'तुम अकेले नहीं हो रमेश \ कहानी - rashtrmat.com

‘तुम अकेले नहीं हो रमेश \ कहानी

आचार्य नीरज शास्त्री की कहानी ‘तुम अकेले नहीं हो रमेश’ रंग बदलती पत्रकारिता की तस्वीर है। निष्पक्ष और ईमानदार पत्रकारों के साथ किस तरह भ्रष्ट लोग खेला कर जाते हैं,यह कहानी उसकी बानगी है।पत्रकार टूट जाता है मगर परिवार का साथ ही उसे निराशा के सागर से निकालता है।

 ‘तुम अकेले नहीं हो रमेश \ कहानी

  आचार्य नीरज शास्त्री 

रमेश पाठक पत्रकार हैं। वे ‘सत्य दर्पण’ पत्र के लिए पत्रकारिता करते हैं। न्यायप्रियता, ईमानदारी तथा कर्त्तव्य के प्रति निष्ठा उनके विशेष गुण हैं। इन्हीं गुणों के कारण वे अपने समाचार-पत्र के संपादक नियुक्त हुए। तीन महीने पहले उनके घर शानदार प्रीतिभोज का आयोजन हुआ।

मैं भी आमंत्रित लोगों में शामिल था। बड़े ही आनंद एवं उत्साह के साथ वे सभी का स्वागत सत्कार कर रहे थे। उनकी पत्नी श्रीमती भारती भी उनका साथ दे रही थीं।

भोजन करने वाले अतिथिगण उन्हें भोज के लिए बधाई दे रहे थे परंतु सभी की जिज्ञासा थी कि प्रीतिभोज का प्रयोजन क्या है? कुछ लोग आपस में ही बातचीत कर इस जिज्ञासा को शांत करने का प्रयास कर रहे थे। कुछ लोग बिना हिचकिचाहट के शानदार  भोज का प्रयोजन क्या है ? पूछ रहे थे।

मैंने भी पूछ ही लिया तो रमेश पाठक से  उत्तर मिला – “मेरी पत्नी का जन्म-दिन है।”  तभी किसी ने श्रीमती भारती से पूछा तो  उत्तर मिला – “ये संपादक बने हैं न! इसीलिए छोटा-सा आयोजन रख लिया।”

सत्य चाहे जो भी हो, सभी अतिथियों को बधाई देना ही उचित लगा । पति पत्नी दोनों को सम्मिलित रूप से ही बधाइयाँ मिलीं।    उस दिन के बाद अचानक आज प्रताप नगर चौराहे पर रमेश पाठक से मुलाकात हुई। मैंने अभिवादन करते हुए पूछा-“कैसे हैं रमेश बाबू?”

उन्होंने उत्तर दिया- “ठीक हूँ।”

मैंने कहा- ” संपादक होकर कैसा लग रहा है?”

वे दुखी स्वर में बोले-“क्या कहूँ मित्र! अब मैं संपादक नहीं हूँ।

मैंने पुनः पूछा- “क्यों? … आखिर  हुआ क्या…?”

उनकी आंखों में नमी उतर आई।वे उसे छुपाने की कोशिश करते हुए बोले-“संपादक का पद संभालने के  बाद मैं और भी दृढ़ता और निष्पक्षता के साथ समाचार प्रकाशित करने लगा। कई भ्रष्ट नेताओं और अधिकारियों की कलई खोली।लोक निर्माण मंत्री सुरेन्द्र अक्खड़ के काले कारनामों का भी खुलासा किया।

सब कुछ ठीक चल रहा था।

उन्हीं दिनों एक राजनैतिक कार्यकर्ता ने मुझसे मुलाकात की। उसने कहा- “रमेश जी! आपके पत्र में एक  कमी है कि इसमें अभी तक  समाज के तिरस्कृत वर्ग का साक्षात्कार नहीं छपा। यदि संभव हो तो वैश्याओं की समस्याओं पर उनका साक्षात्कार छापिए।”

यह बात मुझे उचित लगी।अतः मैंने तिरस्कृत लोगों के साक्षात्कार की योजना बनाई और सबसे पहले नगरवधू मुन्नीबाई का साक्षात्कार लेने का निर्णय किया, परंतु जब कोई संवाददाता साक्षात्कार लेने के लिए वहां जाने को तैयार नहीं हुआ तो मैं स्वयं  मुन्नीबाई के कोठे पर साक्षात्कार लेने जा पहुँचा। वहाँ मैंने लोक निर्माण मंत्री सुरेन्द्र अक्खड को  देखा तो मैं वापस लौट आया और अगले दिन  फिर मुन्नीबाई के कोठे पर साक्षात्कार लेने जा पहुँचा। मुन्नीबाई ने दरवाजा खोला और अंदर बुलाया। मेरे अंदर जाते ही उसने दरवाजा बन्द कर दिया और  बोली-“मैं एक मिनट में आती हूँ।” इतना कहकर वह चली गई। ठीक एक मिनट बाद वह मेरे सामने आई….नग्न… निर्वस्त्र।

.मैं समझ नहीं पाया कि मुन्नी ऐसा भी कर सकती है । तभी दरवाजा खोलकर ‘काली दुनिया’ के संपादक राकेश भंडारी ने प्रवेश किया।.फिर अगले दिन के. पत्र में .।”- वे सुबकने लगे।

मैंने उन्हें दिलाशा दी और पूछा- “क्या था अगले दिन के पत्र में?”

“अगले दिन .मेरा चित्र ‘काली दुनिया’ में छपा, मुख पृष्ठ पर। नीचे लिखा था- सुप्रसिद्ध पत्रकार और सत्य दर्पण के संपादक मुन्नीबाई के साथ रंगरेलियाँ मनाते हुए पाये गये। दूसरी ओर वह चित्र छपा जिसमें मुन्नीबाई नग्न अवस्था में थी और उसके सामने बैठा था मैं।”

एक बार फिर उनका गला रुँध गया। मैंने पुनः उनको सांत्वना देते हुए पूछा- “रमेश जी ! क्या आपने अपने पत्र के द्वारा इसका उत्तर नहीं दिया?”

वे बोले- ” मुझे…कुछ भी करने का अवसर ही नहीं मिला क्योंकि एक घंटे बाद ही मुझे पत्र के प्रबंधक मंडल की ओर से पत्र प्राप्त हुआ, जिसमें लिखा था- ‘रमेश पाठक ! तुम एक सत्यनिष्ठ पत्रकार रहे हो, इसलिए तुम्हें संपादक जैसे गौरवपूर्ण पद पर नियुक्त किया गया परंतु इस पद पर पहुँचकर तुमने पत्रकार की गरिमा का अपमान किया है जिससे तुम्हारा मुंह तो काला होना ही था, समाचार-पत्र का सम्मान भी आहत हुआ है।

लगता है आप मानसिक रूप से विक्षिप्त हो चुके हैं। अतः आपकी चरित्रहीनता एवं मानसिक विकृति के कारण आपको सेवा मुक्त किया जाता है।’ इस प्रकार मेरी सेवा समाप्त कर दी गई।. इतना ही नहीं. मेरी सामाजिक प्रतिष्ठा भी समाप्त हो गई। तब मैंने आत्महत्या करने का कुत्सित विचार किया । मैं मर जाना चाहता था। इसलिए नदी किनारे चला गया। पुल पर खड़ा होकर नदी में कूदने ही वाला  था कि तभी मेरे कानों में आवाज आई- “रुक जाओ पापा! हमें आप पर विश्वास है।”

मैंने पीछे मुड़कर देखा तो मेरी बेटी सौम्या और पत्नी भारती मेरे पीछे खड़ी थीं । वे शायद मेरा पीछा करते हुए वहाँ तक आ पहुँची थीं।

मेरी पत्नी ने मेरा हाथ थाम कर कहा- “तुम अकेले नहीं हो रमेश! हम तुम्हारे साथ हैं। अवसर की प्रतीक्षा करो और अपने दामन पर लगा दाग धोने के लिए तैयार रहो।” तब से मैं उचित अवसर की तलाश में हूँ।

एक पत्नी का अपने पति और एक पुत्री का अपने पिता पर विश्वास मुझे  रमेश के जीवन की सबसे बड़ी पूंजी अनुभव हुआ। मेरा विश्वास बोल उठा- “रमेश! निश्चित ही तुम्हें तुम्हारे मकसद में कामयाबी मिलेगी क्योंकि सूरज को ग्रहण लगता है, अंधेरा उसे ग्रस नहीं सकता। तुम एक दिन निश्चित ही बेदाग साबित हो जाओगे। मैं प्रणाम करता हूँ तुम्हारी पत्नी और पुत्री को जिनका विश्वास अटल है। उनके विश्वास में ही तुम्हारे लिए संजीवनी शक्ति है।”

  आचार्य नीरज शास्त्री, 34/2,’गायत्री निवास’,

लाजपत नगर,एन. एच- 2,मथुरा 281004

मो.9259146669