तीसरा कमरा \ कहानी - rashtrmat.com

तीसरा कमरा \ कहानी

रमेश कुमार*रिपु’ की तीसरा कमरा कहानी की सबसे बड़ी ताकत यह है कि यह पारंपरिक “पति–पत्नी–दूसरी औरत” वाली कहानी नहीं है।यहाँ प्रेम, बीमारी, उम्र, असुरक्षा, स्त्री-मन, अकेलापन और त्याग  सब एक-दूसरे में घुले हुए हैं।कल्याणी खलनायिका नहीं है, बल्कि वह अपने ही प्रेम से डरती हुई स्त्री है।  यह कहानी प्रेम पाने की नहीं,प्रेम को अपने बाद भी बचाए रखने की कहानी है।

                             तीसरा कमरा \ कहानी

रमेश कुमार ‘रिपु’

कल्याणी जब पहली बार वॉकर पकड़कर अस्पताल के गलियारे में चली थी, तब उसके चेहरे पर दर्द से ज्यादा जिद थी। दोनों घुटनों का ऑपरेशन हुए अभी पाँच दिन ही हुए थे। हर कदम पर ऐसा लगता था जैसे किसी ने हड्डियों में कील ठोक दी हो, मगर वह रुकना नहीं चाहती थी।पीछे खड़े महेन्द्र की आँखों में बेचैनी थी।

डॉक्टर हँसते हुए बोले,“मैडम से ज्यादा डर तो इनके चेहरे पर दिख रहा है।”

कल्याणी मुस्कुराई,“इन्हें लगता है मैं मर जाऊँगी तो ये अकेले पड़ जाएँगे।”

महेन्द्र ने तुरंत उसकी बाँह थाम ली।“तुम नहीं रहोगी तो मैं सिर्फ अकेला नहीं पड़ूँगा,खत्म हो जाऊँगा।”

कल्याणी हँसी,मगर भीतर कहीं वह काँप गई।साठ की उम्र में भी महेन्द्र बेहद सधे हुए आदमी लगते थे। हल्की सफेद दाढ़ी, चुस्त शरीर, हमेशा करीने से प्रेस की हुई शर्ट। कोई भी उन्हें चालीस-पैंतालीस से ज्यादा का नहीं मानता। वहीं कल्याणी के चेहरे पर बीमारी की लंबी कहानी लिखी थी। ब्रेस्ट कैंसर का ऑपरेशन, फिर गॉलब्लैडर की पथरी, अब घुटनों का रिप्लेसमेंट। शरीर धीरे-धीरे उसका साथ छोड़ता जा रहा था।लेकिन महेन्द्र ने कभी उसे यह महसूस नहीं होने दिया कि वह अधूरी है।

शादी के दस साल बाद जब डॉक्टरों ने साफ कह दिया कि अब संतान की उम्मीद लगभग खत्म है, तब भी महेन्द्र ने सिर्फ इतना कहा था,“हर आदमी बाप बनने के लिए नहीं पैदा होता कुछ लोग सिर्फ पति बनने के लिए भी पैदा होते हैं।”

उस दिन कल्याणी देर तक रोई थी।घर लौटने के बाद स्नेहा ने जिस तरह उसकी सेवा शुरू की, उससे कल्याणी का सूना घर जैसे फिर से घर लगने लगा।स्नेहा ऊपर वाले दो कमरों में किराए से रहती थी। साथ में उसका पाँच साल का बेटा ईशान रहता था।

उसका पति सोहन मुंबई में इंजीनियर था। साल में एक-दो बार आता। फिर एक दिन पता चला,तलाक हो चुका है। कोर्ट ने बच्चे का खर्च तय कर दिया है। बस रिश्ता कागज़ पर खत्म हुआ था, आदतों में नहीं।एक रात छत पर कपड़े उतारते हुए कल्याणी ने उसे चुपचाप रोते देख लिया।

“क्या हुआ?”

स्नेहा पहले मुस्कुराई। फिर अचानक आँखें भर आईं।

“कुछ नहीं आंटी, बस कभी-कभी लगता है किसी का इंतजार आदत बन जाए ना तो नींद मर जाती है।”

उस रात पहली बार कल्याणी को लगा,यह लड़की भीतर से बहुत अकेली है।धीरे-धीरे वह किराएदार कम, घर की सदस्य ज्यादा हो गई।

सुबह नाश्ता बनाकर लाती। दोपहर में दवा देती। रात में घुटनों पर सिकाई करती। कई बार महेन्द्र ऑफिस से लौटते तो स्नेहा चाय बनाकर उनके सामने रख देती।

“अंकल, आज शुगर कम डाली है।”

“तुम्हें कैसे पता मुझे कितनी शुगर पसंद है?”

“आंटी ने बताया।”

तीनों हँस पड़ते।और यहीं से शायद वह महीन धागा बुना जाना शुरू हुआ जिसे बाद में कल्याणी खुद काट नहीं पाई।

एक दिन स्नेहा को तेज दर्द उठा। जाँच हुई। रिपोर्ट में बच्चेदानी में गांठ निकली।वह डर गई।कल्याणी ने तुरंत कहा,“घबराओ मत। तुम्हारे अंकल के बहुत डॉक्टर परिचित हैं। सब ठीक हो जाएगा।”

उस दिन पहली बार महेन्द्र उसे डॉक्टर के पास लेकर गए।वापसी में रास्ते भर स्नेहा चुप रही।फिर अचानक बोली,“अगर मुझे कुछ हो गया ना तो ईशान का क्या होगा?”

महेन्द्र ने स्टीयरिंग पर हाथ कस लिया।

“कुछ नहीं होगा तुम्हें।”

“सब यही कहते हैं।”

“मैं कह रहा हूँ।”

उसके स्वर में एक अजीब भरोसा था।घर लौटकर उसी रात स्नेहा ने उन्हें मैसेज किया,“आज अगर आप साथ नहीं होते तो मैं बहुत डर जाती।”

महेन्द्र फोन टेबल पर छोड़कर नहाने चले गए।स्क्रीन चमकी।मैसेज कल्याणी ने पढ़ लिया।बस वही क्षण था जब उसके भीतर की औरत पहली बार चुपचाप जागी।कुछ दिनों बाद महेन्द्र एक साड़ी खरीदकर लाए।कल्याणी खुश हो गई।

“अरे वाह! मेरी पसंद याद है अभी तक?”

महेन्द्र सहज स्वर में बोले,“स्नेहा ने पसंद करवाई।”

पता नहीं क्यों, उस एक वाक्य ने भीतर कहीं हल्की-सी चुभन पैदा कर दी।उस रात कल्याणी देर तक आईने के सामने खड़ी रही।ढीली पड़ती त्वचा। ऑपरेशन के निशान। झुकी देह।उसी समय बाहर से स्नेहा की खिलखिलाहट सुनाई दी। खुले बाल। जवान चेहरा। जिंदा आँखें।

कल्याणी ने धीरे से अपने प्रतिबिंब से कहा,““औरत पहले अपने शरीर से हारती है फिर दुनिया से।”

महेन्द्र को अभी भी कुछ समझ नहीं आया था।उन्हें लगता था,कल्याणी बस बीमारी और उम्र की वजह से भावुक हो रही है।लेकिन शक बहुत धीरे जन्म लेता है। और एक बार जन्म ले ले तो हर चीज़ में अपना प्रमाण खोज लेता है।

अब कल्याणी नोटिस करने लगी,महेन्द्र स्नेहा के बेटे के लिए खिलौने लाते हैं।स्नेहा महेन्द्र की पसंद का दलिया बनाती है।महेन्द्र कहते,“तुम अकेले डॉक्टर के पास मत जाया करो।”

स्नेहा पूछती,“ऑफिस से लौटने में देर हो जाएगी क्या?”

सामान्य बातें थीं।लेकिन अब सामान्य कुछ नहीं रह गया था।कल्याणी का जन्मदिन आया।घर सजाया गया। केक आया। तस्वीरें खिंचीं।एक फोटो में फोटोग्राफर ने महेन्द्र और स्नेहा को साथ खड़ा कर दिया। पीछे हल्की लाइट थी। दोनों सचमुच पति-पत्नी जैसे लग रहे थे।फोटो सोशल मीडिया पर डाली गई।कमेंट आने लगे,“क्या खूबसूरत कपल है!”

“ऐसा पति मिले तो जिंदगी बन जाए!”

“जोड़ी हो तो ऐसी!”

कल्याणी सब पढ़ती रही।चेहरे पर मुस्कान थी।लेकिन भीतर कोई धीरे-धीरे टूट रहा था।उस रात उसने पहली बार महेन्द्र से पूछा,“तुम्हें स्नेहा अच्छी लगती है?”

महेन्द्र हँस पड़े।“तुम्हें क्या हो गया है?”

“सीधा जवाब दो।”

“अच्छी लड़की है।”

“बस लड़की?”

महेन्द्र ने पहली बार उसकी आँखों में देखा। वहाँ मजाक नहीं था।उसके बाद घर बदलने लगा।अब कल्याणी छोटी-छोटी बातों पर चिढ़ने लगी।

“बहुत फिक्र रहती है तुम्हें उसकी।”

“अरे बीमार है।”

“और मैं?”

“तुम्हारे लिए ही तो सब कर रहा हूँ!”

“या मेरे सामने कुछ और पीछे कुछ और?”

महेन्द्र अवाक रह जाते।एक दिन तो उसने साफ कह दिया,“मैं जानती हूँ तुम दोनों के बीच क्या चल रहा है।”

महेन्द्र जैसे सुन्न पड़ गए।“होश में हो?”

“उस रात लाइट गई थी। दस मिनट अंधेरा था। मैं कमरे में थी। तुम दोनों बाहर थे। मुझे सब समझ आता है।”

असलियत यह थी कि रिपोर्ट देखकर स्नेहा डर गई थी और रोने लगी थी। महेन्द्र उसे पानी पिला रहे थे।लेकिन अंधेरा हमेशा सच नहीं दिखाता। कई बार वह डर दिखाता है।धीरे-धीरे कल्याणी के आरोप वही करने लगे जिससे वह डरती थी।अब महेन्द्र सचमुच स्नेहा के प्रति सजग रहने लगे।एक दिन कल्याणी ने सबके सामने स्नेहा का अपमान कर दिया।

“बहुत सेवा कर ली तुमने इस घर की!”

स्नेहा का चेहरा सफेद पड़ गया।वह ऊपर जाकर सामान पैक करने लगी।महेन्द्र पीछे-पीछे पहुँचे।

“ये क्या कर रही हो?”

“कमरा खाली कर दूँगी।”

“कहीं नहीं जाओगी।”

“किस हक से रोक रहे हैं?”

महेन्द्र चुप रह गए।और उसी चुप्पी में शायद प्रेम पहली बार जन्मा।उसके बाद तीनों साथ रहते हुए भी साथ नहीं रहे।कल्याणी अब भीतर-ही-भीतर बुझने लगी थी।लेकिन एक सच कोई नहीं जानता था।

उसका कैंसर लौट आया था।रिपोर्ट उसने महीनों पहले देख ली थी।उसने महेन्द्र को नहीं बताया। क्योंकि वह जानती थी,अब उसके बाद महेन्द्र अकेले रह जाएँगे।और शायद इसी डर में उसने एक अजीब खेल खेलना शुरू किया।वह खुद दोनों के बीच शक बोती रही।शायद इसलिए कि उसके जाने के बाद महेन्द्र बिल्कुल खाली न रह जाएँ।

एक सुबह स्नेहा चाय लेकर नीचे आई।कमरा खुला था।कल्याणी बिल्कुल शांत लेटी थी।जैसे बहुत दिनों बाद उसे नींद आई हो।तकिए के नीचे एक पत्र रखा था।महेन्द्र काँपते हाथों से पढ़ने लगे,“मेरी मौत के लिए किसी को दोष मत देना।मैं थक गई थी।बीमारी से नहीं,इस डर से कि मेरे बाद तुम अकेले रह जाओगे।”

उनकी आँखें धुँधली हो गईं।पत्र में आगे लिखा था,““मैंने ही शक का बीज बोया।पहले मुझे सचमुच डर लगा था कि कहीं स्नेहा तुम्हें मुझसे दूर न कर दे।फिर एक दिन समझ गई वह तुम्हें मुझसे दूर नहीं, मेरे बाद अकेलेपन से बचा सकती है।”

स्नेहा फूट-फूटकर रोने लगी।पत्र की आखिरी पंक्तियाँ थीं,“महेन्द्र, मुझे माफ कर देना।और स्नेहा,अगर तुम्हारे दिल में उनके लिए जरा-सी भी जगह हो तो उन्हें अकेला मत छोड़ना।मैं हारना नहीं चाहती थी।इसलिए तुम्हें किसी और की बाँहों में धकेल दिया।”

तेरहवीं के बाद स्नेहा सामान बाँधने लगी।महेन्द्र ने धीमे स्वर में पूछा,““तुम भी चली जाओगी?”

स्नेहा ने सिर झुका लिया।

“मैं रह गई तो लोग बातें करेंगे।”

बहुत देर तक कमरे में खामोशी रही।

फिर महेन्द्र बोले,“और अगर वही बात सच हो चुकी हो तो?”

स्नेहा रो पड़ी।बालकनी में हवा चल रही थी।दीवार पर टंगी कल्याणी की तस्वीर मुस्कुरा रही थी। घर

में अब भी तीन लोगों की उपस्थिति थी।बस उनमें से एक दिखाई नहीं देती थी।

  रमेश कुमार ‘रिपु’

रीवा,मध्यप्रदेश,486002

MO-7974304532