रमेश कुमार ‘रिपु’ बता रहे हैं यदि रजाई भी आधार से लिंक कराना पड़ा तो क्या होगा। क्यों कि आज सब कुछ आधार से लिंक कराना जरूरी हो गया है। मोहल्ले में चर्चा है कि अब रजाई को भी लिंक कराना पड़ेगा। पहले गैस, फिर मोबाइल, फिर बैंक, अब बारी रजाई की है। कहते हैं बिना आधार के रजाई में गर्मी नहीं आती, सिर्फ़ कपास आती है। सरकारी रजाई में ‘सब्सिडी वाली ऊष्मा’ होती है, जो सीधा शरीर नहीं, सिस्टम से होकर आती है।
आधार से लिंक नहीं है रजाई \व्यंग्य
इस साल ठंड कुछ ज़्यादा ही संवैधानिक हो गई है। वह अब शरीर से नहीं, काग़ज़ों से होकर आती है। बिना आधार के ठंड लगती है, आधार जुड़ा हो तो गर्मी स्वतः उपलब्ध हो जाती है,ठीक वैसी ही, जैसी योजनाओं में दिखाई जाती है। मोहल्ले में अब यह सवाल नहीं पूछा जाता कि कंबल है या नहीं, बल्कि यह पूछा जाता है,“रजाई आधार से लिंक है या अभी पेंडिंग में है?”
सुबह-सुबह पड़ोसन सरोज देवी बाल्टी में गरम पानी भरते हुए बोलीं,“बहन, ठंड तो हड्डी में घुस गई है।”
दूसरी बोली,“हड्डी में नहीं, काग़ज़ में घुसी है। मेरी रजाई अभी लिंक नहीं हुई है, इसीलिए ठंड लग रही है।”
तीसरी ने अनुभव साझा किया,“कल सेंटर गई थी। ऑपरेटर बोला,पहले पति का आधार, फिर बच्चों का, फिर रजाई का। अरे भइया, रजाई भी परिवार का सदस्य हो गई क्या?”
कॉलेज में पढ़ने वाली लड़कियाँ इस ठंड को और ज़्यादा डिजिटल तरीके से महसूस कर रही हैं। कैंटीन के बाहर खड़ी दो छात्राएँ बातें कर रही थीं,“यार, इतनी ठंड है कि नोट्स लिखते-लिखते उँगलियाँ सुन्न हो गईं।”
दूसरी बोली,“मेरी तो रजाई हॉस्टल में है, लेकिन सीनियर कह रही थी कि बिना आधार लिंक के रजाई में हीटर इफेक्ट नहीं आता।”
तीसरी ने चुटकी ली,“लगता है अब सिलेबस में नया चैप्टर आएगा—‘डिजिटल इंडिया और रजाई का भविष्य’।”
घर में बच्चे भी इस नई व्यवस्था से अछूते नहीं हैं। एक बच्चा माँ से पूछ बैठा,“माँ, मेरी रजाई क्यों ठंडी है?”
माँ बोली,“बेटा, तुम्हारी रजाई का आधार अभी नहीं बना।”
बच्चा मासूमियत से बोला,“तो स्कूल में आधार कार्ड की जगह रजाई ले जाऊँ? मैडम से कहूँगा, ठंड इसी से दूर होती है।”
राजनीतिक लोग इस ठंड में भी अवसर ढूँढ लेते हैं। एक नेता जी चौराहे पर भाषण दे रहे थे,“देश में ठंड नहीं है, यह विपक्ष का फैलाया हुआ भ्रम है। जिनकी रजाई आधार से जुड़ी है, वे आराम से सो रहे हैं।”
पीछे से आवाज़ आई,“नेता जी, हमारी रजाई तो जुड़ी है, पर गर्मी नहीं आई।”
नेता जी बोले,“तकनीकी समस्या होगी, भावनात्मक रूप से आप गर्म रहिए।”
महिलाओं की बैठक में एक गृहिणी ने गंभीर सवाल उठाया,“कल को कहेंगे कि तकिया भी लिंक कराओ, नहीं तो सपने नहीं आएँगे।”
दूसरी बोली,“हाँ बहन, और चादर बिना ओटीपी के ओढ़ी नहीं जाएगी।”
सब हँस पड़ीं, लेकिन ठंड अपनी जगह अडिग रही।

अब स्थिति यह है कि लोग ठंड से कम, फॉर्म भरने से ज़्यादा परेशान हैं। कोई कहता है,“रजाई पेंडिंग में है”, कोई कहता है,“सर्वर डाउन है”, और कोई उम्मीद लगाए बैठा है कि अगले अपडेट में शायद थोड़ी गर्मी भी डाउनलोड हो जाए।
सच यही है कि ठंड अब मौसम नहीं रही, यह एक प्रक्रिया बन गई है। जब तक रजाई आधार से लिंक नहीं होगी, तब तक सर्दी लोकतांत्रिक अधिकार की तरह सबको बराबर नहीं मिलेगी।
और हम सब काँपते हुए यही सोचते रहेंगे,काश! ठंड भी बिना दस्तावेज़ के आती…
मोहल्ले में चर्चा है कि अब रजाई को भी लिंक कराना पड़ेगा। पहले गैस, फिर मोबाइल, फिर बैंक अब बारी रजाई की है। कहते हैं बिना आधार के रजाई में गर्मी नहीं आती, सिर्फ़ कपास आती है। सरकारी रजाई में ‘सब्सिडी वाली ऊष्मा’ होती है, जो सीधा शरीर नहीं, सिस्टम से होकर आती है।
कल शर्मा जी शिकायत करने गए “साहब, ठंड बहुत लग रही है।”
क्लर्क ने फाइल देखी, चश्मा ठीक किया और बोला—
“रजाई आधार से लिंक है?”
“नहीं।”
“तो फिर ठंड तो लगेगी ही। नियम सबके लिए बराबर है।”
अब लोग रजाई ओढ़ने से पहले ओटीपी ढूँढते हैं। ठंड आती है तो संदेश आता है, ‘आपकी रजाई अभी सत्यापित नहीं है।’ कुछ लोग तो बायोमेट्रिक फेल होने से पूरी रात जागते रहे; उँगलियाँ इतनी ठंडी कि मशीन ने पहचानने से इनकार कर दिया।
गाँव में एक बुज़ुर्ग कहते मिले,“पहले ठंड गरीब-अमीर नहीं देखती थी, अब देखती है। जिनका आधार सही, उनके पास ही गर्मी है।”
कुल मिलाकर, ठंड कोई मौसम नहीं रही, यह एक योजना बन चुकी है। जैसे ही रजाई आधार से जुड़ जाएगी, देश में ठंड अपने आप कम हो जाएगी। तब तक आप काँपते रहिए,क्योंकि यह प्राकृतिक नहीं, प्रशासनिक ठंड है।

रमेश कुमार ‘रिपु’
MO- 7974304532
