीबत के मारे\ व्यंग्य

जगदीश त्रिपाठी

गंगादास जी की कार कंपनी के दफ्तर के सामने रुकी  ही थी कि बल्लू दादा  की बोलेरो के ब्रेक चरमराए। गंगादास के दिल में गालियों की गंगा बहने लगी। साला फिर वसूली करने आ गया। अभी चुनाव से पहले तो आधी पेटी लेकर गया था। लेकिन अपने दिल के भावों को बाहर नहीं आने दिया। चेहरे मुस्कराहट चिपकानी ही थी। सो चिपका ली। उनकी पर मुस्कराहट वैसी ही लग रही थी, जैसे उनका डिनर का आमंत्रण स्वीकार करते समय उनकी स्टेनो की होती है। बोले, बल्लू भाई काफी दिन बाद दर्शन हुए। चलो, बैठते हैं।

दोनों भीतर बने वातानुकूलित कमरे में चले गए। सोफे पर पसरते हुए बल्लू यादा ने कहा, सेठ तुम अपन का आदमी है। तुम्हें मालूम है भाई इस बार चुनाव हार गए हैं। साला हम लोगों ने टिकट के लिए ही मादाम को पूरे सौ पेटी दिए थे। हालांकि मादाम की कोई गलती नहीं, वह तो भाई को गरीबों का मसीहा भी बोल गई। लेकिन भाई  फिर भी नहीं जीते। पूरे पांच सौ पेटी खर्च कर भी नहीं जीते। बड़ा घाटा हो गया। साला विधानसभा में दो  सौ बूथ होते हैं। सत्तर-अस्सी  कैप्चर कर लेते थे। रही सही कसर बिरादरी वाले बोट देकर पूरी कर देते थे। लेकिन लोकसभा क्षेत्र बड़ा था। कैपचरिंग  हो नहीं पाई और बिरादरी वाले भी दगा दे गए। अब इस हाल में अपनों से ही मदद मांगी जा सकती है। भाई ने बोला है ज़्यादा नहीं आधी पेटी दे दो बस।

बल्लू के शब्द गंगादास को यों लगे जैसे टायसन ने कलेजे पर घूंसा जड़ दिया हो। बड़ी मुश्किल से खुद को संभाला। आखिर उन्हें अक्सर इस तरह की दुश्वारियों से दो-चार होना पड़ता था। थोड़ी  दबी आवाज में  बोले, ‘बल्लू भाई देखो। भाई ने जो पिछला ठेका दिलवाया था उसका पेमेंट अटक गया है। अखबार वालों ने  हंगामा खड़ा कर दिया था कि हमने बाढ़ पीड़ितों जो चावल सप्लाई किया, उसकी क्वांटिटी और क्यालिटी दोनों ही घटिया थी। अब जांच अधिकारी क्लीन चिट देने आधी पेटी मांग रहा है। कहता है मार्च में मुख्यमंत्रीजी का जन्मदिन है। अभी से जोड़ रहा हूं, हमें भी नौकरी करनी है। गंगादास ने फिर बल्लू के चेहरे पर कुछ इस  तरह निगाह डाली. जैसे अपनी गुगली पर एलबीडब्लू की अपील कर रहे हों। लेकिन बल्लू ने उनकी अपील को बेरहमी से ठुकरा दिया। ‘देखो सेठ, यह भाई का हुक्म है। बाकी तुम जानो। गंगादास ने देखा कि गुगली कारगर नहीं रही तो सीधे लेगब्रेक फेंक दी। ‘बल्लू दादा भाई तो

भगवान हैं। राम हैं। आप उनके हनुमान हो। और हम हनुमान के भक्त हैं। कुछ तो सोचो। बल्लू ने सोचा, मक्खन इसीलिए महंगा हो गया है लोग खाएं कहां से। सारा तो लगाने में खर्च हो जाता है। पर सेठ की बात अच्छी लगी। बल्लू बल्ले-बल्ले हो गए। वियर का आचमन कर मुंह में चिप्स  रखते हुए बोले, सेठ चल  तू पैतीस दे दे। हालांकि ऐसा होगा नहीं, पर खुदा न खास्ता कभी भाई फोन करके पूछ ले तो कहना कि पच्चीस दिए थे। दस में रखा लूंगा। साला रेप वाले केस को सेटल करने के लिए अपोजीशन वाले लीडर को देना है। तू अपन का बड़ा भाई है। अपन सोचेगा तेरे बारे में। भाई को बोलेगा। कोई नया काम दिलवाओ। भले  भाई चुनाव  हार गए हों, लेकिन अब हैं तो सत्तारूढ़ पार्टी में। अपन अपन के लोगों का जितना भी नुकसान हुआ है, सब कर लेंगे। चिंता मत करो. सब भरपाई हो जाएगी। गंगादास के चेहरे पर चमक आ गई। बल्लू को विदा करने बाहर निकल कर सड़क तक आए। ‘ठीक है दादा, शाम को माल पहुंच जाएगा। बल्लू दादा की नीली झंडी लगी बोलेरो में बैठे आधा दर्जन बंदूकधारी छोकरे बियर की खाली बोतलें सीट के नीचे डाल अलर्ट हो चुके थे। गाड़ी के गेट खुले। बल्लू दादा अगली सीट पर विराजमान हुए और बोलेरो स्टार्ट हो गई।