काली आँधी \ कहानी - rashtrmat.com

काली आँधी \ कहानी

डॉ. नीरू मित्तलनीर’की कहानी काली आंधी में संघर्ष,सामाजिक सरोकार और प्रेरणा तीनों तत्व मौजूद हैं।ड्रग्स की समस्या,राजनीतिक संरक्षण और गांव के विकास कहानी को सामाजिक यथार्थ से जोड़ते हैं।यह  प्रेरणादायक सामाजिक कहानी है जो बताती है कि एक व्यक्ति का अच्छा आचरण पूरे समाज की दिशा बदल सकता है।

                   काली आँधी \ कहानी

फिरोजपुर जिले का एक छोटा-सा टापूनुमा गाँव है- बनेडी। तीन ओर से लहराती सतलुज नदी उसे बाहों में जकड़े है और चौथी ओर दूर तक फैली सरहद- पाकिस्तान। मानो गाँव किसी नक्शे पर नहीं, बल्कि नियति की रेखाओं के बीच फँसा हो। गाँव से कहीं भी जाने के लिए किश्ती ही एकमात्र साधन है। बारिश के दिनों में जब सतलुज उफान पर होती तो उस पार जाना और भी मुश्किल हो जाता। सतलुज का पानी गाँव में भर जाता, लोग अपना सामान कमरे के ऊपर बनी दुछत्ती पर चढ़ा देते, जैसे अपनी उम्मीदों को भी टांग रहे हों। चूल्हा भी नहीं जल पाता, स्टोव पर ही खाना बनता। केरोसिन की बड़ी किल्लत हो जाती और घंटों लाइन में लगे रहने पड़ता। पाँच लीटर केरोसिन मिलना किसी जंग जीतने से कम नहीं था। गाँव की पीड़ा समझने वाला कोई नहीं था। गाँव में न कोई डिस्पेंसरी, न कोई कॉलेज, बस एक लंबा इंतजार।

एक दिन पंजाब सेहत विभाग, ममदौट की ओर से मेडिकल कैंप लगा। बंतो कई महीनों से पेट दर्द से कराह रही थी। जब कभी दर्द ज्यादा होता तो अजवाईन की फक्की ले लेती या हींग मल लेती या कभी जीरा पीसकर खा लेती, कई बार वैद्य जी से दवाई भी लाई, पर कुछ आराम नहीं हुआ। दर्द था कि दिन-पर-दिन बढ़ता ही जा रहा था। मेडिकल कैंप की खबर सुनकर उसके पति करतार ने कहा- “पिंड विच मेडिकल कैंप लग रिहा ऐ..डागटर सॉब आणगे…तूं रोज दर्द नाल तड़फदी रेहंदी ऐं, चल, अज्ज मैं तैंनू विखा ल्यावां। ओ जेहड़ी दवाई लिख के देणगे, मलकीत शहर तों लिया दऐगा।”

“हाँ जी…बथेरे दिन हो गए…दरद जाण दा नां ही नीं लै रेहा। तुसीं ठीक कह रऐ ओ…विखा ही लेंदे हाँ,” बंतो ने धीमे स्वर में कहा।

दोनों मेडिकल कैंप में दिखाने गए। अपनी बीमारी से जूझते लोग इसी तरह के मेडिकल कैंपों का इंतजार करते रहते। दो घंटे लाइन में लगने के बाद नंबर आया। डॉक्टर ने देखकर कहा- “दर्द कम करने की दवाई तो मैं लिख दूँगा, परंतु इनको कुछ टेस्ट कराने होंगे, उसके बाद ही पता चलेगा कि असली बीमारी क्या है?”

मलकीत अपनी बेबे को किश्ती में ले जाकर फिरोजपुर के सिविल अस्पताल में दिखाता रहा। अस्पताल के चक्कर, लंबी जाँच प्रक्रियाएँ- सी.टी.स्कैन,पैट स्कैन और बायोप्सी सब करवाया गया। अन्ततः डॉक्टर ने कैंसर की पुष्टि कर दी। मलकीत, छोटा बेटा हरजीत और उनके पिता करतार, जी-जान से बेबे की सेवा करने लगे। जब बेबे को पता चला कि उसे कैंसर है तो वो भीतर से टूट गई पर चेहरे पर अजीब-सी दृढ़ता ले आई। अक्सर कहती- “सानूं रब ने राम-लखन दी जोड़ी दित्ती ऐ…सारे पिंड नूं तारणंगे मेरे पुत्तर…तुसीं वेखना, साड्डे मलकीत हरजीत एहो जेहा कम्म करणंगे जेहो जिहा किसे ने अज्ज तक नीं कीता होएगा।” मलकीत का पिता करतार उसकी बात सुनकर गर्दन हिला देता पर आँखों में छुपा डर कोई नहीं देख पाता। बस दस महीनों पश्चात् ही वो दुनिया छोड़ गई, चुपचाप, जैसे कोई दीया बिना शोर के बुझ जाता है।

समय बीतता गया। करतार के दोनों पुत्र पढ़ाई में अच्छे थे, परंतु जहाँ छोटा बहुत शरारती और चंचल था, बड़ा मलकीत ठहरा हुआ, संजीदा और पढ़ाई में डूबा हुआ। करतार को हमेशा छोटे बेटे की ज्यादा फिक्र रहती। गाँव में नशे का साया गहराता जा रहा था, बहुत से जवान लड़के इस दलदल में फँस चुके थे। छोटे-छोटे बच्चे भी ड्रग्स और हथियारों को सीमा से लाकर फिरोजपुर तक पहुँचाने में लगे हुए थे। ड्रग्स के इस पिशाच ने कितनी ही जवान जिन्दगियों को लील लिया था और कितने ही घर बर्बाद हो गये थे। करतार की चिंता दिन-रात उसे खाई जा रही थी-“रब्बा! मेरे पुत्तरा नूँ इस दलदल तों बचा रखीं,” वह अक्सर गुरुद्वारे में मत्था टेकते हुए बुदबुदाता।

पाकिस्तान की तरफ लगी कांटेदार बाड़ और उसके साथ ही लगे हुए खेतों में काम करना हमेशा जोखिम भरा रहता। न जाने कब किस तरफ से गोलीबारी हो जाए। बीएसएफ की तैनाती हर समय रहती, परंतु उसके बावजूद हथियार और नशे का व्यापार धड़ल्ले से चलता। जान हमेशा जोखिम में रहती, पर लोग इसके आदी हो चुके थे और यह टापूनुमा गाँव हर तरह की गैरकानूनी गतिविधियों में लिप्त था।

मलकीत कुछ अलग ही धुन का लड़का था। उसे पढ़ना बहुत अच्छा लगता, मास्टर रामदीन उसे अपने पुत्र की तरह प्यार करते। जब पाँचवीं में पढ़ता था तब मास्टर जी ने कहा था- “पाकिस्तान इस गाँव को बसने नहीं देता, तुम पढ़-लिख कर इस गाँव से गंदगी निकालना। इसे हरा-भरा और खुशहाल बनाना।” बस मास्टर जी की यही बात मलकीत ने गाँठ बाँध ली थी।

बारहवीं में अच्छे नंबर लेकर आया तो पिता से कहा- “बाऊजी! मैं वकालत करूँगा और गरीबों के केस मुफ्त लड़कर उनकी मदद करूँगा।” पिता को भी अपने होनहार बेटे पर गर्व था। उसने अपने बेटे की आँखों में जलती आग देखी तो सिर हिला दिया- “जा पुत्तर, तूँ पढ़, मैं तेरे नाल खड़ा हाँ।”

कॉलेज जाना-आना ही अपने आप में मुश्किल काम था, वह नाव में साइकिल रख उस पार जाता, वहाँ से पाँच किलोमीटर साइकिल चलाकर कॉलेज जाता और ऐसे ही वापस आता। कड़ी मेहनत और पक्के इरादे से मलकीत वकील बन गया, गाँव का पहला पढ़ा-लिखा और होनहार युवा। उसने गाँव के विकास के लिए पूरा जोर लगाया। वह चाहता था कि गाँव से शहर जाने के लिये नदी पर एक पुल बन जाए, साथ ही गाँव में डिस्पेंसरी और कॉलेज खोलने की भी माँग रखी। सरकार से काम करवाना कोई आसान काम तो है नहीं, बी.डी.ओ., विधायक और जिलाधीश के दफ्तरों के चक्कर लगाता रहा।

गाँव के सरपंच चाहे ज्यादा पढ़े लिखे नहीं थे, पर उसके कंधे पर हाथ रखकर कहते- “पुत्तर, मैं तेरे नाल आँ, चाहे कित्थे वी जाना पवे।” उनकी तरफ से वही चिट्ठी-पत्री का व्यवहार किया करता। जब जरूरत होती तो सरपंच जी को साथ ले बी.डी.ओ. साहब या जिलाधीश से मिलता। वहाँ के विधायक ढींडसा साहब नहीं चाहते थे कि गाँव का विकास हो। नशे और हथियारों का अवैध धंधा करके ही वह इतना पैसा कमाते थे कि चुनाव में खर्च कर सकें। परंतु अपनी धुन के पक्के मलकीत ने बार-बार पुल, कॉलेज और डिस्पेंसरी की माँग रखकर प्रशासन को इस बात के लिए मजबूर कर दिया। आखिर उसके अथक प्रयासों से वहाँ एक पुल बन ही गया।

पुल का उद्घाटन करने मुख्य-मंत्री के साथ विधायक ढींडसा साहब भी पधारे। उद्घाटन के दौरान अकेला मिलते ही उन्होंने कहा- “देख मलकीत! पुल तो बन गया है, लेकिन इस गाँव का विकास होना चाहिए। अब पुलिस आसानी से यहाँ चक्कर लगाया करेगी, तो एक दिन यह न हो कि गाँव के सारे लड़के जेल में मिलें,” और हो.. हो… करके हँसने लगे। उसकी हँसी में छिपा व्यंग्य मलकीत के सीने में तीर की तरह चुभ गया।

मलकीत गाँव की खुशहाली के सपने देखा करता। मास्टर रामदीन उसके जज्बे में सूरज की किरणों का उजाला भरते। वह गाँव के हर सुख-दुख में सबसे पहले पहुँचता। हारी-बीमारी में भी लोगों को अस्पताल दिखाने शहर ले जाता। जब लड़के नशाखोरी करते या ड्रग्स ले जाते हुए पकड़े जाते तो वही उनकी जमानत करवाता। गाँव के बड़े बुजुर्ग उसके लिए गुरुद्वारे में अरदास करते। जवान लड़के उससे डरते। बच्चों का वह स्कूल में दाखिला कराता, रात के समय मुफ्त ट्यूशन भी पढ़ाता। परंतु मलकीत जितनी मेहनत करता, गाँव वालों की हालत सुधारने की कोशिश करता, नशे के व्यापारी उससे चार कदम आगे ही रहते।

एक शाम करतार ने चूल्हे पर सरसों का साग चढ़ाया और मक्की का आटा गूँथ रहा था कि हरजीत आकर मंजे पर लेट गया- “पुत्त, उठ के रोटी खा लै…सरों दा साग बणाया ऐ…तेरी बेबे वरगा तां मैं नीं बणा सकदा पर फेर वी स्वाद बनया ऐ।” करतार ने हरजीत को कई बार उठाया, परंतु वह नहीं उठा तो उसे कंबल ओढ़ा दिया। थोड़ी देर बाद उसने हरजीत को ड्रग लेते हुए देख लिया। अब तो करतार बिलख पड़ा-“हाय रब्बा…एहो दिन वेखणा रेह गया सी! जेहड़े दैत तों सारी जिंदगी दूर भज्दा रेहा, ओही मेरे घर विच आ बैठ्या ऐ। इक पुत्तर पिंड वास्ते दिन रात इक कर रेया ऐ, ते दूजा नशे विच डुब्या रहंदा ऐ।” फिर बंतो की फोटो के आगे खड़ा हो गया, “नी बंतो! मैं बथेरी कोशिश कीती, मेरे घर नू ऐ दैत ना खावे, पर मैं हार गया, मैनूँ माफ कर दईं, मैं जवाकां दा चंगी तरां ध्यान नीं रख सकया।” इसके बाद तो घर में मुर्दनी छा गई।

मलकीत धैर्य से काम लेते हुए हरजीत को नशा मुक्ति केंद्र ले गया पर वहाँ की हकीकत और भी भयावह थी। ये एक दूसरा नर्क था। नशे के व्यापारियों की वहाँ पूरी पहुँच थी, और दाखिल लड़कों को नशा मुहैया कराया जाता था। हरजीत भी उनके हत्थे चढ़ गया और एक दिन नशा मुक्ति केंद्र से भाग आया। अब तो वह नशे की सप्लाई करने और नशा लेने, दोनों में ही अग्रणी हो गया। अब वह अपनी मर्जी का मालिक था, मर्जी होती तो घर आता, नहीं तो नशे में डूबा कहीं पड़ा रहता। नशे का व्यापार करके कमाता और नशे पर ही उड़ा देता। आखिर वही हुआ जो होना था। एक दिन पुलिस की गिरफ्त में आ गया। किसी तरह जमानत करवा कर मलकीत उसे छुड़ा तो लाया, परंतु इस बात की कोई गारंटी नहीं थी कि वह दोबारा नशे का व्यापार नहीं करेगा। महीने भर के भीतर ही हरजीत दोबारा ड्रग्स ले जाते हुए पकड़ा गया।

चुनाव सिर पर आ रहे थे और चुनावों में तो गाँवों की अहमियत बढ़ जाती है। मलकीत जानता था, वैसे चाहे गाँव वाले उसे प्यार करते हैं, उसका कहना मानते हैं, आदर सम्मान करते हैं, परंतु पैसा बड़ी खराब चीज है। वोट डालने के लिए जब शराब की बोतल, कट्टा भर चावल और नकद राशि मिलेगी, तभी वोट पड़ेंगे। वैसे भी सभी नेता तो एक ही थाली के चट्टे-बट्टे हैं। वोट किसी को भी डाला जाए, हालात तो वही रहेंगे।

चुनाव से पहले विधायक ढींडसा गाँव आया। मलकीत को देखकर बोला- “गाँव में तो बहुत विकास हो गया भाई! हैं…क्या कहने, अब तो गाँव और जेल दोनों एक जैसे ही हो गए हैं।” उसकी जहरीली हँसी गूँजती रही।

मलकीत जैसे जमीन में गड़ा जा रहा था। उसे लगा कि वह पुल पर जा रहा है और पुल नीचे बैठने लगा है। पुल के नीचे कीचड़ है, उस कीचड़ में हथियार दबे हुए हैं। बड़े-बड़े काँटों वाले पौधों पर ड्रग्स के पैकेट उगे हैं। वह कीचड़ में धँसता जा रहा है, उसका बदन काँटों से लहूलुहान हो रहा है, उसके सिर पर भी ड्रग्स के पैकेट लटक रहे हैं। आगे काली आँधी चल रही है, धीरे-धीरे वह काली आँधी हरजीत का रूप लेकर जोर-जोर से हँसने लगी…फिर आँधी में ढींडसा का चेहरा नजर आने लगा…वह चेहरा ठहाके मार कर हँस रहा है..हँसता ही जा रहा है।

उस रात मलकीत सो नहीं पाया। आँखें बंद करता तो वही दृश्य- कीचड़, काँटे, ड्रग्स के पैकेट, हरजीत की हँसी और ढींडसा का ठहाका। पर अचानक जैसे भीतर कहीं कोई आवाज उठी- “भागना हल नहीं है मलकीत..तूने ही तो कहा था कि पिंड बदलना है…”

वह झटके से उठ बैठा। माथे पर पसीना था, पर आँखों में एक नई चमक। सुबह होते ही वह गुरुद्वारे पहुँचा। माथा टेकते हुए बुदबुदाया- “वाहेगुरु… मैं अकेला नहीं लड़ सकता पर तू साथ हो, तो सब मुमकिन है …”

उस दिन से मलकीत बदल गया। अब वह केवल लोगों की मदद नहीं करता था, बल्कि उन्हें जगाने लगा। एक शाम उसने गाँव के चौपाल में सबको इकट्ठा किया। बूढ़े, जवान, औरतें, सब बैठे थे। मलकीत ने दृढ़ स्वर में कहा- “आप सब जानते हो हमारा पिंड किस राह पर जा रहा है..हम अपने बच्चे खो रहे हैं, आज अगर चुप रहे तो कल हमारे घर सिर्फ अँधेरा रह जाएगा…”

भीड़ में सन्नाटा छा गया। एक बुजुर्ग ने काँपती आवाज में कहा- “पर पुत्तर… असीं की कर सकदे हाँ? ओ लोग बहुत ताकतवर ने…”

मलकीत की आवाज और ठोस हो गई- “डर ही हमारी सबसे बड़ी कमजोरी है… अगर हम एक हों तो कोई हमें नहीं हरा सकता!”

धीरे-धीरे बदलाव शुरू हुआ। मलकीत ने गाँव के युवाओं को साथ लेकर नशा विरोधी समिति बनाई। स्कूल के बच्चों के साथ रैलियाँ निकालीं- “नशा छोड़ो, जीवन जोड़ो!” के नारे गूँजने लगे। मास्टर रामदीन ने उसका साथ देते हुए कहा- “आज से यह लड़ाई सिर्फ मलकीत की नहीं, पूरे गाँव की है।”

सबसे कठिन काम अभी बाकी था। एक दिन मलकीत सीधे पुलिस अधीक्षक के दफ्तर पहुँचा। उसने नशे के धंधे, नेताओं की संलिप्तता और गाँव की स्थिति के पुख्ता सबूत सौंप दिए। अधिकारी ने आश्चर्य से पूछा- “तुम जानते हो, इसके क्या परिणाम हो सकते हैं?”

मलकीत ने बिना झिझके कहा- “जी, जानता हूँ…पर अगर आज डर गया, तो सारी जिंदगी खुद से नजरें नहीं मिला पाऊँगा।”

गाँव में हलचल मच गई। छापेमारी शुरू हुई। कई तस्कर पकड़े गए। ढींडसा का नाम भी जाँच के घेरे में आ गया। गाँव में पहली बार डर का संतुलन बदला। अब डर ईमानदार लोगों के दिल में नहीं, बल्कि अपराधियों की आँखों में था। पर सबसे बड़ा संघर्ष अभी बाकी था- हरजीत।

एक रात मलकीत ने उसे ढूँढ निकाला। नशे में चूर, एक कोने में पड़ा था। मलकीत ने उसे झकझोरते हुए कहा- “हरजीत! उठ…देख अपने आप को, हम दोंनो वही भाई हैं जिन्हें बेबे ‘राम-लखन दी जोड़ी’ कहती थी।”

हरजीत ने लड़खड़ाती आवाज में कहा- “छोड़ दे वीर…मैं खत्म हो गया हूँ …”

मलकीत की आँखों में आँसू थे-“नहीं! तू खत्म नहीं हो सकता, तूं मेरा वीर है” इस बार मलकीत उसे एक अच्छे पुनर्वास केंद्र ले गया, जहाँ इलाज इंसानियत से होता था।लंबी जद्दोजहद के बाद…महीनों की पीड़ा, टूटन और संघर्ष के बाद, हरजीत लौट आया। कमजोर था, पर आँखों में फिर से जीवन था।

एक दिन उसने मलकीत के सामने सिर झुका कर कहा- “वीरे मुझे माफ कर दे… मैंने बेबे का सपना तोड़ दिया…”

मलकीत ने उसे गले लगा लिया- “नहीं वीर तू वापस आ गया… बस ये ही हमारी जीत है…”

समय के साथ गाँव में अब एक छोटी-सी डिस्पेंसरी बन गई। कॉलेज के लिए मंजूरी मिल गई। पुल पर अब सिर्फ लोग ही नहीं चलते थे, उम्मीदें भी बड़ा सफर तय कर पाती थीं। और हरजीत वही हरजीत अब स्पोर्ट्स टीचर हो गया था। बच्चों को खेल सिखाता, नशे से दूर रहने की सीख देता।

एक शाम, मलकीत और मास्टर रामदीन पुल पर खड़े थे। सूरज ढल रहा था, और उसकी किरणें सतलुज के पानी पर सुनहरी चादर बिछा रही थीं। मास्टर जी मुस्कराए- “देख मलकीत… तेरा सपना सच हो रहा है।”

मलकीत ने दूर गाँव की ओर देखा- वहाँ अब अँधेरा नहीं, हल्की-सी रोशनी थी। उसने धीमे से कहा- “नहीं मास्टर जी ये हमारा सपना है…आज लगता है… बेबे कहीं-न-कहीं मुस्करा रही होगी…”

हवा में जैसे बंतो की आवाज गूँजी- “जिउंदा रह मेरे पुत्तर..तूँ सचमुच पिंड नूं तार दित्ता ए…” और इस बार मलकीत के होंठों पर भी एक सुकून भरी मुस्कान थी।

डॉ. नीरू मित्तल ‘नीर’

पता : #40, सेक्टर 15,पंचकूला, हरियाणा -134113

Email: neerumittal58@gmail.com

MO : 9878779743

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