सार्थक जीवन \ कहानी - rashtrmat.com

सार्थक जीवन \ कहानी

 संदीप पांडे सार्थक जीवन के जरिये बता रहे हैं कि खुशियां मिलती है बशर्ते योजना बनाकर जिन्दगी को जिया जाए।भविष्य को ध्यान में रखकर कोई काम किया जाए तो आगे चलकर जीवन सार्थक हो जाता है। उसके बस दोस्ती की पूंजी होनी चाहिए।

सार्थक जीवन \ कहानी

संदीप पांडे

ऐसा दोस्ताना था कि जो लोग पूरे स्कूल में पांच पांडव के नाम से मशहूर थे। पहली कक्षा से साथ पढ़ते आठवीं कक्षा में आने तक उनकी दोस्ती इतनी पक्की हो चुकी थी कि उनका कोई काम अकेले नहीं होता था। क्लास में साथ बैठना हो या भोजनावकाश में साथ खाना, कोई खेल खेलना हो या मटरगश्ती करना हो, तो पांचों साथ ही नजर आते थे। और तो और अगर एक के छुट्टी लेने की मजबूरी का बाकियों को पता हो, तो वो भी अवकाश मना लेते थे। आठवीं के बच्चों की यारी बारहवीं के बच्चों में और अध्यापकों में भी चर्चा का विषय थी।

धर्मेश, कबीर, जॉन, रणदीप और त्रिलोक का साथ होना एक सुमधुर जलतरंग बजने के समान या जिसे किसी बजाने बाले की आवश्यकता नहीं थी। हर तरंग स्वतः ही दूसरे के साथ जुड़ कर एक कर्णप्रिय राग पैदा करती थी। उन्हें हो-हल्ला करते तो सुना जा सकता था पर कभी झगड़ते वा नकारात्मक काम करते कभी किसी ने नहीं देखा।

अब हुआ यह कि आठयों की फाइनल परीक्षा नजदीक थी पर पांचों के चेहरे पर उन्मुक्त ऊर्जा नदारद थी। अंगूर के मीठे दाने अब गुच्छे से टूटने लगे अपनी फितरत से नहीं, कुदरत के परिवर्तनशील रबैये से। जॉन के पिता का तबादला हो जाने से अगले सत्र से वो गाजियाबाद जाने बाला था। कबीर के अब्बा ने भी उसे आगे की पढ़ाई के लिए उसके नाना के पास जबलपुर भेजने का फैसला कर लिया था। धर्मेश पढ़ने में शुरू से ही अच्छा था, तो बेहतर पढ़ाई की लालसा में उसके अभिभाबक उसका एक अच्छे स्कूल में एडमिशन कराने का मन बना चुके थे। त्रिलोक के पिता पंडिताई करते थे और अपने पुत्र का भविष्य भी उसमें तलाशने की फिराक में संस्कृत विघालय में डालने का आदेश सुना चुके थे। रणदीप अकेला ही उसी स्कूल में अपनी पढ़ाई जारी रखने वाला था। उसके टावर व्यवसायी पिता को उसकी पढ़ाई करने या न करने में ज्यादा दिलचस्पी थी नहीं। नौ बरसों के साथ के बाद होने वाले बिछोड से सबका मन अशांत या। न पढ़ाई में मन लग पा रहा था न खेल कूद में।

इंटरनेट और मोबाइल फोन से पहले के युग के यह बच्चे जैसे-तैसे खुद को नवीन परिस्थित में ढाल पाए। मगर वो साथ-साथ मिलकर जीवन का गीत गाना मूल से गये थे। अब वैसा कहाँ हो पाता था। समय पंख लगाकर उड़ता जा रहा था। बीस बरस बाद अब रणदीप अपने पिता की टुकान पर बैठने लग गया है। जमे जमाए काम में किसी तरह उसने अपना मन रमा रखा है। एक शाम दुकान पर चढ़ते एक व्यक्ति पर उसकी नजर पड़ी, तो कुछ जानी पहचानी सी जान पड़ी। वो भी सीधा उसके पास आकर बोला- रणदीप ? ‘अबे त्रिलोक’ और फिर आत्मीय आलिंगन ने कुछ देर उन्हे बांधे रखा। भाई, दाड़ी के कारन तुझे पहचानना ही मुश्किल हो रहा है।

‘पण्डित जी आप भी तो धोती-कुर्ते तिलक में बनारस के पंडे लग रहे हो।’ ‘हां, अब यही पैतृक कार्य अपना लिया है। इसी से रोजी-रोटी चल रही है। पिछले बरस घर बालों ने जबरदस्ती ब्याह मी करवा दिया है’ ‘अच्छा, वेसे मेरी भी शादी तय हो चुकी है, तीन महीने बाद है। तुझे अभी से न्यौता दे रहा हूं। भूलियो मत’ ‘हा ठीक है यार, मेरी तो जल्दी बाजी में कर दी कुछ सोचने-समझने का मौका होनहीं दिया। बाकि किसी को कोई खबर है क्या?’ ‘कहाँ यार?

तीन साल पहले जॉन जरूर आया था। नाचने गाने का शौक तो उसे पहले से ही था।अब उसी में कॅरियर बनाने की कोशिश में लगा है। कह रहा था मुंबई में पांच साल प्रयास करूंगा नहीं तो वापस यही लौट आऊंगा। उसके पिता तो रिटायर होकर यही रहने लग गए है। वो ही बता रहा था कि उसकी कबीर से मुलाकात मुंबई में हुई थी। किसी प्राइवेट कम्पनी में सेल्स का काम करने लग गया है जिसमें काफी टूर करने पड़ते है। धर्मेश का भी सुना है अमरीका जाकर पढ़ाई भी कर रह है और नौकरी भी’ ‘चलो आज तुम से मिलकर अच्छा लगा। अपना फोन नम्बर दे दो अब हम मिलते रहेंगे और भगवान ने चाहा तो बाकि सब के साथ भी मुलाकात का अवसर भी बनेगा।’

एक बरस में ही ऐसा अवसर फिर आ गया। जॉन शहर में रहने आ गया था। उसने मुंबई की जिद छोड़ अपने घर पर ही बच्चों को डांस सिखाना शुरू कर दिया था। साथ में प्रॉपर्टी डीलिंग का काम भी करने लग गया था। चर्च की गतिविधियों में भी वो बढ़कर हिस्सा लेता था। कबीर और धर्मेश भी छुट्टिया मनाने शहर में थे। रणदीप ने सबको जोड़ने के सूत्र का काम करते हुए एक नियत शाम गार्डन रेस्टोरेंट में पार्टी का आयोजन कर लिया।

बचपन की यारी ने जवानो को फिर बच्चा बनने पर मजबूर कर दिया। धर्मेश और त्रिलोक ने भी पहली बार सुरापान कर अपने आप को पुनः दोस्ती में डुबो दिया। इक्कीस साल बाद आज शायद पांचों खुलकर जीना महसूस कर रहे थे। खूब पुरानी नई बातें करते खूब रात हो गई, तो लौटते हुए जॉन ने एक प्रस्ताव रखा- हम सब अभी अपना काम जो कर रहे है वो हमारे पैरंट्स की बनाई हुई राह है। हमें इस पर विचार करना चाहिए कि क्या हम मिलकर अपने लिए कोई नई राह बना सके। एक ओर हम जो कर रहे हैं, उसमें अपना दिल लगा बेहतर करने की कोशिश करते हैं, नहीं तो मेरे पास एक प्लान है। एक साल बाद हम सब मिलकर उसको शुरू करने के बारे में सोच सकते है।’ सबके चेहरे अचानक धर्मेश की ओर मुड़ गए। ‘यह अमरीका में बसने की सोचने वाला कहां हमारे साथ धूल फकिगा’ रणदीप केमुंह से निकला। ‘ऐसा नहीं है यार, मेरी पढ़ाई तो अब पूरी हो गई है। वहां कमाई तो बहुत है पर खर्चे भी कम नहीं। यहां जैसा सुकून मिलना वहां शायद कभी संभव नहीं होगा।’ ‘चलो फिर ठीक रहा अगले साल अपने जॉइंट वेंचर को मूर्त रूप देने के लिए मैं और तैयारी करके रखता हूं। और यह भरोसा दिलाता हूं अगर यह चल गया तो सबको आनंद भी मिलेगा और खूब सारा पैसा भी।’

एक साल कुछ जल्दी ही बीत गया। और पांचों वादे अनुसार फिर साथ बैठे थे। जॉन ने फिर अपना प्रस्ताव सुनाया। तीन साल से प्रोपर्टी का काम करते मुझे समझ आ गया है कि जमीन की कीमत कैसे बढ़ाई जा सकती है। शहरी जिन्दगी से तंग आकर लोगों कुछ दिन के लिए खुले फार्म हाउस की दरकार रहती है। अलग लेकर बनाना बहुत मंहगा सौदा है। अपन सस्ती जमीन खरीद कर उसमें प्लाटिंग करेंगे। और थोड़े एरिये में स्वीमिंग पूल, प्ले एरिया, छोटा थियेटर क्लब हाउस जैसी सुविधा बनाकर हर प्लाट धारक के लिए उपलब्ध कराएंगे।

दो-दो लाख रुपए लगा कर हम यह शुरू कर सकते हैं। पांच बीधा जमीन भी मैंने देख रखी है। शहर से मात्र बीस किमी की दूरी सौ गज के प्लाट बेच कर हम लोग पैसे और खुशिया दोनो कमा सकते हैं।’

कुछ देर माहौल में सन्नाटा पसरा रहने के बाद रणदीप बोला-ओय बढ़िया विचार है, अपन सब मिलकर मेहनत करेंगे तो लोगों को भी फायदा मिलेगा और अपने को भी दाम। कम दाम के फार्म हाउस चाहने वालों के लिए यह सपना पूरा होने जैसा है।’ कबीर भी तैयार हो गया। धर्मेश और त्रिलोक बोले कि उन्हें अपने घरवालों से राय करनी पड़ेगी। वैसे पूरी संभावना है कि वो इंकार न करें।

दो दिन बाद ही ‘सस्ता फार्म हाउस’ नाम से पांचों का प्रोजेक्ट शुरू हो गया। धर्मेश ने हिसाब-किताब रखने की जिम्मेदारी संभाल ली, तो जॉन और रणदीप ने जमीनी भागदौड़ की। कबीर और त्रिलोक बेचने के लिए प्लानिंग और मार्केटिंग में जुट गए। नौ महीने के अथक परिश्रम से कम्युनिटी फार्म हाउस बनकर तैयार हो चुका था और तैयार होने से पहले ही सत्तर में से तीस प्लाट की बुकिंग हो चुकी थी। तैयार करने के मात्र दो महीने बाद ही सारे प्लाट की रजिस्ट्री हो चुकी थी। तय की गई कीमत से भी ज्यादा देकर लोग खरीदने को तैयार थे।

पहले प्रोजेक्ट की सफलता ने ही उनको मन और जेब दोनों से लबालब भर दिया था। अगले की तैयारी के लिए अब किसी के मन में ना कोई दुविधा थी, ना ही आत्मविश्वास की कमी। लंगोटिया यारी अब जीवन भर साथ रहने और निभाने का सबब बन मजबूती से खड़ी थी।

संदीप पांडे,दुर्गेश पुष्कर रोड,अजमेर

राजस्थान 305004, मो. 9414070143