राजेश पाठक बता रहे हैं कि जंगल में नक्सली बनकर अपनी पहचान बनाने वालों को अब लाल गलियारे का मोह छोड़ देना चाहिए। गांव वालों का जनताना सरकार कब भरोसा बन गए, सरकार को भी नहीं पता। सवाल यह है कि नक्सलियों के सरेंडर करने से क्या नक्सलवाद खत्म हो जाएगा? सरकार विकास के मार्ग में नक्सलियों को कंटक बताती है। मगर पेशा कानून के उल्लंघन से नक्सली विचार धारा को एक नयी दिशा मिल रही है।
क्यों भटक रहे हो जंगल में नक्सली की पहचान लिए\विशेष लेख
चिंगारी से लगी आग को आज बुझाने आया हूं
मानो या फिर ना मानो,इक बात सुझाने आया हूं
आज नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में विकास की गति धीमी है।न केवल झारखंड बल्कि बिहार, उड़ीसा, छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में भी नक्सलवाद का उद्भव व तत्पश्चात् सरकारी मशीनरी के प्रति नकारात्मक रवैया एक बाधक तत्व के रूप में उभरा। उनके मुख्यधारा में लौटने की पहल किसी भी जन आंदोलन द्वारा प्रभावशाली एवं क्रमिक रूप से नहीं की गई।
परंतु आज की बदलती परिस्थितियों में उन्हें समाज, राज्य व राष्ट्र की मुख्यधारा में लौटना बेहद जरूरी है।माना कि वर्षों पूर्व देश के लगभग सभी राज्य जमींदारों व सूदखोरों के चंगुल में रहे परंतु आज की आधुनिक परिस्थितियां अब कुछ और बयां करती हैं। शोषण व भयमुक्त समाज के निर्माण में अब जन भागीदारी बढ़ने लगी है।
विभिन्न राज्यों में पंचायत निर्वाचन के बाद अब सरकारी तंत्र में आवश्यक बदलाव नजर आने लगा है। छोटे-छोटे झगडे़ और आपसी विवाद अब स्थानीय स्तर पर सुलझाने का सफल प्रयास किया जा रहा है।और तो और अब राज्य सरकार और गांवों की सरकार में आपसी समन्वय एवं सकारात्मक तालमेल दिखने लगा है।अच्छे-अच्छे काम हों इसके लिए सरकार भी संवेदनशील होने लगी है। निकम्मों एवं चापलूसों की पहचान की जा रही है।उन्हें चिन्हित कर उन पर आवश्यक कार्रवाई की जा रही है।अब प्रशासन गांव की ओर मुखातिब हो उनकी सुध लेने लग गया है।मुख्य सचिव से लेकर जिला कलक्टर तक गांव में रात्रि विश्राम की योजना बना रहे है।लोगो की संवेदना से जुड़ रहे हैं। सच कहूं तो अब प्रशासन हरकत में आने लगा है। इसलिए कहता हूँ कि अब वक्त आ गया है कि वे समाज और राष्ट्र की मुख्यधारा में शामिल हो जाएं। उनकी माताएं, बच्चे, बहुएं उन्हें ‘पुकार’ रही हैं-
*याद करो बचपन के दिन\जब कुछ भी समझ \न पाता था
मां के कपड़े़ गीले करते\तब भी मां को \सब भाता था
अब बता मुझे \बीते दिन की \मां की ममता का पान किए
क्यों भटक रहे \तुम जंगल में
नक्सल की पहचान लिए
वे कहते हैं – राजनीतिक शक्ति बन्दूक की नली से निकलती है, पर मैं कहता हूं- यह शक्ति जनमत से निकलती है, वे कहते हैं बन्दूक से छुटकारा पाने के लिए पहले उसे ठीक से पकड़ना सीखना होगा।पर मैं कहता हूं – बन्दूकों से छुटकारा पाने के लिए लोगों के दिलों को जीतना होगा।वे कहते हैं कि लोहे को काटने के लिए लोहे का होना जरुरी है।पर मत भूलें जब एक लोहा दूसरे लोहे को काटता है तो एक स्थिर रहता है, एक चोट करता है तो दूसरा उसकी चोट सहता है। पर जब एक बन्दूक चले और दूसरी भी उसपर तन जाए तो बन्दूकों से छुटकारा नहीं मिलती, बल्कि बन्दूकों से गोलियां छूटती हैं तो शांति और अमन का स्थाई सपना चकनाचूर हो जाता है। इसलिए तो मै कहता हूं :
क्या बन्दूकों से स्थाई \सब समाधान होता है
मानो या फिर न मानो \बस व्यवधान होता है
उनकी नज़रों में कोई युद्ध, धर्म-युद्ध नहीं होता, दुश्मन-दुश्मन होता है। छिपकर ही सही, घात लगाकर ही सही उसे मात देना मकसद होता है और यह सब वे समाज में व्याप्त शोषण को आधार मानकर करते हैं।क्या उन्हें लगता है कि जिस शोषण की वे बात करते हैं वह पलक झपकते दूर हो जायगा? नहीं। पर प्रयास जारी रहे और या समाज के सभी वर्गो के बीच संवेदनात्मक समन्वय के रूप में हो न कि इस सन्दर्भ में मात्र निरोधात्मक कानूनों के निर्माण से।कदम-दर-कदम नियमों के निर्माण से समस्याओं का स्थाई हल नहीं निकल सकता।कुछ चीजों को स्वतंत्र छोड़ दे।वे स्वयं समायोजित हो जाएंगी।सबका हल कानून नहीं हो सकता।आपसी विचार-विमर्श से भी ढे़र सारी समस्याओं के हल निकल आते हैं।ऐसा हल जो वे सोच भी नहीं सकते।मैं कहता हूँ कि वे विचार में परिवर्तन लाएं,उसकी धाराओं में परिवर्तन लाएं। जीवन के मूलदर्शन को समझें।वे सोचें कि आज वे हैं, कल नहीं, बस, उनके विचार ही जिन्दा रहेंगे।
वे चाहते हैं कि पूंजीपतियों की तानाशाही नहीं चले पर सर्वहारावर्ग की तानाशाही कुछ दिनों के लिए आए और संक्रमण की समाप्ति के बाद एक वर्ग विहीन समाज की स्थापना हो।पर ऐसा हुआ क्या? मैं कहता हूं कि वे कब तक इंतजार करेंगे? बने बनाए मकान (स्थापित लोकतंत्र) अगर मिलते हैं तो क्यों नहीं घर बसाते? हां, मनचाहा परिवर्तन जो पूरे समाज को एक नई दिशा दे सके,उसमे कर डालें, भला कोई रोकेगा क्या!
वे राज्य को शोषण की मशीन मानते हैं।ऐसा नहीं कहते! राज्य और सरकार उनके जन्म लेने के पहले से ही जन्म से लेकर मृत्यु तक की घटनाओं एवं परिस्थितियों पर हर संभव जीत की गवाह बनती है। वे शोषण, भय और अराजक स्थितियों से समाज को मुक्त करना चाहते हैं तो उस समाज से दूर नहीं भागें। समाज में ही रहकर उसे दूर करने के उपाय सुझाएं। उनसे लड़ें। बंदूकों से नहीं विचारों से, सोए समाज को जगाओ, पर सोए समाज में रहकर, उससे दूर हटकर नहीं।मैं तो कहता हूं-
*सूत्र अगर कोई हो जिससे \शोषण मुक्त समाज हो,
लौटो बतलाओ लोगों को \फिर तेरे सिर ही ताज हो*
मैं कहता हूँ- घर में जब कुछ समस्याएं दिखती हैं तो उसे देखकर दूर नहीं भागा करते। उन्हें मानना चाहिए कि दूर रह रहे लोगों को भी जब इसकी जानकारी मिलती है तो दूर से चलकर वे घर आते हैं न कि घर में रह रहे लोग घर ही छोड़ कर भाग खड़े होते हैं और दूर होकर उनसे निजात पाने के उपाय सुझाते हैं।ऐसा नहीं होता कि घर ही छोड़़ देते हैं।तो फिर शोषण का सामना क्यों नहीं कर पाए? क्यों नहीं सोचा अपनी बूढी मां और बच्चों का? क्यों नहीं ले गए उन्हें अपने साथ? मन में भय व्याप्त था।पता नहीं आगे कब क्या होगा? काश! वे घर छोड़ जंगलों में नहीं गए होते।काश! वे शोषण के विरुद्ध अपनी आवाज और लोगों की आवाज के साथ मिलकर आवाज बुलंद किए होते, क्योंकि जब एक आवाज अनेक आवाज में बदल जाए तो शोषण तो मिटेगा ही, हर घर, हर गांव रौशन हो जाएगा।वे पुलिस की बंदूकों से नफरत करते हैं।पुलिस शोषण करती है,बंदूकों का भय दिखाकर मनचाहा काम करा लेती है।पर मैं कहता हूं कि कितने ऐसे थे और अब कितने ऐसे हैं।क्या कोई आंकड़े हैं उनके पास!ऐसा नहीं कि सारी पुलिस शोषक हैं।कुछ शोषक भले दिखती हों पर वे पुलिसतंत्र में ही नहीं वे किसी भी तंत्र में शामिल रहते तो शोषक ही दिखते।अब वक्त बदल रहा है।तंत्र में शोषणकर्ताओं की पहचान कर उन पर आवश्यक कार्रवाई भी की जा रही है।और फिर कितने पुलिस वालों की बंदूकें गोलियां उगलती हैं।गोलियों को उगलने की जरुरत ही न पड़े। पुलिसतंत्र हमेशा यही चाहती है।मैं तो चाहता हूं कि वे अब तंत्र के साथ हो लें।मैं अफ़सोस के साथ कहता हूं कि-
*क्यों सरकारी तंत्र पर \रह गई न उनकी आस्था
विस्फोटों से उड़ती पुलिया \बंद हुआ तब रास्ता*
मैं कहता हूँ कि वे सिस्टम की आवाज बनें।बारूदों से कभी-कभी विस्फोट कर अपनी उपस्थिति दर्ज करने की जगह समाज की मुख्यधारा में जुड़कर शोषण के विरुद्ध बारूद से नहीं वरन् अपनी बुलंद आवाज से ऐसा विस्फोट करें कि उनकी एक आवाज ही समाज में उनकी स्थाई उपस्थिति का प्रमाण बन जाय।मैं तो कहता हूँ कि वे आत्मसमर्पण करें, आत्मसमर्पण उनकी बुजदिली नहीं जिन्दादिली का प्रमाण बने।उनकी ऊर्जा परमाणु ऊर्जा से कम नहीं जिसे अनियंत्रित छोड़ दी जाय तो विस्फोट और नियंत्रित कर ली जाय तो देश के काम आए। वे आएं, अपने समाज में लौटें।मैं मानता हूँ कि अब भी प्रशासन में कुछ सौदागर बैठे हैं।अगर वे जानते हों तो उनके नाम उजागर करें।सरकार अब उनके आत्मसमर्पण की नई नीतियां भी बना रही है। पूर्व की नीतियों में आवश्यक संशोधन भी किए जा रहे हैं। मुकदमे वापस लेने की कार्रवाई की जा रही है।राष्ट्र की सीमाओं के रक्षक बनें। मैं नहीं चाहता अब ऐसी कोई चूक हो कि खेतों में फसलों की जगह बन्दूक हो। मैं चाहता हूँ खेतों में फसलें उगें।उनकी घर-वापसी पर चारों ओर होली और दिवाली हो,बिन मौसम भी चारों ओर हरियाली हो!
@ राजेश पाठक
MO- 9113150917
झारखंड सरकार के योजना एवं विकास विभाग में सांख्यिकी अधिकारी।


