विश्वाश हलवाई बता रहे हें कि जंगलों के बीच पली-बढ़ी संस्कृति के लिए लकड़ी महज एक बेजान टुकड़ा नहीं होती। उसमें पीढ़ियों की स्मृतियां, लोकजीवन की धड़कन और अपनी जड़ों से जुड़ी एक पूरी दुनिया सांस लेती है।

शहडोल के जनजातीय शिल्पकार जब लकड़ी को अपने हाथों में लेते हैं, तो वह धीरे-धीरे आकार ही नहीं लेती, बल्कि जीवन की एक कहानी कहने लगती है।अपनी अद्भुत कला और पारंपरिक हुनर के जरिए ये शिल्पकार गोंडी कला को काष्ठ शिल्प, रॉट आयरन और कालीन-दरी जैसे विविध माध्यमों में अभिव्यक्त कर रहे हैं। उनके हाथों में परंपरा है, आंखों में कल्पना और हुनर में भविष्य की दस्तक।दरअसल, यह सिर्फ कला को बचाए रखने की कोशिश नहीं, बल्कि उसे समय के साथ आगे ले जाने की यात्रा है। परंपरा के हाथों में जब हुनर होता है, तो वही हुनर एक नई दुनिया गढ़ता है।
जंगल, पहाड़, नदियों और समृद्ध जनजातीय संस्कृति के लिए पहचाने जाने वाले शहडोल की असली ताकत उसकी मिट्टी में रची-बसी कला और उन कुशल हाथों में है, जो लकड़ी, धातु, रंग और धागों को जीवंत स्वरूप देने का हुनर रखते हैं। वर्षों से पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही गोंडी पेंटिंग, काष्ठ शिल्प, रॉट आयरन तथा कालीन-दरी निर्माण जैसी पारंपरिक कलाएं अब केवल स्थानीय बाजार तक सीमित रहने के बजाय बड़े बाजार और डिजिटल प्लेटफॉर्म तक पहुंच बनाने की दिशा में आगे बढ़ रही हैं। जिला प्रशासन और संत रविदास मध्यप्रदेश हस्तशिल्प एवं हाथकरघा विकास निगम की पहल से शहडोल के जनजातीय शिल्पकारों के सपनों को नई उड़ान मिली है। प्रशिक्षण, कौशल विकास, प्रदर्शनियों और ऑनलाइन बाजार से जोडऩे की पहल ने इन कलाकारों के सामने संभावनाओं के नए द्वार खोल दिए हैं। अब जरूरत है इस पहल को और व्यापक बनाने की, ताकि शहडोल की कला को राष्ट्रीय ही नहीं, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय पहचान मिल सके।

प्रशिक्षण ने निखारा पारंपरिक हुनर
शहडोल के छतवई स्थित संत रविदास मध्यप्रदेश हस्तशिल्प एवं हाथकरघा विकास निगम में डीएमएफ योजना वर्ष 2024-25 के अंतर्गत 50 दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में लगभग 200 स्थानीय प्रशिक्षणार्थियों ने भाग लिया। प्रशिक्षण का उद्देश्य केवल पारंपरिक कला सिखाना नहीं, बल्कि स्थानीय शिल्पकारों को आधुनिक बाजार की आवश्यकताओं के अनुरूप तैयार करना भी था। प्रशिक्षण के दौरान गोंडी पेंटिंग, रॉट आयरन, काष्ठ शिल्प तथा कालीन-दरी निर्माण जैसी पारंपरिक विधाओं का प्रशिक्षण दिया गया। शिल्पकारों को अपने पारंपरिक ज्ञान और कौशल को आधुनिक तकनीकों के साथ जोडऩे का अवसर मिला। इससे न केवल उनके हुनर में निखार आया, बल्कि उत्पादों की गुणवत्ता, डिजाइन और बाजार की मांग को समझने की दिशा में भी महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त हुई। यह पहल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पारंपरिक शिल्प के सामने सबसे बड़ी चुनौती बदलते समय के साथ खुद को बाजार की जरूरतों के अनुरूप ढालना है। आज ग्राहक केवल पारंपरिक उत्पाद नहीं, बल्कि आकर्षक डिजाइन, बेहतर फिनिशिंग, उपयोगिता और आधुनिक प्रस्तुति भी चाहता है। प्रशिक्षण कार्यक्रम ने शिल्पकारों को इसी बदलते बाजार से जोडऩे का काम किया।
कला को बाजार मिला, अब बाजार को दुनिया तक पहुंचाने की तैयारी
उत्पादों का प्रदर्शन किया
प्रशिक्षण के बाद आयोजित जनजातीय शिल्पकार नामिका मेले ने स्थानीय कलाकारों को अपनी कला और उत्पादों को प्रदर्शित करने का महत्वपूर्ण मंच प्रदान किया। मेले में शिल्पकारों ने अपने हाथों से तैयार किए गए उत्पादों का प्रदर्शन किया। यहां उनकी कला को देखने और समझने के लिए लोगों के साथ-साथ संबंधित संस्थाओं और अधिकारियों ने भी रुचि दिखाई। ट्राइफेड के अधिकारियों ने शिल्पकारों को ऑनलाइन पंजीयन के लिए प्रेरित किया। इसका उद्देश्य स्थानीय उत्पादों को फ्लिपकार्ट, अमेजन सहित अन्य ऑनलाइन माध्यमों के जरिए व्यापक बाजार तक पहुंचाना है। यदि यह पहल प्रभावी रूप से आगे बढ़ती है तो शहडोल के एक छोटे से गांव या प्रशिक्षण केंद्र में तैयार किया गया कोई उत्पाद देश के किसी भी हिस्से में खरीदा जा सकेगा। यह बदलाव शिल्पकारों के लिए केवल व्यापार का विस्तार नहीं है, बल्कि उनकी कला को पहचान दिलाने की दिशा में बड़ा कदम है। अभी तक अनेक कलाकार अपनी कला को स्थानीय स्तर पर बेचने तक सीमित रहे हैं। उन्हें अपने उत्पादों का उचित मूल्य नहीं मिल पाता था और बाजार तक सीधी पहुंच का अभाव रहता था। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म इस दूरी को कम कर सकते हैं।
गोंडी कला- संस्कृति की कहानी
शहडोल की गोंडी कला केवल चित्रकला नहीं, बल्कि जनजातीय जीवन, प्रकृति, लोकविश्वास और सांस्कृतिक परंपराओं की जीवंत अभिव्यक्ति है। इसमें जंगल, पशु-पक्षी, पेड़-पौधे, लोकजीवन और पारंपरिक प्रतीकों के माध्यम से एक पूरी सांस्कृतिक दुनिया दिखाई देती है। गोंडी पेंटिंग की सबसे बड़ी विशेषता उसकी विशिष्ट शैली और प्रतीकात्मकता है। प्रत्येक चित्र अपने भीतर एक कहानी समेटे होता है। यही कारण है कि आज गोंडी कला को देश-विदेश में पहचान मिल रही है। शहडोल के कलाकारों को यदि बेहतर प्रशिक्षण, डिजाइन सहयोग, विपणन सुविधा और उचित मंच उपलब्ध कराया जाए तो यह कला स्थानीय पहचान से आगे बढ़कर वैश्विक बाजार का हिस्सा बन सकती है।

लकड़ी में जीवन गढ़ते शिल्पकार
शहडोल के काष्ठ शिल्पकार साधारण लकड़ी को अपनी कल्पना और मेहनत से आकर्षक कलाकृतियों में बदल देते हैं। पेड़ की लकड़ी में छिपे आकार को पहचानना और उसे कलात्मक स्वरूप देना आसान काम नहीं है। इसके लिए वर्षों के अनुभव, धैर्य और बारीक तकनीक की आवश्यकता होती है। प्रशिक्षण कार्यक्रम के माध्यम से काष्ठ शिल्पकारों को पारंपरिक तकनीक के साथ आधुनिक डिजाइन और फिनिशिंग की जानकारी मिली। इससे उनके उत्पादों को बाजार की मांग के अनुरूप तैयार करने की क्षमता बढ़ी है। सजावटी वस्तुओं से लेकर उपयोगी घरेलू उत्पादों तक काष्ठ शिल्प में रोजगार और बाजार की अपार संभावनाएं मौजूद हैं।
कबाड़ से कला तक का सफर
रॉट आयरन शिल्प भी शहडोल की रचनात्मक क्षमता का बेहतरीन उदाहरण है। धातु के टुकड़ों और बेकार समझी जाने वाली वस्तुओं को कलाकार अपनी कल्पना और कौशल से सुंदर कलाकृतियों में बदल देते हैं। इन उत्पादों में जनजातीय जीवन, पशु-पक्षियों और दैनिक गतिविधियों की झलक दिखाई देती है। आज जब लोग अपने घरों, कार्यालयों और संस्थानों के लिए अनूठी सजावटी वस्तुओं की तलाश करते हैं, ऐसे में रॉट आयरन शिल्प की मांग बढ़ सकती है। जरूरत केवल इस बात की है कि कलाकारों को बाजार की जानकारी, बेहतर डिजाइन और विपणन का स्थायी मंच मिले।
कालीन-दरी निर्माण से महिलाओं और ग्रामीण परिवारों को रोजगार की संभावना
कालीन और दरी निर्माण भी ग्रामीण एवं जनजातीय परिवारों के लिए रोजगार का महत्वपूर्ण माध्यम बन सकता है। यह ऐसी कला है जिसमें स्थानीय स्तर पर उपलब्ध कौशल और श्रम का उपयोग कर परिवार अपनी आय बढ़ा सकते हैं। प्रशिक्षण कार्यक्रम ने इस क्षेत्र में भी नए अवसरों की संभावनाएं पैदा की हैं। यदि तैयार उत्पादों को बाजार से जोड़ा जाए, डिजाइन में विविधता लाई जाए और गुणवत्ता पर ध्यान दिया जाए तो शहडोल की कालीन-दरियां देश के बड़े बाजार में अपनी जगह बना सकती हैं।
आत्मनिर्भरता की दिशा में कदम
इस पूरी पहल को केवल एक प्रशिक्षण कार्यक्रम के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह शहडोल के जनजातीय परिवारों को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास है। हुनर पहले से मौजूद था, आवश्यकता थी उसे निखारने, बाजार से जोडऩे और उचित मंच देने की। शिल्पकारों को यदि कच्चा माल, आधुनिक उपकरण, डिजाइन विकास, पैकेजिंग, ब्रांडिंग, डिजिटल मार्केटिंग और सीधे बाजार तक पहुंच की सुविधाएं मिलें तो वे सरकारी सहायता पर निर्भर रहने के बजाय स्वयं एक मजबूत आर्थिक इकाई बन सकते हैं। इसके लिए आवश्यक है कि प्रशिक्षण समाप्त होने के बाद शिल्पकारों को अकेला न छोड़ दिया जाए। प्रशिक्षण के बाद भी लगातार मार्गदर्शन, उत्पादों की गुणवत्ता जांच, डिजाइन में सुधार और बाजार से जोडऩे की व्यवस्था बनी रहे। शिल्पकारों के उत्पादों की बिक्री के लिए स्थायी हाट, प्रदर्शनियां और ऑनलाइन स्टोर विकसित किए जाएं।
अंतर्राष्ट्रीय बाजार में शहडोल की कला
आज दुनिया भर में हस्तनिर्मित और पारंपरिक उत्पादों की मांग बढ़ रही है। लोग मशीनों से बने एक जैसे उत्पादों के बजाय हाथ से तैयार की गई विशिष्ट वस्तुओं को पसंद कर रहे हैं। ऐसे समय में शहडोल की जनजातीय कला के लिए संभावनाएं बेहद व्यापक हैं। गोंडी पेंटिंग, काष्ठ शिल्प, रॉट आयरन और कालीन-दरी जैसे उत्पादों को यदि उचित ब्रांडिंग के साथ प्रस्तुत किया जाए तो इन्हें अंतर्राष्ट्रीय बाजार तक पहुंचाया जा सकता है। शहडोल की पहचान को केवल खनिज संपदा या प्राकृतिक सुंदरता तक सीमित रखने के बजाय यहां के शिल्पकारों की कला को भी जिले की आर्थिक और सांस्कृतिक पहचान का प्रमुख हिस्सा बनाया जाना चाहिए।

हुनर को मिले उसकी पूरी कीमत
शहडोल के जनजातीय शिल्पकारों ने अपनी मेहनत और प्रतिभा से यह साबित किया है कि उनके हाथों में केवल हुनर नहीं, बल्कि रोजगार, आत्मनिर्भरता और आर्थिक परिवर्तन की ताकत भी है। अब जरूरत है कि शासन इन कलाकारों के लिए दीर्घकालिक और प्रभावी योजना तैयार करे। शिल्पकारों को प्रशिक्षण के साथ-साथ सस्ती दर पर कच्चा माल, आधुनिक उपकरण, डिजाइन विशेषज्ञों का मार्गदर्शन, स्थायी बाजार, ऑनलाइन बिक्री की सुविधा और उत्पादों की ब्रांडिंग उपलब्ध कराई जानी चाहिए। साथ ही ऐसे केंद्र स्थापित किए जाने चाहिए जहां शिल्पकार नियमित रूप से अपने उत्पाद तैयार कर सकें और उन्हें बाजार तक पहुंचाने की जिम्मेदारी संस्थागत रूप से निभाई जाए। शहडोल के इन कलाकारों को केवल सरकारी मेलों तक सीमित रखने के बजाय देश के बड़े शहरों और अंतर्राष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाया जाना चाहिए। यदि उनकी कला को सही मंच और उचित मूल्य मिलता है तो आने वाले समय में शहडोल के जनजातीय शिल्पकार देश-दुनिया में जिले की नई पहचान बन सकते हैं।
अब वक्त है:शहडोल के हुनर को दुनिया तक पहुंचाने का शहडोल की मिट्टी में कला है, जंगलों में प्रेरणा है और जनजातीय समाज के हाथों में पीढिय़ों का अनुभव। अब इन हाथों को बाजार से जोडऩे की आवश्यकता है। प्रशिक्षण कार्यक्रम ने पहला कदम बढ़ा दिया है। ऑनलाइन पंजीयन और विपणन की पहल ने नई राह खोल दी है। आवश्यकता है इस राह को मंजिल तक पहुंचाने की।
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