डॉ विपिन पांडेय की लघुकथा केवल आम आदमी की हताशा की बानगी मात्र नहीं है। यह आम आदमी के अंदर बेबसी के अलावा उसके गुस्से को भी पूरी शिद्दत के साथ अभिव्यक्त करता है। पढ़िये उनकी लघुकथा मन की शांति के लिए।
डॉ बिपिन पांडेय की लघुकथा
दो दिन
सायं 8 बजे जब आलोक ऑफिस से घर आया तो उसने अपने ससुर को ड्राइंग रूम में बैठा देखा। उसने उन्हें नमस्ते किया और अंदर चला गया। अंदर जाकर उसकी अपनी से नोक-झोंक शुरू हो गई।
“ये तुम्हारे पिता जी यहाँ क्यों आए हैं? इन्हें हमारे घर लेकर क्यों आई हो?”
“आपको तो पता है, भाई वापस जर्मनी चला गया है। पापा जी की देखभाल करने वाला कोई नहीं है। लगभग एक बजे पड़ोस में रहने वाले रावत अंकल जी का फोन आया था। बोला, बेटा आपके पापा जी की तबियत बहुत खराब है। मैं जब घर गई तो पापा जी बेहोश थे। रावत अंकल जी के साथ पापा जी को डॉक्टर के पास लेकर गई। डॉक्टर ने बोला कि इनका विशेष ध्यान रखने की जरूरत है। इसलिए अपने घर ले आई। आप ही बताइए , पापा जी को इनके घर में अकेले भी तो नहीं छोड़ सकती थी।”
“तो तुमने घर को धर्मशाला समझ रखा है। जिसको मन हुआ घर लेकर आ गई।”
“ये मेरे पापा जी हैं।राह से किसी को पकड़कर नहीं लाई हूँ।आप समझते क्यों नहीं।”
“मैं ये सब नहीं जानता। मैंने किसी का ठेका नहीं ले रखा है।”
“ठीक है। आप परेशान मत हो। मैं कल सुबह पापा जी को इनके घर छोड़ आऊँगी।”
अगले ही दिन संध्या अपने पिता जी को मन मसोस कर उनके घर वापस छोड़ आई। दो दिन बाद रावत जी का फिर फोन आया और वे रुँधे गले से बोले-
“बेटा, हमारा पड़ोसी और सबसे प्यारा दोस्त दुनिया छोड़कर चला गया।”
संध्या सोचती है, काश! आलोक ने पापा जी को दो दिन हमारे साथ घर में रहने दिया होता तो मैं अंतिम समय में उनके साथ रहकर बेटी का फर्ज निभा पाती।
.बेबस पिता
“पापा आज ऑफिस से वापस आते समय मेरे लिए गुड़िया जरूर लाना। बहुत दिनों से आप वादा कर रहे हैं ,पर लाते नहीं।”
“आज पक्का अपनी गुड़िया के लिए गुड़िया लेकर आऊँगा।”
“पापा जी! पापा जी! मेरे लिए गुड़िया लेकर आए?” ऑफिस से वापस आए पिता से बेटी ने पूछा।
“नहीं बेटा, आज ऑफिस में काम ज्यादा होने के कारण वहाँ से निकलने में देर हो गई थी और रास्ते में साइकिल भी खराब हो गई थी,इसलिए बाज़ार नहीं जा पाया।” बहुत ही मायूस होकर उन्होंने अपनी पाँच साल की गुड़िया से यह बात कही थी।
पति की यह बात सुनकर पत्नी ने कहा, “क्यों बच्ची को रोज-रोज झूठा वादा करते रहते हो? बच्ची क्या सोचेगी?”
” बच्ची का दिल टूट जाता है,वह उदास हो जाती है।उसे कैसे बहलाती हूँ यह आपकी समझ में नहीं आएगा।”
उन्होंने झल्लाते हुए कहा- “अच्छा, तुमको क्या लगता है कि मैं अपनी बच्ची को गुड़िया लाकर देना नहीं चाहता, मैं उससे झूठे वायदे करता हूँ। अपनी बच्ची के चेहरे पर गुड़िया से खेलते हुए जो खुशी के भाव आएँगे मैं भी वो देखना चाहता हूँ। तुम समझती क्यों नहीं।” उनकी आवाज़ में बेबसी साफ झलक रही थी।
रात में बेटी के सो जाने पर उन्होंने पत्नी से बच्ची के लिए गुड़िया न ला पाने का कारण बताया तो उसकी आँखों में आँसू आ गए।
उन्होने बताया कि सच में उनकी साइकिल खराब हो गई थी, लेकिन दफ्तर से निकलने में उन्हें देर नहीं हुई थी।दफ्तर से तो वे समय से ही निकले थे। उनका बाजार जाकर गुड़िया लाने का विचार भी था। गुड़िया खरीदने के लिए अपने दोस्त से पचास रुपए भी उधार लिए थे। सोचा था पंद्रह रुपए मेरे पास हैं और पचास रुपए उधारी के, इतने में गुड़िया मिल जाएगी लेकिन सारे पैसे तो साइकिल की मरम्मत कराने में ही खर्च हो गए।
अब तुम्हीं बताओ मैं क्या करता? गुड़िया कैसे लाता? शाम को मुझे न तो तुम्हारे ऊपर गुस्सा आ रहा था और न अपनी गुड़िया पर। मुझे तो अपनी बेबसी पर गुस्सा आ रहा था।
अनजान लड़का
मम्मी,”कई दिनों से पापा सुबह ही बाहर कहाँ चले जाते हैं? रात को भी बहुत देर से लौटते हैं?” अनुभूति ने अपनी माँ से पूछा।
“जाएँगे कहाँ? एक बाप का फर्ज निभाना है। जाना तो पड़ेगा। लड़का कोई घर में बैठे-बैठे तो मिल नहीं जाएगा? खोजना पड़ता है, घर-परिवार और खानदान का पता लगाना पड़ता है।”
अब अनुभूति को समझ आया कि उसके पिता जी उसकी शादी करने के लिए योग्य वर की तलाश कर रहे हैं। वर की तलाश ऐसे तो पूर्ण होती नहीं है। उसके लिए तो जूते घिसने पड़ते हैं। जैसे आजकल के लड़कों को नौकरी की तलाश करने के लिए एक ऑफिस से दूसरे ऑफिस के चक्कर काटते हैं और जूते घिसते रहते हैं।
अभी कुछ दिन पहले ही जब अनुभूति को उसकी माँ ने फोन पर किसी लड़के से बात करते सुना था तो कहा था, “बेटा अनजान लड़कों से बात नहीं करते।हमारे खानदान की समाज में कुछ इज्ज़त है।”
“नहीं मम्मी, व्यापक हमारे साथ कॉलेज में पढ़ता था और बहुत अच्छा लड़का है।”
“वह तो ठीक है, पर है तो अनजान ही। तुम उसके घर परिवार के विषय में कुछ जानती हो? नहीं न।”
“मम्मी जैसा आप सोच रही हैं, वैसा कुछ भी नहीं है। हम बस अच्छे दोस्त हैं।”
बस, उसी दिन से अनुभूति की मम्मी ने उसके पापा को शादी के लिए लड़का खोजने के काम पर लगा दिया था।
अनुभूति ने जब अपनी शादी के लिए लड़का खोजने वाली बात माँ से सुनी तो उसने कहा- “मम्मी आप मुझे अनजान लड़के से बात करने से मना कर रही थीं और आज आप ही एक अनजान लड़के के साथ मुझे भेजने की तैयारी कर रही हैं। जब अनजान लड़के से बातचीत करना बुरा है तो शादी करना कहाँ तक उचित होगा।”
अनुभूति की माँ को उसकी बात सुनकर अपनी गलती का अहसास तो हुआ पर उन्होंने उसकी बात का कोई उत्तर नहीं दिया।
अनुभूति सोचती है, माँ-बाप बनी-बनाई लीक पर ही चलना क्यों पसंद करते हैं ? लड़कों की इच्छा-अनिच्छा उनके लिए मायने रखती है लेकिन लड़कियों की नहीं।आखिर कब आएगा बदलाव लड़कियों के जीवन में।
.चिंता बेटे की
“अरे!पिता जी आप? अनमोल ने अपने पिता जी को दरवाजे पर खड़ा देखकर कहा।”
“क्यों , क्या हुआ? मुझे नहीं आना चाहिए था?”
“नहीं,ऐसी बात नहीं है? मैंने कल रात में टूटते तारे को देखकर विश माँगी थी कि ‘ पापा जी मिलने आ जाएँ ‘ और आप आ गए। बचपन की सुनी हुई बात ‘टूटते तारे को देखकर विश करो तो पूरी हो जाती है’, सुना था। आज तो सच होते हुए, देख लिया। आइए, आइए,अंदर आइए।”
” मैंने और तुम्हारी माँ ने तुमको कई बार फोन किया और बोला कि बेटा! थोड़ा समय निकालकर घर आ जाओ। तुम्हें देखे हुए कई महीने हो गए।तुम्हारे पास तो समय है नहीं, माँ -बाप से मिलने का।”
“क्या करूँ? पिता जी! काम ही इतना ज्यादा है कि समय नहीं मिलता।” मैं तो आप लोगों से बार-बार कहता हूँ कि आप और यहीं आ जाओ, मेरे पास आकर रहो।”
“कैसे आ जाऊँ? बेटा ! गाँव का घर और खेत कौन देखेगा ?
“आप घर और खेत-खलिहान की चिंता छोड़िए।मुझे तो नौकरी ही करनी है।खेती-बाड़ी अपने बस की बात नहीं , और न मैं गाँव जाकर रह सकता हूँ। आप घर में ताला लगा दीजिए और खेत किसी को बटाई पर दे दीजिए।”
बेटा,यहाँ पर हमारा मन भी नहीं लगेगा।गाँव में तुम्हारी माँ और मेरा दोनों का मन लगा रहता है। मैं खेतों पर जाकर घूम आता हूँ और आते-जाते हुए गाँव के लोगों से बात भी कर लेता हूँ तो टाइम पास हो जाता है।तुम्हारी माँ से भी टोले- मुहल्ले की औरतें मिलने आ जाती हैं और काम में हाथ भी बँटा लेती हैं। यहाँ शहर में आकर हम किसके साथ बात करेंगे।तुम तो सुबह नौकरी पर चले जाओगे। हम लोग घर में अकेले ही रह जाएँगे। फिर मैं यह भी नहीं चाहता कि मेरे बेटे की बदनामी हो।”
कैसी बदनामी पिता जी? ये आप कैसी बात कर रहे हैं?
“अरे, बेटा! लोग कहेंगे कि अनमोल के माँ-बाप को तो देखो, कैसे हैं? हर समय खाँसते- खखारते रहते हैं।बूढ़े हो गए हैं। बीमार रहते हैं। बेटे को परेशान करने गाँव से शहर चले आए।”
“ये कैसी बात कर रहे हैं आप। जब बेटा जवान हो जाता है तो बाप तो बूढ़ा होगा ही और बुढ़ापे में तो छोटी-मोटी बीमारी तो लगी रहती है, ये सबको पता है। जो ये बात नहीं समझते, वे पढ़े-लिखे मूर्ख हैं। आप उनकी चिंता छोड़िए।”
बेटे की बात सुनकर अनमोल के पिता जी की आँखे नम हो गईं। उनको लगा कि ऐसी सोच वाला बेटा पाकर उनका जीवन धन्य हो गया। उन्होंने कहा, “ठीक है बेटा! अब मैं कल जाकर तुम्हारी माँ को भी ले आता हूँ।”
“नहीं , कल मैं खुद आपके साथ गाँव चलूँगा और माँ को साथ लेकर आऊँगा।”
डॉ बिपिन पांडेय,टाइप-IV, क्वार्टर नं 4020,
आधुनिक रेल डिब्बा कारखाना लालगंज,
रायबरेली ( उत्तर प्रदेश)पिन-229120
मो- 9412956529



