रेड कॉरिडोर का गुलाब \ कहानी - rashtrmat.com

रेड कॉरिडोर का गुलाब \ कहानी

रमेश कुमार ‘रिपु’ की “रेड कॉरिडोर का गुलाब यह केवल नक्सलवाद की कहानी नहीं, बल्कि प्रेम, विश्वास, छल, अपराधबोध और परिवर्तन की कहानी  है। यही इसकी मौलिकता है। नक्सलवाद पर लिखी जाने वाली अधिकांश कहानियाँ आमतौर पर मुठभेड़, हिंसा, विचारधारा, पुलिस ऑपरेशन या जंगल की राजनीति पर केंद्रित होती हैं। “रेड कॉरिडोर का गुलाब  कहानी में ये सब तत्व मौजूद हैं, लेकिन केंद्र में मानवीय संबंध है।

                 रेड कॉरिडोर का गुलाब \ कहानी

रमेश कुमार ‘रिपु’

दंडकारण्य के घने जंगलों में उस रात बारिश हो रही थी। लालटेन की पीली रोशनी में जोन कमांडर सुरजीत हिड़मा नक्शे पर उंगली फेरते हुए बोला,”सुजाता,अब बंदूक से ज्यादा काम तुम्हारी मुस्कान करेगी।”

सामने बैठी युवती ने शांत नजरों से उसकी ओर देखा। मेडिकल कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद उसने शहर की आरामदायक जिंदगी नहीं चुनी थी। वह जंगलों में आदिवासियों का इलाज करते-करते संगठन का हिस्सा बन गई थी।

“तुम्हें पीएस कल्लूरी के घर कामवाली बनकर जाना है,” हिड़मा ने कहा।

सुजाता ने सिर हिलाया।

कुछ दिनों बाद वह एक साधारण सूती साड़ी पहने,बिना मेकअप,झिझकती हुई एक गरीब लड़की के रूप में कल्लूरी के सरकारी बंगले पर खड़ी थी।कल्लूरी ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा।

“कितना पढ़ी हो?”

“आठवीं तक, साहब।”

“शादी?”

“नहीं हुई।”

“खाना बनाना आता है?”

“इसी से पेट पलता है, साहब।”

उसकी बनाई पहली दाल और बाजरे की रोटी खाकर कल्लूरी ने बरसों बाद कहा था, “आज मां की याद आ गई।”

धीरे-धीरे वह घर का हिस्सा बन गई।कल्लूरी को यह नहीं मालूम था कि सुबह चाय बनाते समय जो लड़की उसकी पसंद-नापसंद पूछती है,वही रात को उसकी बातचीत रिकॉर्ड कर रही है।उसने ड्राइंग रूम और बेडरूम में छोटे ट्रांसमीटर लगा दिए।अब पुलिस की हर रणनीति जंगल तक पहुंचने लगी।हर ऑपरेशन विफल होने लगा।

सब कुछ अचानक बदलने लगा।वहीं,एक और चीज बदल रही थी।सुजाता का दिल।वह पहली बार किसी दुश्मन को इतनी नजदीक से देख रही थी।कल्लूरी वैसा निर्दयी आदमी नहीं था जैसा उसे बताया गया था। वह अपने जवानों के लिए चिंतित रहता था। घायल सिपाहियों के घर खुद फोन करता था। आदिवासी बच्चों की पढ़ाई के लिए पैसे देता था।

एक रात तेज बुखार में तपते कल्लूरी के माथे पर उसने पट्टी रखी।कल्लूरी ने अधखुली आंखों से पूछा, “तुम्हें इतनी दवाओं की जानकारी कैसे है?”

“डॉक्टरों के यहां काम किया है, साहब।”

वह झूठ बोल रही थी।असलियत यह थी कि वह खुद डॉक्टर थी।दिन गुजरते गए।नफरत की जगह अपनापन आने लगा।एक दिन कल्लूरी ने कहा, “अगर मेरी जिंदगी में पहले तुम मिली होती, तो शायद मैं पुलिस वाला नहीं, किसान बन जाता।”

सुजाता ने मुस्कुराने की कोशिश की, मगर उसकी आंखें भीग गईं।वह जानती थी कि वह जिस आदमी से प्यार करने लगी है, वही उसके मिशन का लक्ष्य है।कुछ महीनों बाद उसे पता चला कि वह मां बनने वाली है।उसके हाथ कांप उठे।उसने सबसे पहले सुरजीत हिड़मा को सूचना दी।हिड़मा का चेहरा कठोर हो गया।

“बच्चा गिरा दो।”

“क्या?”

“मिशन बड़ा है। भावनाओं के लिए जगह नहीं।”

उस रात सुजाता बहुत रोई।पहली बार उसे लगा कि जंगल और शहर की लड़ाई के बीच कहीं उसका अपना जीवन कुचल रहा है।फिर वह दिन आया।सूचना मिली कि कई बड़े नक्सली नेता एक गुप्त बैठक में जुटे हैं।

कल्लूरी ऑपरेशन के लिए निकलने वाले थे।सुजाता जानती थी कि इस बार पुलिस को गलत सूचना नहीं मिली है।अगर वे पहुंच गए तो संगठन को भारी नुकसान होगा।लेकिन वह यह भी जानती थी कि जिस रास्ते से फोर्स जा रही है, वहां बारूदी सुरंगें बिछी हैं।

कल्लूरी के निकलते समय उसने कहा, “साहब, आपसे कुछ कहना है।”

“वापस आकर सुनूंगा।”

दरवाजा बंद हो गया।सुजाता देर तक खड़ी रही।फिर उसने मोबाइल उठाया।एक संदेश टाइप किया।

“मैं आपके बच्चे की मां बनने वाली हूं। जिस रास्ते से जा रहे हैं, वहां मत जाइए। खतरा है। दूसरा लोकेशन भेज रही हूं।”

मैसेज भेजते समय उसकी उंगलियां कांप रही थीं।उसे पता था कि इस संदेश के साथ उसका पूरा भेद खुल सकता है।कल्लूरी ने रास्ता बदल दिया।और पहली बार उसका ऑपरेशन पूरी तरह सफल रहा।कई बड़े नक्सली पकड़े गए।कुछ मारे गए।जब वह लौटकर आया तो सीधे सुजाता के पास पहुंचा।

“तुम्हें कैसे पता था?”

सुजाता चुप रही।

“और अंग्रेजी में मैसेज? तुम तो आठवीं पास हो।”

कमरे में लंबी खामोशी छा गई।

फिर सुजाता बोली,”पहले वादा कीजिए कि सच सुनकर गुस्सा नहीं होंगे।”

कल्लूरी मुस्कुराया।”अब तो मैं तुम्हारे बच्चे का पिता बनने वाला हूं। बोलो।”

और फिर सुजाता ने सब कुछ बता दिया।अपना असली नाम।अपनी मेडिकल डिग्री।अपने संगठन का मिशन।ट्रांसमीटर।जासूसी।हर राज।हर झूठ।हर सच।

कल्लूरी सुनता रहा।उसके चेहरे पर कभी आश्चर्य आया, कभी पीड़ा।सब कुछ खत्म होने के बाद कमरे में सन्नाटा था।सुजाता ने सोचा, अब हथकड़ी लगेगी।लेकिन अगले ही क्षण कल्लूरी ने धीमे स्वर में कहा,

“जिस दिन तुम चाहतीं, उस दिन मेरी मौत तय थी।”

उसकी आंखें भर आईं।

“लेकिन तुमने मुझे बचाया।”

“क्योंकि मैं तुमसे प्यार करती हूं,” सुजाता फूट पड़ी।

कल्लूरी ने उसके आंसू पोंछे।

“और मैं भी।”

समय बीतने के साथ कल्लूरी के मन में एक बेचैनी घर करने लगी थी।लगातार तीन ऑपरेशन विफल हो चुके थे।जहाँ भी पुलिस की टीम निकलती, नक्सली पहले से तैयार मिलते।कभी रास्ते में बारूदी सुरंग बिछी होती, कभी कैंप खाली मिलता।जैसे किसी को पहले से सब कुछ मालूम हो।एक शाम कल्लूरी अपने ड्राइंग रूम में जिले के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों के साथ गुप्त बैठक कर रहे थे।नक्शे खुले थे।मोबाइल बंद थे।दरवाजे पर जवान तैनात थे।बैठक समाप्त हुई।लेकिन अगले ही दिन वही योजना भी विफल हो गई।

कल्लूरी देर रात तक अकेले बैठे सोचते रहे।

“यह बात बाहर गई कैसे?”

उनके दिमाग में एक-एक चेहरा घूमने लगा।फिर अचानक उनकी नजर रसोई में काम करती सुजाता पर गई।उन्होंने तुरंत उस विचार को झटक दिया।

“नहीं… यह लड़की ऐसा नहीं कर सकती।”

लेकिन एक पुलिस अधिकारी का दिमाग भावनाओं से नहीं चलता।अगले दिन उन्होंने सुजाता को बुलाया।

“इधर आ।”

सुजाता आई और चुपचाप खड़ी हो गई।

“कल ड्राइंग रूम में कौन-कौन आया था?”

“मैं आई थी साहब। चाय रखकर चली गई थी।”

“हम लोग क्या बात कर रहे थे?”

सुजाता भोलेपन से बोली,”मुझे क्या पता साहब?”

“कुछ तो सुना होगा?”

“आप लोग अंग्रेजी में बात कर रहे थे।”

कल्लूरी उसकी आँखों में देखते रहे।

“तुझे अंग्रेजी समझ नहीं आती?”

“मुझे तो हिंदी भी पूरी नहीं आती साहब। आठवीं में दो बार फेल हुई थी।”

कल्लूरी मुस्कुराए नहीं।उन्होंने अगला सवाल किया।

“अगर मैं कहूँ कि घर के अंदर से कोई खबर पहुँचा रहा है तो?”

सुजाता के हाथ में पकड़ी ट्रे हल्की-सी काँपी, लेकिन चेहरा शांत रहा।

“तो बहुत गलत बात है साहब।”

“और अगर वह तुम हुई तो?”

सुजाता ने पहली बार सीधी नजर से उनकी ओर देखा।

“अगर मैं होती तो आज आपके घर में नहीं खाना बना रही होती या जंगल में बंदूक लेकर घूम रही होती?”

कुछ क्षणों के लिए कमरे में सन्नाटा छा गया।कल्लूरी जवाब नहीं दे पाए।लेकिन शक पूरी तरह खत्म नहीं हुआ।अब कल्लूरी ने उसकी परीक्षा लेने का फैसला किया।

एक दिन उन्होंने जानबूझकर ड्राइंग रूम में बैठकर एक नकली ऑपरेशन की चर्चा की।सुजाता चाय रखकर चली गई।असल में वह चर्चा केवल उसे सुनाने के लिए की गई थी।लेकिन तीन दिन बाद भी उस नकली ऑपरेशन पर नक्सलियों की कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई।कल्लूरी उलझ गए।अगर सुजाता खबर पहुँचा रही होती तो इस बार जरूर जाल में फँसती।

उधर सुजाता समझ गई थी कि उसकी परीक्षा ली जा रही है।वह अब पहले से ज्यादा सावधान हो गई।

कुछ दिनों बाद फिर एक ऑपरेशन विफल हो गया।इस बार कल्लूरी ने गुस्से में सुजाता को बुला लिया।

“सच-सच बता, तेरा कोई संबंध नक्सलियों से है?”

सुजाता की धड़कन तेज हो गई।लेकिन चेहरे पर वही मासूमियत बनी रही।

“साहब, मैं तो खुद उनसे डरती हूँ।”

“झूठ मत बोल।”

“मैं झूठ क्यों बोलूँगी?”

“क्योंकि हर बार हमारी बात बाहर पहुँच जाती है।”

सुजाता ने धीरे से कहा,”साहब, आप बड़े अफसर हैं। आपके दफ्तर में कितने लोग आते-जाते हैं। कितने मोबाइल चलते हैं। कितने मुखबिर होंगे। मैं तो बस रोटी बनाती हूँ।”

फिर हल्की मुस्कान के साथ बोली,”और आप लोग जो बातें करते हैं, आधी अंग्रेजी में करते हैं। मुझे तो ‘ऑपरेशन’ का मतलब भी नहीं पता।”

कल्लूरी कुछ देर उसे देखते रहे।उसकी आवाज में डर था, लेकिन घबराहट नहीं।आँखों में नमी थी, मगर झूठ पकड़ में नहीं आ रहा था।अंततः उन्होंने कहा,”जा, काम कर।”

सुजाता बाहर निकल गई।लेकिन बाहर आते ही उसने गहरी साँस ली।उसे पहली बार महसूस हुआ कि वह केवल पुलिस को नहीं, बल्कि उस आदमी को भी धोखा दे रही है जो उस पर भरोसा करने लगा है।और यहीं से उसके भीतर का संघर्ष और गहरा हो गया।

इस तरह कल्लूरी का शक बार-बार उठता है, वह उसकी परीक्षा भी लेता है, लेकिन सुजाता अपनी बुद्धिमानी, संयम और बनाई हुई “आठवीं फेल कामवाली” की पहचान के कारण हर बार बच निकलती है।

लगातार असफलताओं ने कल्लूरी को बेचैन कर दिया था।उस दिन वह अपने कार्यालय में अकेले बैठे थे। सामने फाइलें खुली थीं, लेकिन उनका ध्यान कहीं और था।वे मन ही मन सोच रहे थे,”अगर सुजाता खबर नहीं पहुँचा रही, तो फिर कौन पहुँचा रहा है? क्या मेरे ही बीच कोई मुखबिर बैठा है? कोई अधिकारी? कोई जवान? या फिर मेरा कोई भरोसेमंद आदमी?”

उनके सामने पिछले छह महीनों के ऑपरेशनों का पूरा रिकॉर्ड रखा था।हर बार योजना गोपनीय रखी गई थी।हर बार नक्सली पहले से तैयार मिले थे।यह महज संयोग नहीं हो सकता था।अचानक उनके दिमाग में एक विचार कौंधा।उन्होंने कुर्सी पर सीधा बैठते हुए कहा,”इस बार खेल उल्टा खेलते हैं।”

उस शाम घर पर चाय पीते समय उन्होंने जानबूझकर फोन पर और ड्राइंग रूम में कुछ ऐसी बातें कीं जिन्हें सुनने वाला यही समझे कि पुलिस एक खास रास्ते से जंगल में प्रवेश करने वाली है।सुजाता भी पास ही रसोई में काम कर रही थी।कल्लूरी ने ध्यान दिया कि वह हमेशा की तरह शांत थी।उसने कोई विशेष प्रतिक्रिया नहीं दी।लेकिन इस बार कल्लूरी ने असली योजना किसी को नहीं बताई।

न अपने घर में।न दफ्तर में।न वायरलेस पर।केवल दो भरोसेमंद अधिकारियों को अंतिम समय पर जानकारी दी गई।और सबसे महत्वपूर्ण बात,उन्होंने घर में जिस रास्ते का जिक्र किया था, उस रास्ते पर जाना ही नहीं था।असल ऑपरेशन पूरी तरह दूसरे मार्ग से होना था।

रात के अंधेरे में पुलिस और सीआरपीएफ की टुकड़ी जंगल की ओर बढ़ी।कल्लूरी के मन में हल्का तनाव था।उन्हें लग रहा था कि शायद इस बार भी कहीं कुछ गड़बड़ हो जाएगी।लेकिन जैसे-जैसे वे आगे बढ़ते गए, सब कुछ सामान्य दिखाई देता रहा।न कोई विस्फोट।न कोई घात।न कोई संदिग्ध गतिविधि।

पहली बार उन्हें महसूस हुआ कि दुश्मन को उनकी मौजूदगी का पता नहीं है।सुबह होने से पहले पुलिस ने उस पहाड़ी को चारों ओर से घेर लिया जहाँ नक्सलियों के एक बड़े दल के छिपे होने की सूचना थी।

अचानक गोलियों की आवाज गूँज उठी।जंगल कांप उठा।करीब एक घंटे तक मुठभेड़ चलती रही।

जब सब कुछ शांत हुआ तो जवानों ने एक शव की पहचान की।वह कोई साधारण नक्सली नहीं था।

वह दस लाख रुपये का इनामी एरिया कमांडर शिव डेहरिया था।

कैंप लौटते समय कल्लूरी जीप में बैठे खिड़की के बाहर देखते रहे।उनके चेहरे पर विजय की खुशी थी, लेकिन मन में एक नया सवाल जन्म ले चुका था।”तो फिर खबर घर से ही जा रही थी…”क्योंकि जिस रास्ते की चर्चा उन्होंने घर में की थी, वहाँ नक्सलियों ने घात लगाकर इंतजार किया था।

बाद में मिली सूचना से पता चला कि उस रास्ते पर कई जगह बारूदी सुरंगें भी बिछाई गई थीं।

लेकिन पुलिस वहाँ गई ही नहीं।और दूसरी ओर से पहुँचकर उसने शिव डेहरिया को मार गिराया।

अब संदेह का दायरा बहुत छोटा रह गया था।कल्लूरी के मन में पहली बार सुजाता का चेहरा साफ-साफ उभर आया।उन्होंने तुरंत खुद को टोका।”नहीं… ऐसा नहीं हो सकता।”

लेकिन एक अनुभवी पुलिस अधिकारी के भीतर बैठा जांचकर्ता अब चुप नहीं था।

वह कह रहा था,”संयोग एक-दो बार हो सकता है। हर बार नहीं।”

उधर घर पर बैठी सुजाता को भी खबर मिल चुकी थी कि शिव डेहरिया मारा गया है।उसके हाथ से पानी का गिलास छूटते-छूटते बचा।वह समझ गई थी कि इस बार कल्लूरी ने कोई ऐसा खेल खेला है जिसे वह समझ नहीं पाई।और पहली बार उसे एहसास हुआ कि जिस आदमी को वह सिर्फ पुलिस अधिकारी समझती थी, वह असल में एक बेहद चतुर शिकारी भी है।

अब दोनों एक-दूसरे पर भरोसा भी करते थे और अनजाने में एक-दूसरे की परीक्षा भी ले रहे थे।यहीं से उनकी प्रेम कहानी और जासूसी कथा एक-दूसरे में उलझने लगती है।

कल्लूरी अब सुजाता को पहले की तरह नहीं देख पा रहे थे। उनके भीतर दो आदमी रहने लगे थे। एक पुलिस अधिकारी, जो तथ्यों और संदेह पर भरोसा करता था; दूसरा एक प्रेमी, जो सुजाता की आँखों में छल नहीं देख पाता था।

दूसरी तरफ सुजाता की स्थिति भी अलग नहीं थी। वह हर सुबह उनके लिए नाश्ता बनाती, उनकी दवाइयाँ समय पर रखती, उनकी पसंद का खाना पकाती, लेकिन अब जब भी वह उनकी तरफ देखती, उसे लगता कि शायद कल्लूरी की निगाहें उससे कोई जवाब मांग रही हैं।

एक शाम कल्लूरी बरामदे में बैठे चाय पी रहे थे। सुजाता कप रखकर लौटने लगी तो उन्होंने अचानक पूछा,

“सुजाता, अगर कभी पता चले कि जिसे हम सबसे ज्यादा भरोसेमंद समझते हैं, वही हमें धोखा दे रहा है, तो क्या करना चाहिए?”

सुजाता के कदम ठिठक गए।क्षण भर के लिए उसका दिल जोर से धड़का।लेकिन उसने खुद को संभाला।

“गलती कितनी बड़ी है, पहले यह देखना चाहिए साहब।”

“और अगर गलती बहुत बड़ी हो?”

“तो यह भी देखना चाहिए कि उसने ऐसा क्यों किया।”

कल्लूरी ने उसकी ओर देखा।

“कानून वजह नहीं देखता, सिर्फ अपराध देखता है।”

सुजाता ने धीमे स्वर में कहा,”लेकिन इंसान वजह भी देखता है।”

कुछ क्षण दोनों की नजरें मिली रहीं।फिर सुजाता चुपचाप रसोई में चली गई।उस रात दोनों में से किसी को नींद नहीं आई।कल्लूरी सोचते रहे कि आखिर एक साधारण कामवाली इतनी गहरी बातें कैसे कर सकती है।

उधर सुजाता सोचती रही कि कहीं कल्लूरी सच के बहुत करीब तो नहीं पहुँच गए हैं।

इसके बाद कल्लूरी ने सुजाता पर नजर रखना शुरू कर दिया, लेकिन खुलकर नहीं।वह कभी-कभी अचानक घर लौट आते।कभी बिना बताए किसी बैठक का समय बदल देते।कभी जानबूझकर गलत जानकारी छोड़ देते।उन्हें लगता था कि एक दिन सच अपने आप सामने आ जाएगा।लेकिन हर बार उन्हें केवल एक मेहनती, स्नेही और ईमानदार दिखने वाली लड़की ही दिखाई देती।यही बात उनके संदेह को और उलझा देती।

उधर सुजाता के लिए भी स्थिति आसान नहीं थी।अब हर बार जब वह ट्रांसमीटर चालू करती, उसे अपराधबोध होने लगता।जिस आदमी की आवाज वह रिकॉर्ड कर रही थी, उसी के साथ वह जीवन के सपने भी देखने लगी थी।

एक रात उसने रिकॉर्डिंग भेजने के बाद मोबाइल बंद कर दिया और देर तक रोती रही।उसे पहली बार महसूस हुआ कि वह दो अलग-अलग दुनिया में जी रही है।एक दुनिया जंगल की थी, जहाँ उसे मिशन पूरा करना था।दूसरी दुनिया घर की थी, जहाँ वह कल्लूरी के साथ एक सामान्य स्त्री की तरह हँसना, जीना और भविष्य देखना चाहती थी।और यही द्वंद्व ज़िन्दगी में सबसे बड़ा तनाव बन जाता है।

अब सवाल यह नहीं रह जाता कि पुलिस जीतेगी या नक्सली।सवाल यह हो जाता है कि जब सच सामने आएगा, तब प्रेम बचेगा या नहीं।क्योंकि दोनों एक-दूसरे से प्यार करने लगे थे, लेकिन दोनों की दुनिया एक-दूसरे के खिलाफ खड़ी थी। यही तो सबसे मजबूत भावनात्मक केंद्र है। असली संघर्ष जंगल और पुलिस के बीच नहीं, बल्कि सुजाता और कल्लूरी के भीतर चल रहा संघर्ष है।

सुजाता जब पहली बार कल्लूरी के घर आई थी, तब उसके लिए वह केवल एक “टारगेट” थे। एक ऐसा पुलिस अधिकारी, जिसकी हर गतिविधि पर नजर रखनी थी। लेकिन समय के साथ उसने कल्लूरी का वह चेहरा भी देखा जो पुलिस की वर्दी के पीछे छिपा था एक संवेदनशील इंसान, जो अपने जवानों की चिंता करता है, आदिवासी बच्चों की पढ़ाई की बात करता है और उसके सिरदर्द होने पर दवा लाने के लिए खुद गाड़ी निकाल देता है।

उधर कल्लूरी के लिए सुजाता शुरू में केवल एक कामवाली थी। फिर वह घर की जरूरत बन गई। फिर आदत। और धीरे-धीरे वह उनके अकेलेपन का हिस्सा बन गई।लेकिन प्रेम की यही खूबसूरती उनकी सबसे बड़ी समस्या भी बन गई।क्योंकि जिस दिन सच सामने आएगा, उस दिन दोनों को केवल एक-दूसरे का नहीं, अपने-अपने अतीत का भी सामना करना होगा।

कल्लूरी के सामने प्रश्न होगा,”क्या मैं उस स्त्री को माफ कर सकता हूँ जिसने मेरे घर में रहकर मेरी जासूसी की?”

और सुजाता के सामने प्रश्न होगा,”क्या मैं उस आदमी का हाथ थाम सकती हूँ जिसके खिलाफ मुझे भेजा गया था?”

यही कारण है कि सबसे मार्मिक दृश्य गोलीबारी या मुठभेड़ नहीं, बल्कि वह क्षण बन सकता है जब सुजाता सच स्वीकार करती है।

वह कहती है,”मैंने आपसे झूठ बोला। मैं आठवीं फेल नहीं हूँ। मैं डॉक्टर हूँ। मैं आपके घर नौकरी करने नहीं, आपकी जासूसी करने आई थी।”

और उसके बाद कमरे में छा जाने वाली खामोशी किसी भी मुठभेड़ से ज्यादा भारी हो सकती है।क्योंकि उस समय कल्लूरी के सामने कोई नक्सली नहीं खड़ा होगा।उसके सामने वह स्त्री खड़ी होगी जिससे वह प्रेम करता है।और सुजाता के सामने कोई पुलिस अधिकारी नहीं होगा।उसके सामने उसके बच्चे का पिता खड़ा होगा।

यहीं कहानी यह प्रश्न उठाती है कि क्या प्रेम मनुष्य को उसकी विचारधारा से बड़ा बना सकता है?

क्या दो विरोधी पक्षों के लोग एक-दूसरे को दुश्मन की तरह नहीं, इंसान की तरह देख सकते हैं?

यदि अंत में कल्लूरी सुजाता को कानून के हवाले करने के बजाय उसके पश्चाताप, उसके प्रेम और उसके द्वारा अंततः उसकी जान बचाने को महत्व देता है। कभी-कभी इंसानियत उन दीवारों को भी गिरा देती है जिन्हें राजनीति, हिंसा और विचारधाराएँ खड़ी करती हैं।इसीलिए यह केवल नक्सलवाद की कहानी नहीं रह जाती, बल्कि दो विरोधी संसारों के बीच जन्मे प्रेम की त्रासदी और विजय,दोनों की कहानी बन जाती है।

सुजाता और कल्लूरी शुरू में एक-दूसरे को अपने-अपने पक्ष के प्रतिनिधि के रूप में देखते हैं। लेकिन धीरे-धीरे वे एक-दूसरे की मानवीय परतों को पहचानने लगते हैं। सुजाता को कल्लूरी में केवल एक पुलिस अधिकारी नहीं दिखता, और कल्लूरी को सुजाता में केवल एक संभावित संदिग्ध नहीं दिखती।हालाँकि वास्तविक जीवन में ऐसा होना आसान नहीं होता। विश्वासघात, हिंसा, कर्तव्य और कानून जैसे प्रश्न रास्ते में खड़े रहते हैं। इसलिए ऐसे रिश्तों में प्रेम के साथ-साथ गहरा नैतिक और भावनात्मक संघर्ष भी होता है।

यही संघर्ष  कहानी को रोचक बनाता है। यदि दोनों शुरू से ही एक-दूसरे को सही मान लें, तो तनाव खत्म हो जाएगा। लेकिन जब प्रेम और कर्तव्य आमने-सामने खड़े हों, तब कहानी पाठक को सोचने पर मजबूर करती है।

कल्लूरी सोचता है,”हाँ, इस स्त्री ने मेरे घर में रहकर मेरी जासूसी की। इसकी वजह से कई ऑपरेशन विफल हुए। यह एक गंभीर अपराध है। लेकिन यही स्त्री वह भी है जिसने आखिरी क्षण में मेरी और मेरे जवानों की जान बचाई। इसने अपने संगठन से ज्यादा मेरे जीवन को चुना। इसने सच छिपाने के बजाय स्वयं स्वीकार किया।”

कल्लूरी भावुक प्रेमी की तरह निर्णय नहीं लेता बल्कि एक ऐसे इंसान की तरह फैसला लेता है जो परिस्थिति की पूरी जटिलता को देख रहा है।

सुजाता सब कुछ स्वीकार करने के बाद कहती है,”मैंने जो किया उसकी सजा मिलनी चाहिए। अगर आप चाहें तो अभी हथकड़ी पहना दीजिए।”

कल्लूरी कुछ देर चुप रहता है।फिर कहता है,”जिस दिन तुमने मुझे वह संदेश भेजा था, उस दिन तुम दो रास्तों में से एक चुन सकती थीं। एक रास्ता तुम्हारे संगठन की तरफ जाता था, दूसरा मेरी मौत से दूर। तुमने दूसरा रास्ता चुना।”

सुजाता की आँखों से आँसू बहने लगते हैं।कल्लूरी आगे कहता है,”आज मैं पुलिस अधिकारी के रूप में बहुत कुछ देख रहा हूँ। लेकिन एक इंसान के रूप में यह भी देख रहा हूँ कि तुम अब वह नहीं हो जो पहली बार मेरे घर आई थी।”

“सब कुछ कानून की किताबों में नहीं लिखा होता, सुजाता। कुछ फैसले इंसान को अपने विवेक से भी लेने पड़ते हैं। जब तुम मेरे घर आई थीं, तब तुम एक मिशन पर थीं। आज तुम मेरे बच्चे की माँ हो। मैं तुम्हारे भीतर वह लड़की नहीं देखता जो मुझे नुकसान पहुँचाने आई थी। मैं वह स्त्री देखता हूँ जिसने मेरी जान बचाने के लिए अपना सब कुछ दाँव पर लगा दिया।”मैंने तुम्हारे भीतर परिवर्तन देखा है, इसलिए तुम्हें एक दूसरा अवसर देने का निर्णय लिया। ”

कल्लूरी मन ही मन सोचते हैं कि सरकार स्वयं पुनर्वास और मुख्यधारा में वापसी की बात करती है, और सुजाता का जीवन अब पूरी तरह बदल चुका है। अब ये मेरे बच्चे की मां बनने जा रही है। क्यों ने इसके शादी करके इसका पूरी तरह जीवन बदल दूं। कुछ महीनों बाद दोनों ने चुपचाप शादी कर ली।कल्लूरी ने तबादला दूसरे जिले में करा लिया।

दंडकारण्य के जंगल पीछे छूट गए।लेकिन कभी-कभी रात में जब उनका बच्चा सो रहा होता, सुजाता खिड़की से बाहर देखते हुए सोचती,वह किसकी जीत थी? राज्य की?जंगल की?या प्रेम की?और हर बार उसे एक ही जवाब मिलता,कुछ लड़ाइयां बंदूकें नहीं जीततीं, उन्हें प्रेम जीत लेता है।

रमेश कुमार ‘रिपु’

राममंदिर के पास,अवधपुरी कालोनी
भाटागांव,रायपुर छत्तीसगढ़
मो. 7974304532