विलुप्त होती जनजाति का दस्तावेज 'माहरा' \किताब समीक्षा - rashtrmat.com

विलुप्त होती जनजाति का दस्तावेज ‘माहरा’ \किताब समीक्षा

सरकारी व्यवस्था की अपनी निर्धारित प्रक्रिया होती है, लेकिन जब उस प्रक्रिया में किसी समुदाय की ऐतिहासिक और सामाजिक पहचान ठीक से दर्ज नहीं हो पाती, तो उसका खामियाजा पीढ़ियों तक भुगतना पड़ सकता है।

विलुप्त होती जनजाति का दस्तावेज ‘माहरा‘ \किताब समीक्षा

रविन्द्र गिन्नौरै 

किसी सरकारी दस्तावेज में दर्ज एक शब्द, उसकी वर्तनी या क्रम में हुआ मामूली-सा बदलाव किसी समुदाय की पूरी पहचान पर कितना बड़ा असर डाल सकता है, इसका उदाहरण छत्तीसगढ़ की ‘माहरा’ जनजाति के संदर्भ में सामने आता है। सरकारी व्यवस्था की अपनी निर्धारित प्रक्रिया होती है, लेकिन जब उस प्रक्रिया में किसी समुदाय की ऐतिहासिक और सामाजिक पहचान ठीक से दर्ज नहीं हो पाती, तो उसका खामियाजा पीढ़ियों तक भुगतना पड़ सकता है।

छत्तीसगढ़ की विलुप्तप्राय मानी जा रही ‘माहरा’ जनजाति को केंद्र में रखकर डॉ. पी. आर. कोसरिया ने ‘माहरा’ नाम से एक महत्वपूर्ण पुस्तक लिखी है। यह पुस्तक केवल किसी जनजाति के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का अध्ययन नहीं करती, बल्कि उसकी पहचान, इतिहास और सरकारी अभिलेखों में उसके दर्जे को लेकर उठे सवालों की भी पड़ताल करती है।

पुस्तक में लेखक ने छत्तीसगढ़ के ‘माहरा’ और महाराष्ट्र के ‘महार’ के बीच के अंतर को रेखांकित करने का प्रयास किया है। लेखक के अनुसार, दोनों समुदायों के नाम और कुछ सामाजिक संदर्भों में समानता के बावजूद उनकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान अलग है। पुस्तक में स्वतंत्रता से पहले के दौर में ‘माहरा’ समुदाय की सामाजिक और राजनीतिक स्थिति को भी सामने लाया गया है।

लेखक ने 1949 के नागपुर गजेटियर का संदर्भ देते हुए ‘माहरा’ के सरकारी वर्गीकरण पर महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं। पुस्तक में प्रस्तुत विवरण के अनुसार, गजेटियर में ‘माहरा’ को अनुसूचित जनजाति के रूप में सूचीबद्ध किए जाने का उल्लेख मिलता है, जबकि बाद के सरकारी अभिलेखों में इसके अलग वर्गीकरण का सवाल सामने आता है। यही अंतर पुस्तक का एक महत्वपूर्ण आधार बनता है। लेखक यह जानना चाहते हैं कि यह परिवर्तन किन परिस्थितियों और किस आधार पर हुआ।‘माहरा’ का इतिहास केवल सरकारी अभिलेखों तक सीमित नहीं है। पुस्तक में बस्तर क्षेत्र में इस समुदाय के उद्भव से जुड़ी लोककथाओं और किवदंतियों को भी स्थान दिया गया है। उनके पूजनीय देवी-देवताओं, परंपराओं और पूर्वजों के संदर्भों के माध्यम से लेखक ने समुदाय की सांस्कृतिक स्मृति को दर्ज करने की कोशिश की है। पूर्वज जगतू माहरा का वर्णन भी इसी क्रम में महत्वपूर्ण हो जाता है।

पुस्तक का एक उल्लेखनीय पक्ष इसका नृजातीय अध्ययन है। लेखक ने ‘माहरा’ समुदाय की सामाजिक प्रथाओं, भाषा, रीति-रिवाज, त्योहारों और जीवन-शैली के साथ उनकी सामुदायिक पहचान को समझने का प्रयास किया है। समुदाय की सामान्य शारीरिक बनावट, रहन-सहन, व्यवहार और सामाजिक आचरण का वर्णन भी पुस्तक में मिलता है। इन विवरणों के माध्यम से लेखक यह स्थापित करने की कोशिश करते हैं कि छत्तीसगढ़ के ‘माहरा’ की अपनी विशिष्ट सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान है।

डॉ. कोसरिया ने टी. एस. वैष्णव के नृजातीय अध्ययन पर भी सवाल उठाए हैं। उनका तर्क है कि महाराष्ट्र के ‘महार’ और छत्तीसगढ़ के ‘माहरा’ के बीच के अंतर को पर्याप्त रूप से स्पष्ट नहीं किया गया, जिसके परिणामस्वरूप छत्तीसगढ़ के ‘माहरा’ की अलग पहचान प्रभावित हुई। इस संदर्भ में लेखक ने नागपुर गजेटियर सहित विभिन्न ऐतिहासिक और दस्तावेजी स्रोतों को आधार बनाया है। यह पुस्तक का ऐसा पक्ष है जिस पर इतिहास, समाजशास्त्र और जनजातीय अध्ययन के शोधकर्ताओं के बीच आगे भी विमर्श की गुंजाइश बनती है।

पुस्तक का सबसे गंभीर प्रश्न सरकारी अभिलेखों में ‘माहरा’ की पहचान से जुड़ा है। यदि किसी समुदाय की सामाजिक पहचान सरकारी रिकॉर्ड में अस्पष्ट या परिवर्तित हो जाती है, तो उसका असर केवल कागजों तक नहीं रहता। शिक्षा, रोजगार, सरकारी योजनाओं और संवैधानिक संरक्षण से जुड़े अधिकारों पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए यह मामला महज जातीय या जनजातीय वर्गीकरण का नहीं, बल्कि पहचान और अधिकार दोनों का प्रश्न बन जाता है।

‘माहरा’ की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि यह एक ऐसे समुदाय की आवाज और जीवन-स्मृति को दस्तावेजबद्ध करने का प्रयास करती है, जिसकी पहचान धीरे-धीरे सार्वजनिक विमर्श से ओझल होती जा रही है। पुस्तक में इतिहास, लोकस्मृति, संस्कृति और सरकारी दस्तावेजों को एक साथ रखकर समुदाय के अस्तित्व का प्रश्न उठाया गया है।

हालांकि पुस्तक के कुछ दावों और ऐतिहासिक निष्कर्षों को उपलब्ध सरकारी अभिलेखों तथा अन्य स्वतंत्र स्रोतों के साथ रखकर देखने की आवश्यकता भी बनी रहती है। यही किसी भी गंभीर शोधपरक पुस्तक को आगे के विमर्श का आधार बनाता है। ‘माहरा’ इस अर्थ में केवल एक समुदाय का परिचय नहीं, बल्कि यह सवाल भी सामने रखती है कि सरकारी दस्तावेजों में दर्ज पहचान किस तरह किसी समाज के वर्तमान और भविष्य को प्रभावित कर सकती है।

डॉ. पी. आर. कोसरिया की ‘माहरा’ उन पाठकों और शोधार्थियों के लिए उपयोगी हो सकती है जो छत्तीसगढ़ के जनजातीय समाज, उसकी लोकपरंपराओं, सामाजिक इतिहास और सरकारी वर्गीकरण की प्रक्रिया को समझना चाहते हैं। पुस्तक का महत्व इस बात में भी है कि यह एक ऐसे समुदाय के अस्तित्व और पहचान पर बहस को सामने लाती है, जिसके बारे में सार्वजनिक विमर्श अपेक्षाकृत कम दिखाई देता है।

इस दृष्टि से ‘माहरा’ को केवल एक जनजातीय अध्ययन की पुस्तक मानना पर्याप्त नहीं होगा। यह एक ऐसे समुदाय की पहचान को दर्ज करने की कोशिश है, जो सरकारी कागजों और बदलते सामाजिक परिदृश्य के बीच अपने अस्तित्व की तलाश कर रहा है।

रविन्द्र गिन्नौरै 

ravindraginnore58@gmail.com

 पुस्तक-  ‘माहरा’

लेखक – डा. पी. आर.कोसरिया

वैभव प्रकाशन, न्यू चंगोराभाठा

रायपुर (छत्तीसगढ़)

पृष्ठ 100, मूल्य 100 रुपए

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