पोषितों के कुपोषण का महात्म्य \ व्यंग्य - rashtrmat.com

  पोषितों के कुपोषण का महात्म्य \ व्यंग्य

डाॅ प्रदीप उपाध्याय का कहना है कुपोषण को भी हमें नकारात्मक दृष्टि से नहीं देखना चाहिए। दुबला.पतला बच्चा संसाधनों पर कम बोझ डालता है। छोटे कपड़े कम कपड़े में बन जाते हैंए भोजन कम खाता है और भविष्य में यदि नौकरी न मिले तो कम खाने की आदत पहले से ही काम आ जाती है। ऐसी दूरदर्शिता हर सरकार में कहाँ होती है!

पोषितों के कुपोषण का महात्म्य \ व्यंग्य

देश में एक पूरा विभाग इस पवित्र संकल्प के साथ कार्यरत है कि कोई महिला और बच्चा कुपोषित रहे। विभाग है, बजट है, योजनाएँ हैं, समितियाँ हैं, सर्वे हैं, बैठकें हैं, समीक्षा बैठकें हैं, समीक्षा बैठकों की समीक्षा है, और इनके ऊपर भी समीक्षा करने वाले लोग हैं। यानी कागज़ों में पोषण ऐसा छलक रहा है कि लगता है देश का हर बच्चा रोज़ बादामपिस्ता पीसकर पी रहा होगा।अर्थात आगामी सदी पोषण के अजीर्ण से मुक्ति के अभियान को समर्पित रह सकती है!

बहरहाल अभी तो कुपोषण का भूत पीछा नहीं छोड़ रहा है। जाने बच्चों की नीयत में क्या खोट है कि वे फिर भी कुपोषित निकल आते हैं। उनका कद अपेक्षा के अनुरूप नहीं बढ़ता, वजन सरकारी दावों का सम्मान नहीं करता और शरीर आँकड़ों की भाषा समझने से इनकार कर देता है।

अब इसमें सरकार बेचारी क्या करे?

सरकार तो अपनी तरफ़ से पूरा प्रयास कर रही है। यदि बच्चों को खीरपूरी के स्थान पर सेंव परमल या सूखीसादी व्यवस्था परोसी जा रही है तो इसका अर्थ यह तो नहीं कि उन्हें भूखा मारने की कोई साजिश है। दरअसल यह दूरदर्शी नीति है।धानीभूंगड़ा चबाकर ही तो स्वयंसेवक काजूपिश्ता का हकदार बनता है!इसीलिए बचपन से ही बच्चों को जीवन का यथार्थ समझाया जा रहा है कि बेटा, सपने में चाहे रसमलाई देख लेना, लेकिन जीवन की असली थाली में जो मिले, उसी में राष्ट्रनिर्माण का स्वाद खोजो।

वैसे भी खीरपूरी जैसी विलासिताएँ बच्चों की आदतें बिगाड़ देती हैं। आज खीर मिलेगी तो कल पनीर माँगेंगे, परसों अंडा या फिर चिकन माँगेंगे और उसके बाद संतुलित आहार की ज़िद करेंगे। फिर देश का क्या होगा? इसलिए उन्हें शुरू से ही अपेक्षाएँ सीमित रखने का संस्कार दिया जा रहा है। यह केवल भोजन नहीं, चरित्र निर्माण की योजना है।

कुपोषण को भी हमें नकारात्मक दृष्टि से नहीं देखना चाहिए। दुबलापतला बच्चा संसाधनों पर कम बोझ डालता है। छोटे कपड़े कम कपड़े में बन जाते हैं, भोजन कम खाता है और भविष्य में यदि नौकरी मिले तो कम खाने की आदत पहले से ही काम जाती है। ऐसी दूरदर्शिता हर सरकार में कहाँ होती है!

उधर खबर आई कि कूनो के चीतों के लिए खरीदे गए मटन में भी भ्रष्टाचार की बू रही है। सुनते ही कुछ लोगों ने फिर ईमानदारी का शंख बजाना शुरू कर दिया। जैसे देश की सारी समस्याएँ इसी मटन में छिपी हों।अरे भाई, ज़रा चीतों के भविष्य के बारे में भी सोचिए।

यदि उन्हें रोज़ बढ़िया मटन मिलता रहा तो वे जंगल में शिकार करना भूल जाएँगे। फिर वे भी सरकारी सुविधाओं के अभ्यस्त नागरिकों की तरह केवल अगली सप्लाई का इंतज़ार करेंगे। आत्मनिर्भरता का क्या होगा? इसलिए मटन में थोड़ीबहुत हेराफेरी वास्तव में वन्यजीवों को आत्मनिर्भर बनाने का अभिनव प्रयोग है। भूख सबसे बड़ा प्रशिक्षक होती है। भूखा चीता ही सबसे तेज़ दौड़ता है।आप उसके कुपोषण की चिंता करें।

कुछ लोग इसे भ्रष्टाचार कहते हैं। उन्हें प्रशासनिक दर्शन का ज्ञान ही नहीं है। हमारे यहाँ हर कमी के पीछे कोई कोई महान उद्देश्य अवश्य होता है। राशन कम मिले तो सादगी सिखाई जा रही है, दवा मिले तो रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाई जा रही है, सड़क टूट जाए तो वाहन धीरे चलेंगे और दुर्घटनाएँ कम होंगी, मशीनें बंद रहें तो बिजली की बचत होगी, और यदि मटन में भी कटौती हो जाए तो चीते का शिकार कौशल सुरक्षित रहेगा।

यह सब सुनकर लगता है कि हमारे देश में भ्रष्टाचार नहीं, बल्किरचनात्मक प्रबंधनचल रहा है। हर घोटाले के भीतर लोककल्याण का कोई कोई बीज अवश्य छिपा रहता है। बस जनता की दृष्टि इतनी विकसित नहीं हो पाई है कि वह उसे देख सके।

दरअसल समस्या योजनाओं में नहीं, जनता की सोच में है। जनता हर बात में खोट निकालने लगती है। उसे परिणाम चाहिए। उसे बच्चों का बढ़ता वजन चाहिए, महिलाओं का बेहतर स्वास्थ्य चाहिए, चीतों को पूरा मटन चाहिए। आखिर इतनी अपेक्षाएँ भी कोई करता है?

लोकतंत्र में नागरिक का पहला कर्तव्य सरकार पर विश्वास करना है, दूसरा कर्तव्य विश्वास बनाए रखना है और तीसरा कर्तव्य यह मान लेना है कि जो दिख रहा है, वह वास्तव में वही नहीं है।इसलिए अगली बार यदि किसी आँगनवाड़ी में बच्चा कुपोषित दिखे या किसी चीते के हिस्से का मटन रास्ते में ही दुबला हो जाए, तो घबराइए मत। समझ जाइए कि कहीं कहीं कोई बहुत ऊँची नीति काम कर रही है। इतनी ऊँची कि वह आम आदमी की समझ के कद से हमेशा थोड़ी ऊपर ही रहती है।

डाॅ प्रदीप उपाध्याय

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