राष्ट्रमत न्यूज,बालाघाट(ब्यूरो)। बालाघाट जिले के जंगलों में बसे कुंडेकसा और बोंदारी गांवों में पिछले 15 दिनों में वायरल बुखार के कारण तीन बच्चों की जान चली गई। अडोरी पंचायत के इन दोनों गांवों में 100 से ज्यादा लोग बीमार पड़े हैं। गांव वालों का दर्द है कि दूर-दराज इलाका होने की वजह से उन्हें टाइम पर इलाज और सही स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं मिल पाती हैं।

तीन मासूम बच्चों की मौत
गांव में फैले इस बुखार से तीन मासूम बच्चों की मौत हो चुकी है। बीते 22 तारीख को 3 साल की छोटी बच्ची प्रीति मरकाम ने दम तोड़ दिया। इससे करीब दो हफ्ते पहले एक ही घर के दो भाई-बहन, 13 साल के लम्बिया धुर्वे और 1 साल के संतोष धुर्वे की एक-एक दिन के अंतर पर मौत हो गई थी।
झाड़ फूंक न करें
बीमार लोगों और मृत बच्चों में तेज बुखार के साथ गले में खराश, मुंह में छाले और शरीर पर छोटे-छोटे लाल दाने निकलने जैसे लक्षण दिखे हैं।मामले पर स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि मौतों की बड़ी वजह ग्रामीणों का वक्त पर अस्पताल न जाना और पंडा-पुजारियों के चक्कर में पड़कर झाड़-फूंक करवाना है। मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) ने बताया कि एक बच्ची की हालत बिगड़ने पर उसे बड़े अस्पताल ले जाने को कहा गया था, पर घरवाले इसके लिए तैयार ही नहीं हुए।

झाड़-फूंक के भरोसे इलाज में देरी न करें
इन दोनों गांवों में ज्यादातर आदिवासी बैगा समाज के लोग रहते हैं। बीमारी की खबर मिलते ही स्वास्थ्य विभाग की टीम एक्शन में आ गई है।CMHO डॉ. परेश उपलव ने बताया कि डॉक्टरों, एएनएम और आशा कार्यकर्ताओं की टीम पिछले तीन दिनों से हर घर जाकर लोगों का चेकअप कर रही है। अफसरों ने खुद गांव पहुंचकर मेडिकल कैंप का जायजा लिया है और हालात पर पूरी नजर रखी जा रही है।अधिकारियों ने लोगों से अपील की है कि किसी भी प्रकार के लक्षण दिखाई देने पर तत्काल स्वास्थ्य टीम से संपर्क करें और झाड़-फूंक के भरोसे इलाज में देरी न करें।

डर और बुखार से तप रहे हैं बच्चे
इन गांवों की वीरान गलियों में पसरा सन्नाटा, चिंतित माता-पिता की आंखों में तैरता डर और बुखार से तपते बच्चों की कराहें इस बात की गवाही दे रही हैं कि आदिवासी अंचल अभी भी स्वास्थ्य सुविधाओं तक भरोसेमंद और समय पर पहुंच बनाने की जद्दोजहद में है। तीन मासूमों की मौत केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि उस दर्द की कहानी है जिसे जंगल के इन दूरस्थ गांवों का हर परिवार महसूस कर रहा है। अब उम्मीद प्रशासन की सतर्कता, स्वास्थ्य विभाग की लगातार निगरानी और ग्रामीणों के सहयोग पर टिकी है, ताकि बीमारी की यह कड़ी यहीं टूट जाए और बैगा अंचल फिर से सुरक्षित सांस ले सके।