अधिग्रहण \ कहानी - rashtrmat.com

अधिग्रहण \ कहानी

झारखंड में सिमलिया रांची जिले के रातू प्रखंड में स्थित एक गांव है।सिमलिया अपने पिन कोड के लिए देश में जाना जाता है वहीं यहां का चतरा विधान सभा नक्सलियों के लिए जाना जाता है।इस भूमि को आधार बनाकर पंकज मित्र ने कहानी लिखी है। वैसे पंकज मित्र अपनी कहानियों के माध्यम से किसान मजदूर,आदिवासी और स्त्री दलित के मुद्दों को उठाते आए हैं। अधिग्रहण कहानी में उन्होंने सिमलिया की जमीन के लिए जासूसी का प्लाट किस तरह बुना है उसे जानिये इस कहानी में।

                 अधिग्रहण \ कहानी 

पंकज मित्र,झारखंड 

करमचन्द जासूस करे महसूस

जासूसी कहानियाँ पढ़ने और जासूसी टी.वी. सीरियल्स देखने की लत एक दिन जान लेकर रहेगी मेरी, आँखें तो करीब -करीब ले ही चुकी है। पढ़ने के लिए आतशी शीशे की जरूरत पड़ती है और थोड़ी दूर देखने के लिए भी बाइनाक्यूलर्स इस्तेमाल करता हूँ। यहाँ तक कि टी.वी. देखने के लिए भी। वैसे बूढ़े हो जाने के बाद जासूसों वाले थोड़े बहुत गुणदोष आ ही जाते है – मसलन

हर किसी को संदिग्ध समझना, पड़ोसियों के घरों के मसले सूँघने की कोशिश करना, बहू-पोते-पोतियों के आने-जाने पर नजर रखना-(टोका-टोकी की हैसियत कुछ वर्षों पहले तक थी पर अब है नहीं, सो…) एक छोटा टी.वी. सेट लगा है कमरे में और केबल भी बेटे की कृपा से लगा है।

एक ‘भोर का तारा’ अखबार आता है- इन उपकरणों से शहर-समाज पर भी नजर रखना। अगाथा क्रिस्टी से लेकर कर्नल रंजीत या इब्ने सफी और ‘सी.आई.डी.’ से लेकर ‘अदालत’ टी.वी. सीरियल तक इस जासूसी प्रेम का दायरा फैला हुआ था मेरा। पहले करमचन्द और व्योमकेश बक्शी देखता था। पोती मतलब आर.के. (रागिनी कच्छप यही कहलवाना पसंद करती है) कहती है – ये लो शर्लक होम्स, स्कूल से लाई हूँ क्योंकि मेरी फ्रेंडस कहती है कि खिड़की से बाइनाक्यूलर्स लगाकेगेट की तरफ नजर रखते हुए आप एकदम अफ्रीकन जासूस लगते हो। गेट बहुत दूर नही था,छोटे से घर का गेट कितना दूर होगा, लेकिन उतनी दूर देखने के लिए भी मुझे उनकी जरूरत थी। नाकाबिलेमेंशन सी नौकरी में कितना बड़ा घर बन पाता। सुनता हूँ बेटा नये इलाके में कोई

बड़ा सा घर बनवा रहा है पर मुझे उससे क्या। रिटायरमेंट के बाद जरूरत ही कितनी है मेरी। घर बनवाये या जहन्नुम में जाये। मैं तो अब नई जगह जाने से रहा। यहाँ चर्च भी नजदीक है और अपने समाज के दस लोग नजदीक हैं – करमा पर्व से लेकर क्रिसमस तक सब में धूम रहती है।

बस एक रिटायर्ड विधुर को और क्या चाहिये। बेटा तो बस बेटा ही है, पोते-पोतियों का थोड़ा मोह रहता है। खैर ये तो आम बूढ़ों की आम दास्तान है लेकिन मैंने जो जासूसी वाला इंट्रो दिया था उसके पीछे मकसद था कि आम बूढ़ों की तरह बीमारी और घरेलू कलह की बातें न करके कुछ हटके करूँ-मसलन एक जासूस बूढ़ा जो अपने गहरे काले रंग और घुँघराले कड़े बालों के कारण

नीग्रो जासूस लगता है।

रंग जमाने के लिए कभी-कभी एक पुरानी घिसी बदरंग सी फेल्ट हैट भी लगा लेता हैऔर बाइनाक्यूलर्स की आँखों से आने-जाने वालों पर नजर रखता है। देखो, फिर वही लड़का आर.के. से गेट पर खड़ा होकर बातें कर रहा है जिसका रंग-ढ़ंग मुझे बिल्कुल भी पसंद नहीं। जबकि नापसंदगी की वजह भी कोई खास नहीं है। अरे, आजकल तो लड़के इस तरह के रूप-रंग में रहते ही हैं। ऊपर बाल खड़े, पीछे लंबे, गर्दन से सटे-घोड़े की अयाल की तरह, ठुड्डी पर जहाज के एंकर की तरह की दाढ़ी, हिप पाकेट जाँघों के नीचे लटकती हुई और टी-शर्ट पर लिखा था- माय पापा इज माय ए.टी.एम.। उस दिन थोड़ी दूर तक पीछे भी गया था। मोहल्ले में ही जोनाथन के घर में घुसते देखकर समझ गया, इनकम टैक्स वाले जोनाथन का बेटा है।

आर.के. ने बताया – ‘इस बार टेन सी.जी.पी.ए. लाया है।

– ये क्या होता है ?

– आजा ! ये सी.बी.एस.ई. का मार्किंग है। टाॅप स्कोर।

– अच्छा! लगता तो नहीं… मैं बुदबुदा कर चुप हो गया था।

– ओ हो ! आपकी जेनरेशन का यही प्राबलम है। सब चीज पर शक।

– हो! हो! मैं हूँ शक्की और झक्की जासूस और तुम मेरी एसिस्टेंट आर.के!

-अच्छा ! आज का अनलाॅक शर्लाक किया ?

-ही! ही! ही!

– आज फिर चीटिंग की ? आन्सर पहले पढ़ लिया ? आजा, तुम कब सुधरोगे ? तुम्हारे जासूसी

के कैरियर का क्या होगा ? – आर. के. लाड़ से अखबार में एक जासूसी पहेली पर मुझे उलाहने

दे रही थी।

केस न. – एक

तभी फिर वह मुझे दिखी थी। बाइनाक्यूलर्स के जरिये गेट के ठीक सामने गुलमोहर पेड़ के नीचे बैठी। पीठ पर बेतरा में बच्चा सो रहा था। आज तीसरा दिन था। पहली नजर में कोई रेजा-कुली जैसी लगती थी। घर के पिछले हिस्से में बेटा कुछ तामीरी काम करवा रहा था। उसी में काम कर रही होगी। लेकिन बेटा उससे पेड़ के नीचे जाकर क्यों बातें कर रहा था। फिर वहीं से

वह चली गई। गर्मियों की उदास दोपहर में जब बूढ़े झपकी और जगने के बीच झूलते हैं तभी पहली बार दिखी थी। वक्त काटने के लिए जैसे ही बाइनाक्यूलर्स आंखों पर लगाया – गुलमोहर से फूलों को देखने के लिए । जूम थोड़ा बढ़ाया तो उसका चेहरा साफ दिखने लगा – पसीने की लकीरें थी और शायद परेशानी की भी रही हों । तभी फ्रेम में बेटा भी आया। उसने कुछ कागज

दिये। फिर वह चली गई। दूसरी बार उसे इतवार के मास के समय देखा। चर्च के कैंपस के बाहर खड़ी – लग रहा था, जैसे किसी का इंतजार कर रही हो। आर.के. ने मुझे बताया कि ये वही औरत है। क्योंकि इस वक्त बाइनाक्यूलर्स नहीं थे मेरे पास। पर ये फादर कंडुलना भी जानते हैं इसे। पास से गुजरा तो फादर उसे समझा रहे थे – जेम्स तो देख रहा है न कागज’ – कान खड़के

थे मेरे। जेम्स यानि बेटा मेरा। हाँ, कुछ पेपर्स तो दिये थे इसने उसे। कदम धीरे कर दिये मैंने।आर.के. झल्लायी भी – ‘क्या आजा! जल्दी चलो’। लेकिन कान फादर कंडुलना की बातों पर लगे थे- ‘देखो सिमलिया की जमीन है तो चर्चा में है – सिमलिया सुनते ही लहर सी उठी। उस दिन अपनी घुरघुरिया, घुरघुरिया नहीं समझे, अरे ! मोपेड, मोपेड पर चढ़कर चैक तक पहुँचा ही था

कि माथे पर हरी पट्टियाँ बांधे, हाथों मे डंडे लिये रंग बिरंगे नौजवान – ‘‘का अंकल! भोरे से पेपर नहीं पढ़ने सके का ? आज बंदी है, घुरघुरिया से घुर जाइये’’ – उसी ने मेरे मोपेड को पहली बार घुरघुरिया कहा था।

– काहे बंदी है बाबू ?

– वही सिमलिया के लिए।

– लेकिन पेंशन लेने जाना था बैंक।

– घुर जाइये। नही तो पेंशन कहाँ लेने सकियेगा कभी – गुटखा खाये बहुत सारे दाँत निकल आये थे। एक मारूति के पीछे भागे थे जैसे कई बार कुते गाड़ियों का पीछा करते हैं। भूँकते जाते हैं -एक डंडा बाॅडी पर लगा भी दिया था। मारूतिवाला भागा, बदहवास। बंदी में कुछ नुकसान होने पर इंश्योरेंस भी नहीं मिलता था। बीमा कंपनी कहती थी – बंदी में गाड़ी निकाला क्यों ? एक मेरी

घुरघुरिया को डंडे से छेड़ रहा था। वापस आने में भलाई थी। यही सिमलिया से लहर की वजह थी। खैर तो अब जासूस मन ‘पेपर्स’ देखने को बैचेन हो गया था वो औरत सिमलिया, पेपर्स,जेम्स कुछ कील-काँटा मिल नही रहा था। आर.के. को शामिल करना पड़ेगा लेकिन बाप से डरती थी वह। फिर कई रोज तक बाइनाक्यूलर्स लगाये गुलमोहर के पेड़ के नीचे की जगह को देखता रहा वो औरत फिर नजर नहीं आई। जगह खाली और सुनसान पड़ी रहती थी। आखिर कहाँ चली गई होगी वह। उसकी परेशानियाँ जो भी रही हो क्या खत्म हो गई होगी ? पर सवाल नं.-वन था कि वह थी कौन ? जेम्स से पूछने का कोई फायदा नहीं था, वह बताता नहीं। इधर कुछ बिजी भी दिखने लगा था। पहले तो गाछतर का वकील कहा जाता था, सुना अब किसी चेम्बर में बैठने लगा है।

आर.के. उर्फ करमचंद की किटी

आजा की सारी आदतें अच्छी है सिर्फ जेवियर को देखकर कुड़-कुड़ करने के अलावा।फेल्ट हैट लगाकर बाइलाक्यूलर्स से खिड़की में से देखते हुए कितने क्यूट लगते हैं आजा। एकदम क्यूटिपाई। इधर कुछ परेशान दिखते हैं। शायद उस औरत की वजह से। पापा को कुछ पेपर्स तो दिये थे उसने। वो पेपर्स मिल जायें तो आजा की परेशानी कुछ कम हो सकती है। लेकिन पापा

के पेपर्स में वह ढ़ूढना। पेंशेंस चाहिए। जेवियर भी मुझे बार-बार यही कहता है पेशेंस की कमी है मुझमें इसलिये गिटार भी नहीं सीख पाई। जबकि जेवियर ने बहुत कोशिश की थी। कितना अच्छा बजाता है वह- ‘ हाउ आय फाॅल इन लव’ पर। बदमाश भी है एकदम – कूल सा बदमाश। कहता है ये गाना तुम्हारे लिये नहीं गा रहा हूँ। है कोई जिसके लिए ये साँग डेडीकेट कर रहा हूँ।

और फिर जो गाया क्रिसमस गैदरिंग पर, वाउ! चलो, पेपर्स ढूंढती हूँ। पापा तो अभी तीन-चार घंटे नहीं आयेंगे। ले न गए हों कहीं। आजा ने बताया था ऐसा पेपर होगा जिसपर बड़े साइज का स्टैंप जैसा लगा होगा। लेकिन ऐसे तो बहुत सारे पेपर्स हैं यहाँ। ये फाइल – ‘सिमलिया’ लिखा है इस पर। इसमें भी तो वैसे ही बहुत सारे पेपर्स हैं। चलो, ये पूरी फाइल ही ले जाती हूँ आजा के पास।

आजा ! मिशन सक्सेसफुल ।

एक्जीबिट न.-1

जल्दी-जल्दी फाइल पलटना भी तो मुश्किल ही होता है न। एक-एक कागज पढ़ो, वो भी आतशी शीशे से। आर.के. पढ़ नहीं पा रही है। जगह-जमीन के कागज ऐसी – ‘‘किस लैंग्वेज मे रहता है आजा ?’’ तिसपर फोटोकॉपी धुंधली, कही कालिख ज्यादा पर सभी एक ही इलाके के हैं –

सिमलिया के। ‘भोर का तारा’ अखबार में जो खबर तीन-चार दिन पहले छपी थी – मतलब बंदी से एक दिन पहले, जिसमें मुआवजा वगैरह से संबंधित जेम्स का बयान भी छपा था और उससी तस्वीर भी थी। उसी के कागज हैं ये सब। लेकिन इन सबसे जेम्स को क्या मतलब। इसमें तो किसानों के ‘जान देंगे जमीन नहीं’ वगैरह का मामला था – कुछ सरकारी अधिग्रहण वगैरह का।

एक लिफाफा अलग से रखा है, देखूँ जरा, इसमें लाल रंग से मार्कर पेन का निशान भी बना है जिसे पहली नजर में देखने पर लाल स्याही फैल गई है – ऐसा लगता है – पर ध्यान से देखने पर – नहीं मैंने कहाँ… आर.के. ने देखा – देखो आजा ! ये हार्ट बना है इस पर। अच्छा ! – मैं आश्चर्य में पड़ गया । जगह -जमीन के कागजात और उसपर दिल की तस्वीर। जासूसी नजरिया

न भी हो तो अजीब लगता किसी को भी। लिफाफा खोला तो उसमें से फोटो कॉपी नहीं बल्कि मूल प्रति निकली। यह भी जमीन का ही कागज था। किसी सैमुअल तिर्की का – सिमलिया का…हूँ ! सिमलिया का सैमुअल – आर. के. मेरी ओर देखे जा रही थी। उसका पेशेंस जबाब दे रहा था। झपट्टे से उसने सारे कागज उठाये, फाइल में रखे और यह जा वह जा। शायद पापा के

मोटरसाइकिल की आवाज सुन ली हो उसने या दूर से आते देख भी लिया हो। मेरे देखने का तो

सवाल ही पैदा नहीं होता था। कई बार दुहराता रहा – सिमलिया का सैमुअल – नाम सुना सा

लगता है।

मौका-ए- वारदात

अब तो जासूस का फर्ज़ बनता है कि सिमलिया चला जाये। पहले तो हिम्मत जवाब दे रही थी। एक तो आँखों की तकलीफ, फिर घुरघुरिया पर उतना दूर, मतलब तकरीबन दस-बारह

किलोमीटर। बराबर कुछ न कुछ होता रहता था वहाँ, जैसा ‘भोर का तारा’ बताता रहता था -आज सरकारी बाउंड्री भसकाई जायेगी, आज हल चलाया जायेगा, आज बिचड़ा डालेंगे, आज बाहर से बहुत सारे पढ़े-लिखे लोग आयें हैं हक दिलवानें सुकुमनि की तस्वीर हमेशा छपती रहती थी।

कभी-कभी जेम्स की भी। साहसी थी सुकुमनि। साथी राय जी की मोटरसाइकिल पर तकरीबन रोज ही सिमलिया जाती थी। किसी को समाज का काम करते देख खुशी होती है। पुलिस ने एक बार लाठी भंाजी तो सुकुमनि भी भागती हुई तस्वीर छपी। उससे मुझे थोड़ा दुख हुआ था।लेकिन बाद में उसके साथियों का बयान आया था -‘‘ज्यादा लंबी छलाँग लगाने के लिए थोड़ा

पीछे हटना पड़ता ही है।’’ ठीक ही कहतें होंगे। तो घुर-घुर करने हुए जब वहाँ पहुँचा और एक पेड़ की छाँव में बैठा तो सामने बगीचे में बाँस पर चौकी बाँध कर मंच बन रहा था। मालूम हुआ आज धिक्कार सभा है। जो भी हमारे जमीन पर कब्जा करना चाहता है – मतलब सरकार – उसे धिक्कारा जायेगा। सुकुमनि दी, जेम्स दा सबका भाषण होगा। पुलिस भी मौजूद थी। फेल्ट हैट लगाकर एक बूढ़े को आँखों पर बाइनाक्यूलर्स लगाकर मंच की तरफ देखते देखकर – कई लोग जमा हो गए। आपस में खुसुर-फुसुर हो रही थी- सरकारी जासूस है, सी.आई.डी. है। जल्दी से बाइनाक्यूलर हटाये। झोली में डाल लिया। अब जब भाषण शुरू होगा तो लगाउँगा। फेल्ट हैट भी हटा लिया।

एक से खैनी मांगी तब जाकर संधि-समझौता हुआ – ‘‘धत् तेरी! हमलोग तो बुझने नहीं सके, आप तो अपना ही आदमी हैं। ‘‘जेम्स दादा आ गए‘‘सुकुमनि दी भी’’- सब उधर चले गए तो राहत मिली। जासूस को तो छुपकर काम करना पड़ता है। सबकी नजर उसी पर रहे तब तो हो गया काम। किनारे ले जाकर एक से पूछा सैमुअल के बारे मे -‘‘सैमुअल ! सैमुअल तो बहुत पहले मतलब दो साल पहले सिरा गया (मर गया)। जेम्स दादा का तो दोस्त था।‘‘ भक से जैसे दिमाग पर से जाले साफ हो गये। वही सैमुअल! जिसे एकाधबार जेम्स के साथ आते देखा था घर पर। फिर एक दिन जेम्स उसकी मिट्टी में गया था। दोनों जोन्हा फाॅल गये थे नया साल मनाने। हर साल नया साल में जोन्हा दो-चार को निगल जाता था। चट्टानें पानी की मार खाकर चिकनी हो गयी थी। थोड़ा नए साल के सुरूर की फिसलन भी रहती थी तो एक दो लडखड़ा जाते ही थे। फिर तो कहाँ पत्थरों के नीचे जाकर फंस जाते थे कि गोताखोर ही खोज पाते थे। तो वही था सिमलिया का सैमुअल। भाषण शुरू हो गया था। जेम्स भाषण दे रहा था। – हमारी जमीन पर नजर रखने वाले को मुँहतोड़ जबाव देंगे। जल-जंगल – जमीन – आदिवासी – पहचान- बोलता रहा। मुझे थोड़ा गर्व हो रहा था कि जेम्स समाज का काम कर रहा है।

सुकुमनी जब बोल रही थी तो फिर मुझे वही नजर आई। ठीक मेरे सामने से गुजरी – वही परेशानी-चिंता की लकीरें – बेतरा में बच्चा पीठ पर। चेहरा पसीना-पसीना चमकता हुआ। तुरंत खैनीवाले को पकड़ा -‘‘यही तो सैमुअल का औरत है। जेम्स दादा हर मुसीबत के समय खड़ा रहता है इसके साथ। दोस्ती ऐसे निभाना चाहिये।’’

– और पियार भी – खैनीवाले के बगल से एक की आवाज आयी। बाइनाक्यूलर घुमाया तो वह सिटपिटा गया – आँखें लाल, जबान लटपटाती।

– ‘‘छोडिये न काका – इ तो ए.बी.सी.डी. में डूबा रहता है हरदम।

-ए.बी.सी.डी.? मतलब ?

– आदिवासी कोल्ड ड्रिंक – सब हँसने लगे।

सुकुमनी भी हड़िया – दारू के दुष्प्रभाव पर बोल रही थी। एकता बनाये रखने, मुआवजा के फेरे मे न पड़ने आदि के बारे में समझा रही थी। तभी सुकुमनी ने कहा – ‘‘ और सबसे खतरनाक हैं वे जो हमारे बीच के ही हैं। लेकिन हमारी पीठ में ही छुरा घोंप रहे हैं। ऐसे लोगों की पहचान जरूरी है-’’ मैं चैंका। सब सिर हिला रहे थे और सबसे जोर से वही ए.बी.सी.डी. वाला

हिला रहा था सिर।आगे खतरनाक मोड़ है – हाय करमचंद ! किट्टी रिपोर्टिंग – आज एक और हार्ट मिला, पापा के पेपर्स से।

– एक और हार्ट! – किट्टी मतलब आर.के. ने तो मामला पूरा कंफ्यूज्ड कर दिया। एक हार्ट अभी धीरे-धीरे धड़कना शुरू हुआ ही था, फिर दूसरा हार्ट- दिखाओ, दिखाओ। इस लिफाफे में कई चिट्ठियाँ थी। सभी किसी एस. की थी जे. के नाम -कुछ छोटी कुछ बड़ी । चिट्ठियों के लूर-लक्षण से कुछ बहुत ही पर्सनल किस्म की लग रही थी जिसे आर. के. के सामने पढ़ना ठीक नहीं होता। फिर आतशी शीशे से पढ़ने में टाइम भी तो लगता है।

– क्या करमचंद, कुछ सुराग मिल रहा है ?

– पापा कब लौटेंगे दिल्ली से ?

– तीन दिन बाद ।

अंदाजा लगाया तीन दिन में तो पढ़ ही लूँगा।

– ठीक है, अभी सबको यहीं रहने दो, बाद मे ले जाना।

– ये ‘एस’ कौन है आजा ? जे. तो समझ मे आ गया, पापा हैं।

– ‘पता नहीं’ ‘पढूँगा, तब न’ – मैंने टाला – ‘तुमने पढ़ा तो नहीं।’

– नहीं तो – तिरछी मुस्कान से समझ में आ गया कि पढ़ा है। कुछ तो जरूर। आर.के. चली गई।जाते ही एक चिट्ठी उठा ली। शुरू करते ही बूढ़ी हड्डियाँ गनगना उठी। ये एक विशेष रात की दास्तान थी। खुशनुमा अनुभवों की आदिम महक भरी रात। टपकते महुए की महक थी उसमें -आदिम राग का मादक संगीत था – अंत में राय जी से झगड़े का जिक्र था – ‘‘ आज राय जी से

मेरा फाइनल झगड़ा हो गया। उसकी नीयत पर तो शक पहले से ही था लेकिन इस आंदोलन के जुड़ना भी उसी नीयत से होगा ये अंदाजा नहीं था। ये जानकर तो मैं सन्न रह गई कि ‘जोहार कंस्ट्रक्शन’ राय जी का ही है।’’

दूसरी चिट्ठी में जेम्स के भाषण की तारीफ थी- ‘अब तुम भी बहुत अच्छा बोलने लगे हो। इसका इनाम तुम्हें दूँगी अगली बार, जब भी मौका मिला।’ फिर सिमलिया के आंदोलन की रूपरेखा पर चिंता व्यक्त की गई थी- ‘‘लोग कहीं मुआवजे से डोल न जायें। गरीबों का ईमान डोलने में भला कितना समय लगता है।’’

फिर एक थोड़ी लंबी चिट्ठी उठाई तो उसमे अभियोग- आक्षेप- गुस्सा था – ‘‘सबको मालूम है कि तुम आजकल सैमुअल की बीबी को ज्यादा वक्त दे रहे हो। तुम्हारा दोस्त था लेकिन इसका मतलब ये थोड़े ही है। उसके दो एकड़ जमीन पर तुम्हारी नजर है। अब तो तुम्हारेपर भी मेरा शक है कि कहीं सैमुअल के साथ दुर्घटना हुई या कुछ और। खैर, कोई सबूत तो है

नहीं वहाँ तो सिर्फ तुम दोनों ही थे।’’

तभी आर. के. दौडते हुए आई – ‘करमचन्द ! जल्दी से चिट्ठी सब दो। पापा आज ही फ्लाइट से लौट रहे हैं। अभी फोन आया था।’ हबड़-दबड़ में सबको समेटा गया। याद्दाश्त के आधार पर सबको तरतीब दी गई। लिफाफे में डाला और उड़न छू… – ‘‘ठीक से रख देना जैसे था’’ पीछे से पुकारकर कहा मैंने।

फिर एक बार सिमलिया चला जाये, ये इच्छा तब पैदा हुई जब अखबारों और टी.वी.चैनलों ने सिमलिया के पानी को मथकर घी निकालने की कोशिश की। पिछले हफ्ते तीन बार बंदी भी रही। मुझे बेकार ही सैमुअल की औरत याद आ रही थी। मतलब सिमलिया खबरों में था तो सिमलिया का सैमुअल याद आ ही जाता था। साथ ही एक शक का कीड़ा कानों के नीचे रेंगने लगता- जेम्स क्या ऐसा करेगा !! घुरघुरिया चली और जहाँ लिखा था बोर्ड पर -‘आगे खतरनाक मोड़ है’ वहीं पर से रास्ता कटता था सिमलिया के लिए, वहीं से मुड़ गई। सामने से खैनीवाला चला आ रहा था -‘‘एक खिल्ली खिला हो, बाबू।

-तब काका कहाँ ?

– तुम्हारे ही गाँव ।

– जमीन – उमीन तो नहीं खोज रहे हैं ?

– मतलब ?

– मतलब बड़ीमन आदमी आजकल यहीं जमीन खोजता है। टाउन से नजदीक न है। खासकर के बिल्डर लोग – टनटना के दाम बढ़ा दिया है सब।

– अच्छा वो सैमुअल की औरत… ?

– उ तो चली गयी, कहीं अपने बाप घर तरफ – , गुमला – उमला कहीं, था।

– और उसका जमीन-उमीन।

– ठीक से तो मालूम नहीं। शायद जेम्स दा जानते होंगे,

– कैसे चल रहा है रेट यहाँ।

– दू लाख डिसमिल हो गया है।

घुरघुरिया घुर आया घर। जेम्स उत्साह में था। क्योंकि आज शिकार बन रहा था। किट्टी मतलब आर.के. एक चमकदार पैम्फलैट लेकर आई थी – बडे़-बड़े अक्षरों में लिखा था तो आतशी शीशे की जरूरत नहीं पड़ी – ‘हम आपको घर देंगे सपना नहीं’ – ‘‘जोहार कंस्ट्रक्शन’’ प्रो0 जेम्स कच्छप, घीरेन्द्र राय,सिमलिया में भूमि पूजन दिनांक 15 नवम्बर (झारखण्ड स्थापना दिवस) जय बिरसा मुण्डा, जय झारखंड

पंकज मित्र,झारखंड 

MO- 9470956032