गोवर्धन यादव की लघुकथा हमारे समय का बयान है।इनकी कथाओं में समाज की वो तस्वीर है जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। गिरते सामजिक मूल्यों की ओर केवल इशारा नहीं करती है बल्कि कहती हैं कि यदि चाहते हो कि समाज में सामाजिक संस्कार जिंदा रहें तो एक कदम बढ़ायें बचाने के लिए।
गोवर्धन यादव की लघुकथा
बरसात का पाठ.
पहली बारिश अभी थमी ही थी.आँगन में मिट्टी की सोंधी-सोंधी गंध तैर रही थी. छत से टपकती बूँदों को देखकर महेश झुंझलाया-“ दादाजी ! यह बारिश भी बड़ी मुसीबत है. देखिए न, पूरा आँगन गीला हो गया है. सड़क पर जगह-जगह गढ्ढों में पानी भरा है. चारों ओर कीचड़-ही-कीचड़.है…इस बारिश ने छुट्टी का मजा किरकिरा कर दिया. अब हम खेलने कहाँ जाएँ?
दादाजी मुस्कुराए. उन्होंने महेश का हाथ पकड़ा और खेतों की ओर चल पड़े.दूर तक धान की नन्हीं-नन्हीं पौधियाँ वर्षा की बूँदों से झिलमिला रही थीं. पास के तालाब में सूखी पड़ी दरारें पानी से भर चुकी थी. पेड़ों की पत्तियाँ धुलकर नई दुल्हन-सी दमक रही थीं. चिड़ियों का कलरव पूरे वातावरण में गूँज रहा था. मंद-मंद पवन प्रवाहित हो रही थी.
दादाजी बोले-“ बेटा, मनुष्य अक्सर केवल अपनी असुविधा देखता है. जरा इन खेतों से पूछो?, इन तालाबों से पूछो?, इन पेड़ों और पक्षियों से पूछो कि वर्षा का उनके लिए क्या महत्व है?.”
महेश चुपचाप चारों ओर देखने लगा.
दादाजी ने नीचे झुकते हुए खेत से मुठ्ठी भर मिट्टी उठाई और कहा-“ महेश,… वर्षा केवल पानी नहीं बरसाती, यह धरती की प्यास बुझाती है, अन्न उगाती है, नदियों को जीवन देती है. भूजल भरती है और प्रकृति के हर प्राणी की साँसों को नया सहारा देती है. यदि वर्षा न हो, तो हमारे घरों की थाली सूनी रह जाएगी?. हम पानी की एक-एक बूँद के लिए तरस जाएंगे?.जब जल ही नहीं होगा तो हमारी प्यास कौन बुझाएगा?.”
दादाजी की एक-एक बात उसके मन-मस्तिस्क में उतरते जा रही थी. वर्षा कितनी महत्वपूर्ण है, यह बात उसकी समझ में आने लगी थी. यह सब सुनकर उसकी सोचने की और देखने की दृष्टि बदलने लगी थी.
उसने आसमान की ओर देखा. बादलों से फ़िर बूँदे झरने लगी थीं. उसने दोनों हथेलियाँ फ़ैलाकर उन दूँदों को थाम लिया और धीमें से बोला-“ दादाजी…आज समझ में आया…वारिश छुट्टी बिगाड़ने नहीं, जीवन सँवारने आती है.”
दादाजी ने स्नेह से उसके सिर पर हाथ फ़ेरा. उस दिन महेश ने केवल वर्षा का आनन्द ही नहीं लिया, बल्कि यह भी सीख लिया कि जिसे हम कभी-कभी अपनी परेशानी समझ लेते है, वही पूरी सृष्टि के लिए जीवन का सबसे बड़ा उत्सव हो सकता है..
कागज की नाव.
झमाझम बारिश हो रही थी. बच्चे खिलखिलाते हुए कागज की नाव बनाकर पानी में बहा रहे थे. हर नाव के पीछे एक सपना था. कोई उसे जहाज कहता, कोई समंदर की रानी.
तभी एक नाव थोड़ी दूर बहती हुई प्लास्टिक की थैलियों और चिप्स के खाली पैकैटों में उलझ कर रुक गई.
एक बच्चे ने उदास होते हुए कहा—“अरे मेरी नाव तो बीच रास्ते में ही रुक गई.”
पास ही खड़े दादाजी मुस्कुराए नहीं. उन्होंने झुककर कचरा उठाया और बोले- “ बेटा, नाव नहीं डूबी…हमारी आदतें डुबी हैं.
बच्चे चुप हो गए.
उन्होंने मिलकर नाली और पानी में तैरते कचरे को बाहर निकाल दिया. फ़िर उसी पानी में नाव बनाकर दुबारा छोड़ी. इस बार वह बिना रुके दूर तक बहती चली गई.
नाव को बिना रुकावट के बहता देख दादाजी बोले-“ जिस रास्ते को हम साफ़ रखते हैं, वहाँ केवल कागज की नावें ही नहीं, आने वाली पीढ़ियों का भविष्य भी आसानी से आगे बढ़ता है.
पिता की नसीहत.
बात काफ़ी पुरानी है.गर्मी के दिन थे.मेरा सहकर्मी चेन-स्मोकर था. उसने एक दिन मुझे सिगरेट पकड़ाते हुए धुँआ उगलने का आग्रह किया.
मैंने उस दिन सिगरेट का पहला-पहला स्वाद चखा था. आसमान में धुँए के छल्ले उड़ाने में मुझे बहुत आनंद आ रहा था.
सिगरेट पीना अब मेरी आदत में शुमार हो चुका था. रात के दस बज थे. कड़ाके के ठंड पड़ रही थी. आदतन मैंने सिगरेट का पैकेट खोला,उसमें एक भी सिगरेट नहीं थी.मैंने छोटे भाई को बुलाकर, उसे पैसे देते हुए, सिगरेट का पैकेट खरीद लाने को कहा.
थोड़ी देर में वह लौट आया और मुझसे कहने लगा-“भैया, दुकान बंद हो चुकी है.”
मेरे कमरे से ही सटकर दूसरा कमरा था, जिसमें पिताजी सोया करते थे. शायद उन्होंने हम दोनों की बात सुन ली थी.
घर से दो किमी की दूरी पर स्थित सिनेमा-हाल था. मेरी खास ब्रांड की सिगरेट केवल वहीं मिल सकती थी.
छोटे को सिगरेट का पैकेट देते हुए उन्होंने कहा- जा, बड़े भैया को दे आ.”
उसने मुझे सिगरेट का पैकेट लाकर दिया. मैंने आश्चर्यचकित होकर उससे पूछा- ये पैकेट कहाँ से आया?.
उसने कहा-“ पिताजी ने भिजवाया है.”
उसकी बात सुनकर मुझे सहसा ऐसा लगा कि किसी ने मुझे आकाश से उठाकर जमीन पर पटक दिया हो.पिताजी की यह मेरे लिए सबसे बड़ी नसीहत थी .उस दिन के बाद से फ़िर मैंने कभी सिगरेट नहीं पी.
पानी का एटीम
गाँव के चौक पर पानी का एटीएम लगा.कार्ड डालिये, पैसे दीजिए और जितना पानी चाहिए, उतना ले जाइये.एक बूढ़ा किसान देर तक मशीन को देखता रहा.उसने पास खड़े पोते से कहा-“ बेटा, इसमें पानी कौन भरता है?.”
“ सरकार भरवाती है.”
किसान ने आसमान की ओर सिर उठाकर देखा और हँस दिया.
उसने अपने पोते से कहा-“ बेटा…जब मैं तेरी उम्र का था, तब पानी सरकार नहीं, बादल भरते थे.”
पोते ने मासूमियत से पूछा-“ दादा, क्या बादल भी पैसे लिया करते थे?.”
अश्रुपूरित नेत्रों से किसान ने अपने सुखे खेतों की ओर देखा. उसके होंठ तो हिले, पर एक शब्द भी नही निकले.



