अपनी शायरी का उजाला छोड़ कर ब्रशीर बद्र चले गए - rashtrmat.com

अपनी शायरी का उजाला छोड़ कर ब्रशीर बद्र चले गए

राष्ट्रमत न्यूजभोपाल(ब्यूरो)। उजाले अपनी यादों को हमारे साथ रहने दो,न जाने किस गली में शाम हो जाए।ऐसा शेर कहने वाले हर अजीज शायर बशीर बद्र 91 साल की उम्र में दुनिया से रूखसत हो गए। वे आम बोल चाल की भाषा में गजल को लोगों तक पहुंचाया। मेरठ में उदू के प्रोफेसर थे। मेरठ दंगे में उनका घर जला तो भोपाल आ गए। उसके बाद कहीं नहीं गए। काफी समय तक वो पुलिस में भी सर्विस किये।लेकिन दिल से वो शायर थे। उनके अनेक शेर लोगों की जुबान पर है। मीना कुमारी ने एक शेर लिखकर मैगजीन को दिया और बशीर बद्र उसके बाद मशूहर हो गए। उनके कई शेर पूर्व प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी भी दोहराती थीं।

डिमेंशिया बीमारी से पीड़ित थे

मशहूर शायर डॉ. बशीर बद्र का गुरुवार दोपहर करीब 12 बजे भोपाल में निधन हो गया। 91 वर्ष की उम्र में उन्होंने अंतिम सांस ली। अंतिम संस्कार का समय अभी तय नहीं हुआ है। हालांकि परिजन के अनुसार आज शाम को अंतिम संस्कार किया जा सकता है।बद्र लंबे समय से डिमेंशिया बीमारी से पीड़ित थे। याददाश्त जा चुकी थी। वे लोगों को पहचान भी नहीं पा रहे थे। पिछले कुछ समय से उनकी सेहत लगातार गिरती जा रही थी। जब भी उन्हें मुशायरे की याद आती थी तो इरशाद, इरशाद कहने लगते थे।बद्र ने उर्दू गजल को नया लहजा दिया। कठिन लफ्जों की जगह आसान शब्दों का प्रयोग करके शायरी लिखते थे।

आम लोगों के दिलों तक पहुंचाया

साल 1974 से 1990 के बीच का दौर उनके जीवन का स्वर्णिम काल माना जाता है। इस दौरान उनकी शायरी ने नई ऊंचाइयों को छुआ और वे देश-विदेश में पहचान बनाने में कामयाब रहे। उनकी गजलों की सादगी, गहराई और आम बोलचाल की भाषा ने उन्हें आम लोगों के दिलों तक पहुंचाया। वर्ष 1974-1990 का दौर बशीर बद्र के लिए काफी अहम रहा। तब वे शायरी के बुलंदी को छू रहे थे।

डॉ. बशीर ने 500 से ज्यादा मुशायरे किए थे।

मीना कुमारी ने मशहूर किया बशीर ने एक शेर लिखा था- उजाले अपनी यादों हमारे साथ रहने दो, न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए। 1960 के दशक में इस शेर को एक्ट्रेस मीना कुमारी ने अपने हाथों से लिखकर एक मैगजीन को दिया। इसी के बाद शेरो-शायरी की दुनिया में बद्र की कद्र होने लगी।।

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